Gandhi vidya sansthan,Rajghat, Varanasi.

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10/12/2024

The first modern flushable toilet was invented in 1596 by Sir John Harrington who installed one for his godmother, Queen Elizabeth 1.
His invention came complete with a water tank and a flush valve. However, the flush toilet wouldn't really take off for another 250 years. Most of the toilets in Medieval Europe were either holes in the ground, communal outhouses or chamber pots.
If you were lucky and born into tremendous wealth, you would have the luxury of using a garderobe (derived from the French word for "wardrobe"), which was a small rooms built adjacent to the wall of a medieval castle. The toilet would be connected to a vertical shaft that would run all the way down to the ground. Garderobes which literally translates to "guarding one's robes" originated from the practice of hanging clothes in the shaft as a way to kill fleas by using the ammonia in urine.
Occasionally some brave knights would conduct sneak attacks by entering the castle via the shaft connected to the garderobe. Throughout history, there have been a number of famous people who have died on the toilet. Several of them were stabbed from below while in the process of defecating.
These people include King Edmund II of England (30 November 1016), Jaromír Duke of Bohemia (4 November 1035), Godfrey IV Duke of Lower Lorraine (Circa. 26 or 27 of February 1076), Wenceslaus III of Bohemia (4 August 1306) and Uesugi Kenshin (19 April 1578).

19/11/2024

भारत के नव नियुक्त वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव खन्ना जी को सभी लोग साधुवाद दे रहे हैं और साथ ही उनके पूज्य चाचा जी की स्मृति भी सबको हो रही है।उचित ही है।

यह मानकर चलना चाहिए कि वे भले ही आदरणीय स्वर्गीय श्री हंसराज खन्ना जी के सुपुत्र नहीं है ,भतीजे हैं, लेकिन उनमें उनके कुछ गुण अवश्य होंगे।

जिन लोगों ने श्रद्धेय हंसराज खन्ना जी का वह दौर देखा है ,उनकी निष्पक्षता, न्याय निष्ठा और साथ ही उनके विरुद्ध इंदिरा गांधी और तत्कालीन शासक दल के षड्यंत्र और प्रहारों को देखा है तथा उसमें उनकी वीरता और न्याय निष्ठा को देखा है, वह स्वर्गीय हंसराज खन्ना जी की पुण्य स्मृति से जीवन भर अभिभूत रहेंगे और इसलिए श्री संजीव खन्ना जी से यह अपेक्षा करना स्वाभाविक है कि उनमें कुछ तो गुण अवश्य अपने चाचा जी के भी होंगे ।जिससे एक नई आशा बन्धती है कि सुप्रीम कोर्ट अब भारत के बहुसंख्यकों के साथ भी न्याय करेगा क्योंकि विगत कुछ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट के कतिपय जज भारत के बहुसंख्यकों के विरुद्ध कुछ पूर्वाग्रह रखते दिखने लगे थे।अब वह असंतुलन मिट सकता है।

19/11/2024

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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। आज उनकी जयंती है।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठनी थी
चमक उठी सन सत्तावन में, यह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी

19/11/2024

आदरणीय मनोज श्रीवास्तव जी के लिए

अपनी सुन्दर पोस्ट में आपने कम्युनिस्ट लोगों की दल रेखा की मतांधता पर बहुत ही अच्छा लिखा है।

वस्तुत : चर्च की मतांधता का ही एक परिशिष्ट है कम्युनिस्ट जनों की दल रेखा ।

परंतु ऐसी मतान्धता स्वयं उसके अनुयायियों को भी कष्ट देती है।

आदरणीय पूरनचंद जोशी जी का ही उदाहरण लें।
जैसे ही उन्होंने जीवन भर पार्टी की सेवा करने के बाद स्वयं कम्युनिस्ट चिंतन के अनुसार यह थीसिस दी कि कांग्रेस एक राष्ट्रीय बोरजयूआ पार्टी है इसलिए क्रांति के पहले चरण में हमें उसे सहयोग करना चाहिए,
वैसे ही उन पर उनके अन्य सहयोगी टूट पड़े और कहा गया कि जवाहरलाल नेहरू से ब्राह्मण होने के कारण आप मित्रता निभा रहे हैं और इनको महासचिव के पद से हटाओ।
उनको हटा दिया गया और उन्हें न्यू ऐज का संपादक बना दिया गया जो एक बहुत ही छोटा दायित्व है।
वह इतने समर्पित थे और जीवन भर पार्टी के सिवाय और कुछ उन्होंने सोचा ही नहीं था तो वह रोज पार्टी दफ्तर आते रहे जो गांधी शांति प्रतिष्ठान के सामने सड़क के उसपार गंधर्व महाविद्यालय से थोड़ी दूर पर स्थित है बाल भवन के ठीक सामने ।।

उसका जो वर्णन उन्होंने अपने अंतरंग मित्रों से किया जिनमें से कुछ मेरे अग्रज मित्र थे,वह बहुत ही पीड़ा जनक है।

वे जाकर घंटों पार्टी ऑफिस में बैठे रहते ।
उस ऑफिस में जहां किसी समय उनकी पूरी अधिनायकशाही चलती थी,उनका मुंह लोग देखते थे और उनके संकेत पर व्यवहार करते थे ,
वहां कोई उनसे ठीक से अभिवादन भी नहीं करता था और हर कोई बातचीत करने से बचता था।
यह बहुत ही यन्त्रणा दायक अनुभव था।
परंतु एक समर्पित कम्युनिस्ट की तरह उन्होंने यह सारी वेदना सही।
यह तो हुई कम्युनिस्टों के विषय में बात जो बहुत ही दयनीय दशा में है और जो अगर व्यापक परिदृश्य में देखे तो एक बौद्धिक व्यायाम में लिप्त परंतु वास्तविक बुद्धि की दृष्टि से बहुत ही मंदबुद्धि लोग होते हैं ।
परंतु फिर सत्य तो यह है कि मंदबुद्धि तो वे सभी लोग हैं भारतीय दृष्टि से जो किसी भी आधुनिक एंग्लो क्रिस्चियन ढँग के राजनीतिक दल के प्रति पूर्ण समर्पित होते हैं और सभी दलों में यह प्रवृत्ति है कि वह मुख्य लाइन से असहमत व्यक्ति को दूध से मक्खी के तरह निकाल फेंकते हैं ।
बहुत ही कठोर चित्त,संकीर्ण मन और अल्प बुद्धि से बना है सभी आधुनिक पॉलिटिकल पार्टियों का मानस ।
इनमें जैसी कट्टरता है उसकी तो कोई बात ही नहीं होती।
वह मजहबी उग्रवाद और चर्चवाद के ही एक परिशिष्ट हैं।
लेकिन अभी तो यही दॄश्य सब दूर है। इसकी तुलना में पश्चिमी यूरोप के लोकतंत्र में थोड़ी उदारता है और थोड़ा खुलापन है ।
इसलिए कह सकते हैं कि वे लोग अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान लोग हैं।

जहां तक सनातन धर्म और भारतीय सांस्कृतिक चेतना या भारतीय प्रज्ञा की बात है,
उसकी दृष्टि से तो वर्तमान भारतीय राजनीति में वह भारत में भी अनुपस्थित है और विश्व में तो कहीं है ही नहीं ।
यह तो शायद दौर ही ऐसा है। पॉलिटिक्स बौद्धिक संकीर्णता से ही चल रही है सब जगह। पर फिर इसके अधीन प्रशासन औऱ ज्यूडिशियल प्रशासन भी ऐसी ही संकीर्णता से संचालित है।

लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं, ज्ञान और शक्ति की सहचरी हैं | प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज | धर्म मीमांसा | 19/11/2024

https://youtu.be/y2hF6EYgtxw?si=X-9M6SUhSpgoDLKD

लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं, ज्ञान और शक्ति की सहचरी हैं | प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज | धर्म मीमांसा | आपका स्वागत है "धर्म मीमांसा" चैनल पर! इस रोचक वीडियो को अवश्य देखें और हमारे चैनल "धर्म मीमांसा" को सब्सक्राइब करें ....

🔴 त्रिपुरारी पूर्णिमा को देव शक्तियां विजयी हुईं थीं | प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज | धर्म मीमांसा | 19/11/2024

https://www.youtube.com/live/X_hmtbHoILo?si=jcO7DS6cP8Z61nzi

🔴 त्रिपुरारी पूर्णिमा को देव शक्तियां विजयी हुईं थीं | प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज | धर्म मीमांसा | आज के हमारे YouTube LIVE सत्र में हम बात करेंगे "आयुर्वेद और समृद्धि की साधना का पर्व |" आप सभी से निवेदन है कि इस लाइव सत्र मे....

19/11/2024

गांधी विद्या संस्थान के शासकीय संचालक मंडल के अध्यक्ष श्री गिरिधर मालवीय जी का जाना हम सबके लिए हृदय विदारक है।

वह हमारे शासकीय संचालक मंडल के अध्यक्ष थे ।
उनके उदात्त मार्गदर्शन से संस्थान निरंतर उन्नति कर रहा था परंतु अखिलेश यादव ने अपनी जाति के कुछ कर्मचारियों के उकसावे पर सारे नियमों को रौंदते हुए उस पर ताला जड़ दिया और अंततः संस्थान बैठ गया।

मालवीय जी संस्थान की उन्नति और हित के लिए सदा मार्गदर्शन करते रहे थे।

हमारी लिखी शोध पुस्तकों की भूमिकाएं भी उन्होंने लिखीं।
उनकी पवित्र स्मृति में हम सब प्रणत हैं और दुःखी परिजनों के लिएगहरी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

19/11/2024

पूज्य गिरिधर मालवीय जी की पवित्र स्मृति में शत शत नमन

बहुत ही गहरी छटपटाहट से भारत रत्न श्री जयप्रकाश नारायण जी ने गांधी विद्या संस्थान की स्थापना की थी क्योंकि तब तक जवाहरलाल नेहरू की छत्रछाया में भारत के विश्वविद्यालय में या तो कम्युनिज्म से प्रेरित समाजशास्त्र पढ़ाया जाता था और सभी मानविकी विद्याएं पढ़ाई जाती थी या फिर यूरो अमेरिकी दृष्टि से प्रेरित।
दोनों का खोखलापन जय प्रकाश नारायण जी जान चुके थे और इसलिए उन्होंने विशुद्ध भारतीय दृष्टि पर आधारित गांधी विद्या संस्थान नामक समाज वैज्ञानिक अध्ययन संस्थान बनाया परंतु 11 वर्षों तक उसे धीरे-धीरे खड़ा करने के बाद और अनेक महत्वपूर्ण अमेरिकी एवं यूरोपीय उन विद्वानों को लाकर उनका भाषण कराने के बाद जो इन दोनों दृष्टियों से भिन्न एक सत्य निष्ठ समाज दर्शन की खोज में जिज्ञासु थे, इसके बाद अचानक जेपी को संपूर्ण क्रांति आंदोलन में लिप्त होना पड़ा और फिर उसमें उनके साथ इंदिरा गांधी के द्वारा किए गए अत्याचार से जर्जर शरीर अधिक दिन नहीं रह पाया और वे चले गए।
उसके बाद जाति तथा क्षेत्र के समीकरणों के आधार पर विद्या में बिल्कुल भी रुचि न रखने वाले कम्युनिस्टों ने उसे अपना अड्डा बना लिया और उन्हें इतनी मस्ती चढ़ गई कि आवश्यक किसी भी नियम का पालन न करते हुए पूरी तरह कम्यूनिज्म से संचालित राजनीतिक अड्डे की तरह विकसित करने लगे और वहां के समाज विज्ञान संकाय की प्रोफेसर शीर्ष विदुषी प्रोफेसर कुसुमलता केडिया जी से कामरेडों का ईर्ष्याद्वेष बढ़ता ही गया और उन्होंने बहुत अनुचित व्यवहार किया।

मैं जब गांधी विद्या संस्थान पहुंचा तो मैं ने स्वयं को गांधीवादी कहने वाले तत्कालीन निदेशक को बहुत समझाया कि आप पूरी तरह दलदल में फंसे हैं और यह सब मनमानियां मत कीजिए पर वे नहीं माने ।
अंतमें मैं ने माननीय उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की और तब शासन ने जांच की और पाया कि संस्था विधिक रूप से शून्य हो चुकी है।

जितने लटके कोर्ट में किया जा सकते थे उतना करके कम्युनिस्टों ने कई वर्ष प्रकरण को खींच डाला।
परंतु जब बहस का दिन आया तो एक ही दिन में सत्य सामने आ गया और न्याय हो गया।

तब न्यायिक निर्णय के प्रकाश में उत्तर प्रदेश शासन को न्यायालय आदेश अनुसार एक शासकीय संचालक मंडल गठित करना पड़ा ।
उसके लिए जब सर्वमान्य व्यक्तित्व की खोज हुई तो स्वाभाविक रूप से गिरिधर मालवीय जी का नाम सामने आया और वे शासकीय संचालक मंडल के अध्यक्ष बने।
कम्युनिस्टों ने उनके साथ भी कुचालें चलना नहीं छोड़ा और एक कम्युनिस्ट को जो रिवाल्वर लेकर संस्थान परिसर में आता था उसे कथित गांधी वादियों ने अपने परिसर में गांधी विद्या संस्थान का एक समानांतर ऑफिस खोलकर उसका ही निर्देशक बना दिया।
अंत में न्यायालय से पुनः सत्य की जीत हुई ।।

आदरणीय गिरिधर मालवीय जी के कारण सरकार के स्तर पर कोई बहुत पहल न करने पर भी संस्थान की पुनः प्रतिष्ठा दिन दूनी बढ़ने लगी परंतु अखिलेश यादव ने शुद्ध जातिवाद के आधार पर उस पर ताला लगा दिया क्योंकि कुछ लाइब्रेरियन तथा अन्य तृतीय श्रेणी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यादव तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के थे।

आदरणीय मालवीय जी का भी लिहाज अखिलेश यादव ने नहीं किया।सत्य से तो अखिलेश यादव को कोई लेना देना था नहीं।

मालवीय जी जैसे बड़े व्यक्तित्व को इससे क्या अंतर पड़ना था ।
उन्होंने तो अनुग्रह पूर्वक गांधी विद्या संस्थान संचालक मंडल का अध्यक्ष बनना स्वीकार किया था।

परंतु अखिलेश यादव की कुचाल से संस्थान की बहुत ही हानि हुई और कुल मिलाकर संस्थान बैठ गया।

परंतु जब तक संस्थान चला
मालवीय जी का न्यायपूर्ण और उदात्त मार्गदर्शन हम सब की प्रेरणा बना रहा।

हमारे और प्रोफेसर केडिया जी के द्वारा संयुक्त रूप से लिखित दो पुस्तकों की उन्होंने भूमिका भी लिखी और आशीर्वाद भी दिया ।
सभी कार्यों में वे सदा अपना आशीर्वाद देते रहे ।
उनकी पुण्य स्मृति को बारंबार नमन।

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