10/05/2024
तक्षशिला विद्यार्थी दैनिक आचरण सूचना
सभी विद्यार्थी प्रातः जागृत होने के बाद विस्तर पर अपने हस्तरेखा को देखते हुए प्रातः स्मरण का पाठ करेंगे।
कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्द: प्रभाते कर दर्शनम्॥
समुद्रवसने देवि! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे ॥
अर्थ : हमारी हथेली के अग्रभाग में, धन की देवी लक्ष्मी का वास है, हथेली के मध्यभाग में ज्ञान की देवी सरस्वती निवास करती हैं तथा हथेली के मूलभाग में भगवान् गोविंद जो प्राणीमात्र की रक्षा करते हैं, का वास होता है और इस प्रकार का विचार कर नेत्रों के सम्मुख मूर्ति का ध्यान करते हुए प्रातः काल में हथेलियों का दर्शन करना चाहिए।
हे मातृभूमि देवी! जिसकी रक्षा स्वयं विष्णु करते हैं, मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। हे सागर रूपी परिधानों और पर्वत रूपी वक्षस्थल से शोभायमान धरती माता। मुझे चरणों से स्पर्श के लिए क्षमा करो।।
प्रातः स्मरण के उपरांत भूमि को हाथों से स्पर्श कर प्रणाम करना है।
तक्षशिला की वंदना पुस्तिका पेज 9 में प्रातः स्मरण मंत्र दिया गया है।
मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवों भव। - तैत्तिरीयोपनिषद
माता पिता आचार्य और अतिथि को देवता की श्रेणी में रखा गया है। विद्यार्थी प्रातः स्मरण करने के बाद विस्तर का त्याग करेंगे। विस्तर छोड़ने के बाद सबसे पहले अपने माता पिता और बड़ों का चरणस्पर्श दोनों हाथों से झुक कर करना है।
उसके उपरांत दैनिक कार्य से निवृत होकर स्नान आदि के बाद पूजाघर में कुल देवी को प्रणाम कर घर से बाहर निकलना है, घर से बाहर निकलने के बाद ग्रामदेवी मंदिर में प्रणाम कर दिन की शुरुआत करनी है। विद्यालय पहुँचने के उपरांत विद्यालय के सभी आचार्य का चरणस्पर्श कर विद्यालय प्रवेश करना है।
अभिभावक विद्यार्थी के दैनिक आचरण की चिंता करें।
धन्यवाद,
तक्षशिला गुरुकुल
वारिसलीगंज (नवादा)