स्वर्ग जाने का रास्ता

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इस्लाम की सही जानकारी, इस्लाम के बारे में गलतफहमी अैार भ्रम का निवारण के साथ इस्लामी मसाइल की रहनुमाई, कुरआन व पैगम्बर के फरमान की रोशनी में सीखें और दूसरों तक पहुंचाएं। आज ही फॉलो करें।

10/08/2026

नज़र और शर्मगाह की हिफ़ाज़त

इस्लाम ने इंसान की इज़्ज़त, पाकीज़गी, हया और चरित्र की हिफ़ाज़त के लिए बहुत महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दी हैं। इनमें नज़र की हिफ़ाज़त, शर्मगाह की हिफ़ाज़त और हराम कामों से बचना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

1. नज़र नीची रखने का कुरआनी हुक्म

अल्लाह तआला फरमाता है:

قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ

हिंदी अर्थ:
“ईमान वाले पुरुषों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें। यह उनके लिए अधिक पाकीज़ा है। निश्चय ही अल्लाह उनके कामों से पूरी तरह खबरदार है।”

(सूरह अन-नूर, 24:30)

इस आयत में अल्लाह तआला ने सबसे पहले नज़र की हिफ़ाज़त का आदेश दिया है। क्योंकि अक्सर गुनाह की शुरुआत एक नज़र से होती है और वही नज़र आगे चलकर इंसान को बड़े गुनाह की ओर ले जा सकती है।

2. महिलाओं के लिए भी यही हुक्म

अल्लाह तआला फरमाता है:

وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ...

हिंदी अर्थ:
“और ईमान वाली महिलाओं से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें और अपनी ज़ीनत को जाहिर न करें…”

(सूरह अन-नूर, 24:31)

इससे पता चलता है कि हया और पाकीज़गी की ज़िम्मेदारी पुरुष और महिला दोनों की है।

3. अचानक पड़ जाने वाली नज़र

हज़रत जरीर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि.) ने रसूलुल्लाह ﷺ से अचानक पड़ जाने वाली नज़र के बारे में पूछा।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

فَأَمَرَنِي أَنْ أَصْرِفَ بَصَرِي

हिंदी अर्थ:
“आप ﷺ ने मुझे आदेश दिया कि मैं अपनी निगाह फेर लूँ।”

(सहीह मुस्लिम, हदीस 2159a)

इससे हमें यह सीख मिलती है कि यदि अचानक किसी ऐसी चीज़ पर नज़र पड़ जाए जिसे देखना उचित नहीं है, तो तुरंत अपनी निगाह हटा लेनी चाहिए।

4. आँखों का ज़िना

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

فَالْعَيْنَانِ زِنَاهُمَا النَّظَرُ

हिंदी अर्थ:
“आँखों का ज़िना देखना है।”

आगे हदीस में ज़बान, कान, हाथ और पैरों के गुनाहों का भी उल्लेख किया गया है।

(सहीह मुस्लिम, हदीस 2657)

इसका अर्थ यह है कि इंसान को केवल बड़े गुनाह से ही नहीं, बल्कि उन रास्तों से भी बचना चाहिए जो उसे गुनाह की ओर ले जाते हैं।

5. नौजवानों के लिए नबी ﷺ की हिदायत

रसूलुल्लाह ﷺ ने नौजवानों को संबोधित करते हुए फरमाया:

يَا مَعْشَرَ الشَّبَابِ مَنِ اسْتَطَاعَ الْبَاءَةَ فَلْيَتَزَوَّجْ، فَإِنَّهُ أَغَضُّ لِلْبَصَرِ، وَأَحْصَنُ لِلْفَرْجِ

हिंदी अर्थ:
“ऐ नौजवानों की जमाअत! तुममें से जो निकाह की क्षमता रखता हो, उसे निकाह कर लेना चाहिए। क्योंकि यह निगाह को अधिक नीचा रखने वाला और शर्मगाह की अधिक हिफ़ाज़त करने वाला है।”

आगे फरमाया:

وَمَنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَعَلَيْهِ بِالصَّوْمِ، فَإِنَّهُ لَهُ وِجَاءٌ

हिंदी अर्थ:
“और जो निकाह की क्षमता न रखता हो, उसे रोज़े रखने चाहिए, क्योंकि रोज़ा उसके लिए ढाल है।”

(सहीह बुखारी, हदीस 5066)

6. ज़िना के करीब जाने से भी मना किया गया

अल्लाह तआला फरमाता है:

وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَىٰ ۖ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا

हिंदी अर्थ:
“और ज़िना के करीब भी मत जाओ। निश्चय ही वह बहुत बड़ी बेहयाई है और बहुत ही बुरा रास्ता है।”

(सूरह अल-इसरा, 17:32)

ध्यान देने वाली बात यह है कि अल्लाह ने केवल ज़िना करने से नहीं रोका, बल्कि “ज़िना के करीब भी मत जाओ” कहा। यानी उन सभी रास्तों से बचना चाहिए जो इंसान को हराम संबंधों और बेहयाई की ओर ले जा सकते हैं।

आज के दौर में नज़र की हिफ़ाज़त

आज मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए नज़र की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई है।

हमें चाहिए कि:

अश्लील तस्वीरों और वीडियो से बचें।
सोशल मीडिया पर गलत सामग्री को देखने से बचें।
किसी गैर-महरम को गलत नज़र से न देखें।
अचानक नज़र पड़ जाए तो तुरंत निगाह फेर लें।
अकेले में भी अल्लाह की निगरानी को याद रखें।
अच्छी और नेक संगत अपनाएँ।
निकाह की क्षमता हो तो निकाह करें।
निकाह की क्षमता न हो तो रोज़े रखें।
अपने मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल पर नियंत्रण रखें।
निष्कर्ष

नज़र की हिफ़ाज़त केवल आँखों की हिफ़ाज़त नहीं, बल्कि दिल और चरित्र की हिफ़ाज़त भी है। जब इंसान अपनी निगाह को नियंत्रित करता है तो उसका दिल पाक रहता है और वह बहुत से गुनाहों से बच जाता है।

अल्लाह तआला फरमाता है:

ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ

“यह उनके लिए अधिक पाकीज़ा है।”
(सूरह अन-नूर, 24:30)

इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी नज़र, दिल, ज़बान और शर्मगाह की हिफ़ाज़त करे, हया और पाकीज़गी को अपनाए और अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चले।

अल्लाह तआला हमें नज़र की हिफ़ाज़त, हया, पाकीज़गी और नेक अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

09/08/2026

इस्लाम क्या सिखाता है?

इस्लाम एकेश्वरवाद (तौहीद) का धर्म है। यह सिखाता है कि इस पूरे ब्रह्मांड का सृष्टिकर्ता केवल एक है—अल्लाह—और उसी की इबादत (पूजा) की जानी चाहिए। उसके साथ किसी को भी किसी भी रूप में साझी (शरीक) नहीं ठहराया जाना चाहिए।

इस्लाम की मूल आस्था (ईमान के 6 स्तंभ)

इस्लाम में हर मुसलमान के लिए इन 6 बातों पर ईमान (विश्वास) रखना आवश्यक है:

1. अल्लाह पर ईमान – वह एक है, उसका कोई साझी नहीं।
2. फ़रिश्तों पर ईमान – वे अल्लाह की बनाई हुई नूरानी मख़लूक़ हैं।
3. आसमानी किताबों पर ईमान– जैसे क़ुरआन, तौरात, ज़बूर, इंजील आदि।
4. पैग़म्बरों (रसूलों) पर ईमान – अल्लाह ने इंसानों की मार्गदर्शन के लिए अनेक पैग़म्बर भेजे।
5. क़यामत (आख़िरत) के दिन पर ईमान– हर इंसान को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।
6. तक़दीर (भाग्य) पर ईमान – हर चीज़ अल्लाह के ज्ञान और फैसले से होती है।

इस्लाम के पाँच स्तंभ (इस्लाम के मूल कर्म)

जो व्यक्ति दिल से इन 6 बातों पर यक़ीन करता है और ज़ुबान से स्वीकार करता है, वह इन 5 कामों को भी अदा करता है:

1. कलिमा (ईमान की गवाही)
"अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह"
(मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, और मुहम्मद ﷺ उसके बंदे और रसूल हैं)

2. नमाज़ (सलाह)– दिन में पाँच बार अल्लाह की इबादत।
3. रोज़ा (सौम) – रमज़ान के महीने में उपवास रखना।
4. ज़कात– ज़रूरतमंदों को अपनी संपत्ति का एक हिस्सा देना।
5. हज – यदि सामर्थ्य हो, तो मक्का की यात्रा करना।

शिर्क से बचना (जो सबसे बड़ा गुनाह है)
इस्लाम में *शिर्क* (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना) सबसे बड़ा गुनाह है।
इसका मतलब है यह मानना कि अल्लाह के अलावा कोई और:

* शिफ़ा (स्वास्थ) दे सकता है
* जीवन या मृत्यु दे सकता है
* जीविका दे सकता है
* या किसी भी तरह का अध्यात्मिक आत्मिक नियंत्रण रखता है

ऐसी मान्यताएँ इस्लाम में गलत मानी जाती हैं।
पैग़म्बरों का संदेश

अल्लाह ने इंसानों की मार्गदर्शन के लिए बहुत से पैग़म्बर भेजे (रिवायतों में लगभग 1,24,000 का उल्लेख मिलता है)।
कुछ के नाम हमें ज्ञात हैं और कुछ के नहीं, लेकिन हर पैग़म्बर पर ईमान रखना ज़रूरी है।

इबादत का सही तरीका

इस्लाम सिखाता है कि:
* केवल अल्लाह की ही इबादत की जाए
* किसी भी बनाई हुई चीज़ (मूर्ति, कब्र, प्रकृति आदि) की पूजा न की जाए
* कब्रों को सजाना, उन पर भवन बनाना या उन्हें पूजा का स्थान बनाना सही नहीं माना गया
(इस संबंध में हदीस, जैसे सही मुस्लिम में निर्देश मिलते हैं)

इस्लाम के नैतिक और सामाजिक सिद्धांत
इस्लाम केवल इबादत ही नहीं, बल्कि अच्छे आचरण भी सिखाता है:
* सच बोलना
* माता-पिता का सम्मान करना
* गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करना
* न्याय और ईमानदारी से जीवन जीना
* दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना
* ज़ुल्म (अत्याचार) से बचना

इस्लाम का मूल संदेश है:
एक अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, और पैग़म्बरों के बताए रास्ते पर चलकर एक नैतिक, न्यायपूर्ण और संतुलित जीवन जियो।

06/08/2026

ईमान वाले कौन हैं?

06/08/2026

“मेरा माल, मेरी दौलत”

आपके द्वारा उल्लिखित कथन सही हदीस है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:

قال رسول الله ﷺ:
«يقولُ ابنُ آدمَ: مالِي مالِي، وهل لكَ من مالِكَ إلا ما أكلتَ فأفنيتَ، أو لبستَ فأبليتَ، أو تَصدَّقْتَ فأمضَيْتَ؟»
(सहीह मुस्लिम, किताब الزकاة)

अनुवाद

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“आदम की औलाद (इंसान) कहता है: मेरा माल, मेरी दौलत!
लेकिन तेरी दौलत में से वास्तव में तेरी वह ही है —

जो तूने खा-कर खत्म कर दी,
या पहनकर पुरानी कर दी,
या अल्लाह की राह में दान कर दी, जो क़ियामत के दिन तेरे काम आएगी।”

यह हदीस समाज को मनी-सेंट्रिक सोच से निकाल कर उपयोग और साझा करने की शिक्षा देती है।

समाज में अमीरी-गरीबी का फ़ासला कम करने का सबसे बड़ा ज़रिया दान, ज़कात, सदक़ा है।

अगर हर व्यक्ति यह समझ ले कि असली फायदा सिर्फ उस माल का है जो वह किसी के काम ला सके, तो समाज अधिक न्यायपूर्ण और दयालु बन जाता है।

यह हदीस ख़ैरात, सामाजिक सेवा, और इंसानियत को बढ़ावा देती है।

मानसिक (Psychological) दृष्टि
इंसान के अंदर यह प्रवृत्ति होती है कि वह जमा किए हुए माल को “मेरा” समझ कर उससे अनुचित लगाव (attachment) बना लेता है।

इस हदीस के अनुसार:
➤ जमा किया हुआ माल हमें मानसिक बोझ देता है।
➤ खर्च किया हुआ माल हमें असली संतोष और फ़ायदा देता है।

यह मानसिकता विकसित होती है कि माल का असली मूल्य उपयोग में है, संग्रह में नहीं।

यह हदीस “अति-लालच (over-attachment)” के मनोवैज्ञानिक रोग को दूर करती है।

धार्मिक (Islamic) दृष्टि
इस्लाम में माल एक अमानत है जिसे इंसान को कमाना, खर्च करना और बांटना है।

खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने में हिस्से भर खर्च करना दुनिया में काम आएगा।
दान-सदक़ा आख़िरत का असली निवेश (investment) है।

धार्मिक दृष्टि से यह हदीस हमें तौहीद और आख़िरत की याद दिलाती है कि:
माल दुनिया ही में रह जाएगा, लेकिन नेकी (दान) आख़िरत के लिए सदाबहार बैंक बैलेंस होगा।

📖 क़ुरआन में इस विषय से संबंधित आयतें
① क़ुरआन 57:18 – दान का सवाब

إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ

“निश्चय ही पुरुष और स्त्री दोनों जो दान करते हैं और अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैं, उनके लिए (सवाब) कई गुना बढ़ाया जाएगा, और उनके लिए बड़ी इज़्ज़त का बदला है।”

② क़ुरआन 3:92 – असली भलाई

لَن تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ

“तुम असली भलाई को नहीं पा सकते जब तक कि अपनी पसंदीदा चीज़ों में से ख़र्च न करो।”

③ क़ुरआन 2:272 – दान अपने लिए है

وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ

“तुम जो कुछ अल्लाह की रज़ा के लिए खर्च करते हो, वह (आख़िरत में) तुम्हें पूरा लौटा दिया जाएगा।”

यह हदीस इंसान को बताती है कि जमा किया हुआ माल असली फायदा नहीं देता,
बल्कि:

खाया हुआ → शरीर को फायदा
पहना हुआ → जरूरत पूरी
दान किया हुआ → आख़िरत में फायदा

इस्लाम में माल का मकसद इस्तेमाल और बाँटना है,
ना कि सिर्फ जमा करना।

05/08/2026

"एक सच्चा मुसलमान वह है, जिससे दूसरों को कोई नुकसान न पहुँचे — न उसके हाथ से, और न ही उसकी ज़बान से।"

पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा:
"المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده"
(अर्थ: मुसलमान वह है जिससे दूसरे मुसलमान (या लोग) उसकी ज़बान और हाथ से सुरक्षित रहें।)

हाथ और ज़बान से महफूज रखना:
हाथ से महफूज रखना: इसका अर्थ है कि एक मुसलमान किसी को शारीरिक हानि न पहुँचाए। वह हिंसा, ज़ुल्म, चोरी, मारपीट या किसी भी प्रकार के अन्याय से बचे।
ज़बान से महफूज रखना: इसका मतलब है कि वह किसी को अपनी बातों, गाली, बुराई, झूठ, चुगली, ताना या अपमानजनक शब्दों से तकलीफ न दे।
इसका व्यापक अर्थ यह है कि एक सच्चा मुसलमान वही है जो लोगों के लिए अमन, चैन, शांति और भरोसे का स्रोत हो।

मुसलमान की खूबियाँ:
इस्लाम एक मुसलमान में निम्नलिखित गुणों को पसंद करता है:
सच्चाई (सिद्क़): वह हमेशा सच बोले और झूठ से बचे।
ईमानदारी (अमाना): भरोसेमंद हो, किसी की अमानत में खयानत न करे।
नरमी और विनम्रता (हिल्म व तवाज़ो): दूसरों से नम्रता और आदर से पेश आए।
क्षमा भाव (अफ़्वो-दरगुज़र): लोगों की गलतियों को माफ़ करने वाला हो।
सहयोग और मददगार: गरीबों, ज़रूरतमंदों, पड़ोसियों की मदद करने वाला हो।
न्यायप्रियता (अदल): सही को सही और गलत को गलत कहे, भले ही खुद के ख़िलाफ़ हो।
सब्र (धैर्य): मुश्किलों में घबराए नहीं, बल्कि सब्र करे और अल्लाह पर भरोसा रखे।
अच्छा व्यवहार (अख़लाक़): अच्छा आचरण, मुस्कराहट, मीठी ज़बान और सेवा भाव।

इस्लाम सिर्फ इबादत (नमाज़, रोज़ा) ही नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार और समाज में अमन व इंसाफ़ फैलाने पर भी उतना ही ज़ोर देता है।
सच्चा मुसलमान वह है जो दूसरों के लिए राहत और शांति का ज़रिया बने — ना कि डर या तकलीफ़ का।

04/08/2026

माँ पर्दे में, बेटी जिस्म की नुमाइश में

आज के समाज में एक मंज़र बार-बार देखने को मिलता है:
माँ या अधेड़ उम्र की औरत पूरा पर्दा किए होती है, और उसके साथ बेटी ऐसे कपड़ों में होती है जिनमें जिस्म की नुमाइश आम हो चुकी है।

क़ुरआन मजीद ने लिबास और हया का साफ़ हुक्म दिया है:

﴿وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا﴾
(सूरह अन-नूर: 31)

“और मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें, और अपनी ज़ीनत ज़ाहिर न करें सिवाय उसके जो ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ाहिर हो जाए…”

और फ़रमाया:

﴿يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّأَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَاءِ الْمُؤْمِنِينَ يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِن جَلَابِيبِهِنَّ﴾
(सूरह अल-अहज़ाब: 59)

“ऐ नबी! अपनी बीवियों, अपनी बेटियों और मोमिनों की औरतों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें लटका लिया करें…”

ये आयतें साफ़ तौर पर बताती हैं कि ज़ीनत और जिस्म की नुमाइश मोमिना औरत की पहचान नहीं है।

नबी करीम ﷺ ने ऐसे लिबास के बारे में सख़्त चेतावनी फ़रमाई:

قال رسول الله ﷺ:

«صِنْفَانِ مِنْ أَهْلِ النَّارِ لَمْ أَرَهُمَا…
وَنِسَاءٌ كَاسِيَاتٌ عَارِيَاتٌ، مَائِلَاتٌ مُّمِيلَاتٌ،
رُءُوسُهُنَّ كَأَسْنِمَةِ الْبُخْتِ الْمَائِلَةِ،
لَا يَدْخُلْنَ الْجَنَّةَ وَلَا يَجِدْنَ رِيحَهَا»

(सहीह मुस्लिम, हदीस: 2128)

“जहन्नमियों की दो क़िस्में हैं जिन्हें मैंने नहीं देखा…
और वे औरतें जो कपड़े पहनने के बावजूद नंगी होंगी,
ख़ुद भी गुमराह होंगी और दूसरों को भी गुमराह करेंगी,
उनके सिर बख़्ती ऊँट के कोहान की तरह होंगे,
वे न जन्नत में दाख़िल होंगी और न उसकी ख़ुशबू पाएँगी…”

उलमा के अनुसार ‘कासियातुन आरियात’ से मुराद वे औरतें हैं:

जो पतले कपड़े पहनें

या तंग कपड़े पहनें

या ऐसा लिबास पहनें जिससे जिस्म के उभार साफ़ नज़र आएँ

यह हदीस आख़िरी ज़माने की निशानियों में से है, न कि किसी एक माँ या बेटी पर इल्ज़ाम।

असल मसला यह नहीं कि माँ नेक है और बेटी क्यों नहीं,
बल्कि यह है कि फ़ैशन, मीडिया और माहौल ने हया को पुराना और नुमाइश को तरक़्क़ी समझ लिया है।

दीन हमें यह भी सिखाता है कि:

नसीहत हिकमत और नरमी से हो

नफ़रत, तंज़ और तौहीन से हिदायत नहीं मिलती

﴿إِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ﴾
हिदायत अल्लाह के हाथ में है।

अल्लाह हमें और हमारी औलाद को हया, दीन और समझ अता फ़रमाए। आमीन।

03/08/2026

मौत आने से पहले यह एक काम जरूर कर लो

अल्लाह तआला ने इंसान को इस दुनिया में हमेशा रहने के लिए नहीं, बल्कि एक निश्चित अवधि के लिए भेजा है। इस दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई अगर कोई है, तो वह मौत है। इससे न कोई बादशाह बचा, न कोई फ़क़ीर, न कोई पैग़म्बर (अलैहिमुस्सलाम) और न ही कोई महान वैज्ञानिक, खिलाड़ी या पर्वतारोही।

हर जान को मौत का स्वाद चखना है
अल्लाह तआला फरमाता है:

كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۖ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ
"हर जान को मौत का स्वाद चखना है, और तुम्हें तुम्हारा पूरा बदला क़ियामत के दिन दिया जाएगा।" (सूरह आले इमरान 3:185)

एक दूसरी जगह अल्लाह फरमाता है:
أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِكْكُمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِي بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ
"तुम जहाँ कहीं भी हो, मौत तुम्हें आ पकड़ेगी, चाहे तुम मज़बूत किलों में ही क्यों न हो।" (सूरह अन-निसा 4:78)

मौत का समय न आगे होता है, न पीछे
अल्लाह तआला फरमाता है:
فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
"जब उनका निर्धारित समय आ जाता है, तो वे न एक घड़ी देर कर सकते हैं और न एक घड़ी पहले आ सकते हैं।" (सूरह अल-आराफ 7:34)

इसी विषय को सूरह अन-नहल (16:61) और सूरह यूनुस (10:49) में भी दोहराया गया है कि हर व्यक्ति की मौत का समय पहले से निर्धारित है।

इंसान लाख योजनाएँ बना ले, लेकिन उसकी आख़िरी साँस कहाँ निकलेगी, यह ज्ञान केवल अल्लाह के पास है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

أَكْثِرُوا ذِكْرَ هَاذِمِ اللَّذَّاتِ
"लज़्ज़तों (दुनियावी सुखों) को समाप्त कर देने वाली चीज़, अर्थात मौत, को अधिक याद किया करो।" (سنن الترمذي، رقم 2307، سنن النسائي، رقم 1824)

एक और हदीस में आता है:
الكَيِّسُ مَنْ دَانَ نَفْسَهُ وَعَمِلَ لِمَا بَعْدَ الْمَوْتِ
"समझदार वह है जो अपने आप का हिसाब ले और मौत के बाद की ज़िंदगी के लिए तैयारी करे।" (سنن الترمذي، رقم 2459)

महान लोग भी मौत से नहीं बच सके

दुनिया के इतिहास में अनेक ऐसे लोग हुए जिन्होंने असंभव लगने वाले कार्य कर दिखाए, लेकिन मौत के सामने सब बेबस रहे।

नेपाल के महान पर्वतारोही निर्मल पुर्जा (निम्सदाई) ने दुनिया की 14 सबसे ऊँची चोटियों को रिकॉर्ड समय में फतह कर इतिहास रच दिया। उनकी बहादुरी, कौशल और अद्भुत उपलब्धियों ने पूरी दुनिया को प्रेरित किया।

उनका जीवन साहस, अनुशासन और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक माना जाता है। लेकिन उनकी उपलब्धियाँ भी इस सत्य को नहीं बदलतीं कि जब किसी इंसान की मौत का निर्धारित समय आएगा, तो न अनुभव, न शक्ति, न प्रसिद्धि और न ही तकनीक उसे रोक सकती है।

31 जुलाई 2026 को पाकिस्तान के ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान आए भीषण हिमस्खलन में वे और उनके कई साथी पर्वतारोही दुनिया से रुख़्सत हो गए।
यह घटना हमें कुरआन की इस आयत की याद दिलाती है:

وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ
"कोई जान नहीं जानती कि वह किस ज़मीन में मरेगी।" (सूरह लुक़मान 31:34)

वास्तव में, इंसान चाहे कितना ही शक्तिशाली, प्रसिद्ध या अनुभवी क्यों न हो, जब अल्लाह का तय किया हुआ समय आ जाता है, तो न वह एक पल आगे हो सकता है और न एक पल पीछे:

﴿فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ﴾
"जब उनका निर्धारित समय आ जाता है, तो वे न एक घड़ी देर कर सकते हैं और न एक घड़ी पहले।"

इसी प्रकार सिकंदरे आजम, बड़े-बड़े सम्राट, वैज्ञानिक, अरबपति और विश्वविख्यात हस्तियाँ भी आखिरकार इस दुनिया से चली गईं। किसी को बीमारी ने लिया, किसी को दुर्घटना ने, किसी को बुढ़ापे ने और किसी को अचानक मौत ने। यह सब इस बात की याद दिलाता है कि मौत का समय और स्थान केवल अल्लाह जानता है।

जब मौत निश्चित है, तो जीवन का उद्देश्य क्या है?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि हम कब मरेंगे, बल्कि यह है कि मरने से पहले हम क्यों जी रहे हैं?

अल्लाह तआला फरमाता है:

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ

"मैंने जिन्नों और इंसानों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।"

(सूरह अज़-ज़ारियात 51:56)

यही इंसान की ज़िंदगी का वास्तविक उद्देश्य है—अल्लाह की पहचान, उसकी इबादत, उसके आदेशों का पालन, नेक अमल और उसकी मख़लूक़ के साथ भलाई।

अल्लाह तआला यह भी फरमाता है:

الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا

"उसी ने मौत और ज़िंदगी को पैदा किया ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कौन सबसे अच्छे कर्म करता है।"

(सूरह अल-मुल्क 67:2)

मौत एक ऐसी सच्चाई है जिससे कोई बच नहीं सकता। उसका समय निश्चित है, लेकिन वह समय हममें से कोई नहीं जानता। न हमें पता है कि आख़िरी साँस कब आएगी, न कहाँ आएगी और न किस परिस्थिति में आएगी।

इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि मौत आने से पहले तौबा कर ली जाए, ईमान को मज़बूत किया जाए, नमाज़, कुरआन, नेक अमल और इंसानों के हक़ अदा किए जाएँ। क्योंकि जब मौत आ जाएगी, तब लौटकर एक भी नेक काम करने का अवसर नहीं मिलेगा।

अल्लाह हमें मौत से पहले सच्ची तौबा, सही ईमान, नेक अमल और अपने दीन पर इस्तिक़ामत अता फरमाए, और हमारा ख़ातिमा ईमान पर करे।

آمين يا رب العالمين

02/08/2026

दुनिया से अपना हिस्सा न भूलो

इस्लाम इंसान को न आख़िरत से ग़ाफ़िल रहने की इजाज़त देता है और न दुनिया को छोड़ने की। दोनों के बीच सही संतुलन ही एक मोमिन की असल पहचान है।

कुरआन की हिदायत
1. आख़िरत की कामयाबी तलाश करो
﴿ وَابْتَغِ فِيمَا آتَاكَ اللَّهُ الدَّارَ الْآخِرَةَ ﴾

अनुवाद:
“और जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उसके ज़रिये आख़िरत का घर (यानी आख़िरत की कामयाबी) तलाश करो।”
— (सूरह अल-क़सस 28:77)

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की दी हुई नेमतें — माल, औक़ात, सेहत, इल्म, क़ाबिलियत — सब इस लिये हैं कि हम उन्हें आख़िरत की कामयाबी बनाने में इस्तेमाल करें।

2. और दुनिया का हिस्सा न भूलो
﴿ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ الدُّنْيَا ﴾

अनुवाद:
“और दुनिया में जो हिस्सा अल्लाह ने तुम्हारे लिये रखा है, उसे मत भूलो।”
— (सूरह अल-क़सस 28:77)

इस्लाम रूहानियत के नाम पर दुनिया से भागने की सिखलायी नहीं देता। हलाल रोज़ी, परिवार, आराम, सेहत और दुनियावी ज़रूरतें — सब अल्लाह की नेमतें हैं, जिनका सही इस्तेमाल करना सुन्नत है।

हदीस की रौशनी में संतुलित ज़िंदगी

रसूलुल्लाह ﷺ ने दुनिया और आख़िरत के बीच संतुलन की बेहतरीन तालीम दी है।

हदीस
﴿ إِنَّ لِرَبِّكَ عَلَيْكَ حَقًّا، وَلِنَفْسِكَ عَلَيْكَ حَقًّا، وَلِأَهْلِكَ عَلَيْكَ حَقًّا، فَأَعْطِ كُلَّ ذِي حَقٍّ حَقَّهُ ﴾

— सहीह बुख़ारी

अनुवाद:
“तुम्हारे रब का तुम पर हक़ है, तुम्हारी जान (नफ़्स) का तुम पर हक़ है, और तुम्हारे घरवालों का भी तुम पर हक़ है। तो हर हक़दार को उसका हक़ अदा करो।”

यह हदीस बताती है कि इंसान सिर्फ इबादत में डूबकर अपने जिस्म, अपनी सेहत और अपने परिवार को छोड़े — यह भी पसंदीदा नहीं। इस्लाम एक संतुलित और मुकम्मल जीवन जीने की दावत देता है।

दुनिया और आख़िरत — दोनों साथ

दुनिया खेती है, आख़िरत फसल है।
जो यहाँ बोएगा, वहीं आख़िरत में काटेगा।

इसलिये न दुनिया में डूब जाओ कि आख़िरत भूल जाओ,
और न आख़िरत में इतने मशग़ूल हो जाओ कि दुनिया की ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ कर दो।

अल्लाह की दी हुई हर नेमत — माल हो, औक़ात हो, रिश्ते हों, तंदुरुस्ती हो — सब एक अमानत है।
इन्हें आख़िरत के लिये, और दुनिया को हक़ के साथ जीने के लिये इस्तेमाल करना ही इंसान की असली कामयाबी है।

30/07/2026

दूसरे समुदाय, धर्म, जाति या समूह के लोगों को उकसाना या उपहास करना कैसा है?

इस्लाम शांति, न्याय, करुणा और सदाचार का धर्म है। वह मनुष्य की गरिमा, सम्मान और सामाजिक सद्भाव की रक्षा पर विशेष बल देता है। किसी दूसरे समुदाय, धर्म, जाति या समूह के लोगों को उकसाना, उनका उपहास करना, उन्हें चिढ़ाना, अपमानित करना, गाली देना या उनके धार्मिक प्रतीकों का मज़ाक उड़ाना इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध है। कुरआन और हदीस दोनों इस प्रकार के व्यवहार से स्पष्ट रूप से रोकते हैं।
1. उपहास, ताना और अपमान की मनाही
कुरआन
अरबी मतन:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِنْ قَوْمٍ عَسَىٰ أَنْ يَكُونُوا خَيْرًا مِنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِنْ نِسَاءٍ عَسَىٰ أَنْ يَكُنَّ خَيْرًا مِنْهُنَّ وَلَا تَلْمِزُوا أَنْفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ
अनुवाद:
“ऐ ईमान वालों! कोई समूह दूसरे समूह का उपहास न करे, हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों; और न स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों का उपहास करें। आपस में एक-दूसरे को ताना न दो और न बुरे उपनामों से पुकारो।”
हवाला: सूरह अल-हुजुरात (49:11)
यह आयत सामाजिक सम्मान और पारस्परिक गरिमा की मूल शिक्षा देती है। इसमें उपहास (سخرية), ताना (لمز) और अपमानजनक संबोधन (تنابز بالألقاب) सभी से रोका गया है।
2. दूसरे धर्मों के पूज्य प्रतीकों का अपमान न करो
कुरआन
अरबी मतन:
وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ
अनुवाद:
“और जिनको वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं उन्हें गाली न दो, कहीं ऐसा न हो कि वे अज्ञानवश शत्रुता में अल्लाह को गाली देने लगें।”

29/07/2026

दंगा–फसाद, तोड़फोड़ और आतंकवाद का इस्लामी समाधान एवं सज़ा

दंगा–फसाद, तोड़फोड़, आगज़नी, आतंकवाद, निर्दोष व्यक्तियों की हत्या, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश तथा समाज में भय और अराजकता फैलाने जैसे सभी कार्य इस्लाम में सख़्ती से निषिद्ध हैं। क्योंकि इस्लाम शांति, न्याय, दया और मानवता का धर्म है। "इस्लाम" शब्द का मूल अर्थ ही शांति और सुरक्षा है।

आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में होने वाली हिंसा, आतंकवाद और सांप्रदायिक घृणा ने मानव समाज को भारी क्षति पहुँचाई है। ऐसे कार्य प्रायः घृणा, ईर्ष्या, प्रतिशोध, जातीय या धार्मिक कट्टरता तथा अन्यायपूर्ण सोच से उत्पन्न होते हैं।

दुर्भाग्यवश दंगा–फसाद की यह बीमारी नेपाल तक भी पहुँच चुकी है।

इस्लाम इन सभी प्रवृत्तियों की निंदा करता है और न्याय, सहिष्णुता तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की शिक्षा देता है।

फ़ितना और फ़साद धरती पर सबसे बड़े अपराधों में से हैं

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا﴾

"धरती में सुधार हो जाने के बाद उसमें फ़साद (उपद्रव) मत फैलाओ।"
(सूरह अल-आराफ़: 56)

यह आयत स्पष्ट करती है कि समाज में अशांति, हिंसा, दंगा, तोड़फोड़, आगज़नी और आतंक फैलाना अल्लाह को पसंद नहीं है।

फ़ितना हत्या से भी बड़ा अपराध है

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿وَالْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ﴾

"फ़ितना हत्या से भी अधिक गंभीर है।"
(सूरह अल-बक़रह: 191)

एक अन्य स्थान पर अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿وَالْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ﴾

"फ़ितना हत्या से भी बड़ा अपराध है।"
(सूरह अल-बक़रह: 217)

फ़ितना का अर्थ क्या है?

इन आयतों में "फ़ितना" का अर्थ सामान्य मतभेद नहीं है। इसका अर्थ है लोगों को उनके धर्म से रोकना, उन पर अत्याचार करना, दंगे भड़काना, समाज में आतंक और अराजकता फैलाना, धार्मिक स्वतंत्रता छीनना तथा सार्वजनिक शांति को भंग करना जैसे गंभीर अपराध।

हत्या से बड़ा क्यों?

क्योंकि एक हत्या केवल एक व्यक्ति का जीवन समाप्त करती है, जबकि फ़ितना सैकड़ों या हज़ारों लोगों के जीवन, धन, सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक शांति को नष्ट कर सकता है। दंगे समाज में वर्षों तक घृणा, विभाजन और असुरक्षा पैदा कर सकते हैं। इसलिए क़ुरआन ने फ़ितना को हत्या से भी बड़ा अपराध बताया है।

निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या के समान है

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿مَنْ قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا ۖ وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا﴾

"जिसने किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, मानो उसने पूरी मानवता की हत्या कर दी। और जिसने एक जीवन बचाया, मानो उसने पूरी मानवता को जीवन प्रदान किया।"
(सूरह अल-माइदा: 32)

यह आयत स्पष्ट करती है कि निर्दोष व्यक्ति की हत्या इस्लाम में अत्यंत बड़ा अपराध है।

इस्लाम न्याय की शिक्षा देता है

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى﴾

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए न्याय पर दृढ़ रहो। किसी समुदाय की शत्रुता तुम्हें न्याय करने से न रोके। न्याय करो, यही तक़वा के अधिक निकट है।"
(सूरह अल-माइदा: 8)

इस्लाम शत्रु के साथ भी अन्याय करने की अनुमति नहीं देता।

सच्चा मुसलमान कौन है?

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«الْمُسْلِمُ مَنْ سَلِمَ الْمُسْلِمُونَ مِنْ لِسَانِهِ وَيَدِهِ»

"मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ से लोग सुरक्षित रहें।"
(सहीह बुख़ारी)

एक अन्य हदीस में आपने ﷺ फ़रमाया:

«لَا تَحَاسَدُوا، وَلَا تَبَاغَضُوا، وَلَا تَدَابَرُوا، وَكُونُوا عِبَادَ اللَّهِ إِخْوَانًا»

"आपस में ईर्ष्या मत करो, घृणा मत करो, एक-दूसरे से मुँह मत मोड़ो, बल्कि अल्लाह के बंदे बनकर भाई-भाई बनो।"
(सहीह बुख़ारी)

सार्वजनिक संपत्ति का विनाश भी हराम है

इस्लाम दूसरों की संपत्ति, चाहे वह व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक, उसकी रक्षा करने का आदेश देता है। दंगों के नाम पर वाहनों को जलाना, सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों, अस्पतालों, दुकानों या अन्य सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना इस्लाम में हराम और अत्याचार है।

इस्लाम में आतंकवाद और फ़साद की सज़ा

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ مِنْ خِلَافٍ أَوْ يُنْفَوْا مِنَ الْأَرْضِ﴾

"जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से युद्ध करते हैं और धरती में फ़साद फैलाने का प्रयास करते हैं, उनकी सज़ा (अपराध की प्रकृति के अनुसार) यह है कि उन्हें क़त्ल किया जाए, या सूली पर चढ़ाया जाए, या उनके विपरीत दिशा के हाथ और पैर काट दिए जाएँ, या उन्हें देश निकाला दिया जाए।"
(सूरह अल-माइदा: 33)

यह सज़ा किसी व्यक्तिगत व्यक्ति द्वारा लागू नहीं की जा सकती। ऐसी सज़ा केवल वैध राज्य, सक्षम न्यायालय, पर्याप्त प्रमाण और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही लागू की जा सकती है।

इस्लामी सज़ाएँ कठोर क्यों हैं?

बहुत से लोग प्रश्न करते हैं कि इस्लामी क़ानून में कुछ सज़ाएँ कठोर क्यों हैं। इसका उत्तर स्वयं क़ुरआन देता है।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

﴿وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ﴾

"ऐ बुद्धिमानों! क़िसास (न्यायोचित प्रतिशोध) में तुम्हारे लिए जीवन है।"
(सूरह अल-बक़रह: 179)

अर्थात सज़ा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज में जीवन की रक्षा करना है। जब अपराधी को न्यायपूर्ण दंड दिया जाता है, तो अन्य लोग भी ऐसे अपराध करने से बचते हैं और निर्दोष नागरिकों का जीवन, संपत्ति और सम्मान सुरक्षित रहता है।

इस्लामी सज़ाओं के उद्देश्य
अपराध को रोकना।
मानव जीवन की रक्षा करना।
समाज में न्याय और सुरक्षा स्थापित करना।
पीड़ित को न्याय दिलाना।
दंगा, आतंकवाद और अराजकता पर नियंत्रण करना।
दंगा–फसाद और आतंकवाद का समाधान

क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार इसके समाधान निम्नलिखित हैं:

अल्लाह का भय (तक़वा) अपनाना।
न्याय और निष्पक्षता स्थापित करना।
संवाद और मेल-मिलाप के माध्यम से विवादों का समाधान करना।
क्रोध, घृणा और प्रतिशोध की भावना पर नियंत्रण रखना।
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, संपत्ति और सम्मान की रक्षा करना।
जातीय, धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता का त्याग करना।
युवाओं को सही इस्लामी शिक्षा और नैतिक संस्कार देना।
निर्दोषों पर होने वाले अत्याचार का विरोध करना।
समाज में शांति, भाईचारा और सहिष्णुता का वातावरण बनाना।
निष्कर्ष

इस्लाम दंगा–फसाद, तोड़फोड़, आगज़नी, आतंकवाद और निर्दोष लोगों की हत्या जैसे सभी प्रकार के हिंसक कार्यों को सख़्ती से निषिद्ध करता है। क़ुरआन ने फ़ितना को हत्या से भी बड़ा अपराध बताया है, क्योंकि उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है और असंख्य लोगों के जीवन, सुरक्षा और शांति को नष्ट कर देता है।

इसीलिए इस्लाम ऐसे अपराधों को रोकने के लिए न्यायपूर्ण और प्रभावी कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है। इसका उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा, समाज में शांति की स्थापना, अपराध की रोकथाम और न्याय की सुनिश्चितता है।

सच्चा मुसलमान वही है जो लोगों को सुरक्षा प्रदान करे, न्याय का साथ दे, शांति फैलाए और मानवता की रक्षा करे।

अल्लाह तआला हम सबको दंगा, फ़साद, आतंकवाद, अन्याय और हर प्रकार के अत्याचार से सुरक्षित रखे। वह हमारे समाज में शांति, न्याय, दया और भाईचारा स्थापित करे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

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