02/09/2022
अनुगूँजआत्मस्वीकृति की/ एक अनुभूति और सत्याभिव्यक्ति
पाप के प्रायश्चित की...कविता !! क्षमायाचना के साथ
#कुमारशैलेन्द्र
पाँच दशक पूर्व,
पन्द्रह वर्ष की उम्र थी,
परीक्षार्थी था मैं, जीवन में
पहली बार मुझे मैट्रिक की परीक्षा देनी थी।
पहले हाथ में हथौड़ी थी , दूसरे में छेनी थी ।
प्रवेश पत्र प्राप्ति हेतु
परीक्षा- तिथि के
पाँच दिन पूर्व सकुचाया सा मैं
प्रधानाचार्य आदर्श कक्ष के ठीक सामने ही तो खड़ा हूँ,
प्रवेश द्वार पर,किन्तु अपराध बोध के दलदल में गड़ा हूँ।
पिताजी मेरी पैरवी में , प्राचार्य के समक्ष कुर्सी पर,
पहले से ही विराजमान थे मेरे प्रभु
प्रस्तुत होना ही था मुझको तत्क्षण, अब दोनों ही के सामने,
प्राचार्य -पिता जहाँ दोनों बैठे थे बस ठीक आमने सामने।
प्राण पँखेरू पंकिल तन में ऐंठ ऐंठ कर
पस्त हो चुके थे ।
प्रति क्षण पाप- परीक्षण प्रायश्चित की
प्रतीति कराते रहे,
प्राण प्राण में पोर पोर में
परम प्रलय की हर मरोड में
प्रभु दीनदयाल विरिदु समभारी,
प्रेम के परम पुनीत
प्राक्कथन -पाठ का मनन अन्तर्मन में था जारी।
प्रलयकाल की निष्ठुर गति में बुद्धि गयी थी मारी।
प्रतिज्ञा अपनी भीष्म वाली पलटी मार रही थी।
प्रवेश पत्र प्राप्त करना था।
पतित पावनी गंगा को पार करने के पूर्व ही मरना था।
पैन्ट कमर के नीचे पीछे से सरके इसमें कोई भ्रम नहीं,
पाला पड़ चुका था
पाप के भींगी माटी के कच्चे घडे़ से,
पुण्य प्रेत के सोने के मजबूत हथकड़े से ।
प्रथम पुरुष की
प्रथम प्रतीक्षित पहली पारी,
प्रारम्भ पुलिसिया कारगुज़ारी
प्यारी प्यारी,हत्यारी सारी साॅरी , पावनता पातित्य पलों में होती रही भारी।
प्राण पखेरू पवनदेवता का
पता पूछकर पारंगतता का
प्रश्न पत्र पत्रोत्तर के। परिणाम -पुष्टि
प्रतिपल पाण्डित्य पालने लगे,
परीक्षा के पुनीत पात्र को खंगालने लगे।
"परन्तु" "किन्तु" को
पलट पलट कर पुचकारने लगे
प्यार की प्रतीति के
प्रश्नोत्तर जब पछाड़ खाने लगे तब लगा, हम भी,
पुण्यसलिला गंगा माँ के साथ हरिद्वार जाने लगे।
#इति प्रथमोध्याय
#प्रधानाचार्य पुण्य स्मरण
#कीर्तिशेष हरिद्वारउपाध्याय
सादर नमन
#कुमारशैलेन्द्र ++++++ क्रमशः ---