Madarsa Salfiya Darul Islam, Kalaiya-9, Bara, Nepal

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25/03/2026

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29/08/2025

1️⃣ *सवाल व जवाब का सिलसिला* 1️⃣

🕌 *मस्जिदों में छोटे बच्चों को नमाज़ केलिए लेजानेका क्या हुक्म है?*🕌

*सवाल:*
*कुछ नमाज़ी जब मस्जिद में आते हैं, तो उनके साथ इतने छोटे बच्चे भी होते हैं जो अभी तक शुऊर की उम्र को नहीं पहुंचे होते और वह नमाज़ भी अच्छे तरीके से नहीं पढ़ सकते, लेकिन नमाज़ियों के साथ सफ़ में शामिल हो जाते हैं और उनमें से कुछ नमाज़ के दौरान ही खेलने लगते हैं और अपने साथ खड़े नमाज़ियों को परेशान करना शुरू कर देते हैं। इस संबंध में क्या हुक्म है?* बच्चों के गार्जियनो के लिए आपके क्या संदेश हैं?

*जवाब:*
मेरी राय में ऐसे ना शुऊर बच्चों को मस्जिद में लाना जाइज़ नहीं है जो नमाज़ियों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं, क्योंकि इसमें फ़र्ज़ अदा करने वाले नमाज़ियों के लिए (अज़ीयत) नुकसान है। नबी करीम ﷺ ने जब कुछ सहाबा को नमाज़ पढ़ते और जहरि किरात करते हुए सुना, तो फ़रमाया:
( لَا يَجْهَرُ بَعْضُكُمْ عَلَى بَعْضٍ بِالْقِرَاءَةِ)
"जब कुछ लोग नमाज़ पढ़ रहे हों, तो बाकी जहरि (जोर) से किरात न करें।" एक दुसरी हदीस में ये शब्द हैं:
( فَلَا يُؤْذِيَنَّ بَعْضُكُمْ بَعْضًا )
"कुछ नमाज़ी एक-दूसरे को अज़ीयत न पहुंचाएं।" इससे मालूम हुआ कि वह काम जाइज़ नहीं है जिससे नमाज़ियों को तकलीफ़ पहुंचती हो।

*मेरी इन बच्चों के जिम्मेदारान से गुजारिश है कि वह ना शुऊर बच्चों को मस्जिद में न लाएं* और उसी भलाई को अपनाएं जो नबी करीम ﷺ ने अपने इस आदेश में सिखाई है:
*(مُرُوا أَبْنَاءَكُمْ بِالصَّلَاةِ لِسَبْعِ سِنِينَ، وَاضْرِبُوهُمْ عَلَيْهَا لِعَشْرِ سِنِينَ)* (سنن ابي داود‘ الصلاة‘ باب متي يومر الغلام بالصلاة‘ ح:494‘495 ومسند احمد: 2/187‘ واللفظ له)
"अपने बच्चों को नमाज़ का आदेश दो जब वह सात साल के हो जाएं, और अगर दस साल के होकर भी नमाज़ न पढ़ें, तो उन्हें मारो।"

*मैं मस्जिद के जिम्मेदारान से भी यह गुजारिश करता हूं कि इन बच्चों के लिए उनके दिल कुशादा हो जाएं जिनका मस्जिद में आना दुरुस्त है जैसा कि ऊपर की हदीस से मालूम हुआ, *उन्हें मुश्किल में न डालें और न उस जगह से उन्हें हटाएं जहां वह आगे बढ़कर बैठ गए हैं,* क्योंकि जो शख़्स आगे बढ़कर किसी जगह बैठ जाए, वह उसका अधिक हकदार है, चाहे वह बच्चा हो या बड़ा।

*बच्चों को सफ़ में से उनकी जगह से उठा देने में कई नुकसानात हैं:*

*1.* उनकी हक़ तलेफ़ी है, क्योंकि जो व्यक्ति आगे बढ़कर किसी जगह बैठ जाए, वह उसका अधिक हकदार है।
*2.* इससे उनके दिलों में मस्जिद से नफ़रत पैदा होगी।
*3.* बच्चे के दिल में उस व्यक्ति के बारे में किना और क्रोध पैदा होगा जो उसे उस जगह से उठाएगा जहां वह पहले से बैठा है।
*4.* बच्चों को उनकी जगह से उठा देने की स्थिति में वह सब इकट्ठे हो जाएंगे और खेलने लगेंगे, जिससे मस्जिद वालों को परेशानी होगी, और अगर बच्चे अलग-अलग होकर पुरुषों के बीच में खड़े होंगे, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं होगी।

✍️ जवाब दिहिंदा: *शेख़ इब्ने उथैमीन*
📖 किताब: फ़तावा इस्लामीया, जिल्द २, सफहा:२७
अनुवादकर्ता : *मो.अशरफ अंसारी सलफी अबहा सऊदी अरब*

05/04/2025

1️⃣दरसे हदीस1️⃣
💐*"अल्लाह तआला के अलावा ग़ैरुल्लाह की क़सम खाना शिर्क है"*💐

*"हदीस"* 👇👇👇
عَنِ ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، - عَنْ رَسُولِ اللَّهِ - صلى الله عليه وسلم - أَنَّهُ أَدْرَكَ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ فِي رَكْبٍ، وَعُمَرَ يَحْلِفُ بِأَبِيهِ، فَنَادَاهُمْ رَسُولُ اللَّهِ - صلى الله عليه وسلم: ((أَلَا إِنَّ اللَّهَ يَنْهَاكُمْ أَنْ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ، فَمَنْ كَانَ حَالِفًا فَلْيَحْلِفْ بِاللَّهِ، أَوْ لِيَصْمُتْ)). (أخرجه البخاري:٦١٠٨)
وَفِي رِوَايَةٍ لِأَبِي دَاوُدَ، : عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ - رضي الله عنه: ((لَا تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ، وَلَا بِأُمَّهَاتِكُمْ، وَلَا بِالْأَنْدَادِ، وَلَا تَحْلِفُوا إِلَّا بِاللَّهِ، وَلَا تَحْلِفُوا بِاللَّهِ إِلَّا وَأَنْتُمْ صَادِقُونَ)). (أخرجه أبوداود:٣٢٤٩)
*"तर्जुमा"* 👇👇👇
हज़रत इब्न उमर (रज़ीअल्लाहु अनहुमा) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से रिवायत करते हैं कि आपने हज़रत उमर (रज़ीअल्लाहु अनहु) को एक कारवां में अपने बाप की कसम उठाते सुना, तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन्हें बुलाकर फरमाया: "सुन लो! अल्लाह तआला ने तुम्हें तुम्हारे माँ–बाप की कसम खाने से मना फरमाया है। इसलिए जो कसम खाना चाहे तो अल्लाह की कसम खाए, वरना चुप रहे।" सही बुखारी:६१०८)
अबू दाऊद और नसाई की हज़रत अबू हुरैरा (रज़ीअल्लाहु अनहु) से एक मरफुअ रिवायत में है: "अपने माँ–बाप, और अल्लाह के साझीदारों (शरिको) की कसम न खाओ। अल्लाह की कसम भी सिर्फ उस हालत में खाओ जब तुम सच्चे हो।" (सुनन अबी दाऊद:३२४९)

*"तशरीह"* 👇👇👇 *
*1.* यह हदीस दलील है कि गैर-अल्लाह के नाम की कसम खाना हराम है। जामेअ तिर्मिज़ी में हज़रत इब्न उमर (रज़ीअल्लाहु अनहुमा) से मरवी है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "जिस किसी ने गैर-अल्लाह की कसम खाई, उसने कुफ्र या शिर्क का अपराध किया।" (जामेअ तिर्मिज़ी, अल-नज़र व अल-इमान, हदीस: 1535)
इमाम अबू दाऊद (रहमतुल्लाह अलैहि) ने यही रिवायत इन शब्दों से नकल की है: "जिस किसी ने गैर-अल्लाह की कसम खाई, उसने शिर्क किया।" (सुनन अबी दाऊद, अल-इमान व अल-नज़र, हदीस: 3251) और इसका कारण यह है कि किसी के नाम की कसम खाना उसकी महानता और अजमत की दलील होती है, और महानता वास्तव में सिर्फ अल्लाह के लिए है।

*2.* पुराने ज़माने से लोगों का यह अकीदा और भरोसा चला आ रहा है कि जिस के नाम की कसम खाई जाए, उसका कसम खाने वाले पर गलबा होता है और वह माफ़ौक़ अल-अस्बाब भी नफा और नुकसान देने की शक्ति रखता है। इसलिए जब कसम खाने वाला अपनी कसम पूरी करता है, तो जिसकी कसम खाई गई होती है, वह खुश होता है और उसे नफा देता है, और जब कसम खाने वाला अपनी कसम पूरी नहीं करता, तो वह उस पर नाराज होता है और उसे नुकसान पहुंचाता है। बेशक ऐसा अकीदा गैर-अल्लाह के बारे में रखना खुलम खुल्ला शिर्क और कुफ्र है और गैर-अल्लाह के नाम की कसम और गैर-अल्लाह के नाम की नज़र शिर्क ही की एक सुरत है। इसलिए जब कोई इस विश्वास और अकीदा के साथ कसम खाता है, तो उसने वास्तव में शिर्क का अपराध किया है, और जब कसम खाता है और यह विश्वास और सिद्धांत नहीं होता है, तो फिर उसने कम से कम शिर्क की एक बाहरी सुरत का अपराध जरूर किया है।
*3.* शरीयत ने शिर्क की जाहरी सुरतो से भी उसी तरह मना किया है जैसे वास्तविक (हकीकी) शिर्क से मना फरमाया है। *(ब्लुगूल मराम:११७१)*
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🌹Note:ऐसे ही रोजाना इस्लामी मसाईल से संबंधित हदीस और उसकी वजाहत पढ़ने केलिए इस पेज को follow करें।🌹
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04/04/2025
03/04/2025

🌹*"शव्वाल के छह रोज़े रखने की फ़ज़ीलत"*🌹
*"हदीस"* 👇👇👇
عَنْ أَبِي أَيُّوبَ صَاحِبِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ بِسِتٍّ مِنْ شَوَّالٍ, فَكَأَنَّمَا صَامَ الدَّهْرَ" (سنن ابی داؤد:٢٤٣٣)

*"तर्जुमा"* 👇👇👇
नबी करीम ﷺ के सहाबी सैयदना अबू आयूब ؓ नबी करीम ﷺ से बयान करते हैं कि आप ﷺ ने फरमाया, "जिसने रमज़ान के रोज़े रखे, फिर उसके बाद शव्वाल में छह रोज़े रखे, तो उसने गोया साल भर रोज़े रखे।" (सुनन अबी दाऊद:२४३)

*"शव्वाल के छह रोजों से मुतल्लिक चंद अहम बातें"*👇👇👇

*(1)* रमज़ान के रोज़ों के बाद शव्वाल में छह रोज़े रखना पूरे साल रोज़ा रखने की तरह है। - शेख़ इब्न उथैमीन, माजमू अल-फतावा (20/17)

*(2)* शव्वाल के छह रोज़े मर्द और औरत दोनों के लिए हैं। - शेख़ इब्न उथैमीन, माजमू अल-फतावा (20/17)

*(3)* रमज़ान के रोज़े पूरे किए बिना शव्वाल के छह रोज़ों की फज़ीलत हासिल नहीं होगी। - शेख़ इब्न उथैमीन, माजमू अल-फतावा (20/18)

*(4)* इब्न बाज़ रहमतुल्लाह फ़रमाते हैं: कज़ा रोज़ों से शुरुआत करना मसनून है क्योंकि कज़ा रोज़े जितनी जल्दी अदा कर लिए जाएं बेहतर है, चाहे शव्वाल के छह रोज़े छूट ही जाएं। - माजमू अल-फतावा (15/393)

*(5)* पूरे शव्वाल के महीने में जिस तरह चाहे रख लें, शुरू में, बीच में, या आखिर में, लगातार या अलग-अलग सब जायज़ है। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/390)

*(6)* महीने के शुरू में रख लेना ज्यादा बेहतर और आसान है। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/390)

*(7)* अफ़ज़ल तरीका यह है कि शव्वाल के छह रोज़े ईद के तुरंत बाद लगातार रख लिए जाएं। - शेख़ इब्न उथैमीन, माजमू अल-फतावा (20/20)

*(8)* लगातार रखने जरूरी नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग भी रखना जायज़ है। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/391)

*(9)* किसी साल रख ले और किसी साल न रखे, इसमें कोई हर्ज नहीं है क्योंकि यह फर्ज नहीं है, बल्कि नफ़ली रोज़ा है। - शेख़ इब्न उथैमीन, माजमू अल-फतावा (20/21)

*(10)* शव्वाल का महीना खत्म होने के बाद शव्वाल के छह रोज़ों की कज़ा मसनून नहीं है, क्योंकि शव्वाल के छह रोज़े सुन्नत हैं और माह शव्वाल के खत्म होने के साथ उनका वक्त खत्म हो जाता है, चाहे उज़्र की वजह से न रख सके हों या बिना उज़्र के। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/389)

*(11)* शव्वाल के रोज़ों को कफ़्फ़ारे के रोज़ों पर मुकद्दम करना जायज़ नहीं है क्योंकि शव्वाल के रोज़े नफ़ली हैं, जबकि कफ़्फ़ारे के रोज़े फ़र्ज़ हैं। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/394)

*(12)* कोई शख्स शव्वाल के रोज़े अगर वाकई शरई उज़्र की वजह से पूरे नहीं कर सका है, तो उम्मीद है पूरा अज्र मिलेगा, लेकिन बाकी रोज़ों की कज़ा नहीं है। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/395)

*(13)* रमज़ान के कज़ा रोज़े और शव्वाल के छह रोज़े लगातार बिना फस्ल के रख सकते हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं है। - शेख़ इब्न बाज़, माजमू अल-फतावा (15/396)

*(14)* अगर किसी के ज़िम्मे नज़्र के रोज़े हों, तो पहले नज़्र के रोज़े रखे जाएंगे, फिर अगर मुमकिन हुआ तो शव्वाल के छह रोज़े रखे जाएंगे, क्योंकि शव्वाल के छह रोज़े सुन्नत हैं, जबकि नज़्र के रोज़े रखना वाजिब है। - शेख़ इब्न बाज़, फतावा नूर अल-दारब (3/1261)

*(15)* शव्वाल के छह रोज़ों की हिकमत यह है कि इसके ज़रिए फ़र्ज़ की कमी पूरी की जा सके। शव्वाल के छह रोज़े ऐसे ही हैं जैसे नमाज़ के बाद वाली सुन्नत मुअक्कदा। - शेख़ इब्न उथैमीन (फतावा नूर अल-दारब)

*(16)* अगर शव्वाल के छह रोज़े सोमवार और गुरुवार को रखे जाएं तो दोनों अज्र हासिल हो जाएंगे, शव्वाल के छह रोज़ों के भी और सोमवार गुरुवार के रोज़ों के भी। - शेख़ इब्न उथैमीन (फतावा नूर अल-दारब)

*(17)* रमज़ान की कज़ा और शव्वाल के छह रोज़ों को एक नियत के साथ जमा करना जायज़ नहीं है क्योंकि शव्वाल के छह रोज़े रमज़ान के ताबेअ हैं। चुनानचे यह वैसे ही हैं जैसे फ़र्ज़ नमाज़ों के लिए सुन्नत मुअक्कदा। - शेख़ इब्न उथैमीन (फतावा नूर अल-दारब)
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🌹Note:ऐसे ही रोजाना इस्लामी मसाईल से संबंधित हदीस और उसकी वजाहत पढ़ने केलिए इस पेज को follow करें।🌹
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Photos from Madarsa Salfiya Darul Islam, Kalaiya-9, Bara, Nepal's post 22/03/2025

*🌹अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु🌹*

रमज़ान के आखिरी अशरा यानी शब-ए-क़द्र का समय चल रहा है। यह मालुम नहीं है कि अगले साल यह महीना और यह मौका हम में से किस को मिले और किस को न मिले।

इसलिए, मैं आप सभी नेक और सालेह हजरात से गुज़ारिश करता हूँ कि इस मौके की कद्र जानते हुए, ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़, सदक़ा, और खैरात के साथ-साथ तौबा और इस्तगफ़ार करें।

और ख़ास तौर से, फिलिस्तीन के मुसलमानों के लिए दुआ करें कि अल्लाह उनकी गैबी मदद करें और उनके हालात को बेहतर बनादें।

*और हमारे गांव के मदरसा (MSDI) के सहयोग में ज़्यादा से ज़्यादा Donation जमा करें ताकि मदरसे की तालिमी सरगर्मियां बेहतर से बेहतर बनाया जा सकें।*

16/03/2025

6 sawalat aur unke jawabat by Jalaluddin Qasmi Hafizahullah

14/03/2025

🔥*"पाँच चीजें फित्रत में से हैं"*🔥

हदीस"* 👇👇👇
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ "الْفِطْرَةُ خَمْسٌ الِاخْتِتَانُ وَالِاسْتِحْدَادُ وَقَصُّ الشَّارِبِ وَتَقْلِيمُ الْأَظْفَارِ وَنَتْفُ الْإِبْطِ" (سنن نسائی :٩/١٠/١١/١٢)

*"तर्जुमा"* 👇👇👇
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "पाँच चीजें फित्री हैं: खतना कराना, नाफ़ के नीचे के बाल मुंडना, मूंछें काटना, नाखून तराशना और बगलों के बाल उखाड़ना।" (सुनन नसई:९/१०/११/१२)

*"तशरीह"* 👇👇👇
*1.* खतने को फित्री अमलों में इसलिए शामिल किया गया है कि खतना न कराने की स्थिति में क्लिफ़ा (हस्फ़े पर ज्यादा चमड़ा) तहारत में बाधक बन सकता है, पेशाब की बूंदें इसमें अटक सकती हैं और जिमा के बाद हस्फ़े की सफाई नहीं हो पाएगी। तहारत से अलग, क्लिफ़ा जरासीम की आम जगह भी बन सकता है, इसलिए क्लिफ़े को काट देना अक्ली और फित्री तकाज़ा है।
*2.* नाफ़ के नीचे के बाल साफ करना इसलिए फित्रत में शामिल है कि जिमा के समय बड़े बाल गंदगी से प्रभावित हो सकते हैं। सफाई मुश्किल होगी, खासकर जब पानी न हो या कम हो। इसलिए, उन्हें मुंडना जरूरी है ताकि गंदगी और बदबू से बचा जा सके।

*3.* हदीस में हल्क का शब्द आया है, लेकिन इस बात पर इत्तफाक है कि इन बालों को किसी भी तरीके से साफ किया जा सकता है। मुंडकर, दवाई लगाकर, उखाड़कर या काटकर, लेकिन डॉक्टरी अनुसार मुंडना ही फायदेमंद है। इससे कुवते मर्दानगी बढ़ता है या बना रहता है, और इसके अलावा, इस हुक्म यानी नाफ के नीचे के बाल साफ़ करने में मर्द और औरत बराबर हैं।

*4.* नाफ के नीचे के बाल साफ़ करने में शर्मगाह में सिर्फ आगे की शर्मगाह शामिल है, जबकि कुछ उलेमा के नज़दीक इसमें आगे और पीछे दोनों शर्मगाहें शामिल हैं। वल्लाहु आलम।

*5.* मूंछें, ब्लूग़त का निशान हैं, इससे बच्चे और बड़े में तफ़ावत होती है, लेकिन यह मुंह के ऊपर होती हैं, ज्यादा बड़ी हो जाएं तो खाने-पीने की चीजों को लगेंगी। खुद भी अलूदाह होंगी और खाने-पीने की चीजें भी धूल-मिट्टी के साथ पेट में जाएंगी, इसलिए ऊपरी होंठ से नीचे मूंछों को काटना अक्ली तकाज़ा है। शरीअत इस्लामिया का हुक्म भी यही है, हालांकि मूंछों के किनारे जो दाढ़ी से मिल जाएं, बिना काटे रखे जा सकते हैं।

*6.* नाखून तराशने (काटने) को फित्रत के अमलों में इसलिए शामिल किया गया है कि नाखून गंदगी और मैल-कुचेल को जमा रखने का ज़रिया बन सकते हैं, जो तहारत से रोकता है, और देखने में भी बुरे लगते हैं और जानवरों के साथ तश्बीह होती है, हालांकि अल्लाह तआला ने इंसान को सबसे अच्छी शक्ल-ओ-सूरत में पैदा किया है, इरशाद बारी तआला है: "लकद खलकनअल-इंसान फ़ी अहसिन तक्वीम" (अत-तीन 4:95) "यक़ीनन हमने इंसान को सबसे अच्छी शक्ल-ओ-सूरत में पैदा किया है।" ज्यादा बड़े नाखून किसी को या अपने आप को ज़ख्मी कर सकते हैं, इसलिए फित्रते सलिमा का तकाजा है कि जब नाखून बड़ा होजाए तो काट दिए जाएं।

*7.* बगलों (कांख) के बाल गर्दन की रक्षा के लिए होते हैं। वे गर्मी को रोकते हैं, लेकिन जब काम-काज के दौरान बाजू नंगे हो जाते हैं, तो बगलें दिखाई देती हैं जिससे बगलों के बाल बुरे लगते हैं। इसके अलावा, इनमें धूल-मिट्टी भी जमा हो जाती है, पसीना ज्यादा आता है और बाल सफाई से रोकते हैं। इसलिए, इंसानी फित्रत तकाज़ा करती है कि बगलों (कांख) के बालों को साफ किया जाए।

*8.* हदीसों में बगलों (कांख) के बाल मुंडने की बजाय उखाड़ने का जिक्र है, यह इसलिए कि मुंडने से बाल ज्यादा और मोटे हो जाते हैं, जबकि उखाड़ने से बाल कम और पतले हो जाते हैं। इनमें नरमी रहती है, चुभते नहीं हैं। पसीने और बदबू में कमी होती है, और बगल के बाल उखाड़ने से तकलीफ भी नहीं होती है। इसलिए, इन्हें मुंडने की बजाय उखाड़ना बेहतर है, हालांकि अगर कोई व्यक्ति बाल उखाड़ने से तकलीफ महसूस करे, तो मुंड भी सकता है क्योंकि असली मकसद तो बालों की सफाई है।

*9.* इस हदीस में पांच फित्री अमलों का जिक्र किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ़ यह पांच चीजें ही फित्रत में शामिल हैं, बल्कि दूसरी हदीसों में इनके अलावा कुछ और चीजों का भी जिक्र है, जैसे कि एक रिवायत में है: "[अशर मिन अल-फित्र]" "दस चीजें फित्रत से हैं"। (सही मुस्लिम, अत-तहारत, हदीस 261)

*10.* इन अमलों को फित्रत क़रार देने से मुराद यह है कि इंसान की फित्रत सालिमा इन चीजों का तकाज़ा करती है। दीन-ए-इस्लाम को भी इसी लिए फित्रत कहा गया है कि वह इंसानी फित्रत के तकाजों के अनुसार है।

*11.* इन अमलों को फित्रत क़रार देने की यह वजह भी है कि अल्लाह तआला ने शुरू से ही हर नबी और रसूल को इन अमलों का हुक्म दिया, गोया ये अहकाम ऐसे फित्री और जबली हैं कि इन पर इंसानों की पैदाइश हुई। फित्रत के मायने पैदाइश ही हैं।
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💐Note:ऐसे ही रोजाना इस्लामी मसाईल से संबंधित हदीस और उसकी वजाहत पढ़ने केलिए इस पेज को follow करें।💐
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13/03/2025

🌹 *"ईमान और सवाब की नीयत से रोज़ा रखना और क़याम करना गुनाहों का कफ्फाराह है"*🌹

*"हदीस"* 👇👇👇
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ مَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ وَمَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ (أخرجه بخاری: ١٩٠١)

*"तर्जुमा"* 👇👇👇
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो कोई शब-ए-क़द्र में ईमान के साथ और हुसूल-ए-सवाब की नीयत से इबादत में खड़ा हो, उसके सभी पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। और जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ और सवाब की नीयत से रखे, उसके सभी पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। (सही बुखारी:१९०१)

*"तशरीह"* 👇👇👇
*1.* हर एक काम के लिए नीयत का सही होना ज़रूरी है, रोज़ा भी सबसे अच्छा काम है, बशर्ते कि खुलूस-ए-दिल के साथ, सिर्फ़ रिज़ा-ए-इलाही की नीयत से रखा जाए। और हुक्में इलाही पर यक़ीन होना भी ज़रूरी है कि यह सिर्फ़ एक रस्म न हो, नहीं तो सवाब नहीं मिलेगा, जो यहाँ बयान किया गया है।

*2.* इस हदीस की वजाहत में उस्ताद-ए-कुल हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि मैं कहता हूँ, इसकी वजह यह है कि रमज़ान के रोज़े रखने में कुव्वत-ए-मलकी के ग़ालिब होने और कुव्वत-ए-बहीमी के मगलूब होने के लिए यह मिकदार काफ़ी है कि उसके सभी पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे।
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12/03/2025

🌾 *"ज़कात-उल-फित्र क्यूं,किस पे, कितना, कब, और क्या अदा करने का बयान"*🌾

*"हदीस"* 👇👇👇
عَنِ ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم زَكَاةَ الْفِطْرِ، صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ: عَلَى الْعَبْدِ وَالْحُرِّ، وَالذَّكَرِ، وَالْأُنْثَى، وَالصَّغِيرِ، وَالْكَبِيرِ، مِنَ الْمُسْلِمِينَ، وَأَمَرَ بِهَا أَنْ تُؤَدَّى قَبْلَ خُرُوجِ النَّاسِ إِلَى الصَّلَاةِ" ( أخرجه البخاري"١٥٠٣)

*"तर्जुमा"* 👇👇👇
हज़रत इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों में से हर गुलाम, आज़ाद, मर्द, औरत, छोटे और बड़े पर एक सा' खजूर या एक सा' जौ ज़कात-उल-फित्र फर्ज़ किया है। और इसके बारे में हुक्म दिया है कि इसे नमाज़ (ईद) के लिए निकलने से पहले अदा कर दिया जाए। (सही बुख़ारी: १५०३)

*"तशरीह"* 👇👇👇
*1.* इस हदीस से यह पता चलता है कि फ़ित्राना मुसलमानों के सभी सदस्यों पर वाजिब है, और इसकी अदायगी का हुक्म भी नमाज़-ए-ईद से पहले है। ताकि समाज के ज़रूरतमंद लोग इस दिन मांगने से बेनयाज होकर आम मुसलमानों के साथ खुशियों और मस्तियों में शामिल हो सकें।

*2.* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़ित्राने की मात्रा एक सा' तय की है।

*3.* ज़कात-उल-फ़ित्र में नकदी अदा करने का मौकिफ़ कुछ उलेमा ने अपनाया है, लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान और सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के उस्वे हसना से यही पता चलता है कि ज़कात-उल-फ़ित्र में वह जिंस अदा करनी चाहिए जो अहल-ए-खाना की आम ग़जा हो, जैसे कि गेहूं, चावल, और खजूर वगैरह।

*4.* ग़ैर मुस्लिम गुलाम का फ़ित्राना नहीं है, लेकिन जिन लोगों की कफ़ालत किसी के ज़िम्मे है, उन सभी का फ़ित्राना वह खुद अदा करेगा।
*5.* हदीस से साबित होता है कि ज़कात-उल-फ़ित्र के लिए निसाब का मालिक होना भी ज़रूरी नहीं है।

*6.* फर्ज़ का शब्द बता रहा है कि फ़ित्राना अदा करना निहायत ज़रूरी और लाज़िमी है। इमाम इसहाक़ बिन राहवियह ने तो फ़ित्राने के वुजूब पर इज्मा का दावा किया है। *(ब्लुगूल मराम:५०५)*
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🌹Note:ऐसे ही रोजाना इस्लामी मसाईल से संबंधित हदीस और उसकी वजाहत पढ़ने केलिए इस पेज को follow करें।🌹
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