जय श्रीजी

जय श्रीजी !!राधे, राधे ...जय श्री राधे राधे, राधे ...जय श्री राधे।।

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

!!राधे, राधे ...जय श्री राधे!!
राधे, राधे ...जय श्री राधे।।

!! राधा साध्यं साधनं यस्य राधा
मंत्रो राधा मंत्र दात्री च राधा

सर्वं राधा जीवनम् यस्य राधा
राधा राधा वाचिकिन तस्यै शेषम् !!

अंत काल के समय , तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार आत्मा के लिए बंद हो जाता है :-"धात्री फलानी तु...
22/11/2015

अंत काल के समय , तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार आत्मा के लिए बंद हो जाता है :-

"धात्री फलानी तुलसी ही अन्तकाले भवेद यदि,
मुखे चैव सिरास्य अंगे पातकं नास्ति तस्य वाई "।

पदम पुराण में तुलसी जी के आठ नाम बताये गए है :-

वृंदा, वृंदावनि, विश्व पूजिता, विश्व पावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्ण जीवनी.

तुलसीजी के नामो के अर्थ :-

वृंदा :- सभी वनस्पति व वृक्षों की आधि देवी.

वृन्दावनी :- जिनका उदभव व्रज में हुआ.

विश्वपूजिता :- समस्त जगत द्वारा पूजित.

विश्व -पावनी :- त्रिलोकी को पावन करने वाली.

पुष्पसारा :- हर पुष्प का सार.

नंदिनी :- ऋषि मुनियों को आनंद प्रदान करने वाली.

कृष्ण -जीवनी :- श्री कृष्ण की प्राण जीवनी .

श्री तुलसी प्रणाम :-

"वृन्दायी तुलसी देव्यै प्रियायाई केसवास्य चविष्णु -भक्ति -प्रदे देवी सत्यवात्याई नमो नमः"

मैं श्री वृंदा देवी को प्रणाम करता हूँ जो तुलसी देवी हैं , जो भगवान् केशव की अति प्रिय हैं।

हे देवी !आपके प्रसाद स्वरूप , प्राणी मात्र में भक्ति भाव का उदय होता है.

" श्री तुलसी प्रदक्षिणा मंत्र :-

"यानि कानि च पापानि, जन्मान्तर कृतानि च, तानि तानि प्रनश्यन्ति, प्रदक्षिणायाम् पदे पदे"

आपकी परिक्रमा का एक एक पद समस्त पापों का नाश कर्ता है"

जय जय तुलसी माता।

आप सभी से निवेदन है कृप्या अपने घर पर तुलसी माता को अवश्य स्थापित करे।

मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके  |सब कोऊ चली डोली पालकी रथ जुडवाये के।साधु चले पाँय पैया, चीटी सो ...
22/11/2015

मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके

मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके |

सब कोऊ चली डोली पालकी रथ जुडवाये के।

साधु चले पाँय पैया, चीटी सो बचाई के।

मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके।
मगन भई तुलसी हरी गुन गाइके मगन भई तुलसी ||

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन एवं तुलसी विवाह का उत्सव पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है।

पद्मपुराण के पौराणिक कथानुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए, जिस कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है, और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं।
इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है।

देवोत्थान एकादशी के दिन मनाया जाने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है।
दरअसल, तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं।
देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं।
इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है।
तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आहवान।
कुछ लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन कर पाँचवें दिन तुलसी विवाह करते हैं।
आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधु का विवाह किया जाता है।

तुलसी की शादी में भेंट देना भी बहुत पुण्य का काम माना जाता है, इसलिए कोई पीछे नहीं रहता।
सब इसे अपने घर का ही काम मानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि धर्म के इस काम में किसी के रूठने-मनाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती, इसलिए आम शादियों में अपना रुतबा दिखाने और ख़ास ख़ातिर की इच्छा रखने वाले रिश्तेदार भी तुलसी की शादी में बर्ताव के मामले में नरम ही नज़र आते हैं।

तुलसी कथा।

प्राचीन काल में जालंधर नामक एक महापराक्रमी और महाउपद्रवी राक्षस हो गया।
उसकी वृंदा नाम की एक परम रूपवती व परम साध्वी पत्नी थी।
वृंदा की निष्ठा थी कि ‘जब मेरा पातिव्रत्य अटल है तो मेरे पति का बाल बाँका कैसे हो सकता है , हुआ भी ऐसा ही।

जालंधर सती वृंदा के पातिव्रत्य-बल से अजेय बन गया।
वह मनमाना आचरण कर लोगों को सताने लगा।
इससे दैवी वृत्ति वाले लोग दुःखी हुए और भगवान नारायण को पुकारने लगे।

जालंधर ने देवलोक पर आक्रमण कर इंद्र के साथ युद्ध शुरू कर दिया।
भगवान नारायण समझ गये कि जालंधर की यह अजेयता सती वृंदा के पातिव्रत्य का ही प्रभाव है।

व्रत से निष्ठा आती है और निष्ठा का संकल्प जालंधर के साथ जुडकर इसकी रक्षा कर रहा है।
जब तक वृंदा का सतीत्व खंडित नहीं होता तब तक यह पापमूर्ति नहीं मरेगा और जब तक यह नहीं मरेगा तब तक समाज का दुःख दूर नहीं होगा।

भगवान जालंधर के रूप की धारणा करके जालंधर बन गये और वृंदा के पास गये।

अपना पति ही युद्ध से लौटा है ऐसा समझकर सती वृंदा ने भगवान नारायण का स्पर्श किया।
इससे उसका पातिव्रत्य खंडित हो गया और उधर युद्ध में जालंधर मारा गया।

जब वृंदा को इस बात का पता चला तो उसने भगवान को शाप दे दिया कि ‘‘तुमने मेरे साथ धोखा किया है।
तुम्हारा हृदय पाषाण के समान है इसलिए जाओ, तुम पाषाण-स्वरूप हो जाओ।

भगवान ने उसके पातिव्रत्य का आदर किया और कहा : ‘‘हम शालग्राम के रूप में पाषाण हो जायेंगे और तुम्हारा यह शरीर, जिसे तुम छोड दोगी, नदी के रूप में परिवर्तित होगा।
वह नदी ‘गंडकीङ्क के नाम से विख्यात होगी।

तुम तुलसी देवी के रूप में मेरे साथ ही रहोगी।
तुम्हारे केशकलाप से उत्पन्न तुलसी वृक्षों के पत्तों आदि के बिना मेरी पूजा अधूरी मानी जायेगी।
तेरे व्रत का, तेरी निष्ठा का आदर होगा।

लेकिन वृंदा ! तूने जालंधर के असत् का कवच बनने की गलती की थी।
इसलिए जैसे काँटे से काँटा निकलता है, वैसे ही ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय मुझे यह कार्य करना पडा क्योंकि जब सत्य असत्य का रक्षक बन जाता है तो असत्य का नाश कठिन हो जाता है।
वृंदा ! तेरा सतीत्व जालंधर के असत्य को पोषित कर रहा था, पाप को पोषित कर रहा था और किसी भी कीमत पर वह मर नहीं रहा था।
उसको मारने का केवल एक ही उपाय था कि तेरा सतीत्व खंडित हो।
फिर भी तेरे सतीत्व का आदर दुनिया करेगी।

हम एक रूप से शालग्राम बन जायेंगे और गंडकी नदी के तट पर वास करेंगे।
हमारी पूजा करने वाले प्रतिवर्ष तेरा और मेरा विवाह रचायेंगे।
इसके फलस्वरूप उन्हें महान पुण्य की प्राप्ति होगी।

भगवान के वचन सुनकर वृंदा संतुष्ट हुई।

तबसे कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिकी पूर्णिमा तक ‘तुलसी विवाह किया जाता है।

जय श्री तुलसी शालिग्रामजी।

ऐसे वर को क्या करू जो जन्मे और मर जाये,पर ये गिरधर लाल को जो चुन ले अमर हो जाये।आओ मेरी सखिओं मुझे मेहँदी लगा दो, मुझे श...
22/11/2015

ऐसे वर को क्या करू जो जन्मे और मर जाये,
पर ये गिरधर लाल को जो चुन ले अमर हो जाये।

आओ मेरी सखिओं मुझे मेहँदी लगा दो, मुझे श्याम सुंदर की दुल्हन बना दो.!

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 'आप सभी भक्तों को कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ की  हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ....
22/11/2015

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय '

आप सभी भक्तों को कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ...!!

जो मनुष्य इस एकादशी के माहात्म्य को सुनते व पढ़ते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन ! मैं तुम्हें मुक्ति देनेवाली कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के सम्बन्ध में नारद और ब्रह्माजी के बीच हुए वार्तालाप को सुनाता हूँ ।

एक बार नारादजी ने ब्रह्माजी से पूछा : ‘हे पिता ! ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बतायें ।’
ब्रह्माजी बोले : हे पुत्र ! जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना दुष्कर है, वह वस्तु भी कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत से मिल जाती है । इस व्रत के प्रभाव से पूर्व जन्म के किये हुए अनेक बुरे कर्म क्षणभर में नष्ट हो जाते है । हे पुत्र ! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस दिन थोड़ा भी पुण्य करते हैं, उनका वह पुण्य पर्वत के समान अटल हो जाता है । उनके पितृ विष्णुलोक में जाते हैं । ब्रह्महत्या आदि महान पाप भी ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन रात्रि को जागरण करने से नष्ट हो जाते हैं ।

हे नारद ! मनुष्य को भगवान की प्रसन्नता के लिए कार्तिक मास की इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए । जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतनेवाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है ।
इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ (भगवान्नामजप भी परम यज्ञ है। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ । यज्ञों में जपयज्ञ मेरा ही स्वरुप है।’ - श्रीमद्भगवदगीता ) आदि करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य मिलता है ।

इसलिए हे नारद ! तुमको भी विधिपूर्वक विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए । इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूजा करनी चाहिए । रात्रि को भगवान के समीप गीत, नृत्य, कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए ।
‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन पुष्प, अगर, धूप आदि से भगवान की आराधना करनी चाहिए, भगवान को अर्ध्य देना चाहिए । इसका फल तीर्थ और दान आदि से करोड़ गुना अधिक होता है ।
जो गुलाब के पुष्प से, बकुल और अशोक के फूलों से, सफेद और लाल कनेर के फूलों से, दूर्वादल से, शमीपत्र से, चम्पकपुष्प से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे आवागमन के चक्र से छूट जाते हैं । इस प्रकार रात्रि में भगवान की पूजा करके प्रात:काल स्नान के पश्चात् भगवान की प्रार्थना करते हुए गुरु की पूजा करनी चाहिए और सदाचारी व पवित्र ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अपने व्रत को छोड़ना चाहिए ।

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में किसी वस्तु को त्याग देते हैं, उन्हें इस दिन से पुनः ग्रहण करनी चाहिए । जो मनुष्य ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अंत में स्वर्ग को जाते हैं ।

श्री प्रबोधिनी एकादशी माहात्म्य .......

श्री कृष्ण भगवान् ने कहाः- "हे अर्जुन, तुम मेरे बड़े ही प्रिय सखा हो।
हे पार्थ, अब मैं तुम्हें पापों का नाश करने वाली तथा पुण्य और मुक्ति को देने वाली प्रबोधिनी एकादशी का माहात्म्य सुनाता हूं, श्रद्धापूर्वक सुनो।

एक बार नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा - "हे पिता, प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बताएं।"
ब्रह्मा जी बोले - "हे पुत्र, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का फल एक सहस्त्र अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ के फल के बराबर होता है।
नारदजी ने पूछा - "हे पिता, एक संध्या को भोजन करने से, रात्रि में भोजन करने तथा पूरे दिन उपवास करने से क्या-क्या फल मिलता है, उसे आप समझाइए।"
ब्रह्माजी बोले - "हे नारद, एक संध्या को भोजन करने से दो जन्म के तथा पूरे दिन उपवास करने से सात जन्म के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना दुष्कर है, वह वस्तु भी प्रबोधिनी एकादशी के व्रत से मिल जाती है।
प्रबोधिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से बड़े से बड़ा पाप भी क्षण मात्र में ही नष्ट हो जाता है। पूर्व जन्म के किये हुए अनेक बुरे कर्मों को प्रबोधिनी एकादशी का व्रत क्षण भर में नष्ट कर देता है।
जो मनुष्य अपने स्वभावानुसार प्रबोधिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें पूर्ण फल प्राप्त होता है।
हे पुत्र, जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस दिन थोड़ा भी पुण्य करते हैं, उसका वह पुण्य पर्वत के समान अटल हो जाता है।
जो अपने हृदय के अन्दर ही ऐसा ध्नान करते हैं कि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करुंगा, उनके सौ जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी को रात्रि जागरण करते हैं, उनकी बीती हुई तथा आने वाली दस पीढ़ियां विष्णु लोक में जाकर वास करती हैं और नरक में अनेक दुःखों को भोगते हुए उनके पितृ विष्णुलोक में जाकर सुख भोगते हैं।
हे पुत्र, ब्रह्महत्या आदि महान् पाप भी प्रबोधिनी एकादशी के दिन रात्रि को जागरण करने से नष्ट हो जाते हैं।
प्रबोधिनी एकादशी को रात्रि को जागरण करने का फल अश्वमेध आदि यज्ञों के फल से अधिक होता है।
समस्त तीर्थों में जाने तथा गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल प्रबोधिनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल के बराबर होता है।"
"हे नारद, इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधिनी एकादशी के व्रत द्वारा अपने कुल को पवित्र किया है।
संसार में जितने भी तीर्थ हैं तथा जितने भी तीर्थों की आशा की जा सकती है, वह प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले के घर में रहते हैं।
मनुष्य को समस्त कर्मों को त्यागते हुए भगवान् की प्रसन्नता के लिए कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान् विष्णु की अत्यन्त प्रिय है।
इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता है।
इस व्रत के प्रभाव से कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान् की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ आदि करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य मिलता है।
प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान् की पूजा करने से बाल, यौवन और वृद्धावस्था के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस एकादशी की रात्रि को जागरण करने का फल, सूर्य ग्रहण के समय स्नान करने के फल से सहस्त्र गुना अधिक होता है।
मनुष्य अपने जन्म से लेकर जो पुण्य करता है, वह पुण्य प्रबोधिनी एकादशी के व्रत के पुण्य के सामने व्यर्थ है।
जो मनुष्य प्रबोधिनी। एकादशी का व्रत नहीं करता, उसके समस्त पुण्य व्यर्थ हो जाते हैं।
इसलिए हे नारद, तुमको भी विधिपूर्वक विष्णु भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
जो मनुष्य कार्तिक मास में धर्मपरायण होकर अन्य व्यक्तियों का अन्न नहीं खाते, उन्हें चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है।
कार्तिक मास में भगवान् दान आदि से उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि शास्त्रों की कथा सुनने से प्रसन्न होते हैं।
कार्तिक मास में जो मनुष्य भगवान् की कथा को थोड़ा-बहुत पढ़ते हैं या सुनते हैं, उन्हें सौ गायों के दान का फल मिलता है।"
यह सुनकर नारदजी बोले - "हे परमपिता, अब आप एकादशी के व्रत का विधान कहिए और व्रत करने से कैसा पुण्य मिलता है, वह भी समझाइए।"
ब्रह्माजी बोले - "हे नारद, इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त्त में उठना चाहिए और स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए।
उस समय भगवान् से विनय करनी चाहिए कि
हे भगवन् आज मैं निराहार रहूंगा और दूसरे दिन भोजन करुंगा, इसलिए आप मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार विनय करके भगवान् की पूजा करनी चाहिए और व्रत प्रारम्भ करना चाहिए।
उस रात्रि को भगवान् के समीप गीत, नृत्य, बाजे तथा कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।
प्रबोधिनी एकादशी के दिन कृपणता को त्याग कर बहुत से पुष्प, अगर, धूप आदि से भगवान् की आराधना करनी चाहिए, शंख के जल से भगवान् को अर्घ्य देना चाहिए।
कार्तिक में जो मनुष्य तुलसीजी से भगवान की पूजा करता है, उसके दस हजार जन्मों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो मनुष्य इस माह में श्री तुलसीजी के दर्शन करते हैं या छूते हैं या ध्यान करते हैं या कीर्तन करते हैं या रोपन करते हैं अथवा सेवा करते हैं, वे हजार कोटियुग तक भगवान के घर में रहते हैं।
(आज रविवार हैं कृप्या तुलसी जी के पत्तों को ना तोड़े)
जो मनुष्य तुलसी का पेड़ लगाते हैं, उनके कुटुम्ब में जो पैदा होते हैं, वे प्रलय के अन्त तक विष्णुलोक में रहते हैं।
इस प्रकार एकादशी रात्रि में भगवान् की पूजा करके प्रातःकाल द्वादशी को शुद्ध जल की नदी में स्नान करना चाहिए।
स्नान करने के पश्चात् भगवान् की प्रार्थना करते हुए घर आकर भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और दक्षिणा देकर सम्मान सहित उनको विदा करना चाहिए।
जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी के दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अन्त में स्वर्ग को जाते हैं।"
जो मनुष्य इस एकादशी के माहात्म्य को सुनते व पढ़ते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज lउत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु ll'हे गोविन्द ! उठिए, उठिए, हे गरुडध...
22/11/2015

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज l
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु ll
'हे गोविन्द ! उठिए, उठिए, हे गरुडध्वज ! उठिए, हे कमलाकांत ! निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मंगल कीजिये l

महाभारत युद्ध के बाद जब पांण्डवों की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पांण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुर...
22/11/2015

महाभारत युद्ध के बाद जब पांण्डवों की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पांण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि आप पांण्डवों को अमृत स्वरूप ज्ञान प्रदान करें |

भीष्म भी उन दिनों शर सैय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहे थे |

कृष्ण के अनुरोध पर परम वीर और परम ज्ञानी भीष्म ने कृष्ण सहित पाण्डवों को राज धर्म, वर्ण धर्म एवं मोक्ष धर्म का ज्ञान दिया |

भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक पांच दिनों तक चलता रहा|

भीष्म ने जब पूरा ज्ञान दे दिया तब श्री कृष्ण ने कहा कि आपने जो पांच दिनों में ज्ञान दिया है यह पांच दिन आज से अति मंगलकारी हो गया है |

इन पांच दिनों को भविष्य में भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाना जाएगा |

यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी होगा |

भीष्मजी को अर्घ्य देने से पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है |
हम सभी पाठकों को इन पांच दिनों में भीष्मजी को अर्घ्य जरुर देना चाहिए और ब्रह्मचर्य रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए |

सूर्योदय से पूर्व उठना और पवित्र नदियों का स्मरण करते हुए संभव हो तो तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए |

स्नान के बाद निम्न प्रार्थना करते हुए चन्दन और तिल मिश्रित जल से भीष्मजी को अर्घ्य देना चाहिए : मंत्र →

वैयाघ्रपदगोत्रा य सांकृतप्रवराय च l
अपुत्राय ददाम्येतदुद्कं भीष्म्वर्मणे ll
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च l
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारि णे ll

'जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्रराहित भीश्म्वार्मा को मैं यह जल देता हूँ l
वसुओं के अवतार, शांतनु के पुत्र आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूँ l

( स्कन्द पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक महात्मय )

"गंगाजी के सुपुत्र, आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले पितामह भीष्म को यह अर्घ्य अर्पण है,

22/11/2015
31/10/2015

किसी नगर में कौशिक नामक एक क्रोधी और निष्ठुर ब्राह्मण रहता था. उसे कोढ़ की बीमारी थी. उसकी पत्नी शांडिली अत्यंत मां दुर्गा की बड़ी भक्त था.

करवा चौथ ......करवा चौथ का व्रत सभी सुहागिन औरतों के लिए सब से बड़ा पर्व माना जाता है. देश भर में इसे मनाने की एक ही विधि...
30/10/2015

करवा चौथ ......

करवा चौथ का व्रत सभी सुहागिन औरतों के लिए सब से बड़ा पर्व माना जाता है. देश भर में इसे मनाने की एक ही विधि है परन्तु हर इलाके में थोड़े बहुत भिन्ता होती है.
हमारे शास्त्रों में यही विधि लिखी गयी है
इस वर्ष यह व्रत 30 अक्टूबर 2015 शुक्रवार को होगा.
पूजन समय व चन्द्र उदय
करवा चौथ पूजा मुहूर्त = 16:38 से 18:05
पूजन अवधि = 1 घंटा 27 मिनट
करवा चौथ के दिन चन्द्र उदय = 19:27

विधि

करवा चौथ के दिन लकड़ी के पाटे पर जल का भरा लौटा रखें।
उस के चारों तरफ जल का छीटा देने के बाद एक मिट्टी का करवा रखें।
करवे में गेहूं और उसके ढक्कन में चीनी और नकद रुपये रखें, फिर उसे मोहली से बांधकर गुड़ व चावल से पूजा करें।
इसके बाद तेरह बार करवे का टीका करके उसे सात बार पाट के चारों ओर घुमाएइसके बाद श्रीगणेश जी, शिव जी, महागौरी की मूर्तियां या फोटो रखकर उसे रोली, गुड़ व चावल चढ़ाएं और हाथ में तेरह गेहूं के दाने लेकर कहानी सुनें। ये मूर्तियां काली चिकनी मिट्टी से बना सकती हैं या फिर बाजार से खरीदी जा सकती हैं।
महागौरी को लाल चुनरी पहनाकर सुहाग का सामान चढ़ाना चाहिए। कहानी सुनने के बाद करवे पर हाथ फेरकर सास के पांव छुएं। उन्हें लड्डू, एक लोटा, साड़ी, दक्षिणा और करवा दें। सास न हो तो ननद या फिर मंदिर में मां गौरी के चरण स्पर्श करके उपरोक्त वस्तुएं दें। इसके बाद वह तेरह कनक के दाने व लोटा यथास्थान पर रख दें।
रात होने पर चांद देखकर चंद्रमा को अर्ध्य दें। इसके बाद प्रसाद रखकर व्रत रखने वाली स्त्रियां अपना व्रत खोल सकती हैं।
करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं को अपनी बहन और बेटी को भी व्रत की सामग्री भेजनी चाहिए। इस सामग्री में सुहाग का सामान जैसे साड़ी, चूड़ी, बिछिया आदि तो होने ही चाहिएं, इसके अलावा पूजा की सामग्री, नैवैद्य, चीनी के करवे, पुरी, पुए, मिठाई और दक्षिणा आदि भी रखी जानी चाहियेद्रोपदी द्वारा शुरू किए गए करवा चौथ व्रत की आज भी वही मान्यता है।

सबसे पहले द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए चौथ के दिन यह व्रत रखा था और निर्जल रहीं थीं। यह माना जाता है कि पांडवों की विजय में द्रौपदी के इस व्रत का भी महत्व था । विवाहित स्त्रियों के लिए व्रत रखना अखंड सौभाग्यकारक है, स्त्रियां शादी के पहले साल से ही यह व्रत शुरू करके सुख-सौभाग्य के लिए चंद्रदेव की पूजा करती हैं।

कथा

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहां तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उसकी बहन करवा ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-कारोबार निपटा कर घर लौटे तो बहन को व्याकुल देखा। सभी भाई खाना खाने बैठे और बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे जबकि बहन ने बताया कि उसने करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा है और चंद्रमा को देखकर उसे अर्ध्य देकर ही खा सकती हूं। चूंकि चंद्रमा अभी निकला नहीं, इसलिए भूख प्यास की व्याकुलता है । सबसे छोटे भाई से बहन की हालत देखी नहीं जाती और दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्ध्य देकर भोजन कर सकती हो, बहन खुशी के मारे सीढि़यों पर चढ़कर चांद को देखती है, उसे अर्ध्य देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है कि उसे छींक आ जाती है, दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा निवाला मुंह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है, वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ । करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए और उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चत करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है, उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सुईनुमा घास को वह एकत्र करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है, उसकी सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं, जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी को यम सुई ले लो, प्रिय सुई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कहकर चली जाती है। छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की से उसका व्रत टूटा था, अत: उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है। जब वो आए तो उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जीवित न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। सबसे छोटी भाभी से यही आग्रह करने पर वो टालमटोल करने लगती है, पर करवा उसे जोर से पकड़े रखती है। भाभी उसे नोचती-खसोटती है पर करवा उसे नहीं छोड़ती। आखिर उसकी तपस्या देखकर भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अंगुली चीरकर इसमें से निकला अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्रीगणेश मां गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

आप सभी को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनायें !! !पति के लिए मंगलकामना का एक सुन्दर पर्व।मेरी सभी माता-बहनों को करवाचौथ पर्व...
30/10/2015

आप सभी को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनायें !! !

पति के लिए मंगलकामना का एक सुन्दर पर्व।
मेरी सभी माता-बहनों को करवाचौथ पर्व की मंगल कामनाएं...
उनके सुखी व सौभाग्य सम्पन्न वैवाहिक जीवन के लिए मंगलकामनाएं...
सभी भाईयों को भी उनके सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए शुभकामनाएं।

उल्टा नाम जपत जग जाना ........... ...............................बाल्मिकी भये ब्रह्म समानारामायण के रचयिता को प्रणाम...स...
28/10/2015

उल्टा नाम जपत जग जाना ...........
...............................बाल्मिकी भये ब्रह्म समाना

रामायण के रचयिता को प्रणाम...
संस्कृत के आदि-कवि को प्रणाम...
महर्षि वाल्मीकि जी के प्राकट्य दिवस 'वाल्मीकि जयंती' की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं...

"जय श्रीराम"

26/10/2015

(हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।।)

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1॥

शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥2॥

विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥3॥

न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥4॥

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् ।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥5॥

व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥6॥

प्रणतदेहिनांपापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥7॥

गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥8॥

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥9॥

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10॥

चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11॥

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12॥

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13॥

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14॥

अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥15॥

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥16॥

रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् ।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥17॥

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥18॥

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥19॥

इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां गोपीगीतं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय''

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