05/07/2023
दो चित्र है ...
पहला चित्र है, की देवताओं की भोजन विधि ।।
मनुष्यो को भी इसी प्रकार से भोजन करना,
एवं करवाना चाहिए, यह शास्त्रो का मत है ।।
नीचे वाला चित्र है ... " पता नही किसकी भोजन विधि, मेने तो पशुओ को ही खड़े होकर खाते देखा है ।" यह " खड़ा खाना विधि आजकल तो पूरे भारत की नवसंस्कृति का हिस्सा बन चुका है ।।"
ब्याह शादी, जन्म , मरण, में भरपूर अन्न जल खिलाया जाता है ,,,,
वह अन्न जल
दान का एक माध्यम है ...
इस अन्न जल दान का फल यह मिलता है ...
की बड़े से बड़े पितृदोष से, सीधे कई दिनों की मुक्ति मिल जाती है ।। पितरों की कृपा से, फिर जीवन मे सब ठीक रहता है ।। पहले के जमाने मे 10-10 दिन बारात रुकवा लिया करते थे, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा दान का मौका मिले ।।
कोई भी दान हो, वह श्रद्धा से किया जाता है ।
सामने वाले को पहले तो मान मनुहार करके ,
शादी में आमंत्रित करो, उसके बाद उसे अच्छा सा पीढ़ा देकर, दरी बिछाकर, मेहमान को भोजन करवाओ ...
अन्न की शुद्धता का पूरा ध्यान रखो .... तब तो वह दान सफल होगा ...
हम किसी को बुला लेते है ,
जैसे कुत्ते को तू तू तू तू करके बुलाते है ...
फिर उसे खड़ा करके खाना खिलाते है ...
यह प्रथा
अन्न का सम्मान न् होकर,
अन्न और मानव संस्कृति दोनों का ही अपमान हो जाता है ...
और उसी के परिणाम बाद में ,
विकृत प्रेतदोष, पितृदोष, तलाक,
घर मे क्लेश के रूप में सामने आते है ...
" अगर किसी को सम्मान पूर्वक भोजन नही करवा सकते,
तो भोजन करवाने की यह प्रथा ही बन्द करो "
कम से कम यह खड़े खाने की नोटंकी के चक्कर में
अपने बच्चो का भविष्य मत खराब करो ....
तुम्हारी इसी शान के चक्कर मे , बच्चो के घर बर्बाद हो रहे है ...