HDG Srila Prabhupad Bhaktisiddhanta Saraswati Goswami Thakur

HDG Srila Prabhupad Bhaktisiddhanta Saraswati Goswami Thakur

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To spread the divine glories, teachings and instructions of Srila Prabhupad HDG Srila Bhakti Siddhant Saraswati Goswami Thakur.

07/16/2023

❣️श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु ❣️

प्रश्न - कृपा या शक्ति कैसे प्राप्त होती है ?

उत्तर - ऐकान्तिकरूप से श्रीगुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने पर ही गुरु की कृपा से जीव के हृदय में कृष्ण की शक्ति सञ्चारित होती है । वही कृपाशक्ति सेवा के द्वारा पुष्ट होकर क्रमश: अनर्थों को ध्वंस करती रहती है। किन्तु सेवा बन्दकर देने पर या सेवा के प्रति उदासीन होने पर पुनः अनर्थ बढ़ने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप कृष्ण की शक्ति क्रमशः दूर होने लगती है । जैसे किसी बीज को भूमि में रोपणकर अच्छी प्रकार से जल से सिंचाई करने पर उससे अंकुर फूटता है। जब तक वह अंकुर मजबूत होकर वृक्ष नहीं बन जाता, तब तक उसकी बाहरी किसी भी प्रकार के आक्रमण से रक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गुरुदेव से प्राप्त कृष्णशक्ति को भजन के द्वारा क्रमशः बढ़ाने की आवश्यकता होती है ।

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/25/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - श्रीराधारानी को अभी हम कहाँ प्राप्त कर सकते हैं ?

उत्तर - श्रीराधारानी अभी नहीं है, ऐसी बात नहीं है। अभी हम उन्हें प्राप्त कर सकते हैं, उनकी सेवा प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम श्रीगुरुदेव में श्रीराधारानी के चरणनख की शोभा का दर्शन करें, तो राधारानी को हम कहां प्राप्त करेंगे-ऐसा विचार कभी भी हमारे हृदय में नहीं आयेगा । यदि भाग्य अच्छा हो, तो श्रीराधारानी के निजजन, श्रीराधाजी से अभिन्न मूर्ति श्रीगुरुदेव में श्रीराधारानी के पदनख की शोभा का दर्शन एवं उनकी सेवाप्राप्ति का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं। मधुर - रस में श्रीगुरुदेव श्रीराधारानी की प्रिय सखी एवं उनसे अभिन्न है। मधुर रस के आश्रित गुरुनिष्ठ भक्तों का ही श्रीगुरुदेव में श्रीराधारानी के पदनख की शोभा का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है ।श्रीगुरुदेव श्रीराधाजी के प्रकाशमूर्ति या अभिन्न वार्षभानवी है, इसे एकमात्र गुरु के स्निग्ध शिष्यगण ही अनुभव कर सकते हैं।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/24/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - हमें कौन - सा रोग है ?

उत्तर - कृष्ण की सेवा की चेष्टा को छोड़कर अपने सुखदायक वस्तुओं का संग्रह करना ही हमारा मूल रोग है । हमें विषयरस अच्छा लगता है , परन्तु सभी विषयों के भी विषय कृष्ण की सेवा हमें अच्छी नहीं लगती यही हमारा दुर्भाग्य है । पीलिये के रोगी को मीठी मिश्री भी कड़वी लगती है , उसी प्रकार विषयों में आसक्त होने से मधुर से भी मधुर कृष्णनाम और कृष्णसेवा में हमारी रुचि नहीं होती । यदि शरीर में विष चढ़ जाए तो शहद भी कड़वा लगता है । मिश्री ही पीलिया रोग की औषधि है । मिश्री खाते - खाते धीरे - धीरे जब रोग दूर होने लगता है , तो क्रमशः वही मिश्री मीठी लगने लगती है । उसी प्रकार अनर्थग्रस्त होने के कारण इच्छा न होने पर भी यदि कृष्णनाम और कृष्ण की सेवा की जाए , तो क्रमशः बहिमूर्खता दूर होने लगती है तथा संसार के प्रति आसक्ति कम होने लगती है । फलस्वरूप भगवान के नाम और उनकी सेवा में रुचि होने लगती है । उस समय कृष्णनाम - माधुर्य स्वयं ही प्रकाशित होकर हमें चिन्मय इन्द्रियों के द्वारा भगवान की सेवा में नियुक्त कर देते हैं ।

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/23/2023

⚘️श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु ⚘️

प्रश्न - भगवान की जन्म-लीला किस प्रकार की है ?

उत्तर- नित्यसिद्ध होने के कारण शचीमाता एवं जगन्नाथ मिश्र का हृदय एवं देह - दोनों ही शुद्ध - सत्त्वमय है, साधारण बद्धजीव की भाँति जड़ नहीं हैं। विशुद्ध सत्त्व का नाम वसुदेव है । वसुदेव के हृदय में ही चिद्विलासी वसुदेव प्रकटित होते है। जड़ इन्द्रिय तर्पणमय, प्राकृत रक्तमांसमय देह, स्त्री-पुरुष की कामक्रीड़ा एवं गर्भ की भांति जगन्नाथ एवं शचीदेवी का मिलन एवं शचीदेवी का गर्भसंचार नहीं हुआ है। अतः मन ही मन ऐसी चिन्ता करना भी अपराध है। भगवान की सेवा के उन्मुख चित्त से विचार करने पर शुद्धसत्त्वमय शचीदेवी के अप्राकृत गर्भ की महिमा को समझा जा सकता है। भागवत की टीका में श्रीधरस्वामी पाद कह रहे हैं-

*मनः आविवेश मनसि आविर्वभूव, जीवानामिव न धातुसम्बन्ध इत्यर्थः ।*

इस सम्बन्ध में श्रीरूप गोस्वामी प्रभु लघुभागवतामृत ग्रन्थ में कह रहे हैं- कृष्ण सर्वप्रथम वसुदेवजी के हृदय में प्रकट होते हैं। तत्पश्चात् वसुदेवजी के हृदय से देवकीजी के हृदय में प्रकटित होते हैं। श्रीचैतन्यचरितामृत में आदि १३ परिच्छेद में हम देखते हैं-

*जगन्नाथ मिश्र कहे - स्वप्न जे देखिल ।*
*ज्योतिर्मय धाम मोर हृदये पशिल ||*
*आमार हृदय हैते गेला तोमार हृदय ।*
*हेन बुझि जन्मिबेन कोन महाशये ॥*

अर्थात् जगन्नाथ मिश्र शचीदेवी को कह रहे हैं- स्वप्न में देखा कि एक अत्यन्त ज्योतिर्मय स्वरूप मेरे हृदय में प्रवेश कर गया। तत्पश्चात् मेरे हृदय से वह स्वरूप तुम्हारे हृदय में प्रवेश कर गया। इससे ऐसा लगता है कि अवश्य ही कोई महापुरुष प्रकटित होगे ।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/20/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न -क्या भक्त अपनी बात कहते हैं ?

उत्तर - मुझे अनेक लोग कहते हैं कि आपकी कथा सुनकर मैं बहुत उपकृत हुआ हूँ । किन्तु इसमें हमारी कोई विद्या - बुद्धि नहीं है। गुरुदास होने के कारण हम केवल गुरुपादपद्म की ही कथाओं को कहते हैं । हम किसी प्रकार की कोई नई बात नहीं कहते । हाँ! भगवान को पाने के लिए उसके अनुकूल जो सब कथाएँ कहने योग्य हैं, हम केवल वही कहते हैं ।

मैंने आपके समक्ष जो सब कथाएँ कही हैं, उसमें मेरा कुछ भी नहीं है । हमारी व्यक्तिगत किसी प्रकार की योग्यता नहीं है। यह सब गुरुदेव की ही कथा है। गुरुपरम्परा में मेरे गुरुदेव तक जो सनातन सत्य कथाएँ चली आ रही हैं, मैं उन्हीं कथाओं का ही कीर्त्तन करता हूँ ।

भक्त कहते हैं कि श्रीगुरुपादपद्म कृपापूर्वक हृदय में जो स्फूर्ति कराते हैं, वही जिह्वा में प्रकाशित होता है। मेरी अपनी कुछ भी बोलने की योग्यता नहीं है ।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/19/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - हम साधु को कैसे पहचानेंगे ?

उत्तर - अनेक समय हम साधु को पहचानने की चेष्टा करते हैं। उनकी सेवामय क्रिया - कलापों को न समझ पाने के कारण उन्हें त्याग कर देते है, जैसे कि हम परीक्षक हैं । हम किस यन्त्र के द्वारा साधु की परीक्षा कर रहे हैं? हमें अहंकार परित्यागपूर्वक दैन्य एवं आर्ति भाव के साथ साधुओं के पास जाना चाहिए। उनके शरणागत होकर उनका संग करने पर ही उनकी कृपा से ही उन्हें जाना जा सकता है ।अन्य किसी प्रकार से साधु को नहीं जाना जा सकता है । निष्कपट होकर साधुओं से हरिकथा सुनने पर हमारी समस्त प्रकार की असुविधाएं एवम् अमंगल दूर हो जाएंगे और हमारे ह्रदय में प्रचुर बल आएगा ।

गीता में कृष्ण कह रहे हैं-

*तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।*
*उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन :।।*

(गीता ४/३४)

प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवाभाव को लेकर भगवद्तत्त्वविद् साधुओं के निकट जाने पर वे हमें भगवद् भजन के इच्छुक एवं शरणागत जानकर उपदेश प्रदान करेंगे ।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/09/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृत

प्रश्न - हम लोग वास्तव सत्य कैसे जान पायेंगे ?

उत्तर - बहिर्मुख व्यक्ति की श्रद्धा, भक्ति तथा रुचि- सभी कुछ बहिर्मुखी होती है। मनुष्य ऐसी श्रद्धा, भक्ति तथा रुचि के माध्यम से कभी भी सत्य वस्तु को नहीं पा सकता । जब वास्तव वस्तु स्वयं ही कृपाकर अवतीर्ण होते हैं, तभी वे स्वयं ही अपने को जना देते हैं। किस वस्तु को प्राप्त करना चाहिए, अकपट सेवोन्मुख व्यक्ति को चैत्यगुरु कृपापूर्वक जना देते हैं। विशुद्ध आम्नायधारा के माध्यम से ही वास्तव सत्य वस्तु प्रवाहित होती हैं ।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/07/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - क्या मठ बनाकर रहना ही हमारा कार्य है ?

उत्तर - स्वयं मठ बनाकर आराम से रहने के लिए चेष्टा न कर जीवन्त मठ बनाने के लिए प्रयत्न करना ही बुद्धिमत्ता है । यदि किसी एक श्रद्धालु व्यक्ति को श्रीगुरुदेव के चरणकमलों में आकर्षित किया जा सके, तभी जीवन्त मठ बनाया जा सकता है। गुरु की महिमा और गुरु की सेवा की बात कहकर जीवों को गुरुपादपद्म में आकर्षित करना ही सबसे बड़ा मंगलजनक कार्य है। इसलिए जीवों के कल्याण के लिए गैलन - गैलन रक्त खर्च करने पर गुरु एवं कृष्ण अवश्य ही प्रसन्न होंगे। अतः तन-मन-वचन से ऐसे जगत- मंगलजनक कार्य के लिए व्रती होना ही बुद्धिमत्ता है। इसी में जीवन की सार्थकता भी है।

हरिकीर्तन से गुञ्जित हरिसेवामय मठ साक्षात् वैकुण्ठ है। इसलिए मठवास ही धामवास है। मठ में हरिकथाओं की आलोचना प्रबल होनी चाहिए। केवल खाने - रहने के लिए ही मठ करने से कोई लाभ नहीं है। हरिकथाओं का प्रचार करने के लिए ही मठ करने की आवश्यकता है। इसी से अपना एवं दूसरों का मंगल होगा ।

गुरुनिष्ठ भक्त ही जीवन्त साधु या Living source है। ऐसे जीवन्त साधुओं के पास ही हरिकथा सुननी होगी। तभी हम गुरुदेवात्मा हो सकते हैं । गुरुनिष्ठाहीन या गुरुसेवा से वंचित व्यक्ति जीवन्मृत (जीते जी मरा) है। ऐसे अवैष्णव का संग नहीं करना ही उचित है। इससे हमारा अमंगल ही होगा ।

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

04/02/2023

Everybody, unitedly and full of enthusiasm must spread the loving message of Rupa and Raghunatha.

- Srila Prabhupad Bhaktisiddhant Saraswati Goswami Thakur.

04/01/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - वास्तविक सेव्य ( सेवा ग्रहण करने वाला ) कौन हैं ?

उत्तर - कृष्ण ही जगत के एकमात्र सेव्य है । वे ही समस्त वस्तुओं के प्रभु है । कृष्ण ही सभी के एकमात्र सखा , सभी माता - पिताओं के एकमात्र पुत्र , समस्त स्त्रियों के एकमात्र कान्त ( प्रेमी ) हैं । कृष्ण जिसके सेव्य वस्तु के रूप में प्रकाशित होते हैं , वे किसी दूसरे की सेवा कर ही नहीं सकते।

समस्त कारणों के कारण कृष्ण हैं । वे ब्रह्म , परमात्मा एवं अन्यान्य विष्णु अवतारों के भी कारण हैं ।

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

03/31/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - सेवा का फल क्या है ?

उत्तर - निष्कपट रूप से भगवान का आश्रय ग्रहण करना एक बात है तथा भगवान की सेवा के नाम पर अपनी इच्छानुसार चलना एक बात है। जो स्वतंत्र है, वह अनुगत नहीं है तथा जो अनुगत है, वह स्वतंत्र नहीं है । अनुगत - श्रेयःपन्थी तथा स्वतंत्र - प्रेय:पन्थी हैं । सेवा का अभिनय तथा सेवा एक वस्तु नहीं है। फल के द्वारा ही उसका पता चलता है। सेवा के फल से उत्तरोत्तर सेवा में उन्नति या सेवा की प्रबल आकांक्षा उत्पन्न होती है, इसके विपरीत अर्थात् सेवा का अभिनय करने से भोगों की ओर प्रगति होती है ।

जगद्गुरू श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

03/30/2023

श्रील प्रभुपाद उपदेशामृतसिंधु बिंदु

प्रश्न - निष्किञ्चन कौन हैं ?

उत्तर - जो इस जगत की कोई भी वस्तु नहीं चाहते , वे ही निष्किञ्चन हैं , वे विचार करते हैं कि जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है , जो मुझे सदैव सुख प्रदान कर सके । इस पृथ्वी में नित्य सुखद कोई वस्तु नहीं है । यह पृथ्वी बद्ध जीवों के लिए कारागार सदृश है । हमलोग भगवान को भूलकर ही इस संसाररूपी कारागार में कैद हो गये हैं । इसीलिए इतना कष्ट पा रहे हैं ।
प्रह्लाद महाराज भारत - सम्राट होते हुए भी निष्किञ्चन भक्त थे और सुदामा विप्र अत्यंत निर्धन होने पर भी निष्किञ्चन थे क्योंकि ये दोनों ही निष्काम भक्त थे । निष्किञ्चन भक्त जानते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत हरि , गुरु एवं वैष्णवों की सेवा का उपकरण है । इसीलिए वे इस जगत की किसी भी वस्तु के प्रति भोगबुद्धि नहीं करते और उनका त्याग भी नहीं करते हैं । बल्कि समस्त वस्तुओं को भगवान की सेवा में ही लगाते हैं । यदि कोई हरिभजन न करे , तो उसे इस जगत से एक तृण भी ग्रहण करने का अधिकार नहीं है । भक्तलोग पग - पगपर इसकी उपलब्धि करते हैं ।
भक्तलोग जानते हैं कि कृष्ण की शुद्धभक्ति करने पर समस्त प्रकार की सुविधाएँ एवं समस्त प्रकार का मंगल प्राप्त हो जाता है । निरपराध होकर निरन्तर कृष्णनाम की सेवा करने पर भक्त , भक्ति और भगवान के स्वरूप को जाना जा सकता है । साधु , गुरु के मुख से कृष्णकथा श्रवण करने का सौभाग्य होने पर ही उस कथा का कीर्तन करना चाहिए । तभी कृष्णानुशीलन सम्भव है । कृष्ण का अनुशीलन ( कृष्ण की सेवा की चेष्टा ) न रहने पर कृष्ण के अतिरिक्त सांसारिक वस्तुओं का अनुशीलन ही होगा ।

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर

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