22/11/2015
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय '
आप सभी भक्तों को कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ...!!
जो मनुष्य इस एकादशी के माहात्म्य को सुनते व पढ़ते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन ! मैं तुम्हें मुक्ति देनेवाली कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के सम्बन्ध में नारद और ब्रह्माजी के बीच हुए वार्तालाप को सुनाता हूँ ।
एक बार नारादजी ने ब्रह्माजी से पूछा : ‘हे पिता ! ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बतायें ।’
ब्रह्माजी बोले : हे पुत्र ! जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना दुष्कर है, वह वस्तु भी कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत से मिल जाती है । इस व्रत के प्रभाव से पूर्व जन्म के किये हुए अनेक बुरे कर्म क्षणभर में नष्ट हो जाते है । हे पुत्र ! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस दिन थोड़ा भी पुण्य करते हैं, उनका वह पुण्य पर्वत के समान अटल हो जाता है । उनके पितृ विष्णुलोक में जाते हैं । ब्रह्महत्या आदि महान पाप भी ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन रात्रि को जागरण करने से नष्ट हो जाते हैं ।
हे नारद ! मनुष्य को भगवान की प्रसन्नता के लिए कार्तिक मास की इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए । जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतनेवाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है ।
इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ (भगवान्नामजप भी परम यज्ञ है। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ । यज्ञों में जपयज्ञ मेरा ही स्वरुप है।’ - श्रीमद्भगवदगीता ) आदि करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य मिलता है ।
इसलिए हे नारद ! तुमको भी विधिपूर्वक विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए । इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूजा करनी चाहिए । रात्रि को भगवान के समीप गीत, नृत्य, कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए ।
‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन पुष्प, अगर, धूप आदि से भगवान की आराधना करनी चाहिए, भगवान को अर्ध्य देना चाहिए । इसका फल तीर्थ और दान आदि से करोड़ गुना अधिक होता है ।
जो गुलाब के पुष्प से, बकुल और अशोक के फूलों से, सफेद और लाल कनेर के फूलों से, दूर्वादल से, शमीपत्र से, चम्पकपुष्प से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे आवागमन के चक्र से छूट जाते हैं । इस प्रकार रात्रि में भगवान की पूजा करके प्रात:काल स्नान के पश्चात् भगवान की प्रार्थना करते हुए गुरु की पूजा करनी चाहिए और सदाचारी व पवित्र ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अपने व्रत को छोड़ना चाहिए ।
जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में किसी वस्तु को त्याग देते हैं, उन्हें इस दिन से पुनः ग्रहण करनी चाहिए । जो मनुष्य ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अंत में स्वर्ग को जाते हैं ।
श्री प्रबोधिनी एकादशी माहात्म्य .......
श्री कृष्ण भगवान् ने कहाः- "हे अर्जुन, तुम मेरे बड़े ही प्रिय सखा हो।
हे पार्थ, अब मैं तुम्हें पापों का नाश करने वाली तथा पुण्य और मुक्ति को देने वाली प्रबोधिनी एकादशी का माहात्म्य सुनाता हूं, श्रद्धापूर्वक सुनो।
एक बार नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा - "हे पिता, प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बताएं।"
ब्रह्मा जी बोले - "हे पुत्र, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का फल एक सहस्त्र अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ के फल के बराबर होता है।
नारदजी ने पूछा - "हे पिता, एक संध्या को भोजन करने से, रात्रि में भोजन करने तथा पूरे दिन उपवास करने से क्या-क्या फल मिलता है, उसे आप समझाइए।"
ब्रह्माजी बोले - "हे नारद, एक संध्या को भोजन करने से दो जन्म के तथा पूरे दिन उपवास करने से सात जन्म के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना दुष्कर है, वह वस्तु भी प्रबोधिनी एकादशी के व्रत से मिल जाती है।
प्रबोधिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से बड़े से बड़ा पाप भी क्षण मात्र में ही नष्ट हो जाता है। पूर्व जन्म के किये हुए अनेक बुरे कर्मों को प्रबोधिनी एकादशी का व्रत क्षण भर में नष्ट कर देता है।
जो मनुष्य अपने स्वभावानुसार प्रबोधिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें पूर्ण फल प्राप्त होता है।
हे पुत्र, जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस दिन थोड़ा भी पुण्य करते हैं, उसका वह पुण्य पर्वत के समान अटल हो जाता है।
जो अपने हृदय के अन्दर ही ऐसा ध्नान करते हैं कि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करुंगा, उनके सौ जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी को रात्रि जागरण करते हैं, उनकी बीती हुई तथा आने वाली दस पीढ़ियां विष्णु लोक में जाकर वास करती हैं और नरक में अनेक दुःखों को भोगते हुए उनके पितृ विष्णुलोक में जाकर सुख भोगते हैं।
हे पुत्र, ब्रह्महत्या आदि महान् पाप भी प्रबोधिनी एकादशी के दिन रात्रि को जागरण करने से नष्ट हो जाते हैं।
प्रबोधिनी एकादशी को रात्रि को जागरण करने का फल अश्वमेध आदि यज्ञों के फल से अधिक होता है।
समस्त तीर्थों में जाने तथा गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल प्रबोधिनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल के बराबर होता है।"
"हे नारद, इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधिनी एकादशी के व्रत द्वारा अपने कुल को पवित्र किया है।
संसार में जितने भी तीर्थ हैं तथा जितने भी तीर्थों की आशा की जा सकती है, वह प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले के घर में रहते हैं।
मनुष्य को समस्त कर्मों को त्यागते हुए भगवान् की प्रसन्नता के लिए कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान् विष्णु की अत्यन्त प्रिय है।
इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता है।
इस व्रत के प्रभाव से कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान् की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ आदि करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य मिलता है।
प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान् की पूजा करने से बाल, यौवन और वृद्धावस्था के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस एकादशी की रात्रि को जागरण करने का फल, सूर्य ग्रहण के समय स्नान करने के फल से सहस्त्र गुना अधिक होता है।
मनुष्य अपने जन्म से लेकर जो पुण्य करता है, वह पुण्य प्रबोधिनी एकादशी के व्रत के पुण्य के सामने व्यर्थ है।
जो मनुष्य प्रबोधिनी। एकादशी का व्रत नहीं करता, उसके समस्त पुण्य व्यर्थ हो जाते हैं।
इसलिए हे नारद, तुमको भी विधिपूर्वक विष्णु भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
जो मनुष्य कार्तिक मास में धर्मपरायण होकर अन्य व्यक्तियों का अन्न नहीं खाते, उन्हें चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है।
कार्तिक मास में भगवान् दान आदि से उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि शास्त्रों की कथा सुनने से प्रसन्न होते हैं।
कार्तिक मास में जो मनुष्य भगवान् की कथा को थोड़ा-बहुत पढ़ते हैं या सुनते हैं, उन्हें सौ गायों के दान का फल मिलता है।"
यह सुनकर नारदजी बोले - "हे परमपिता, अब आप एकादशी के व्रत का विधान कहिए और व्रत करने से कैसा पुण्य मिलता है, वह भी समझाइए।"
ब्रह्माजी बोले - "हे नारद, इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त्त में उठना चाहिए और स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए।
उस समय भगवान् से विनय करनी चाहिए कि
हे भगवन् आज मैं निराहार रहूंगा और दूसरे दिन भोजन करुंगा, इसलिए आप मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार विनय करके भगवान् की पूजा करनी चाहिए और व्रत प्रारम्भ करना चाहिए।
उस रात्रि को भगवान् के समीप गीत, नृत्य, बाजे तथा कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।
प्रबोधिनी एकादशी के दिन कृपणता को त्याग कर बहुत से पुष्प, अगर, धूप आदि से भगवान् की आराधना करनी चाहिए, शंख के जल से भगवान् को अर्घ्य देना चाहिए।
कार्तिक में जो मनुष्य तुलसीजी से भगवान की पूजा करता है, उसके दस हजार जन्मों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो मनुष्य इस माह में श्री तुलसीजी के दर्शन करते हैं या छूते हैं या ध्यान करते हैं या कीर्तन करते हैं या रोपन करते हैं अथवा सेवा करते हैं, वे हजार कोटियुग तक भगवान के घर में रहते हैं।
(आज रविवार हैं कृप्या तुलसी जी के पत्तों को ना तोड़े)
जो मनुष्य तुलसी का पेड़ लगाते हैं, उनके कुटुम्ब में जो पैदा होते हैं, वे प्रलय के अन्त तक विष्णुलोक में रहते हैं।
इस प्रकार एकादशी रात्रि में भगवान् की पूजा करके प्रातःकाल द्वादशी को शुद्ध जल की नदी में स्नान करना चाहिए।
स्नान करने के पश्चात् भगवान् की प्रार्थना करते हुए घर आकर भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और दक्षिणा देकर सम्मान सहित उनको विदा करना चाहिए।
जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी के दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अन्त में स्वर्ग को जाते हैं।"
जो मनुष्य इस एकादशी के माहात्म्य को सुनते व पढ़ते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।