27/09/2019
हँसिये, हँसाईए.... अपने भीतर ईश्वर बसाइए।
कुछ ज़्यादा ही लंबा अंतराल हो गया इस बार अपने इस प्रिय पृष्ठ का मुँह देखे, सो हाज़िर हूँ। चलिए, बैठते हैं थोड़ा इत्मीनान से, सोचते हैं थोड़ा कि
कौन है हमारे जीवन का सबसे शक्तिशाली इंजन, प्रसन्नता का ईंधन, प्राणों का संजीवन !!! प्रेम की मीठी मदिरा...
उत्तर किसे मालूम नहीं भला.... जी हाँ, । वही
"हँसी, ठहाके, खिलखिलाहट, हुड़दंग..." जिसे आज अहले सुबह पार्क में जाकर बनावटी, और योजना के तहत, प्लास्टिक सा स्माइल होठों पर रखकर, एक दो तीन.... स्टार्ट.... गिनकर हम करते हैं। 😆😆
जिसे देखो, तनाव ओढ़े, माथे पर शिकन की गठरी लिए, अपने छोड़कर बाकि सारे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की पेचीदगी को सुलझाने का संकल्प लिए उद्देश्यविहीन सा अंतहीन सफ़र पर चला जा रहा हो। भटका हुआ, दुविधाग्रस्त ..........भ्रमित इंसान।
क्योंकि माना जाता है कि जो ठहाके लगाते हुए अपने सारे कार्य दफ़्तर में बख़ूबी सम्पन्न कर ले, वह भला "गंभीर, कार्यसक्षम, समर्पित, अनुशासित, अनुकरणीय, प्रेरणास्रोत और आदर्श एम्प्लॉयी कैसे हुआ?? ज़रूर 'टाइमपास' कर रहा होगा।😀😀
ठीक उसी तरह बात गृहणी, या कोई और पेशे से संबंधित हो, तो साब... जब तक आप गंभीर और दुखी नहीं दिखते तब तक आप काम को सच्चाई, ईमानदारी, ज़िम्मेदारी और निष्ठा से दरसअल नहीं निभा रहे हैं।
रे मनुष्य, 'सोच बदलने' का नारा चला था, मूढ़ बनने का नहीं, अपने पैर पर आप कुल्हाड़ी मारने का नहीं....।
क्रांतिकारी, आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए, बुद्धि भ्रष्ट करने के लिए बेचारा मोबाइल बदनाम है, पर मनुष्य ने अपना बेड़ा ख़ुद ही कम ग़र्क किया हुआ है क्या.....???
अति आधुनिक, सभ्य, विकसित, गंभीर, योग्य, बुद्धिमान, क़ामयाब दिखने के लिए अगर तनाव में रहना, कम से कम बोलना, झगड़ा-मनमुटाव आदि बार बार करते रहना अगर अनिवार्य शर्त है तो भैया... मामला सचमुच बेहद गंभीर है।
पुनर्विचार कीजिये, अभी के अभी ख़ुशी और क़ामयाबी की नई परिभाषाएँ गढ़िए। वक़्त नहीं है ज़्यादा। आइये..
हँसिये, हँसाईए..,अपनी पाचन शक्ति बढाइये...हृदय को निर्मल करिए, चिर युवा बने रहिए और दीर्घायु बनिए।
आज यहीं तक....
शुभेच्छाएँ...
लतिका