10/08/2026
श्रावणव्याख्यानमाला: कालगणना
आज दिनांक 10-08-2026 को इन्दिरागांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र और श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय वेरावल के संयुक्त तत्त्वावधान में “काल गणना” विषय पर श्रावण व्याख्यानमाला का आरम्भ हुआ । आज व्याख्यान माला के द्वितीय सत्र का आयोजन हुआ । कार्यक्रम में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र नई दिल्ली से पृथ्वीराज श्रीवास्तव एवं की प्रादेशिक केन्द्र बडौदा से शिवांगी उपस्थित रहीं ।
व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में बडौदा संस्कृत महाविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. चेतन पण्ड्या उपस्थित रहे । अपने कालविषयक व्याख्यान में महोदय ने काल के स्वरूप का विवेचन करते हुये बताया कि प्रत्येक कार्य का मूल आधार काल ही है । काल गणना के बिना कार्यव्यहार सम्भव ही नही है । डॉ. पण्ड्या ने सृष्टि से लेकर आज तक के कालगणना का मान भी बताया । साथ ही विष्णुपुराण और सूर्य सिद्धान्त के आधार पर काल के सूक्ष्मासूक्ष्म मान से भी अवगत कराया । आधुनिक काल के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुये आपने अक्षांश एवं देशान्तर के आधार पर आधुनिक समय निर्धारण का स्वरूप भी बताया ।
द्वितीय वक्ता के रूप में श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय संचालित संस्कृत महाविद्यालय के पुराण विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पंकज रावल ने पुराणों में काल के विभिन्न स्वरूपों से अवगत कराया ।
डॉ. रावल ने कहा कि जब बालक माता के गर्भ से बाहर आता है तभी से उसका व्यवहारिक कालमान प्रारम्भ हो जाता है । आपने श्रीमद् भागवत गीता में उद्धृत काल के स्वरूप को बताते हुये कहा कि स्वयं भगवान् ही काल हैं प्रत्येक पल उन्ही के इच्छानुसार व्यतीत होता है। हम चाहे व्यवहारिक काल की गणना करें या न करें किन्तु भगवान स्वतः ही काल के रूप में हर पल विद्यमान रहते हैं । साथ ही श्रीमद्भागवत पुराण, अग्नि पुराण, गरुण पुराण , मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण आदि में वर्णित कालमान की अवधारण से छात्रों को परिचित कराया ।
व्याख्यान सत्र में कार्यक्रम की प्रस्तावना एवं उपस्थित महानुभावों का शाब्दिक स्वागत ज्योतिष विभागाध्यक्ष एवं व्याख्यामाला के संयोजक डॉ. नित्यानन्द ओझा ने किया । कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन ज्योतिष विभाग के असिस्टैंट प्रोफेसर डॉ. रमेशचन्द्र शुक्ला ने किया तथा संचालन एम. ए. ज्योतिष की छात्रा आस्का लावडिया ने किया । कार्यक्रम में जिज्ञासु छात्र एवं अध्यापक गण उपस्थित रहे ।