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25/09/2020
आसमान से परे की उड़ान
जन्मशती पर विशेष
बहुत कम लोग ही डॉ सतीश धवन के बारे में जानते होंगे, मैं एक लाइन में कहूँ तो अगर हम आज मंगल तक पहुंच गए तो उस अंतरिक्ष की यात्रा का पहला कदम डॉ सतीश जी ने रखा था और यकीन दिलाया था कि अंतरिक्ष में भी भारत का झण्डा लहराएगा।
नेतृत्व की पराकाष्ठा
श्री एपीजे अब्दुल कलाम साहब डॉ सतीश धवन के साथ हुए एक अनुभव को बहुत प्यार से साझा करते हैं । 1979 की बात थी श्री धवन इसरो ISRO के चेयरमैन हुआ करते थे और कलाम साहब वैज्ञानिक। कलाम साहब की टीम को SLV नामक राकेट को अंतरिक्ष में पहुंचाना था पर राकेट पहुंच गया बंगाल की खाड़ी में । मिशन फेल हो गया था । मिशन से पहले ही कलाम साहब को पता था कि फ्यूल टैंक में लीकेज है पर वह इतनी कम थी कि अंदाज़ था कि राकेट अपनी कक्षा तक पहुंच जाएगा। लेकिन राकेट उड़ने के थोड़ी ही देर में बंगाल की खाड़ी में गिर गया। कलाम साहब बेइंतहा तनाव में थे। डॉ धवन ने यह नोटिस किया और कहा कलाम प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाओ और उसे मैं खुद ब्रीफ करूँगा।
श्री धवन ने मिशन की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए कहा कि मिशन फेल हो गया पर मुझे अपनी टीम पर पूरा भरोसा है अगला मिशन निश्चित ही सफल होगा।
अगले साल SLV राकेट का शानदार लांच हुआ और मिशन पूर्ण रूप से सफल। भारत ने मजबूती से अंतरिक्ष में झंडा फहरा दिया था।
इस सफलता पर श्री धवन ने कलाम को बधाई दी और कहा कलाम प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाओ, और तुम प्रेस को ब्रीफ करो कि मिशन कैसे सफल हुआ
ऐसे होते हैं महान व्यक्तित्व और उनका नेतृत्व
जब असफलता मिलती है तो उसे अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं और जब सफलता मिलती है तो अपनी टीम में बांट देते हैं
ऐसे ही महान व्यक्ति सफल नायक के जन्मशती पर बहुत बहुत बधाइयां
25 Sept 1920 - 3 Jan 2002
20/09/2020
सब इंजीनियर ही बन जाएंगे तो ठेकेदारी कौन करब
32 वर्षो बाद एक बार फिर से
निकल जाती है पूरी जिन्दगी , 2 वक़्त की रोटी, एक आशियाना और समाज में थोड़ी सी पहचान बनाने में
और ये सब करने में हम भूल जाते हैं बहुत से प्यारे लम्हों को, बहुत से प्यारे दोस्तों को जिन्होंने कभी न कभी आपकी बहुत मदद की होती है। ऐसा ही एक मेरा मित्र था दुबे , दुबे कन्नौज का था, कोई पारिवारिक झगड़ा हो गया था पुलिस केस बन गया था तो उसके माता पिता ने उसे इन सब झगड़ो से दूर करने के लिये आगरा भेज दिया था कि दूर जाओ और इंजीनियरिंग की तैयारी करो। दूसरी तरफ कॉलेज में मिले अपमान से मैं भी तिलमिला रहा था और पूरे जुनून के साथ इंजीनियरिंग के एग्जाम की तैयारी में जुटा था , उसी दौरान मुझे आगरा में रहने के लिये कोई जगह नहीं मिल रही थी , उस समय दुबे ने मुझे सहारा दिया और अपने कमरे में ही रहने दिया । फ्री टाइम में अक्सर गप्पे हुआ करती थी और इस प्रश्न पर कि अगर इंजीनियरिंग में सिलेक्शन नहीं हुआ तो क्या करोगे, दुबे का सीधा सा उत्तर हुआ करता था , सब इंजीनियर ही बन जाएंगे तो ठेकेदारी कौन करेगा 😁
दुबे भाई कहाँ हो तुम जल्दी से संपर्क करो , माना कि 32 साल बाद तुमको ढूंढ रहा हूँ पर कोई नहीं अब मैंने भी ठान लिया है तेरे को ढूंढ के ही मानूँगा
दुबे अपने को कन्नौज का बताया करता था, आप सब मेरी हेल्प करो उसे ढूढ़ने में