Philosophical Research Council

Philosophical Research Council

Share

Welcome to the World of Philosophy. This page is mainly intended to serve as

1. a guide to the students of philosophy
2.

as a sharing platform to the elite masters of Philosophy
3. As a medium for Research Scholars to publish their Research Articles related to Philosophy.
4. Facilitate people of other branches other than Philosophy too, to share their views and ideas that can link to Philosophy
5. As a Q & A resource to solve any philosophy related queries.

03/03/2026

अब तो होलिका भी डिजाइनर कलेवर मे

हमारे बचपने मे होली दहन मुहूर्त आज की तरह भद्रा, पुच्छ काल,पढ़वा आदि के चोंचले हो गए हैं वो पहले नहीं था और आज चाहे जो कोइ होली जला देता है नहीं तो गांव देहातों में तो अभी ज्यादा नहीं 25 साल पहले तक ही ऐसा कोइ भी झंझट नहीं होता था , बसंत पंचमी को होली रखे जाने के बाद होलिका स्थल पर होली बढ़ती ही रहती थी , बंबूल के कांटे या करील के झाड़ झंखाड़ काट काट कर होली पर डालने का क्रम अनवरत क्रम चलता रहता था, ज्यादातर ये काम खेल ही खेल में होता रहता था, किसकी होली कितनी ऊँची इस बात को लेकर अदृश्य प्रतियोगिता चलती रहती थी , अंतिम सप्ताह में पेड़ों का काटा जाना काफ़ी तेज हो जाता था , तब वामी रोदालू गेंग पेड़ों के कटने को लेकर रुदन करता रहता था, भले ही नगरों में हर साल लाखों पेड़ कट कर नयी वस्ती वस जाती थी..... लेकिन विलाप होली पर रखे जाने वाले बंबूल के कांटों को लेकर होता था ,होली की रात तो मानो दुकानों के छप्पर, लकड़ी के तख्त बेंच आदि के काल की रात्रि होती थी , लड़के पहले से टारगेट करते रहते थे कि इस साल किसके छप्पर या खोखे को होली पर चढ़ाना है दुकानदार कितनी भी पहरेदारी करते थे लेकिन दो चार छप्पर या तखत होली पर चढ़ाने में सफलता मिल ही जाती थी जिसका जाता था वो थोड़ी बहुत चीख पुकार और गाली देता था, लेकिन फिर वो मनोरंजन में शामिल हो जाता था
-------------------------
होली जलाने का निश्चित मुहूर्त होता था वो था रात्रि का अंतिम पहर हर गांव में किसी चौपाल या घेर पर गांव वाले इकट्ठा होते थे , होली जलाने का काम एक विशेष व्यक्ति करता था, उसको खेरापत बोलते थे, चूंकि महीने भर से ज्यादा समय से रखे जाने वाली होली में पक्षी अपना घोंसला, बिल्ली कुत्ते आदि भी अपना आसरा बना लेते थे.... होली दहन में किसी को निकलने का मौका नहीं मिल पाता था सो यह खेरापत बहुत अशुभ व्यक्ति माना जाता था, इसकी शादी नहीं हुयी होती थी, इसकी शक्ल किसी नें भी नहीं देखी होती थी तो गांव के कुंवारे व्यक्तियों के बारे में हम लोग अनुमान लगाते कि होली इसने जलाई होगी , चौपाल या घेर में जमा लोगों के बीच कोइ सूचना देता कि खेरापत आ गया है, तब गांव का कोइ सम्माननीय पद पर प्रतिष्ठित व्यक्ति थाली में पूजना का सामान लेकर सब लोगों को साथ लेकर चलता, वहाँ होली की पूजा होती , मुंह को कपड़े से ढँके हुए खेरापत होली में आग लगा कर अपनी गुड़ कि भेली और नकदी लेकर दूसरी होली जलाने को निकल जाता था , होली जलने के पश्चात होली जलाने को जमा हुए लोग आपस में चरण स्पर्श या मिलना करके पूरे गांव की परिक्रमा को निकल जाते थे , परिक्रमा के बाद ही व्यक्तिगत रूप से घरों में मिलने को जाने का क्रम चालू होता था
------------------------
यह समय ऐसा था तब ना तो होलिका और प्रहलाद का कोइ चोंचला था, नाही अख़बारों या पंचागों में कोइ मुहूर्त देखा जाता था, खेरापत की उपलब्धता ही होलिका दहन का मुहूर्त होता था , कभी कभार खेरापत नहीं आता तब किसी पर कोइ होली जलवा देते तो जलाने वाले के घर वाले गाली गलौज और लड़ाई पर उतारू हो जाते थे , अब तो मुहूर्त के साथ डिजायनर होली सजती है , प्रहलाद होलिका रखे जाते हैं ,महिलाएं घरों में होली जलाती थीं, लेकिन लोहड़ी की तरह हिन्दू स्त्रियां भी होलिका दहन स्थल पर आ जाती हैं ..

15/02/2026

काशी के प्रमुख चतुर्दश महालिङ्ग
(शिवरात्रि विशेष)

तीर्थानि सर्वाणि पुर्यश्च सर्वा-स्तथा शिवस्यायतनानि षष्टिः ।

नद्यो नदाः ससरः सागराश्च देवा समस्ताः मुनयश्च सर्वे वसन्ति काश्यां सततं स्वशुद्धये विश्वेश्वरस्याद्भुतमुक्तिजन्मनः ।।

ब्रह्मवैवर्तपुराण के उपर्युक्त वचन के अनुसार सभी तीर्थ, सभी पुरियों, शिव के साठ स्थान, नदी, नद, सरोवर एवं सागर निरन्तर अद्भुत मुक्तिदाता विश्वेश्वर की काशी नगरी में अपनी शुद्धि हेतु वास करते हैं। काशी में लिङ्गधारी सदाशिव लोकरक्षा के लिये पञ्चक्रोशात्मक होकर सदैव विराजते हैं। पुराणों में काशी को ब्रह्मरूप में निरूपित किया गया है। यह काशीक्षेत्र, एक के भीतर एक इस प्रकार से चार प्रकार का है। काशी में वाराणसी, वाराणसी में अविमुक्त और अविमुक्त में अनुगृह है। परमज्योति रूप ब्रह्म इससे प्रकाशित होता है अतः यह काशी है। अस्सी, वरुणा के बीच में है अतः वाराणसी है। प्रलय काल में भी शिव इसे नहीं छोड़ते इसलिये अविमुक्त है और विश्वेश्वर का निरन्तर विहार-स्थान है अतः अनुगृह है। इसमें ईश्वर के आनन्द के अङ्कुर लिङ्ग रूप से उदित होते रहते हैं, इसलिये इसे आनन्द-वन भी कहा गया है।

प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में विश्वेश्वर को प्रमुख माना गया है। नारदीय पुराण के अनुसार -

काशीविश्वेश्वरं लिङ्ग पूजितं नमितं स्तुतम् । न तस्य विद्यते कृत्यं संसृतिर्नैव जायते ।।

अर्थात् काशी विश्वेश्वर का जिसने पूजन, अर्चन और स्तुति कर ली उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। वह कृत-कृत्य हो जाता है तथा संसार में उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

श्री विश्वेश्वर की महिमा तो सर्वोपरि है ही किन्तु काशी के अन्य शिवलिङ्गों के दर्शनादि का फल भी अमोघ होता है। काशी में स्थापित एवं स्वयंभू शिवविग्रहों को संख्या अनन्त है। "काशी के कंकर भी शंकर समान है" यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है। पार्वती की जिज्ञासा पर शिव जी ने स्वयं कहा है-"असंख्यातानि लिङ्गानि पार्वत्यानन्दकानने" (काशी खण्ड) इन असंख्य लिङ्गों में उन्होंने चौदह महालिङ्ग विशेष महत्त्व के बताये है जो कलियुग में गुप्त तो हो जायेंगे किन्तु उनका प्रभाव अपने-अपने स्थान पर बना रहेगा। ये प्रमुख लिङ्ग है-

(१) ओंकारेश्वर, (२) त्रिलोचनेश्वर, (३) महादेव, (४) कृत्तिवासेश्वर, (५) रत्नेश्वर, (६) चन्द्रेश्वर, (७) केदारेश्वर, (८) धर्मेश्वर, (९) वीरेश्वर, (१०) कामेश्वर, (११) विश्वकर्मेश्वर, (१२) मणिकर्णिकेश्वर, (१३) अविमुक्तेश्वर और (१४) विश्वेश्वर। इस निबन्ध में उनकी महिमा एवं स्थान का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। इन शिवलिङ्गों की यात्रा का महत्त्व ज्येष्ठकृष्णपक्ष की प्रतिपदा से चतुर्दशी तक प्रतिदिन क्रमशः करने के विशेष माहात्म्य से है।

१- ओंकारेश्वर - यह शिवलिङ्ग, मच्छोदरी के पास उत्तर कोयला बाजार (ओंकारेश्वर मुहल्ले) में स्थित है। इस मुहल्ले को छित्तनपुरा भी कहते हैं। मत्स्योदरी तीर्थ में स्नान करके इनके दर्शन का निर्देश काशी-खण्ड में है।

२- त्रिलोचनेश्वर - यह मन्दिर त्रिलोचन घाट पर है। जहाँ त्रिलोचन लिङ्ग है वह विरजाख्यपीठ है। उस पीठ के दर्शन से मनुष्य रजोगुण से निवृत्त हो जाता है। इनके दर्शन से पातकों का नाश होता है और मुक्ति की चिन्ता नहीं रहती।

३- महादेव - महादेव या आदि महादेव का स्थान त्रिलोचन नाथ के मन्दिर के पीछे पूर्वदिशा में है। शिवलिङ्ग के पूर्वोत्तर अर्थात् ईशान भाग में उनके दर्शन से

पशुपाशच्छेद होता है।

४- कृत्तिवासेश्वर - यह स्थान वृद्धकाल के मार्ग में राय लल्लन जी के बगीचे में स्थित है। काशी में ऋषियों को पीड़ा देने वाले गजासुर का वध करके शंकर भगवान् ने उसकी त्वचा को अपना अधोवस्त्र बनाया इसलिये उनका कृत्तिवासेश्वर नाम प्रसिद्ध

हुआ। यह शिवलिङ्ग सबका शिरोभूत माना गया है।

कृत्तिवासेश्वरं नाम महापातकनाशनम् । सर्वेषामेव लिङ्गानां शिरोभूतमिदं परम् ।।

५- रत्नेश्वर - यह स्थान भी वृद्धकाल के मार्ग में कृत्तिवासेश्वर के पास ही है। इनके दर्शन से ज्ञानरत्न की प्राप्ति होती है।

६- चन्द्रेश्वर - संकठा देवी के मन्दिर के पास सिद्धेश्वरी देवी के मन्दिर में चन्द्रेश्वर का लिङ्ग है। इसी मन्दिर में चन्द्रकूप भी है। यह स्थान सिद्ध योगीश्वरी का पीठ है। यह शिवलिङ्ग चन्द्रदेव द्वारा स्थापित माना जाता है। गया में पिण्डदान से पितृगणों को जो तृप्ति होती है वैसे ही चन्द्रकूप तीर्थ में श्राद्ध करने से होने का प्रमाण

काशी खण्ड में है। यथा-गयायां पिण्डदानेन यथा तुष्यन्ति पूर्वजाः । तथा चन्द्रोदकूपेऽस्मिन् श्रद्वैस्तुष्यन्ति पूर्वजाः ।।

७- केदारेश्वर - केदारघाट पर प्रसिद्ध मन्दिर में यह विग्रह है। हिमालय पर्वत पर स्थित केदारेश्वर के दर्शन से जो पुण्य होता है उससे सात गुना फल काशी में केदारेश्वर के दर्शन से होता है। यथा-

तुषाराद्रिं समारुहा केदारं द्रक्ष्य यत्फलम् । तत्फलं सप्तगुणितं काश्यां केदारदर्शन ।।

८- धर्मेश्वर - यह स्थान लाहौरी टोला में मीरघाट पर स्थित है। इनके दर्शन से पुरुषार्थ की सिद्धि होती है।

९- वीरेश्वर यह स्थान सिंधिया घाट के ऊपर आत्मवीरेश्वर नाम से प्रसिद्ध है। यह शिवलिङ्ग सर्वसिद्धिदायक है तथा पुत्रदाता के रूप में प्रसिद्ध है। काशीखण्ड के अनुसार-

तिलान्तरापि नो काश्यां भूमिलिङ्गं विना क्वचित् । परं वीरेशसदृशं न लिङ्गं त्वाशुसिद्धिदम् ।।

१०- कामेश्वर - यह स्थान मच्छोदरी के पास त्रिलोचन गंज में है। शिवलिङ्ग दुर्वासा मुनि द्वारा स्थापित है। इसकी आराधना से मुनि की सारी कामनायें पूर्ण हुई थीं।

११- विश्वकर्मेश्वर - यह स्थान वाराणसी सिटी स्टेशन के पास गोलगड्डा में

स्थित है। यह विश्वकर्मा द्वारा स्थापित किया गया था। इनके दर्शन से सद्बुद्धि प्राप्त होती है जो मोक्ष के लिये हितकर है।

१२- मणिकर्णिकेश्वर यह स्थान मणिकर्णिकाघाट के ऊपर कासाराम की गली (गऊमठ) में स्थित है। इनके दर्शन से मोक्ष-लाभ होता है।

(१३) अविमुक्तेश्वर - यह शिवलिङ्ग विश्वनाथ मन्दिर में पूर्व-दक्षिण के कोण

पर है। जब विश्वेश्वर काशी से मन्दराचल जाने लगे तब भी उन्होंने काशी का लिङ्गरूप से त्याग नहीं किया। यह अविमुक्तेश्वर लिङ्ग काशी में ही नहीं, पृथ्वी में स्थापित प्रथम लिङ्ग माना जाता है। यथा-

आदिलिङ्गमिदं प्रोक्तमविमुक्तेश्वरं महत् । ततो लिङ्गान्तराण्यत्र जातानि क्षितिमण्डले ।।

१४- विश्वेश्वर - इस शिवलिङ्ग की महिमा, जो विश्वनाथ नाम से प्रसिद्ध है, सर्वविदित है। काशी खण्ड के अनुसार आलस्य करके भी जो इनके दर्शन को जाता है, उसे पद-पद पर अश्वमेध यज्ञ से अधिक पुण्यलाभ होता है। जो मनुष्य गंगा में स्नान करके श्रद्धापूर्वक दर्शन करता है उसके पुण्य का तो अन्त ही नहीं है। यथा-आलस्येनापि यो यायाद् गृहाद्विश्वेश्वरालयम् । अश्वमेधाधिको धर्मस्तदुपास्य पदे पदे ।।

यः स्नात्वोत्तरवाहिन्यां यदि विश्वेशदर्शने ।

श्रद्धापरेण यातस्य श्रेयसस्तेन विद्यते ।।

उपर्युक्त चौदह महालिङ्गों का दर्शन-पूजन, प्रत्येक काशीवासी को अवश्य करना चाहिये। यह सत्य है कि आज के युग में, काशी की तिथिवार-माह-वार्षिक आदि यात्राओं का जो विधान है उसके अनुसार यात्रा करना कठिन, फिर भी यथासमय सुविधानुसार दर्शन-पूजन करने का प्रयास अवश्य करना चाहिये।
डा आशीष पाण्डेय
www.prcuv.com

12/02/2026
12/02/2026

Celebrating my 10th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

01/12/2025

श्रीमद्भगवद्गीता : लघु से विराट की यात्रा
************************

गीता जयंती विश्व मानवता के आध्यात्मिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण तिथि है। यह वह दिवस है जब कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, वही कालान्तर में श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संकलित हुआ। भारतीय संस्कृति में इसे धर्म, दर्शन और कर्तव्य का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है, परंतु साहित्यिक दृष्टि से भी इसकी संरचना, भाषा-शैली, रूपक योजना एवं काव्यात्मक बिम्ब समृद्ध एवं विशिष्ट हैं। गीता जयंती के अवसर पर इसका शोधपरक अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है कि गीता केवल धार्मिक निर्देश नहीं, बल्कि जीवन के समस्त द्वंद्वों का युक्तिसंगत समाधान प्रस्तुत करने वाला व्यवहारिक शास्त्र है।

महाभारत युद्ध के प्रारंभिक क्षणों में अर्जुन मानसिक विचलन से ग्रस्त हो जाते हैं। अपने स्वजनों, गुरुजनों और बंधु-बांधवों को रणभूमि में देखकर उन्हें युद्ध अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है। इसी समय श्रीकृष्ण योगयुक्त कर्म की संकल्पना समझाते हैं। यह संवाद लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व शुक्ल पक्ष की एकादशी, मार्गशीर्ष मास में हुआ—इसी दिन को विश्वभर में गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह तिथि भारतीय समय-चक्र में दर्शन और कर्तव्य के नवोन्मेष की प्रतीक है।

गीता अठारह अध्याय और सात सौ श्लोकों से निर्मित एक काव्यग्रंथ है। इसकी भाषा संस्कृत है, परंतु शैली प्रौढ़, संक्षिप्त और सारगर्भित। छंद-विधान में प्रायः अनुष्टुप छंद का प्रयोग हुआ है, जो अर्थ को सरलता और संतुलन प्रदान करता है। यह शैली गीता को केवल धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि उच्च साहित्य का महत्त्वपूर्ण उदाहरण बनाती है।
गीता के संवाद में नाटकीय प्रवाह है। प्रश्न और उत्तर की संरचना पाठक को चिंतन के लिए विवश करती है। श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद केवल दो व्यक्तियों के मध्य नहीं, बल्कि मनुष्य और उसके अंतर्मन के मध्य द्वंद्व का रूपक है। अर्जुन की शंका हर उस व्यक्ति की शंका है जो कठिन परिस्थितियों में कर्म और नैतिकता के बीच उलझता है।

गीता का केंद्रीय संदेश है—कर्म करते हुए फल की आसक्ति छोड़ देना। “कर्मण्येवाधिकारस्ते” का सिद्धांत मनुष्य को निष्काम कर्म की ओर प्रेरित करता है। यह विचार वस्तुतः जागरूकता और आत्मबल का प्रतिपादन करता है, क्योंकि फल-प्रेरित कर्म व्यक्ति को चिंता, लोभ और निराशा का दास बना देते हैं। गीता तीन प्रमुख योगमार्गों की स्थापना करती है—ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग। ज्ञान योग विवेक और तत्वबोध का मार्ग है, भक्ति योग प्रेम और समर्पण का, जबकि कर्म योग दायित्व और कार्यशीलता का। ये तीनों मार्ग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। यही समन्वय गीता को सार्वभौमिक रूप देता है।

गीता में कई रूपक और प्रतीक हैं जो पूरे ग्रंथ को काव्यात्मक ऊँचाई देते हैं, कुरुक्षेत्र मानव-जीवन का प्रतीक है—जहाँ निर्णय, संघर्ष और परिस्थिति एक साथ उपस्थित रहते हैं।अर्जुन मनुष्य की चेतना है जो भ्रम और मोह में डगमगा जाती है।

श्रीकृष्ण चैतन्य, विवेक और आत्मसाक्षात्कार के प्रतीक हैं, धर्मयुद्ध केवल बाहरी संघर्ष नहीं, बल्कि आंतरिक दुर्बलताओं के विरुद्ध युद्ध है, इन प्रतीकों की साहित्यिक प्रस्तुति पाठक को बाहरी कथा से हटाकर अंतर्मन की यात्रा पर ले जाती है। गीता का संदेश इसी अंतर्मुखी प्रक्रिया में पूर्ण होता है।

आज का मानव विज्ञान, तकनीक और उपभोक्तावाद के युग में जी रहा है। सुविधा बढ़ी, पर शांति घटती गई। प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य को थका दिया है, परिणामस्वरूप तनाव और असंतोष आम अनुभूति बन गए हैं। ऐसे समय में गीता का उपदेश दिशासूचक है—क्योंकि वह बाह्य सफलता से अधिक अंतः शांति पर बल देता है।
गीता हमें सिखाती है कि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में कर्तव्य करना आवश्यक है। निस्स्वार्थ कर्म व्यक्ति को ऊँचे मूल्य प्रदान करता है और समाज में संतुलन व करुणा बढ़ाता है। यह शिक्षा आज की राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, उद्योग और व्यक्तिगत जीवन सभी के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

गीता का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं। विश्व के विद्वानों—टॉल्स्टॉय, आइंस्टीन, थोरौ, ए. सी. ब्रैडली आदि—ने इसकी प्रशंसा की। ओपेनहाइमर ने भगवद्गीता को अपनी प्रेरणा का स्रोत बताया। यह दर्शाता है कि गीता का संदेश सार्वभौमिक है—उसका पाठ किसी जाति, धर्म, भाषा या सीमा से बंधा नहीं।
यही कारण है कि गीता जयंती विश्व स्तर पर मनाई जाती है—वेदांत, अध्यात्म और मानवीय मूल्य को स्मरण करने के लिए। इस दिन गीता पाठ, संवाद, शोध संगोष्ठियों और सांस्कृतिक आयोजन द्वारा इसके संदेश को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाता है।

गीता जयंती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, आत्मबोध का उत्सव है। गीता मनुष्य को सिखाती है कि जीवन संघर्षों का नाम है, और इन संघर्षों के बीच संतुलन, विवेक तथा निस्स्वार्थ कर्म ही श्रेष्ठ मार्ग है। साहित्यिक दृष्टि से यह भारतीय काव्य-परंपरा की अनूठी निधि है—संवादात्मक शैली, छंद-लालित्य, रूपक-सम्पन्नता और दार्शनिक गहनता इसे चिरकालिक बनाती है।
अतः गीता जयंती हमें केवल एक तिथि की याद नहीं दिलाती, बल्कि उस क्षण की स्मृति कराती है जब मानव-चेतना ने धर्म, कर्म और ज्ञान के उच्चतम स्तर को स्पर्श किया था। आधुनिक जीवन की उलझनों में यह ग्रंथ स्थिरता का दीपक है—जो मनुष्य को बाहरी अराजकता से निकालकर आत्म-प्रकाश की ओर ले जाता है। गीता जयंती पर यही संकल्प होना चाहिए कि हम इसके सिद्धांतों को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि जीवन में उतारें—तभी यह ज्ञान सार्थक होगा, तभी मानवता का कल्याण सुनिश्चित हो सकेगा।

डा आशीष पाण्डेय
9451236536

19/10/2025

भारत के सांस्कृतिक विकास में दीपावली
*********************************
असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥
यह मंत्र बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) में मिलता है। इसका पूरा श्लोक और अर्थ इस प्रकार है -हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर,
अंधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। इसका दार्शनिक अर्थ: यह मंत्र मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक है।“असतो मा सद्गमय” — हमें असत्य, मिथ्या और भ्रम से मुक्त होकर सत्य, स्थायी और शाश्वत ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए।“तमसो मा ज्योतिर्गमय” — अज्ञान और अंधकार से निकलकर ज्ञान और विवेक के प्रकाश में प्रवेश करना चाहिए।“मृत्योर्मा अमृतं गमय” — भौतिक मृत्यु के भय से ऊपर उठकर आत्मा की अमरता को अनुभव करना चाहिए। यह मंत्र दीपावली के दर्शन से भी गहराई से जुड़ा है — जहाँ दीपक का प्रकाश अंधकार को मिटाकर मनुष्य को सत्य और अमरत्व की ओर ले जाने का प्रतीक बनता है।भारत विविधताओं का देश है जहाँ धर्म, संस्कृति, परंपरा और उत्सव जीवन का अभिन्न अंग हैं। इन उत्सवों में दीपावली या दीपोत्सव सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय पर्वों में से एक है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला, सामाजिक एकता और आर्थिक जीवन का उत्सव भी है। दीपावली का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है, और इसके माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाएँ तथा आध्यात्मिक मूल्यों का निरंतर विकास हुआ है। इस शोधपरक निबंध में हम दीपावली के माध्यम से भारत के सांस्कृतिक विकास, सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक उत्थान और आध्यात्मिक समृद्धि का विश्लेषण करेंगे।

दीपावली का ऐतिहासिक और पौराणिक आधार-दीपावली का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों — जैसे कि रामायण, महाभारत, स्कन्दपुराण और पद्मपुराण — में मिलता है। रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। यह प्रकाश और अंधकार, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक बन गया| महाभारत में भी दीपोत्सव का उल्लेख “पितृ-पक्ष” और “कार्तिक अमावस्या” के अनुष्ठानों के संदर्भ में मिलता है। जैन परंपरा में यह दिन भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है, वहीं सिख धर्म में यह गुरु हरगोबिन्द जी की जेल से मुक्ति का प्रतीक है। इन सभी परंपराओं का समन्वय दर्शाता है कि दीपावली भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के विकास में “समरसता” का प्रतीक बन चुकी है।

सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता में दीपावली की भूमिका- दीपावली भारत के प्रत्येक राज्य, भाषा, धर्म और जाति के लोगों को एक सूत्र में बाँधने वाला पर्व है। उत्तर भारत में जहाँ यह श्रीराम की वापसी के रूप में मनाई जाती है, वहीं दक्षिण भारत में इसे नरक चतुर्दशी या कृष्ण की नरकासुर पर विजय के रूप में, और पश्चिम भारत में लक्ष्मी पूजन के रूप में मनाया जाता है। इन विविध रूपों के बावजूद, इसके पीछे जो मूल भाव है — अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, असत्य से सत्य की ओर — वह पूरे भारत को एक आध्यात्मिक धागे में बाँध देता है। इस प्रकार दीपावली ने भारतीय समाज में “विविधता में एकता” की अवधारणा को सशक्त किया।

कला, स्थापत्य और लोकसंस्कृति पर प्रभाव- दीपावली का भारतीय कला और लोक परंपराओं पर गहरा प्रभाव रहा है। इस पर्व के अवसर पर घरों और मंदिरों की सजावट, रंगोली, दीपदान, पटाखे, अलंकरण और लोकगीतों की परंपरा लोकसंस्कृति का जीवंत उदाहरण हैं।लोककला जैसे मधुबनी चित्रकला, वारली पेंटिंग, पिथोरा कला और रंगोली शिल्प दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से विकसित हुए। दीपावली ने भारतीय शिल्पकला, हस्तशिल्प और दीया निर्माण की पारंपरिक विधाओं को जीवित रखा है। इस तरह यह पर्व भारत की कला-संवेदना को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम बन गया है।

आर्थिक और औद्योगिक विकास में दीपावली का योगदान-दीपावली केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए “वित्तीय नववर्ष” के रूप में भी देखी जाती है। व्यापारी वर्ग इस दिन लक्ष्मी पूजन कर नया लेखा-जोखा प्रारंभ करता है। स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण, गृहसज्जा, इलेक्ट्रॉनिक, मिठाई और खिलौना उद्योग में इस पर्व के समय व्यापक व्यापारिक गतिविधियाँ होती हैं।ग्रामीण भारत में कुम्हारों, बुनकरों, हस्तशिल्पकारों, मिठाई निर्माताओं और छोटे व्यवसायियों के लिए दीपावली रोजगार और आय का सबसे बड़ा अवसर होती है। इस प्रकार यह पर्व ग्राम्य अर्थव्यवस्था को सशक्त करता है और आत्मनिर्भर भारत के विचार को भी पोषण देता है।

आध्यात्मिक और दार्शनिक आयाम- दीपावली का वास्तविक संदेश केवल बाहरी प्रकाश नहीं बल्कि आंतरिक आलोक का भी है। यह आत्मा में छिपे अंधकार — जैसे लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञान — को मिटाने का प्रतीक है।उपनिषदों में कहा गया है —
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”,
अर्थात् — अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
यह वाक्य दीपावली के मूल दर्शन को अभिव्यक्त करता है। इस दृष्टि से दीपावली ने भारतीय जीवन में आत्मशुद्धि, संयम, दान और करुणा जैसे गुणों को प्रोत्साहित किया है।

पर्यावरणीय और आधुनिक संदर्भ में दीपावली- आधुनिक समय में दीपावली के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं — जैसे अत्यधिक पटाखों से प्रदूषण, बिजली की अधिक खपत, और भौतिक उपभोग की प्रवृत्ति। किंतु इन समस्याओं का समाधान दीपावली के ही मूल दर्शन — प्रकृति-सम्मान और संतुलन — में निहित है। हाल के वर्षों में “हरित दीपावली” की अवधारणा उभरी है, जो पर्यावरण और संस्कृति दोनों के संतुलन का प्रयास है। मिट्टी के दीपक, जैविक रंगोली, स्थानीय उत्पादों का उपयोग और वृक्षारोपण जैसी गतिविधियाँ दीपावली को पुनः अपने आध्यात्मिक स्वरूप की ओर लौटा रही हैं।

सांस्कृतिक विकास का विश्लेषण-दीपावली ने भारतीय संस्कृति को कई स्तरों पर विकसित किया है —
1. धार्मिक स्तर पर – धर्मों के बीच सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान का भाव उत्पन्न किया।
2. सामाजिक स्तर पर – जाति, वर्ग और क्षेत्रीय विभाजन के बावजूद एकता और सहयोग की भावना को प्रबल किया।
3. आर्थिक स्तर पर – लोकशिल्प, व्यापार और उत्पादन को गति दी।
4. कलात्मक स्तर पर – लोककला, नृत्य, संगीत और वास्तुकला को नई प्रेरणा दी।
5. दार्शनिक स्तर पर – आत्मचेतना, सत्य और ज्ञान के मार्ग को प्रकाशित किया।
इन सभी स्तरों पर दीपावली ने न केवल भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया, बल्कि उसे विश्व पटल पर एक अद्वितीय पहचान भी दिलाई।

दीपावली भारत के सांस्कृतिक विकास का जीवंत प्रतीक है। यह उत्सव केवल दीप जलाने या मिठाई बाँटने का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपे अंधकार को मिटाकर समाज में ज्ञान, प्रेम, समरसता और शांति का प्रकाश फैलाने का संदेश देता है। इस प्रकार, दीपावली ने भारत की सांस्कृतिक धारा को निरंतर प्रवाहित रखा है — जहाँ परंपरा और आधुनिकता, भक्ति और विज्ञान, आत्मा और समाज का सुंदर संगम दिखाई देता है। आज जब विश्व भौतिकता के अंधकार में डूब रहा है, तब दीपावली का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है —“दीप जलाना ही नहीं, स्वयं दीप बन जाना ही सच्ची दीपावली है।”

डा. आशीष पाण्डेय
9451236536
फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल

18/10/2025

नरक चतुर्दशी की महत्ता एवं कथा

नरक चतुर्दशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इसे ‘छोटी दीपावली’, ‘रूप चौदस’ या ‘काली चौदस’ भी कहा जाता है। यह पर्व दीपावली से एक दिन पूर्व आता है। इस दिन का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्व है।
2. नरक चतुर्दशी का महत्व :
1. पापों से मुक्ति का दिन:
मान्यता है कि इस दिन स्नान, दान और दीपदान करने से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और वह नरक जाने से बचता है।
2. शरीर और आत्मा की शुद्धि:
प्रातःकाल तेल से उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है, जिससे शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि होती है।
3. दीपदान का विशेष फल:
इस दिन यमराज के नाम का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु और पितृदोष से रक्षा होती है।
4. श्रीकृष्ण की विजय स्मृति:
यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर नामक असुर के वध की स्मृति में मनाया जाता है, इसलिए इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है।
3. नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा :
प्राचीन काल में नरकासुर नामक एक शक्तिशाली दैत्य था। वह पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों में आतंक फैलाता था। उसने 16,000 देवकन्याओं और राजकुमारियों को बंदी बना लिया था। सभी देवता और ऋषि उसकी अत्याचारों से त्रस्त होकर भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना करने लगे भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर नरकासुर का संहार करने का निश्चय किया। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ युद्ध किया। सत्यभामा, वास्तव में देवी पृथ्वी का अवतार थीं — और नरकासुर, पृथ्वी का पुत्र था। इसलिए उसके वध का अधिकार उन्हीं को था। युद्ध में सत्यभामा के तीर से नरकासुर का वध हुआ। मरने से पहले नरकासुर ने श्रीकृष्ण से यह वर माँगा कि उसकी मृत्यु के दिन जो भी स्नान, दीपदान और पूजा करेगा, उसे नरक का भय न रहे।
भगवान ने वर स्वीकार किया और उसी दिन से यह तिथि ‘नरक चतुर्दशी’ कहलाने लगी।
4. पूजन विधि :
1. प्रातःकाल:
प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शरीर पर तिल या सरसों के तेल का उबटन लगाएं।
अपामार्ग (एक औषधीय पौधा) से स्नान करने की परंपरा है।
2. संध्याकाल:
घर, द्वार और आंगन में दीप जलाएं।यमराज के नाम से दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यह प्रार्थना करें —

> “मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भयदेन च।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥”
अर्थात् — “हे यमराज! मैं त्रयोदशी या चतुर्दशी की रात्रि में दीपदान करता हूँ, कृपया मुझे अकाल मृत्यु और भय से रक्षा करें।”

नरक चतुर्दशी आत्मशुद्धि, पापमुक्ति और प्रकाश के माध्यम से अंधकार पर विजय का प्रतीक पर्व है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में असत्य, अहंकार और अधर्म रूपी ‘नरक’ का अंत तभी होता है जब हम सत्य, धर्म और प्रकाश के मार्ग पर चलते हैं।

डा आशीष पाण्डेय
फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल
9451236536

09/10/2025

करवा चौथ व्रत की कथा और पूजा पद्धति
*********************************
करवा चौथ विवाहित स्त्रियों का प्रमुख व्रत है। यह व्रत पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक निर्जला उपवास (बिना जल और अन्न के) रखती हैं। करवा चौथ पर भगवान गणेश और वीरावती वाली दो कथाएँ पढ़ी जाती है। ऐसा कहा जाता है चतुर्थी तिथि पर पहले पढ़ें गणेश जी की पूजा करें और फिर करवा माता की पूजा होती है, जिसकी कहानी वीरावती से जुड़ी है। इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है। करवा चौथ पर पूजा में सास के लिए बायना रखा जाता है। इसमें पूरियां, मीठा, सुहाग का सामान, कपड़े शामिल होते हैं। इसके अलावा पूजा में करवे जरूर रखे जाते है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। करवा चौथ के लिए मिट्टी का बना हुआ करवा, चीनी का बना हुआ करवा रौली, सिंदूर, कलावा, पंचामृत, फल. कपूर घूपबत्ती, गंगाजल, चावल, दीपक, रूई, कलावा, बताशे, पंच मेवा आदि का इस्तेमाल होता है।
पूजा की विधि
**********

सुबह (प्रातःकाल)

1. सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करें।
2. सौभाग्यसूचक वस्त्र (लाल, गुलाबी, पीले) पहनें।
3. सास द्वारा दिया गया “सरगी” (फलों, मिठाई और सूखे मेवों का भोजन) ग्रहण करें।
इसके बाद व्रत आरंभ करें — पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करें।

संध्याकालीन पूजन विधि

1. एक चौकी पर करवा (जल का लोटा) रखें, उस पर हल्दी से स्वस्तिक बनाएं।
2. पास में गौरी-गणेश, करवा माता, और चंद्रमा की मूर्ति या चित्र रखें।
3. लाल चुनरी से सजाएँ, दीपक जलाएँ।
4. करवा चौथ की कथा सुनें या पढ़ें।
5. पूजा में कुमकुम, अक्षत, रोली, दीपक, फल, मिठाई, पान, सुपारी, पानी का लोटा और करवा का प्रयोग करें।
6. कथा के बाद सभी महिलाएँ करवा का आदान-प्रदान करती हैं और "सदा सुहागिन रहो" कहकर आशीर्वाद लेती हैं।

चंद्र दर्शन व अर्घ्य

1. जब चाँद निकल आए, तो छलनी से चंद्रमा देखें, फिर उसी छलनी से पति का चेहरा देखें।
2. चंद्रमा को जल अर्पण करें, कुछ मीठा खाएँ और पति के हाथ से पानी पीकर व्रत तोड़ें।
3. अंत में पति से आशीर्वाद प्राप्त करें।

व्रत के लाभ

पति की दीर्घायु और स्वास्थ्य में वृद्धि।
वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता।
मनोकामना पूर्ण होने और पारिवारिक सौख्य की प्राप्ति।

प्रसिद्ध दो कथाएं

प्रथम कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है एक साहूकार की वीरावती नाम की बेटी थी। उसके सात भाई थे। जब उसने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो दिन भर भूखी-प्यासी रहने से वह बहुत कमजोर हो गई। भाईयों से बहन की ऐसी हालत देखी ना गई, वो उसे बहुत प्यार करते थे। अपनी बहन का व्रत खुलवाने के लिए भाईयों ने युक्ति सोची। उन्होंने पहाड़ी पर दीपक जलाकर चांद जैसा दृश्य बना दिया। वीरावती ने उसे सचमुच में चांद निकल आया है और भाभियों से बोला- व्रत खोल लो चांद निकल आया है। भाभियों ने कहा कि तुम खोलो, हम तो चांद निकलने पर खोलेगे। लेकिन वीरावती भाईयों की बात में आ गई और उसने व्रत खोल लिया, इससे उसके पति की मृत्यु हो गई। यह देखकर वह बहुत दुखी हुई और सच्चे मन से मां पार्वती की पूजा करने लगी। उसने पूरे साल की चौथ का व्रत रखा और करवा चौथ के दिन व्रत रखने पर करवा मां उससे माता पार्वती उससे प्रसन्न हो गईं। उन्होंने उसे वरदान दिया और उसके पति को फिर से जीवित कर दिया। तब से महिलाएं श्रद्धा और विश्वास के साथ करवा चौथ का व्रत रखती हैं, ताकि उनके पति की आयु लंबी हो और जीवन में खुशहाली बनी रहे।

द्वितीय कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक अंधी बुढ़िया थी, वो गणेश जी की भक्त थी और विधि विधान से रोजाना गणेश जी का पूजन करती थी। एक दिन गणेश जी उस बुढ़िया से प्रसन्न हो गए और उसको दर्शन देकर बोला कि कि मैं आपकी पूजा से प्रसन्न हूं आपको जो वर मांगना है वो मांग लें। बुढिया कहती है, मुझे मांगना नहीं आता तो कैसे और क्या मांगू। उसनें अपेन बेटे और बहू से पूछा। उन्होंने कहा कि धन मांग लो और बहु ने कहा की पोता मांग लोष तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो मतलबी है, अपने मन की बाते बोल रहे हैं। फिर बुढ़िया ने पड़ोसियों से पूछा तो, पड़ोसियों ने कहा कि बुढ़िया तेरी थोड़ी सी जिंदगी बची है। तो तू अपनी आंखे मांग ले। जिससे तेरी बाकी की जिंदगी सुख से बीते। उस बुढ़िया ने बेटे और बहू और पड़ौसियों की बातें सुनकर घर में जाकर सोचा, कि क्यों न ऐसी चीज मांग लूं जिसमें बेटा बहू और मेरा सबका ही भला हो। जब दूसरे दिन श्री गणेश जी आए और बोले, कि आपको क्या मांगना है कृप्या बताइए? हमारा वचन है जो आप मांगेगी सो वो हो जाएगा। गणेश जी के वचन सुनकर बुढ़िया बोली, हे गणराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों में प्रकाश दें, नाती पोते दें, और समस्त परिवार को सुख दें। फिर अंत में मोक्ष दें। बुढ़िया की बात सुनकर गणेश जी बोले -बुढ़िया मां तूने तो मुझे ठग लिया। तथास्तु कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गये। हे गणेश जी! जैसे बुढिया मां को मांगे अनुसार आपने सब कुछ दिया वैसे ही सबको देना।
मनोयोग से यह अनुष्ठान सम्पन्न करनेवाले ब्रती को मनोनुकूल लाभ प्राप्त होता है ऐसा साधकों की मान्यता है

डा आशीष पाण्डेय
9451236536
फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल
वाराणसी

07/10/2025

भगवान विष्णु को प्रिय कार्तिक माह का महत्व
**************************************

नारद मुनि ने भगवान ब्रह्मा से पूछा कि वर्ष का सर्वश्रेष्ठ महीना कौन सा है, पूजनीय देवता कौन हैं और दर्शन हेतु सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है। ब्रह्मा ने तुरंत उत्तर दिया कि वर्ष का सर्वश्रेष्ठ महीना कार्तिक है, पूजनीय देवता नारायण हैं और सबसे पवित्र तीर्थ बदरी क्षेत्र है। कार्तिक माह को भगवान विष्णु ने सदैव उच्च सम्मान दिया और इस मास में किए गए सभी शुभ कर्म सभी देवताओं द्वारा पूर्ण रूप से स्वीकार किए जाते थे क्योंकि वे पूरे माह वहाँ सहज रूप से उपलब्ध रहते थे।

कार्तिक मास में स्नान, दान, भोजन, व्रत, तिल, धेनु, सुवर्ण, रजत, भूमि, वस्त्र, तपस्या, जप, होम, यज्ञ, अन्नदान, तुलसीदल से पूजा, भगवान विष्णु की प्रतिमा का गंगा तथा अन्य पवित्र नदियों के जल से अभिषेक, साथ ही दूध, घी, दही, शहद और शर्करा से निर्मित पंचामृत, देवताओं को षोडशोपचार, वेद-परायण, पुराण श्रवण, भजन, देव स्तुति, देवालय दर्शन, उपवास, संयम, जागरण, गुरु सेवा आदि से अनेक गुना फल प्राप्त होता है। दिन-रात हर समय, अपने मुख से 'गोविंदा गोविंदा हरे मुरारी, गोविंदा गोविंदा मुकुंद कृष्ण, गोविंदा गोविंदा रथंगापने, गोविंदा दामोदर माधवेति' जैसे कीर्तन अवश्य करने चाहिए। प्रत्येक दिन 'भगवद्गीता पाठ' या यथासंभव अधिक से अधिक अध्याय पढ़ने के लिए भी एक निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। साथ ही, भक्त को ज़मीन पर सोना चाहिए और यदि संभव हो तो इस महीने में कन्यादान और विद्यादान भी करना चाहिए। वर्ष में एक कार्तिक माह में भी इस मासिक तपस्या और सदाचार का पालन करने से निश्चित रूप से ठोस लाभ प्राप्त होता है!
कार्तिक माह में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे शरीर पर तेल और भोजन का प्रयोग न करना (नरक चतुर्दशी को छोड़कर), दूसरों का भोजन, अधिक बीज वाले फल, चावल, बचा हुआ या खराब भोजन, भारी भोजन और दिन में दो बार भोजन, नशीले पदार्थों का सेवन, कांच की वस्तुओं का उपयोग, समूह भोजन या ग्राम पुरोहित, श्राद्ध और मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों से भोजन न करना; कमल के पत्तों में भोजन करना, बैंगन, गाजर, लोकी, प्याज और मसूर की दाल खाना; एकादशी के दिन भोजन करना; भोजन के समय अतिथियों का बहिष्कार करना; चांडाल, म्लेच्छ, पतित (दुष्ट चरित्र वाली स्त्रियाँ), व्रतहीन (कार्तिक माह के नियमों का पालन न करने वाली), ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले, दूसरों की बुराई करने वाले, ईश्वर/भगवद्पुरुषों में विश्वास न करने वाले और अनैतिक प्राणियों से बातचीत न करना। कार्तिक माह में स्नान(स्नान) का काफी महत्व है। जो लोग सूर्य देव, गणेश, शक्ति, शिव और विष्णु को समर्पित हैं, उन सभी को औपचारिक रूप से कार्तिक स्नान करना आवश्यक है। जब तक सूर्य 'तुला' राशि में हैं, तब तक सूर्य के लिए स्नान करने की आवश्यकता है। शंकर के लिए स्नान अश्वयुज पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक किए जाने चाहिए। देवियों के लिए स्नान अश्वयुज शुक्ल पक्ष के दिन से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तक किए जाने चाहिए, जबकि गणेश के लिए स्नान आश्विन कृष्ण चतुर्दशी से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तक किए जाने चाहिए। आश्विन शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक औपचारिक स्नान से भगवान जनार्दन प्रसन्न होते हैं। जो लोग कार्तिक माह के दौरान स्नान प्रक्रिया का पालन करते हैं, वे यम धर्म राजा के कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। इस महीने के दौरान विशेष स्नान और राधा और गोपाला की पूजा, अधिमानतः तुलसी के पेड़ के नीचे, का बहुत महत्व है। कार्तिक स्नान करते समय निम्नलिखित श्लोक का पाठ किया जाता है:
कार्तिकेहं करिष्यामि प्रथा स्नानं जनार्दन,
प्रीथ्यर्थ तव देवेश दामोदर मया सहः।
(जनार्दन! देवेश्वर दामोदर! मैं आपको और देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए सुबह का स्नान कर रहा हूं)। निम्नलिखित का भी पाठ करें:
गृहाणार्घ्य मया दत्तं राधाय सहित हरे,
नमः कमला-नाभाय नमस्तये जलशायिने,
नमस्थेस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्य नमोस्तुते।
(भगवान! कृपया आपको और देवी राधा को प्रसन्न करने के लिए मेरा यह 'अर्घ्य' (चुल्लू भर पानी) स्वीकार करें; आपको मेरा नमस्कार कमलनाभा, आपको नमस्कार है जलशायिनी; आपको नमस्कार है हृषिकेश; मेरा आपको बार-बार नमस्कार है!)। स्नान करने से पहले पवित्र गंगा का नाम लेना चाहिए; सिर पर हाथ रखकर स्नान करते समय 'पुरुष सूक्त' / 'श्री सूक्त' का पाठ करें और स्नान के बाद हाथ में तुलसी लेकर 'आचमन' करें (केशव, नारायण, माधव आदि के नामों के साथ तीन बार जल पिएं) और बाद में माथे पर तिलक / विभुदि / कुमकुम लगाएं। दोहरे पुण्य के लिए गर्म पानी की तुलना में ठंडे पानी का स्नान हमेशा बेहतर होता है। ऐसा कहा जाता है कि स्नान के चार प्रकार हैं। 'वायव्य' ('गोधूलि' / गाय के गोबर के साथ); 'वरुण' (समुद्र और पवित्र नदियों में); 'ब्रह्मा' या वेद मंत्रों के साथ और 'दिव्य' या सूर्य की किरणें शरीर पर गुजरती हैं। महिलाओं द्वारा स्नान वेद मंत्रों के साथ नहीं होना चाहिए।
भगवान ब्रह्मा ने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर माह के अंत तक, अर्थात अश्वयुज की अमावस्या पर दीपावली से लेकर कार्तिक कृष्ण पक्ष तक, उत्सव दिवसों के रूप में मनाए जाने की पुष्टि की है। उस त्रयोदशी का 'प्रदोष' काल सबसे महत्वपूर्ण समय होता है जब घर के मुख्य द्वार पर दीपदान और नैवेद्य अर्पित करके भगवान यम की पूजा की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि परिवार में कभी भी अपमृत्यु या अकाल मृत्यु (अकाल और अचानक मृत्यु) न हो। पूजा के बाद इस मंत्र के जाप से यमराज प्रसन्न होते हैं:
मृत्युना पाशा दंडाभ्यां कालेना च मया सह,
त्रयोदश्यां दीपा दानथ सूर्यजः प्रीयथमिति

[त्रयोदशी को इस दीपदान से सूर्यपुत्र यमराज मृत्यु, पाश, दण्ड और काल से रहित होकर प्रसन्न हों] तत्पश्चात कार्तिक अमावस्या को प्रातः देवताओं का पूजन करना चाहिए और उसी सायंकाल प्रदोष के समय दीपों की लड़ियाँ जलाकर देवी लक्ष्मी का पूजन करते हुए कहना चाहिए: 'देवी लक्ष्मी! हम आपका स्वागत दीप ज्योति (इन दीपों की चमक) से करते हैं, क्योंकि आप असीम प्रकाश की प्रतीक हैं; आप सूर्य, चन्द्र, अग्नि और स्वर्ण (समृद्धि) की प्रतीक हैं; कृपया अपना निवास हमारा अपना बनाइए!' इस प्रकार कार्तिक कृष्ण पक्ष सबसे शुभ पखवाड़ा है जिसमें यमराज से 'अपमृत्यु'/अच्छे स्वास्थ्य और देवी लक्ष्मी से धन की प्रार्थना की जाती है जिससे सुखों का युग प्रारंभ होता है। यदि संपूर्ण कार्तिक मास - या कम से कम 'पंच रथ' (पाँच रातें) के दौरान, कोई भक्त 'ॐ नमो नारायणाय' का जाप करता है और साथ ही 'विष्णु सहस्रनाम' और 'गजेंद्र मोक्ष पाठ' पढ़ता/सुनता है, तो उसे अभाव, रोग, विपत्ति और असंतोष से मुक्ति मिलती है। निस्संदेह, केवल कार्तिक एकादशी के दिन किया गया तप 'इहम्' (वर्तमान जीवन) में संतोष और 'परम' (उत्तर जीवन) में आनंद सुनिश्चित करेगा। कार्तिक एकादशी के सबसे शुभ दिन पर किया गया प्रत्येक पुण्य कार्य अनंत गुना फल प्रदान करता है।
डा आशीष पाण्डेय
9451236536
पीआरसी पब्लिकेशन
फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल
वाराणसी

Want your school to be the top-listed School/college in Varanasi?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Website

https://university.prcuv.com/

Address


Varanasi