Dr. Latika Rani

Dr. Latika Rani

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I am available to tutor IB and IGCSE students in Hindi, either over Skype, or at my home in Singapore. I have 12 years of teaching experience.

27/07/2021

आज एक अरसे बाद अपने इस पृष्ठ पर हाज़िर हुई हूं!!!
चंद पंक्तियां:

कितनी यादें सिरहाने मेरे
आओ थोड़ा थोड़ा रख लें

अधूरी उमंगों का वो स्वाद
थोड़ा तुम चख लो, थोड़ा हम चख लें

अनकहे, अधूरे अल्फाजों को
थोड़ा तुम कह लो थोड़ा हम कह लें

जो बंधन न हो, मुक्त करे
वह प्रेम ज़रा सा तुम कर लो
कुछ हम कर लें।

कौन हो तुम?
सुना है इश्क़ कभी हंसाता नहीं और दोस्त कभी रुलाता नहीं
यह फ़र्क कुछ कुछ तुम समझो
कुछ हम समझ लें।😊😊❤️❤️

16/11/2020

"सबसे ख़तरनाक"...................

एक पंजाबी कवि 'पाश' की संभवतः अपूर्ण रह गई एक लंबी कविता के कुछ अंश पर आज एक लघु व्यंग्य विमर्श🙂:

' सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...
सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है

तुम्हारे बग़ैर मैं होता ही नहीं
तुम्हारे बग़ैर मैं पूरा खचाखच भरा रहता हूँ
मैं पूरे का पूरा तूफ़ान होता हूँ

"सबसे ख़तरनाक है तड़प का न होना
सबसे ख़तरनाक है हमारे सपनों का मर जाना.".......

कितने अलग अलग कोणों से व्याख्या करें इसकी।🙂 ख़ास तौर से युवा पीढ़ी को या फिर हममें से कई भ्रमितों को बाज़ार ने जो भांग खिलाई है, आज व्यथित होकर वहीं से लिखने अनायास बैठ गई।🙂

इनके या हमारे सपने मरे नहीं हैं, सपने बदल गए हैं। असली सपनों से अलग हो गए हैं। अब मनुष्य सपने देखने और पूरा करने से पहले ही उसे बेचने में लगा है। हमने बदलाव के सपने बुनने छोड़ दिये हैं। बाज़ार और स्व केंद्रित सोच ने हमारी दृष्टि ही वहाँ से हटा दी है।
हम सब एक मनुष्य के तौर पर एक चलचित्र सा जीवन जी रहे हैं। सिनेमा टाइप। दो चार लोग ही नहीं, पूरी की पूरी एक पीढ़ी इन सपनों में खोई हुई है। कुछ चुभता नहीं हमें, बेचैन नहीं करता, कुछ भी सतर्क नहीं करता हमें, अब हिमालय से कोई गंगा नहीं निकलती, परिवर्तन का कोई बिगुल नहीं बजता....

बस 'मैं और सिर्फ़ मैं' 'मेरा और बस मेरा'.......

बहुत डरावनी है यह तस्वीर, जहाँ बाज़ार कहता है," तुम हमारे हिसाब से सपने देखो... हम दे/ बाँट तो रहे हैं सपने!!" ढोंग के, बनावट के, दिखावों के, छल के।
यू ट्यूब, सोशल मीडिया, इश्तहार वग़ैरह वग़ैरह......है न बिना शर्त सहायता के लिए...
ऐसे में हम बहुत ही सक्षम क़िस्म के पुतले मात्र बन कर रह गए हैं।
सारा चिंतन इकोनॉमी पर बेस्ड... सारी रचनात्मकता/ क्रिएटिविटी, बाज़ार कैसे बढ़े, इसी के इर्द गिर्द..
अत्यंत दुखद। मनुष्य का बौद्धिक पैनापन भी बाज़ार के ही काम आ रहा है। बहुत सिकुड़ गया है दायरा जीवन, प्रेम, देय और विराट उद्देश्यों को लेकर...बाज़ार, चमक धमक से अधिक जीवन की और कोई उपादेयता ही नहीं परोस रहा...

तड़प बची ही नहीं, न प्रेम की, न क्रांति की, न ज़ोर से हँसने की, न हँसाने की, न साहस की, न विसंगतियों पर चोट करने की, न ज़ोर से आलिंगन की.... कितनी गिनाऊँ...

पर हर स्टोरी के अंत की तरह इस प्रसंग में भी एक तड़प अब भी बची है, हमारी परंपरा में जन्म जन्मांतर तक कायम भी रहेगी ' विश्वास और आस की'।🙏🙂हमारा साहस वहीं से आता है कि कुछ तो अच्छा होगा.....
जल्द हाज़िर होंगे🙏🙂💐

30/09/2020

स्त्रियाँ, ऐसा करो कि अब न जनो पुरुष अपनी देह से
न जाने उनमें कौन बलात्कारी हो
और पशुता की सारी सीमाएँ लाँघ जाए।
और बल- वर्चस्व के दोगलेपन से मानवता शर्मसार कर जाए।
निःशब्द हूँ, किसको मर्द कहूँ यहाँ?
जिसकी मर्दानगी औरत के सिर्फ़ जिस्म तक सिमट कर रह जाए?


वही देह अपने घर की हो तो आबरू
और पड़ोसी या गाँव की हो
तो हाइवे या खेतों में नोंचने खसोटने की एक वस्तु बिकाऊ?
भीतर भीतर रिसने वाले ज़ख्म से कब तक कराहोगी
कोई न आएगा.....
चाहे रूह से भी चिल्लाओगी।

सोचती है लड़की, शायद अब समाज बदल सकता है
पर पता नहीं उसे
कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तन ढंका हो या मन में दुआ हो
वह दरिंदा तो भीतर तक देख सकता है।

कैंडल मार्च और रैलियों से भला क्या होगा
जहाँ दरिंदों का न कोई ईमान होगा।
क्या कलम से क्रांति का आह्वान होगा?
कौन से संकल्प से अब नया विहान होगा?
अब ख़ुदा भी सिर्फ़ बुतपरस्त है
अपना और वहशी का ख़ुद ही संग्राम होगा।

कब मैं सर उठाकर जी सकूँगी
और रूह पर लगे लहू के दाग़ धो सकूँगी।।।।।

30/04/2020

टूटा एक और सितारा😥........

" हम तो चले परदेस हम परदेसी हो गए, छूटा अपना देश..." गाकर आज सचमुच देश ही नहीं... ऋषि कपूर दुनिया छोड़ गए।
गहरी, चुप आँखों से बोलने और जीवन से भी अधिक सहज, सरल अभिनय के धनी इरफ़ान ख़ान भी कल चुपचाप अलविदा कह गए।

समय की गति अपूर्व है। निरंतर गतिशील, परिवर्तनशील और मृत्यु के आलिंगन का शाश्वत सत्य। न देखा, न इनसे कभी मिली फिर आख़िर इतनी पीड़ा क्यों छलकी मेरी लेखनी से... मेरे लिए भी यह एक सवाल ही है, पर फिल्मों में रुलाते, हँसाते, गाते न जाने कब हम इन चरित्रों के साथ साथ अनजाने ही जीने लग जाते हैं। कभी उनमें अपने किसी पड़ोसी युवा की रोमांटिक झलक, तो कभी कल्पना में उनके साथी कलाकार की भूमिका , कभी भावुक करनेवाले संवादों पर रोने में उनका साथ देना तो कभी अद्भुत अभिनय कला के लिए ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजाना।......
और ऐसा ही कुछ रिश्ता था इन दोनों के साथ हमारा।

यह सब कहकर कहना तो यही चाहती थी कि "मौत,....सब रंग कच्चा एक तेरा ही रंग पक्का...."। मृत्यु किसी भी संस्कृति में भयानक है, पर उसी का भय जीवन बोध को और गहरा करता है। आलेखों और चर्चाओं तक तो यह ठीक लगता है पर अगर वह जीवन के मार्ग पर खड़ी मिले तो उस सिहरन का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
पर आख़िर में ऋषि और इरफ़ान साब.. आपके लिए तो यही कहेंगे कि
आप गए नहीं, हमारे बीच रह गए हैं अपने क्रिएशन से, अपनी अर्थपूर्णता और सार्थकता से.....
और यह भी कि महामारी में हमसे विदा लेने वाले उन लाखों अनजान वजूदों पर क्या लिखें.....कहीं कुछ पढ़ी हुई पंक्तियाँ.. यही न..कि
" ज़िंदगी एक बार फिर मिलना
इस दफ़ा तुझको प्यार कर न सके
तुझको हम अपना कह भी न सके.
वक़्त ने वक़्त ना इतना दिया
ज़िंदगी एक बार फिर मिलना"
😥😥🙏🙏🙏❤️❤️❤️🌹🌹🌹

27/09/2019

हँसिये, हँसाईए.... अपने भीतर ईश्वर बसाइए।

कुछ ज़्यादा ही लंबा अंतराल हो गया इस बार अपने इस प्रिय पृष्ठ का मुँह देखे, सो हाज़िर हूँ। चलिए, बैठते हैं थोड़ा इत्मीनान से, सोचते हैं थोड़ा कि
कौन है हमारे जीवन का सबसे शक्तिशाली इंजन, प्रसन्नता का ईंधन, प्राणों का संजीवन !!! प्रेम की मीठी मदिरा...
उत्तर किसे मालूम नहीं भला.... जी हाँ, । वही
"हँसी, ठहाके, खिलखिलाहट, हुड़दंग..." जिसे आज अहले सुबह पार्क में जाकर बनावटी, और योजना के तहत, प्लास्टिक सा स्माइल होठों पर रखकर, एक दो तीन.... स्टार्ट.... गिनकर हम करते हैं। 😆😆
जिसे देखो, तनाव ओढ़े, माथे पर शिकन की गठरी लिए, अपने छोड़कर बाकि सारे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की पेचीदगी को सुलझाने का संकल्प लिए उद्देश्यविहीन सा अंतहीन सफ़र पर चला जा रहा हो। भटका हुआ, दुविधाग्रस्त ..........भ्रमित इंसान।
क्योंकि माना जाता है कि जो ठहाके लगाते हुए अपने सारे कार्य दफ़्तर में बख़ूबी सम्पन्न कर ले, वह भला "गंभीर, कार्यसक्षम, समर्पित, अनुशासित, अनुकरणीय, प्रेरणास्रोत और आदर्श एम्प्लॉयी कैसे हुआ?? ज़रूर 'टाइमपास' कर रहा होगा।😀😀

ठीक उसी तरह बात गृहणी, या कोई और पेशे से संबंधित हो, तो साब... जब तक आप गंभीर और दुखी नहीं दिखते तब तक आप काम को सच्चाई, ईमानदारी, ज़िम्मेदारी और निष्ठा से दरसअल नहीं निभा रहे हैं।

रे मनुष्य, 'सोच बदलने' का नारा चला था, मूढ़ बनने का नहीं, अपने पैर पर आप कुल्हाड़ी मारने का नहीं....।

क्रांतिकारी, आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए, बुद्धि भ्रष्ट करने के लिए बेचारा मोबाइल बदनाम है, पर मनुष्य ने अपना बेड़ा ख़ुद ही कम ग़र्क किया हुआ है क्या.....???

अति आधुनिक, सभ्य, विकसित, गंभीर, योग्य, बुद्धिमान, क़ामयाब दिखने के लिए अगर तनाव में रहना, कम से कम बोलना, झगड़ा-मनमुटाव आदि बार बार करते रहना अगर अनिवार्य शर्त है तो भैया... मामला सचमुच बेहद गंभीर है।
पुनर्विचार कीजिये, अभी के अभी ख़ुशी और क़ामयाबी की नई परिभाषाएँ गढ़िए। वक़्त नहीं है ज़्यादा। आइये..
हँसिये, हँसाईए..,अपनी पाचन शक्ति बढाइये...हृदय को निर्मल करिए, चिर युवा बने रहिए और दीर्घायु बनिए।
आज यहीं तक....
शुभेच्छाएँ...
लतिका

21/04/2019

खोज प्रारंभ की.......

बचपन से ही ख़ूब पढ़ा है कि बुद्धि तत्व ही ऐसा तत्व है जो मनुष्य को पशुत्व से उठाकर देवत्व तक ले जाता है। कई विद्वानों ने मानव की परिभाषा दी,' मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है, बुद्धिमान जीव है।' बुद्धि के सदुपयोग में ही विकास और उन्नति निहित है आदि आदि....
पर उसी बुद्धिजीवी प्राणी के विडंबनाओं का खेल देखिए जहाँ व्यक्ति का बुद्धि और स्वार्थ केंद्रित चित्त आज शायद ही कभी सुख, शांति, सद्भावना, प्रेम और उदारता की बात आज करता हो। जितने बड़े पैमाने पर इन क्षेत्रों में मनुष्य के अदद विकास के विधान बनाये गए, उससे अधिक मात्रा में और कहीं अधिक तीव्र गति से लोभ, मोह, घृणा, कुटिलता, आक्रोश, दोमुंहापन, ज़लालत जैसे विकार विस्तृत होते गए। उसपर तुर्रा यह कि उसी तथाकथित बुद्धिजीवी 'मनुष्य' नाम की प्रजाति ने अब इन कुत्सित विचारों को शर्मिंदगी की श्रेणी में रखना भी बंद कर दिया है...। खुलेआम स्वयं गढ़ी गई नैतिकता की परिभाषा और उसके डंके की चोट पर।
न ज़ुबान लड़खड़ाती है अब, न आत्मा।
पेट भरा है तो भी छीनने की आदिम प्रवृत्ति आज भी क़ायम. वक़्त ज़्यादा है तो चौक पर बैठकर कीचड़ किसपर उछाला जाय, इसका षडयंत्र।
समाज में भाईचारा और शांति व्याप्त है तो धर्म का पासा कैसे तुरत फेंका जाए.., हवस और पुरुष सत्तात्मक शक्ति का प्रदर्शन करना हो तो किसी बेबस, लाचार या मासूम को दरिंदगी का शिकार महज़ हँसी मज़ाक़ के लिये कैसे बनाया जाए... सब सुख का बंदोबस्त हो तो भी दस पुश्त के लिए तिजोरी भूखों नंगों का हक़ मारकर कैसे भरी जाए।
षड्यंत्र ही षडयंत्र। वाह रे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना.... 'मनुष्य'

बुद्धि का विकास कुछ ज़्यादा ही हुआ है....
हर व्यक्ति आज जीवन जीने का अपना अपना 'सच', अपना 'दृष्टिकोण' और अपना ' परिप्रेक्ष्य' सुविधानुसार तय किये बैठा है और इन्हीं भारी भरकम शब्दों ने ज़बरदस्त भ्रम की स्थिति पैदा की है... उचित- अनुचित, सही-ग़लत, अच्छा-बुरा सब का भेद गड्डमगड्ड.....
आदर्शों को मज़ाक का विषय बना दिया गया और संयम, धैर्य को दकियानूसी मान लिया गया, आदर सम्मान, प्यार को प्राचीन, अनुपयोगी और आउट ऑफ़ फ़ैशन करार दिया गया।
परिणाम जो होना था, वह आप देख ही रहे हैं...
मैं नाम सिर्फ़ राजनीति का नहीं लूँगी...... इशारे कई ओर हैं।☺️☺️
आप भी सोचिये।....विदा....

02/10/2018

अभी आशा शेष है:

पर्दाफाश, पोल खुल गई, फ़रेब, साज़िश ..........

कान पक गए ऐसे समाचारों से। बुराई में रस लेना तो खूब परोसा जा रहा है। पर अच्छाई को उतना ही रस लेकर उजागर न करना क्यों किसी तहखाने में जैसे क़ैद है। यही तो जीवन की मिठास में ज़हर घोल रहा है। अब भी हम मनुष्य से उतना ही प्रेम करते हैं, महिलाओं का सम्मान करते हैं, परपीड़ा को पाप समझते हैं, अनजाने ही संग संग ठठा देते हैं। सैकड़ों घटनाएँ ऐसी हैं जो लोकचित्त में प्रेम की आस जगाती हैं, सतचित्त बनाती हैं। पर क्यों ये अनमोल अहसास सुनियोजित रूप से रची बुनी गई इस अराजक परिवेश के कोलाहल में दब से गये हैं। यक़ीन खो चले हैं हम।
क्या हुआ गर हम ठगे भी गए, धोखा भी खाया, विश्वासघात भी मिला। केवल उन्हीं बातों का हिसाब क्यों रखें? जीवन कष्टकर नहीं हो जाएगा? साँसे गिरवी की नहीं होंगी?
क्या ऐसी घटनाएँ कम हुई हैं, जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाढ़स दिया है, प्रेम किया है और हिम्मत बँधाई है?

28/08/2018

"अकेलापन अभिशाप नहीं, वरदान है।"
मैं सपने ख़ूब देखती हूँ, ख़ुद के साथ। जो मिलता है, और जो कुछ नहीं भी मिलता है, उसके साथ भी समय बिताना चाहती हूँ। अंतर्यात्रा और एकांत अपनी निजी लड़ाई को लड़ने की ताक़त को दुगुनी कर देती है। स्वयं हैरान हूँ इस फलसफे से कि मायूसी, निराशा, हताशा और उदासी भोर बनकर जीवन की इस खोज में हमें विचारमुक्त भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ वेदना और फ़िर सृजन और रचना की अजस्र धारा फूटती है और मन नितांत निर्मल, धवल, स्वच्छ।
इसलिए बाहर देखने की बजाय अपनी यात्रा पर निकलिए। बाहरी संबंध के औचित्य की तलाश करते करते हम आज अकेले खड़े हो गए हैं लिहाज़ा अपने भीतर मौजूद राग, दर्शन और ईश्वर के साथ अपने संबंध को समझ ही नहीं पाते हम।
आइए, अकेले ही बिखराव को जोड़ें, दयालु बनें, करुणा के साक्षी बनें।

27/08/2018

ज्ञान से उपजी आत्मनिर्भरता भीतरी आनंद का बाहरी चिन्ह है। जितना अधिक सोच, चेतना और भावनाओं की अलख जगाओगे, उल्लास और उमंग की उम्र उतनी ही लंबी होगी। इसलिए जागरूक रहो। स्वावलंवी बनो विचारों से। सीखने और गलतियाँ करने की चिंगारी सदा सुलगने दो, परिवर्तन की क्रांति खुद रंग लाएगी।

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