Shree Saraswati Sanskrit Vidyapeeth Parahita Dham, Yatsouk -Myanmar

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Shree Saraswati Sanskrit Vidyapeeth Parahita Dham,  Yatsouk -Myanmar Shwenyaung

राधे राधेे..........
16/07/2019

राधे राधेे..........

गुरुपूर्णिमा महोत्स..... श्री सरस्वती सँस्कृत विद्यापीठ परहित धाम यकसकमा विद्यार्थी द्वारा...गुरूपुजा साथै  गुरुमहिमा को...
16/07/2019

गुरुपूर्णिमा महोत्स..... श्री सरस्वती सँस्कृत विद्यापीठ परहित धाम यकसकमा विद्यार्थी द्वारा...गुरूपुजा साथै गुरुमहिमा को उपदेश ग्रहण गर्दै 16/7/2019

भगवान गौतम बुद्ध जयन्ति की मङ्गलमय शुभकामनाबौद्ध स्तोत्र        ष्टुञ् स्तुतौ धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय कर स्तोत्र शब्द बन...
18/05/2019

भगवान गौतम बुद्ध जयन्ति की मङ्गलमय शुभकामना

बौद्ध स्तोत्र

ष्टुञ् स्तुतौ धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय कर स्तोत्र शब्द बना है। अमरकोश में स्तवः स्तोत्रं स्तुतिर्नुतिः ये चार शब्द स्तोत्र के पर्यायवाची बताये गये है। स्तोत्र शब्द स्तुति का पर्यायवाची है। स्तुति काव्यों में देवताओं के प्रति समर्पण, सख्यभाव, प्रशंसा या गुणगान प्राप्त होता है।

अलंकार शास्त्र के आचार्यों ने स्तोत्र काव्य को लघु काव्य या संघात काव्य माना है। भक्ति की प्रधानता के कारण इसे भक्ति काव्य भी कहा जा सकता है। इसे दसवें रस के रुप में मान्यता दी गयी। स्तोत्र में शाब्दिक चमत्कार या अर्थगाम्भीर्य आवश्यक नहीं है, सरल से सरल और कम से कम शब्दों में अपने हृद्गत भाव को आराध्य तक पहुँचा देना ही स्तोत्र का अभिप्राय है, परन्तु कुछ विद्वानों ने अपने पाण्डित्य का ऐसा कौशल दिखाया है कि उनकी रचनाएँ रस, ध्वनि, व्यञ्जना और अलंकारों से परिपूर्ण काव्य बनकर रह गये है।

लौकिक संस्कृत काव्यों में यत्र-तत्र देव स्तुतियां विकीर्ण है। कुछ आचार्यों ने पृथक्तया भी स्तोत्रों की रचना की है।मत्स्य पुराणों में स्तोत्र के चार प्रकार बताये गये हैं-

द्रव्यस्तोत्रं कर्मस्तोत्रं विधिस्तोत्रं तथैव च।

तथैवभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेतच्चतुष्टयम्। मत्स्य पु0 अ. 121

द्रव्यस्तोत्र में आराध्य के किसी एक आयुध, अंग को लेकर स्तुति की जाती है। जिन द्रव्यों से आराध्य का स्तवन किया जाता हैए उसे भी द्रव्य स्तोत्र कहते है। कर्म स्तोत्र में देवताओं के पराक्रम, वैभव एवं कल्याणकारी गुणों का वर्णन किया जाता है। विधि स्तोत्र में आराधक के कर्तव्यों का विधान तथा शेष स्तोत्र अभिजन कहे जाते है।

सम्पूर्ण बौद्ध संस्कृत स्तोत्र रचनाएँ बुद्ध-भक्ति से अनुप्राणित है तथा अधिकांश बौद्ध-आचार्यो ने बुद्ध के प्रति अपने भक्ति-भाव पूर्ण उद्गारों को अभिव्यक्त किया है। बौद्ध धर्म के महायान शाखा के अधिकांश स्तोत्र संस्कृत में प्राप्त होते है। बौद्ध स्तोत्र काव्य के आदि रचयिता अश्वघोष हैं। अश्वघोष वैदिक-वाङ्मय के विद्वान थे तथा उनका पौराणिक ज्ञान भी गहन था। अतएव इस प्रकार के बौद्ध आचार्य द्वारा बुद्ध-भक्ति की, जो साधना की गई, वह इस बात का द्योतक है कि श्रौत परम्परा की भक्ति-धारा का प्रभाव बौद्ध धर्म पर है। महाकवि अश्वघोष द्वारा बुद्ध-धर्म की प्रस्तुत की गई व्याख्या उपनिषदों से अधिक सादृश्य रखती है। अश्वघोष ने बुद्ध भक्ति को प्रथमतः प्रश्रय दिया तदनन्तर मातृचेट और नागार्जुन का नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है।

इसके अनन्तर तो प्रायः सम्पूर्ण महायानी रचनाओं में भी बुद्ध-भक्ति समाविष्ट हो गई। बुद्ध-भक्ति के प्रकृष्ट भावुक कवि शान्तिदेव हुए हैं।

नागार्जुन के चार स्तव-लोकातीतस्तव, अचिन्त्यस्तव,परमार्थस्तव और निरौपम्यस्तव, मातृचेट का अध्यर्ध शतक आदि कई स्तोत्र में बौद्ध धर्म एवं दर्शन के गूढ़ तत्त्वों को व्यक्त किया गया है।

बौद्ध संस्कृत स्तोत्र को 1. महावस्तु 2. ललित-विस्तर 3. अश्वघोष 4.तदनन्तर के स्तोत्र में बांटा जा सकता है।

सम्प्रति उक्त बुद्ध-भक्ति से सम्बद्ध बौद्ध-स्तोत्रकारों के संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत हैं।

बौद्ध-स्तोत्रकार स्तोत्र

1. अश्वघोष- बुद्धगण्डी स्तव

2. मातृचेट- अध्यर्धशतक

3. शान्तिदेव

4. नागार्जुन- परमार्थ- स्तव, सप्त-बुद्ध-स्तोत्र’ नेपालीय-देवता-कल्याण-पंचविंशतिका, निरौपम्य-स्तव’

5. हर्षवर्धन- ‘सुप्रभातम्’ स्तोत्र,

स्त्रग्धरापंचक स्तोत्र,स्वयम्भूस्तव

6. वज्रदत्त- लोकेश्वर-शतक

7. सर्वज्ञमित्र- स्त्रग्धरा स्तोत्र

8. रामचन्द्र कवि भारती- भक्ति-शतक

9. आर्यदेव- गण्डीस्तव

10. चन्द्रकीर्ति- मध्यममक शास्त्र

इनके सभी महत्त्वपूर्ण स्तोत्रों में से अधिकांश का यहाँ उल्लेख है। भिक्षुणी चन्द्रकान्ता, लक्षा भगवती, चरपति (चर्पटि) पाद, मंजुनाथ,वनरत्न, वन्धुदत्त, वज्रदत्त, विभूतिचन्द्र, आचार्य चन्द्रदास, वासुकिनाग,नवग्रह, ब्रहमा, विष्णु, शंकर और सुरपति आदि के स्तोत्र भी प्राप्त होते हैं।

कुछ स्तोत्र महावस्तु, ललितविस्तार सदृश प्राचीन मूल ग्रन्थों में विद्यमान है। कविवर मातृचेट एक उच्चकोटि के स्तुतिकार हो चुके है, जिन्हें स्तोत्र-साहित्य का जनक कहा जाता है। इनकी स्तुतियाँ साहित्य-जगत् में पूर्ण प्रसिद्वि प्राप्त कर चुकी हैं।

1. आचार्य नागार्जुन

शून्यवाद के प्रधान प्रतिष्ठापक नागार्जुन ने भक्ति-रस से परिपूरित चार स्तोत्रों की रचना की है। यह ‘चतु-स्तव’ नाम से विख्यात् है। इनके तिब्बती भाषान्तर आज भी विद्यमान है। कवि द्वारा विरचित‘निरौपम्यस्तव’ तथा ‘अचिन्त्य-स्तव’ नामक दो स्तोत्र सौभाग्य से संस्कृत में भी उपलब्ध हुए है। इनकी रचना सरस एवं भक्ति रस पूरित भाषा में हुई है। प्रायः लोग शून्यवाद को अभावात्मक मानते है, किन्तु जिन्हें नागार्जुन कृत स्तोत्रों के अध्ययन का सुअवसर प्राप्त हुआ है, वे इस बात को देखकर अत्यन्त ही विस्मित् होते हैं कि ये स्तोत्र अभावात्मक न होकर, आस्तिकता के परमोज्जल दृष्टान्त उपस्थित करते है। उदाहरण के रुप में निम्न उद्धरण देखें-

नामयो नाशुचिःकाये क्षुत्तृष्णासम्भवो न च।

त्वया लोकानुवृत्यर्थं दर्शिता लौकिकी क्रिया।। निरौपम्य-स्तव 19

नित्यो ध्रुवः शिवः कायस्तव धर्ममयो जिन।

विनेयजनहेतोश्च दर्शिता निर्वृतिस्त्वया।। निरौपम्य-स्तव 22

2. हर्षवर्धन (600-640 ई0)

स्तोत्र साहित्य में हर्षवर्धन कृत बौद्ध स्तोत्र एक उज्जवल नक्षत्र के समान अपनी आभा को फैलाये हुये है। हर्षवर्धन ने अपने जीवन के अन्तिम काल में ‘सुप्रभात स्तोत्र’ नामक स्तुति-काव्य की रचना की थी। 24 श्लोकों में उपनिबद्ध उषाकालीन, यह स्तोत्र भगवान बुद्ध की प्रशंसा में लिखा गया है।
उदाहरण स्वरूप निम्न श्लोक को देखें-
अशनवशनहीना भाव्यमाना विरूपा
अलमखिलविघातैः प्रेतवद्गधदेहाः।
उभयगतिविहीनास्तेपि नग्नाः प्रसुप्ता
दशबल तव नित्यं सुप्रभातम् प्रभातम्।। सुप्रभात स्तोत्र 15
‘अष्ट-महा-श्री-चैत्य-स्तोत्र’ इनकी इस प्रकार की द्वितीय रचना है, जो तिब्बती प्रति-लेखन के आधार पर, एस0 लेवी द्वारा अनूदित हुई है। शोभन छन्दों में ग्रथित इसमें अष्ट महनीय तीर्थ स्थानों की संस्तुति की गई है। स्त्रग्धरा स्तोत्र के विषय में कहा गया है कि वह महायान में नितान्त लोकप्रिय तारा का स्तोत्र है। स्तोत्र साहित्य में इसकी टक्कर के बहुत कम-स्तोत्र मिलेंगे। स्त्रग्धरा छन्द में निबद्ध यह स्तोत्र इतना प्रसिद्व हो गया कि बिना भगवती तारा का नाम जोड़े भी केवल स्त्रग्धरा स्तोत्र के नाम से ही इसका बोध हो जाता है। छन्द, अलंकार और अपनी गौडीय रीति के कारण यह स्तोत्र मेघदूत जैसे खण्ड काव्य में स्थान पाने का अधिकारी है। कहा जाता है कि काश्मीर-निवासी, कवि सर्वज्ञमित्र ने तारादेवी की स्तुति में एक स्त्रग्धरा स्तोत्र स्तुति-काव्य लिखा है,

3. वज्रदत्त

महाराज देवपाल (नवम शती) के आश्रित कवि ने ‘लोकेश्वर-शतक’ की रचना की थी, जिसमें शत-श्लोकों में बुद्ध लोकेश्वर की स्तुति की गई है। इसके विषय में ऐसी किम्वदन्ती है कवि अभिशाप के कारण कुष्ट रोग से ग्रस्त हो गया था। उसने अपने रक्षा-निमित्त अवलोकितेश्वर (बुद्ध) की प्रार्थना की तथा प्रतिदिन एक अलंकृत स्त्रग्धरा छन्द, उनकी स्तुति में लिखना प्रारम्भ कर दिया। जब इस प्रकार तीन मास व्यतीत हो गये और कवि ने एक सौ श्लोकों की रचना कर डाली, बोधि-सत्त्व ने उसे दर्शन दिया और इस भक्त कवि को व्याधि-मुक्त का दिया। इस परिश्रम-साध्य रचना में भगवान अवलोकितेश्वर का, अंगुलियों से लेकर अंगूठे तक, विस्तृत एवं भव्य चित्रण किया गया है। इसमें उनके पश्चात् अभिधानों की गणना तथा उनके गुण, प्रेम और उदारता की स्तुति काव्य-मयी सरस भाषा में की गई है।

4. नागार्जुन

परमार्थ-संगीति एक ऐसा स्तोत्र है जिसका यजुर्वेद,महाभारत और प्रायः पुराणों में भी दर्शन होता है। यह धार्मिक प्रार्थनाओं से परिपूरित एक संक्षिप्त रचना है, जिसमें देवी-देवों के अभिधानों एवं संस्तुतिपूर्ण विशेषणों की गणना हुई है। एक अन्य कृति, जिसकी रचना मुख्यतः धार्मिक कृत्यों के निमित्त की गई है, नव श्लोकों की छन्दोबद्ध रचना है, जिसे ‘सप्त-बुद्ध-स्तोत्र’ नाम से अभिहित किया गया है। यह सप्त बुद्धों का स्तवन् है, जिसमें विपश्यिन् से लेकर काश्यप तक के छः विगत कालीन बुद्धों तथा शाक्य-मुनि एवं भावी बुद्ध मैत्रेय के प्रति भक्ति-प्रदर्शित करते हुए, एक दूसरे के अनन्तर स्तुति की गई है।

इसी ढ़ंग की रचना ‘नेपालीय-देवता-कल्याण-पंचविंशतिका’ है,जिसके प्रणेता ‘अमृतानन्द’ नामक एक कुशल कवि है, किन्तु इनके विषय की अधिकांश बातें अज्ञात है। इस कृति में 25 श्लोक स्त्रग्धारा छन्दों में निबद्ध है तथा यह एक मंगलमय स्तोत्र-काव्य है। इसमें नेपाली देवताओं,विशषतः स्वयंभू, बोधि-सत्त्व, हिन्दू देवी-देवताओं, बौद्धों द्वारा जड़ पदार्थोे का मानवीकरण, तीर्थ-स्थानों और चैत्यों की कल्याण-कामना के लिए,गौरवमयी स्तुति वर्णित है।

अचिन्त्ययस्तव में आचार्य नागार्जुन ने चतुष्कोटिविनिमुक्तं शून्यता और निःस्वाभावता सिद्धान्त की स्तुति के व्याज से सम्यक् प्रतिष्ठा की है।

4. सर्वज्ञमित्र

इस कवि का प्रादुर्भाव अष्टम शती के प्रथमार्ध में हुआ था। कल्हन् ने अपनी रचना में सर्वज्ञमित्र का उल्लेख किया है, काश्मीर-निवासी,कवि सर्वज्ञमित्र ने तारादेवी की स्तुति में एक स्तुति-काव्य लिखा है, जिसका नाम ‘स्त्रग्धरा-स्तोत्र या आर्य-तारा-स्त्रग्धरा-स्तोत्र’ है। परिष्कृत एवं सुन्दर काव्य-शैली में रचित, सप्तत्रिंशत् छन्दों की, यह एक अद्वितीय कृति है।‘स्त्रगधरा’ (धन की अधिष्ठात्री-देवी), तारा का एक विशेषण है और साथ ही इसका अर्थ ‘स्त्रगधरा’ छन्द से भी लिया गया है, जिसमें उक्त स्तोत्र की रचना हुई है। बौद्ध-देवी ‘तारा’ की स्तुति में भी प्रभूत मात्रा में स्तोत्रों की रचना हुई है। यह ‘तारा’ अवलोकितेश्वर (बुद्ध) की स्त्री-प्रतिमूर्ति और मुक्ति-दात्री देवी है। जहाँ पर वह द्वितीय जिन के रुप में वर्णित है ये कय्य द्वारा निर्मित कय्य-बिहार में रहा करते थे। ‘कय्य’ लाट के अधिपति और ललितादित्य, जो काश्मीर में (अष्टम् शती में) शासन करते थे, के अधीन थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार, यह अपनी उदारता के लिए सर्वत्र विख्यात् एक उदार व्यक्तित्त्व थे। तारनाथ ने इन्हें काश्मीर-महाराज का जामातृ माना है, जिन्होनें अपना सम्पूर्ण राज-कोष दान कर दिया और अन्त में औषधि-वितरक एक सन्यासी के रुप में सर्वत्र भ्रमण करने लगे। एक समय में उनकी भेंट एक निर्धन ब्राहमण से हुई, जिसने अपनी निर्धनावस्था के कारण अपनी पुत्री का विवाह करने की असमर्थता प्रकट की। इस दीन ब्राहमण को धन देने की अभिलाषा में सर्वज्ञमित्र ने अपने को एक राजा के हाथ में बेंच दिया, जिसे नर-यज्ञ के निमित्त सौ व्यक्तियों की आवश्यकता थी। जब इस कवि ने यज्ञ में बलिदान किया जाने वाले अपने सहचर व्यक्तियों के करुण ह्दय ये करुणा फूट पड़ी और कवि द्वारा प्रार्थित तारा देवी ने दर्शन देकर बलि दिये जाने वाले समस्त व्यक्तियों को अभय-दान दिया। यह स्त्रग्धरा-स्तोत्र, काव्य की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण रचना है। इसके अतिरिक्त ‘आर्य-तारा-नामस्तोत्रशतक-स्तोत्र’ तारा देवी के एक सौ आठ अभिधानों की संगीतमयी स्तुति है। यह साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण न होकर, केवल देवी के विशेषणों और नामों का धार्मिक स्तवन है। इसी ढ़ंग की एक रचना ‘एकविंशति-स्तोत्र’ है, जिसमें तारा देवी की प्रशंसात्मक प्रार्थना, 21 अनुप्रयास युक्त श्लोक में की गई है, साथ ही यह तारा देवी की शिथिल, किन्तु उत्तेजना-वर्धक स्तुतियों से परिपूर्ण है। चन्द्रोगोमिन् तारा देवी के अनन्य भक्त थे, जिनके नाम से ‘तारा-साधक-शतक’ नामक एक स्तुति-काव्य का उल्लेख है। षष्ठ शती में तारा-सम्प्रदाय परिचित था। ह्वेनसांग ने भारत में देखे ‘तारा-बोधिसत्व’ की मूर्तियों का उल्लेख किया है। आर्य-तारा की पूजा जावा (778 ई0) में पूर्ण प्रचलित थी, जहां पर उनकी एक महनीय एवं पूर्ण समाधि है।

5.रामचन्द्र कवि भारती

बंगाल के एक ब्राहमण कवि थे। जिन्होनें बंगाल से लंका जाकर,वहाँ के अधिपति प्राक्रमवाहु (लगभग 1245 ई0) के आश्रय में बौद्ध-धर्म को स्वीकार कर लिया था। ‘भक्ति-शतक’ कवि की एक प्रधान रचना है,जिसमें भक्ति-पूर्ण सौ छन्द है। इसमें कवि ने, भारतीय ब्राहमण-भक्ति-विचार-धारा को बौद्ध-भक्ति-विचार-धारा का रुप प्रदान किया है। यह रचना भगवान बुद्ध की प्रशंसा में अलंकृत एवं छन्दोबद्ध भाषा में निबद्ध एक भक्तिपूर्ण कलात्मक काव्य-कृति है। इसमें बुद्ध के शिक्षक, मुक्ति-दाता एवं करुणा-सागर के स्वरुप का अंकन हुआ है। यह कृति महायान और हीनयान, दोनों सम्प्रदायों से समान रुप से सम्बद्ध है।

Crd: जगदानन्द झा

प्रमाण पत्र प्रदान श्रद्धेय गुरुवरको करकमलबाटजय श्री राधे🙏
28/03/2019

प्रमाण पत्र प्रदान श्रद्धेय गुरुवरको करकमलबाट
जय श्री राधे🙏

प्रातस्मरणीय परं श्रद्धेय श्री पद्मप्रसाद भट्टराई गुरुवरको मुखारवृन्द बाट  विद्यार्थीहरुलाई ज्ञानोपदेश तथा शुभाशिष दिदैं...
28/03/2019

प्रातस्मरणीय परं श्रद्धेय श्री पद्मप्रसाद भट्टराई गुरुवरको मुखारवृन्द बाट विद्यार्थीहरुलाई ज्ञानोपदेश तथा शुभाशिष दिदैं....
जय श्री राधे🙏

प्रातस्मरणीय महात्मा गुरुवर श्री देवर्षि शरण ढकाल ज्यू , यज्ञाचार्य जी, उपवाचक जी साथै तबला वादक, वासुरी वादक र गायक ज्य...
27/03/2019

प्रातस्मरणीय महात्मा गुरुवर श्री देवर्षि शरण ढकाल ज्यू , यज्ञाचार्य जी, उपवाचक जी साथै तबला वादक, वासुरी वादक र गायक ज्यूहरु र विद्यापीठ प्राध्यापक गुरुवर श्री यादव शिवाकोटी श्री कृष्ण भगवानको झाँकी प्रदर्शनादिको दिव्य दृष्यहरु..

प्रातस्मरणीय गुरुवरहरुको सान्निध्यमा प्रथमा परीक्षोत्तीर्ण विद्यार्थीहरूलाई व्यासासन प्रदान कार्यक्रम समारोहका केहि दृष्...
26/03/2019

प्रातस्मरणीय गुरुवरहरुको सान्निध्यमा प्रथमा परीक्षोत्तीर्ण विद्यार्थीहरूलाई व्यासासन प्रदान कार्यक्रम समारोहका केहि दृष्यहरु....
जय श्री राधे......

२५.३.२०१९ सोमबार..नेपाल बाट अागमन गर्नु भएका साहित्यकार गुरुहरु र अन्यान्य विविध शाखा प्रशाखाहरुबाट पालनुभएका विद्वत् वर...
25/03/2019

२५.३.२०१९ सोमबार..
नेपाल बाट अागमन गर्नु भएका साहित्यकार गुरुहरु र अन्यान्य विविध शाखा प्रशाखाहरुबाट पालनुभएका विद्वत् वर्ग हरु अर्थात साहित्य प्रेमी सज्जनहरु द्वारा अायोजना गरिएको साहित्यीक समारोहका केहि दृष्यहरु

24/3/2019 श्री सरस्वती संस्कृत विद्यापीठ (परहित) धाम, यकसक आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ ,सायंकालीन दिव्य कथा...
24/03/2019

24/3/2019 श्री सरस्वती संस्कृत विद्यापीठ (परहित) धाम, यकसक आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ ,
सायंकालीन दिव्य कथा ,कीर्तन साथै श्रीमद्भागवत महापुराणान्तरगत प्रश्नोत्तरी

24/3/2019  श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ,  तृतीय दिन
24/03/2019

24/3/2019 श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ, तृतीय दिन

सायं कालीन महात्म्य व्याख्या साथै भजन-कीर्तनारति...
23/03/2019

सायं कालीन महात्म्य व्याख्या साथै भजन-कीर्तनारति...

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