ओशो ज्ञान

ओशो ज्ञान भगवान श्री रजनीश नाम से और १९८९ के समय से ओशो के नाम से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे

क्रोधित व्यक्ति की कहानीएक दिन, बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। जब वे चल रहे थे, एक व्यक्ति उनके पास आ...
08/09/2024

क्रोधित व्यक्ति की कहानी

एक दिन, बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। जब वे चल रहे थे, एक व्यक्ति उनके पास आया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा। वह व्यक्ति बहुत गुस्से में था क्योंकि उसके गाँव के कई युवा, उसके बेटे सहित, बुद्ध का अनुसरण करने लगे थे। उसे लगा कि बुद्ध उन्हें उनके परिवार और जिम्मेदारियों से दूर ले जा रहे हैं।

वह बुद्ध के सामने खड़ा होकर अपशब्द कहने लगा। उसने बुद्ध को तरह-तरह के नामों से पुकारा और उन्हें भड़काने की कोशिश की। बुद्ध के शिष्य इस स्थिति से हतप्रभ थे और सोच रहे थे कि बुद्ध किस प्रकार प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन बुद्ध शांत और मौन रहे।

कुछ देर बाद, जब वह व्यक्ति अपनी सभी गालियाँ देकर थक गया, तो उसने पूछा, "तुम कुछ कहते क्यों नहीं? तुम मेरे गुस्से का जवाब क्यों नहीं देते?"

बुद्ध ने धीरे से मुस्कराते हुए पूछा, "मुझे बताओ, अगर कोई व्यक्ति तुम्हें कोई उपहार देता है और तुम उसे स्वीकार नहीं करते, तो वह उपहार किसके पास रहेगा?"

वह व्यक्ति, बुद्ध के प्रश्न से अचंभित होकर बोला, "यह तो उसी व्यक्ति के पास रहेगा जिसने उसे दिया है।"

बुद्ध ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, "बिल्कुल सही। इसी प्रकार, यदि मैं तुम्हारा गुस्सा स्वीकार नहीं करता, तो यह तुम्हारे पास ही रहेगा। मुझे वह लेने की आवश्यकता नहीं है जो तुम दे रहे हो।"

यह सुनकर, व्यक्ति हक्का-बक्का रह गया। उसने इस प्रकार की प्रतिक्रिया की कभी कल्पना भी नहीं की थी। बुद्ध ने आगे कहा, "देखो, गुस्सा एक ज़हर की तरह है, जिसे कोई इस उम्मीद में पीता है कि यह किसी और को मार देगा। लेकिन वास्तविकता में, यह केवल उस व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है जो इसे अपने भीतर रखता है।"

यह सुनकर, उस व्यक्ति का चेहरा बदल गया और वह बुद्ध के चरणों में गिर गया, माफी माँगते हुए। उसे एहसास हुआ कि उसका गुस्सा उसके अपने दुख का प्रतिबिंब था, न कि बुद्ध का कारण।

बुद्ध ने उसे धीरे से उठाते हुए कहा, "यह माफी की बात नहीं है, मेरे मित्र। यह समझ की बात है। जब तुम समझ जाते हो कि तुम्हारा गुस्सा तुम्हारे अपने दर्द से आता है, तब तुम ठीक होना शुरू कर सकते हो। और जब तुम ठीक हो जाते हो, तो तुम्हें उस दर्द को दूसरों पर फेंकने की आवश्यकता नहीं रहती।"

ओशो का दृष्टिकोण

ओशो अक्सर ऐसी कहानियों का उपयोग जागरूकता और आत्म-समझ की परिवर्तनकारी शक्ति को उजागर करने के लिए करते थे। वे कहते थे कि बुद्ध केवल अहिंसा या दयालुता का प्रचार नहीं कर रहे थे, बल्कि एक गहरे सत्य की ओर इशारा कर रहे थे: जागरूकता के साथ जीने की कला। जब कोई वास्तव में जागरूक होता है, तो क्रोध, घृणा, और नकारात्मकता अपनी पकड़ खो देते हैं।

ओशो के अनुसार, बुद्ध की वास्तविक शिक्षा शब्दों में नहीं, बल्कि उसके बाद आने वाली मौन में है — एक मौन जो उपस्थिति और करुणा से भरा होता है।

इस कहानी के माध्यम से, ओशो लोगों को अपने भीतर झाँकने, अपने मन का निरीक्षण करने, और यह समझने के लिए प्रेरित करते थे कि सभी बाहरी संघर्ष आंतरिक उथल-पुथल के प्रतिबिंब हैं। और इस समझ में, एक नई तरह की शांति पाई जा सकती है — एक शांति जो बाहरी दुनिया पर निर्भर नहीं है, बल्कि जो एक गहरी, आंतरिक स्पष्टता से आती है।

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌺🙏गणेश चतुर्थी, जो ज्ञान, समृद्धि और नए आरंभों का पर्व है, हमारे जीवन में खुशियों, भ...
07/09/2024

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌺🙏

गणेश चतुर्थी, जो ज्ञान, समृद्धि और नए आरंभों का पर्व है, हमारे जीवन में खुशियों, भक्ति और एकता का संदेश लेकर आता है। विघ्नहर्ता और शुभता के प्रतीक भगवान गणेश का स्वागत हम हर्षोल्लास से करते हैं, मिठाइयों और भक्ति गीतों के साथ उनका पूजन करते हैं।

जैसे हम बाप्पा की मूर्ति की स्थापना और पूजा करते हैं, आइए उनके उपदेशों को अपनाएं:

🌿 विघ्नहर्ता: भगवान की कृपा से हम सभी बाधाओं को पार करें और कठिन समय में शांति पाएं।
📚 बुद्धिप्रिय: ज्ञान के प्रति उनका प्रेम हमें सही निर्णय लेने और जीवन में निरंतर सीखने की प्रेरणा देता है।
💫 मंगलमूर्ति: सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत करें और नए आरंभों को उत्साह के साथ मनाएं।
इस गणेश चतुर्थी पर आप सभी के जीवन में खुशहाली, सफलता और शांति आए। "गणपति बाप्पा मोरया" के जयकारों के साथ आइए पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए, पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों और प्रथाओं को अपनाएं।

आप सभी को गणेश चतुर्थी की ढेर सारी शुभकामनाएं! 🙌🎉

06/09/2024

ओशो बताते हैं कि मधुशाला केवल शराबखाने का वर्णन नहीं, बल्कि यह जीवन के रहस्यों, परम आनंद, और आत्मज्ञान की यात्रा का प्रतीक है। उनके विचारों के माध्यम से हम समझते हैं कि "मधु" (शराब) स्वयं जीवन का रस है, "साकी" परमात्मा है, और "मधुशाला" वह स्थान है जहाँ जीवन की गहराईयों को समझा जा सकता है।

"मैं बस इतना कह रहा हूँ कि एक तरीका है जिसमें आप समझदार हो सकते हैं। मैं कह रहा हूँ कि आप अपने भीतर अतीत द्वारा उत्पन्न ...
06/09/2024

"मैं बस इतना कह रहा हूँ कि एक तरीका है जिसमें आप समझदार हो सकते हैं। मैं कह रहा हूँ कि आप अपने भीतर अतीत द्वारा उत्पन्न इस सारी पागलपन से छुटकारा पा सकते हैं। बस अपने विचारों की प्रक्रिया के साक्षी बनकर।

यह केवल चुपचाप बैठना है, और आपके सामने गुजरते हुए विचारों को देखना है। बस देखना है, न हस्तक्षेप करना है और न ही कोई निर्णय लेना है, क्योंकि जिस क्षण आप निर्णय लेते हैं, आपने उस शुद्ध साक्षी को खो दिया है। जिस क्षण आप कहते हैं 'यह अच्छा है, यह बुरा है,' आप पहले ही विचार प्रक्रिया में कूद चुके होते हैं।

साक्षी और मन के बीच एक अंतर बनाने में थोड़ा समय लगता है। एक बार जब यह अंतर बन जाता है, तो आपको एक बड़ा आश्चर्य होगा कि आप मन नहीं हैं, आप साक्षी हैं, एक देखने वाले हैं।

और यह देखने की प्रक्रिया ही असली धर्म की रसायन विद्या है। क्योंकि जैसे-जैसे आप साक्षी भाव में गहराई से जड़ें जमा लेते हैं, विचार गायब होने लगते हैं। आप होते हैं, लेकिन मन पूरी तरह से खाली होता है।

वही ज्ञान का क्षण होता है। वही वह क्षण होता है जब आप पहली बार बिना शर्त, समझदार, वास्तव में मुक्त इंसान बनते हैं।" — ओशो

ओशो का कृष्ण के प्रति गहरा और बहुआयामी दृष्टिकोण था, वे उन्हें जीवन में समग्रता और संतुलन के प्रतीक के रूप में मानते थे।...
06/09/2024

ओशो का कृष्ण के प्रति गहरा और बहुआयामी दृष्टिकोण था, वे उन्हें जीवन में समग्रता और संतुलन के प्रतीक के रूप में मानते थे। उन्होंने कृष्ण को विरोधों-क्रिया और ध्यान, प्रेम और वैराग्य, भौतिकवाद और आध्यात्मिकता के बीच पूर्ण सामंजस्य के प्रतीक के रूप में देखा। ओशो ने जीवन के प्रति कृष्ण के चंचल, आनंदमय दृष्टिकोण की सराहना की, जहां वह दुनिया से बंधे बिना उसके साथ पूरी तरह से जुड़े रहे। उन्होंने अक्सर भगवद गीता में कृष्ण की शिक्षाओं का संदर्भ दिया, विशेष रूप से कर्म योग के विचार का, जहां व्यक्ति कर्तव्यों का पालन करता है परिणामों के प्रति लगाव के बिना. साथ ही, ओशो ने कृष्ण की मानवीय खामियों को स्वीकार किया, विशेषकर कुरुक्षेत्र युद्ध में उनकी भूमिका को, उन्हें एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखा जिसने अस्तित्व के दैवीय और सांसारिक दोनों पहलुओं को अपनाया। ओशो के लिए, कृष्ण का जीवन पूरी तरह से और बिना किसी डर के जीने का उत्सव था, जिसमें स्वीकृति और संतुलन का गहरा आध्यात्मिक संदेश शामिल था।

एक बार एक आदमी ओशो के पास आया, अपनी ज़िंदगी से बहुत परेशान था। उसने हर जगह ख़ुशी की तलाश की थी, लेकिन चाहे जितनी भी कोशि...
06/09/2024

एक बार एक आदमी ओशो के पास आया, अपनी ज़िंदगी से बहुत परेशान था। उसने हर जगह ख़ुशी की तलाश की थी, लेकिन चाहे जितनी भी कोशिश करे, वह हमेशा खुद को खाली महसूस करता। उसके पास पैसा था, अच्छी फैमिली थी, सारी सुख-सुविधाएँ थीं, फिर भी कुछ कमी थी। उसका मन हमेशा बेचैन रहता, जैसे वह किसी अनजानी चीज़ के पीछे भाग रहा हो।

आदमी ने कहा, "मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मैं दुखी हूँ। मैंने ख़ुशी के बारे में बहुत सी किताबें पढ़ी हैं, ध्यान भी किया है, और कई गुरुओं के पास गया हूँ, लेकिन कुछ काम नहीं आया। क्या आप मुझे ख़ुशी का रास्ता दिखा सकते हैं?"

ओशो ने ध्यान से उसकी बात सुनी और मुस्कुराए। उन्होंने एक कहानी सुनाई:

"एक बार एक अमीर आदमी था, जिसके पास दुनिया का हर सुख था, लेकिन फिर भी वह दुखी रहता था। उसके पास बहुत बड़ा मकान और ज़मीन-जायदाद थी, लेकिन उसे चैन की नींद नहीं आती थी। उसका मन हमेशा परेशान रहता।

एक दिन, वह एक ज्ञानी के पास गया और उससे मदद मांगी। ज्ञानी ने उसकी तरफ देखा और कहा, 'ख़ुशी का एक राज़ है, लेकिन वह बहुत सरल है। तुम एक काम करो – किसी पेड़ के नीचे जाओ, और बस चुपचाप बैठ जाओ। अपने साथ कुछ भी मत ले जाओ – ना कोई किताब, ना कोई ध्यान भटकाने वाली चीज़, यहाँ तक कि अपने विचार भी नहीं। बस शांति से बैठ जाओ।'

अमीर आदमी हैरान हो गया। 'बस इतना ही? सिर्फ़ पेड़ के नीचे बैठना? इससे ख़ुशी कैसे मिलेगी?'

'एक बार करके तो देखो,' ज्ञानी ने कहा।

तो, अमीर आदमी एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। पहले तो उसे बहुत बेचैनी महसूस हुई, क्योंकि उसके दिमाग़ में अपने काम, लोगों से मिलना, और ज़रूरी काम के विचार घूमते रहे। लेकिन ज्ञानी के शब्द उसके दिमाग़ में गूंजते रहे, 'बस चुपचाप बैठो।' धीरे-धीरे, थोड़ी देर बाद, उसका मन शांत होने लगा। उसने ठंडी हवा को महसूस किया, पत्तों की सरसराहट सुनी, दूर कहीं पक्षी चहचहा रहे थे। सालों बाद, पहली बार उसने अंदर एक शांति महसूस की। और उस शांति में, उसे ख़ुशी मिल गई।

उसे समझ आया कि ख़ुशी कोई बाहरी चीज़ नहीं है। यह पैसों में नहीं, सफलता में नहीं, और ना ही रिश्तों में। ख़ुशी तो उसके अंदर ही थी, लेकिन वह हमेशा उसे बाहर ढूंढ रहा था। बस चुपचाप बैठने से, उसने अपने अंदर जगह बनाई, और ख़ुशी वहीं थी।'

कहानी सुनाने के बाद, ओशो ने उस आदमी की तरफ देखा जो उनके पास आया था। 'ख़ुशी तुम्हें ढूंढने से नहीं मिलेगी। जितना तुम ढूंढोगे, उतना ही तुम उससे दूर होते जाओगे। ख़ुशी तुम्हारे अंदर ही है। तुम्हें बस अपने अंदर उसके लिए जगह बनानी है। ढूंढना छोड़ो, और बस अपने पेड़ के नीचे चुपचाप बैठो।'

आदमी चुपचाप ओशो की बात समझ गया और चला गया। उसने समझा कि ख़ुशी का राज़ खोजने में नहीं, बस होने में है।

ओशो हमेशा यह समझाते थे कि असली ख़ुशी और शांति बाहर से नहीं आती, बल्कि अपने अंदर की शांति में होती है। यह कहानी उनकी इसी अनमोल सीख को दर्शाती है।

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