Dharmamrit

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Welcome to Dharmamrit, we are dedicated to share various concept from Ramayana, Mahabharata, Geeta,

30/11/2025

रावण से भी ज्यादा शक्तिशाली था कंस, सवालाख किलो का उठा लिया था धनुष!

रावण को मारने के लिए श्री राम को कई दिन युद्ध करना पड़ा था इस दौरान दो बार राम जी तो 4 बार लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे। करोडो वानरों की भी मृत्यु हो गई थी (हालाँकि उन्हें इंद्र ने पुनः जीवन दान दे दिया था) तब जाकर कंही अंत में रावण का वध हुआ था।

इसपे हनुमान जी और वानरों में भी कई वीरो की सहायता से ही रावण की सेना का संघार हुआ था। भले ही बड़े बड़े राक्षस राम लखन ने मारे थे लेकिन वानर वीरो ने भी कई राक्षस मारे थे।

इन सब को देखते हुए अगर आपको लगता है की कंस तो बड़ा कमजोर था। भगवान कृष्ण जब ग्यारह साल के थे तभी उसे आसानी से मार दिया था तो आप गलत है!

तब पर श्री कृष्णा हो या महाभारत सभी में कृष्ण लीला तो दिखाई है। लेकिन कंस का पराक्रम बहुत कम ही दिखाया गया है। श्री कृष्ण के राज पुरोहित गर्गाचार्य ने जो गर्ग संहिता लिखी है उसमे उन्होंने कंस के बल का वर्णन किया है जिसे जान आप भी कहेंगे की वो रावण से ज्यादा बलशाली था।

जाने उसका बल… वत्सासुर, पूतना, तृणावर्त, अघासुर, बकासुर (पूतना का भाई). अरिष्ठासुर, केशी, व्योमासुर, शकटासुर इन सभी असुरो को भगवान् कृष्ण ने बचपन में ही मार दिया था। लेकिन आप जानकार चौंक जायेंगे की इस सभी को कंस ने अपनी दिग्गविजय यात्रा में परास्त कर अपना गुलाम बना लिया था, तभी प्राण दान दिया इनको नहीं तो ये उसके हाथो भी मारे जाते।

जरासंध का हाथी कुवलयापीड़ जिसमे 1000 हाथियों का बल था जरासंध की दिग्गविजय के समय उसके साथ था, मथुरा नगरी के पास जब उसने शिविर लगाया तो वो हाथी कंस की नगरी में घुस गया। कंस तब मल्ल युद्ध में व्यस्त था तब कंस निहत्था ही उस हाथी से भीड़ गया और उसे उठाकर जरासंध के शिविर में फेंक दिया।

हाथी फिर भी मरा नहीं लेकिन ये पराक्रम देख उसने अपनी दो बेटियों कंस से ब्याहकर उससे संधि कर ली।

परशुराम जी से भी टकरा गया था कंस जाने पूरी कथा….

कंस ने अपने काका देवक की बेटी देवकी के विवाह के पूर्व ही दिग्गविजय की यात्रा शुरू की थी जिस दौरान उसने सभी उपलब्धिया हासिल की थी। इसी दौरान वो महेंद्र पर्वत (वर्तमान ओडिशा में) पहुंचा और उस पर्वत पर परशुराम जी तपस्या कर रहे है, ये जान उसे महेंद्र पर्वत को वैसे ही उठा लिया जैसे रावण ने हिमालय उठा लिया था।

तब परशुराम जी कुपित हो गए तो कंस ने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति की और कहा में क्षत्रिय नहीं हूं। तब भी परशुराम का क्रोध शांत नहीं हुआ और उसे भगवान् विष्णु का धनुष दिखाते हुए कहा की ये 120000 किलो का है अगर तुमने उसे उठा लिया तो में तुम्हे माफ़ कर ये धनुष भी तुम्हे दे दूंगा।

कंस ने सहसा उस धनुष को उठा लिया और उसकी प्रत्यंचा भी कर डाली तो परशुराम जी प्रसन्न हुए और उसे वो धनुष दे दिया, साथ ही ये भी कहा की जो ये धनुष तोड़ेगा वो ही तुम्हारा अंत करने में सक्षम होगा।

चाणूर और मुष्टिक कौन थे कैसे बने कंस के सेवक जाने????

कंस मल्ल युद्ध का बड़ा शौकीन था, उसके बराबर मथुरा में कोई पहलवान भी नहीं था, एक दिन उसे पता चला की पड़ौसी देश के राजा जो की पांच भाई थे वो सभी मल्ल्युद्ध में पारंगत थे। कंस उनके राज्य में गया और उन्हें ललकारा और कहा की अगर तुम जीते तो में तुम्हारा सेवक और में जीता तो तुम मेरे सेवक।

तब कंस ने एक एक कर के पांचो भाइयो को मल्ल युद्ध में हरा दिया और उनमे से मुष्टिक और चाणूर को अपने साथ मथुरा ले आया जिनसे बाद में उसने कृष्ण बलराम को मरवाना चाहा था। लेकिन कृष्ण बलराम जब मथुरा आये तो उन्होंने विष्णु धनुष भी तोडा जरासंध के उस हाथी को भी मारा और अंत में इन दो पहलवानो के बाद कंस को भी,जैसे तैराक पानी में ही डूबता है वैसे कंस को भी उसके पसंदीदा मल्ल युद्ध में ही परास्त कर कृष्ण ने उसका संघार किया।

20/11/2025

नंदी बैल को क्यों शिव मंदिर के सामने विराजित किया जाता है ?

शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और उन्हें भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा।
भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए। शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो गया। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है।

20/11/2025

👉 *प्रणाम का महत्व* 🏵️

*महाभारत का युद्ध चल रहा था -* *एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -* *"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"*
*उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -*
*भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|* *तब -*
*श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -*

*श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -*

*शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -*
*द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने* - *"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!*

*"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्रीकृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?*

*तब द्रोपदी ने कहा कि -* *"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -*

*भीष्म ने कहा -*

*"मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्रीकृष्ण ही कर सकते है"*

*शिविर से वापस लौटते समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -*
*"तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है "* -
*" अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती "* -
*......तात्पर्य्......*
*वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -*

*"जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है "*" यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो "**बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता -*
*"निवेदन 🙏🏻 सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।"*

*क्योंकि*:-

*प्रणाम प्रेम है।*
*प्रणाम अनुशासन है।*
*प्रणाम शीतलता है।*
*प्रणाम आदर सिखाता है।*
*प्रणाम से सुविचार आते है।*
*प्रणाम झुकना सिखाता है।*
*प्रणाम क्रोध मिटाता है।*
*प्रणाम आँसू धो देता है।*
*प्रणाम अहंकार मिटाता है।*
*प्रणाम हमारी संस्कृति है।

*सबको प्रणाम*..
🙏🏻🌺🙏🏻

20/11/2025

वृंदावन से मथुरा जाने के बाद कृष्ण फिर कभी वृंदावन वापस नहीं लौटे।
केवल दो बार वह राधा से मिले थे। एक कुरुक्षेत्र मे और दूसरी बार उस मूसल युद्ध के पहले की जिसमें शराब पीकर आपस में लड़ते हुए सभी यदुवंशी मर गये थे। प्रभास क्षेत्र यादवों का एक बहुत पवित्र स्थल था। ध्यान दीजिए कि विख्यात प्रथम शिवलिंग सोमनाथ प्रभास क्षेत्र में ही है। इस मंदिर का सुसज्जीकरण भी श्रीकृष्ण ने ही कराया था। इसके उत्तर में प्रभास का विस्तृतभू भाग है। इसी स्थान पर मैदान से थोड़ी दूर पर बहेलिये ने श्रीकृष्ण के पैर में बाण मारा था। यहां हर वर्ष एक पूजा समारोह होता था जिसमें यादव गणतंत्र के सभी लोग आबालवृद्ध भाग लेते थे। गोलोक जाने के पहले एक बार श्रीकृष्ण ने समस्त ब्रजवासियों को प्रभास तीर्थ में मिलने के लिए बुलाया था। वृंदावन से जाने के बाद राधा कृष्ण की यही दूसरी और अंतिम भेंट थी। रुक्मिणी भी आई थीं। इस पर सूरदास जी ने एक बहुत भावपूर्ण पद लिखा है.....

रुक्मणि राधा ऐसो भेंटी

बहुत दिनन की बिछुरी जइसे एक बाप की बेटी

इसका बाद राधा कृष्ण का आमना सामना हुआ। मिलते ही राधा ने कहो कृष्ण कैसे हो? कृष्ण हतप्रभ रह गए।अचकचाते हुए कहा क्या कहती हो राधा ?

मैं तुम्हारे लिए कृष्ण कब से हो गया?

मैं तो अब भी तुम्हारे लिए कान्हा ही हूं। राधा ने कहा नहीं कृष्ण अब तुम कान्हा नहीं रहे, बहुत बदल गये हो।

क्या बदलाव आ गया है मुझमें?

राधा- कोई एक हो तब न बताऊं। अगर तुम श्याम होते तो सुदामा के पास तुम जाते। सुदामा को तुम्हारे पास नहीं आना पड़ता।
तुम वनमाली थे। तुम्हारे गले में वनमाला शोभती थी। शायद तुम्हें नहीं मालूम हुआ होगा कि तुम्हारे लिए माला बनाने के लिए मैं और मेरी सखियां ललिता विशाखा अनुराधा कुसुम शैव्या आदि वृंदावन के सात वनों से फूल चुनती थीं। कितनी बार बाहों में खरोंच आई। ओढनियां फट जाती थी।घर पर मार पड़ती थी।पर जब तुम वही वनमाला पहन कर हंसते थे तो आत्मा तृप्त हो जाती थी। लगता था कि लोक परलोक दोनों बन गये। आज तुम्हारे गले की वह वनमाला कहां गई?

आज तुम्हारे गले में हीरे-जवाहरात जड़ित सोने की माला है। जिन हाथों में मुरली शोभायमान होती थी उन हाथों में सुदर्शन चक्र आ गया है। जब तुम मुरली बजाते थे तो मनुष्य क्या पशु पक्षी भी सुनने के लिए जुट जाते थे। आज उन्हीं हाथों से संहार कर रहे हो। लोग कहते हैं कि तुम भगवान हो और ऐसा तुमने भी गीता में कहा है...

मत्तम् परततरंनान्यत किंचिदस्ति धनंजय:
मयि सर्वमदिमश्रोतं सूत्रे मणिगणाइव।

पर मैंने तो तुम्हें ब्रह्म माना ही नहीं। तुम तो मेरे नंद के लाल मुरलीधर श्याम थे एक सामान्य ग्वाला। तुम्हारे इस रूप का तो पता ही नहीं था। तुमने ऊधौ को भेजा था हमें निर्गुण ज्ञान बताने के लिए। ऊधौ ने तो बताया ही होगा कि हमारा प्रेम क्या है और उनकी क्या गति।

कृष्ण सुनते रहे और तब कहा... लेकिन मैं तो तुम्हें अब भी याद करता हूं। तुम्हारी याद आती है तो आंखों आंसू निकलते हैं।

राधा- लेकिन मैं तो तुम्हें कभी याद नहीं करती। याद तो उसको किया जाता है जो कहीं दूर चला गया हो। तुम तो कभी मेरे हृदय से गये ही कहां थे जो याद करना पड़ता। रही मेरे न रोने की बात तो कान्हा मैं इस लिए नहीं रोई कि मेरी आंखों में बसे हुए तुम कहीं आंसुओं के साथ निकल न जाओ। भक्त का भाव देखकर भगवान विह्वल हो गए। बोले राधा तुम जीती मैं हारा।

राधा- याद रखना कृष्ण मेरे बिना अधूरे रहोगे। संसार में जहां भी तुम्हारी पूजा होगी मैं साथ रहूंगी। एक को छोड़कर (जगन्नाथ जी)। कोई ऐसा मंदिर नहीं होगा जहां मैं तुम्हारे साथ नहीं होऊंगी। हमेशा तुम्हारे नाम के पहले मेरा नाम लिया जाएगा ठीक उसी प्रकार जैसे पूर्व में प्रभु श्रीराम के पहले माँ सीता का नाम आया।

भगवान श्रीकृष्ण ने एवमस्तु कहा और एक अंतिम बात कही की राधा अब इस जीवन में मेरी तुम्हारी भेंट नहीं होगी पर मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ, जो भी इच्छा हो मांग लो। राधा ने कहा कन्हैया मुझे तो सब कुछ मिल चुका है और कुछ नहीं चाहिए। मेरा तुम्हारा प्यार अमर रहे। जब तक इस धराधाम पर एक भी प्राणी जीवित रहे मुझे तुम्हारे साथ याद करता रहे। परंतु कहते ही हो तो एक बार वही मुरली की तान एक बार और सुना दो।

भगवान भक्त की इस इच्छा को टाल न सके जबकि सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान कृष्ण इसके भयावह परिणाम को जानते थे। फिर भी उन्होंने बहुत दिनों से संजोकर रखी हुई बांसुरी निकाली और एक अद्भुत अविस्मरणीय तान छेड़ दिया। सारा संसार तरंगित हो उठा। यद्यपि कृष्ण ने अनेकों बार मुरली बजाया था पर यह तान विलक्षण थी, अद्भुत शांति थी और हृदय के तार को झंकृत करने वाली थी। ऐसी धुन न कभी बजी थी और न कभी बजेगी।
सुध-बुध खोकर राधा बंशी की धुन सुनती हुई कृष्ण में ही समा गई।

22/11/2024
22/09/2024

जीमुतवाहन व्रत

यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घ, आरोग्य और सुखमय जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन गन्धर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन की विशेष पूजा की जाती है। व्रत वाले दिन जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सुनना आवश्यक माना गया है। इससे व्रत का विशेष फल प्राप्त होता है।

गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन उदार और परोपकारी व्यक्ति थे। पिता के वन प्रस्थान के बाद उनको ही राजा बनाया गया, लेकिन उनका मन उसमें नहीं रमा। वे राज-पाट भाइयों को देकर अपने पिता के पास चले गए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम कन्या से हुई।

एक दिन वन में उनकी मुलाकात एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वृद्धा रो रही थी, वह काफी डरी हुई थी। जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर उसने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे।

वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है। इस पर जीमूतवाहन ने कहा कि तुम्हारे बेटे को कुछ नहीं होगा। वह स्वयं पक्षीराज गरुड़ का आहार बनेंगे। नियत समय पर जीमूतवाहन स्वयं पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए।

लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई।

पक्षीराज गरुड़ जीमूतवाहन के साहस, परोपकार और मदद करने की भावना से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया और कहा कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। इस तरह से जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा की। इस घटना के बाद से ही पुत्रों के दीर्घ और आरोग्य जीवन के लिए जीमूतवाहन की पूजा होने लगीजितिया व्रत कथा

नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी. उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था. नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी. उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी. दोनों पक्की सहेलियां थीं.

दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया. लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया.

सियारिन को अब भूख लगने लगी थी. मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया. पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया.

फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया. उनके पिता का नाम भास्कर था. चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया. शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई. सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया. उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई. अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई. भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए. पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे.

कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए. वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे. कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी. उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए. उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया.

यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया. इससे उनमें जान आ गई. सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए. जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए. दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी. जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी. वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी.

जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई. अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था. भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं. वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं.

कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई. जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया

26/06/2024

सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है। इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं। इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है। उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-

ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शाकल-शाखा और शांखायन शाखा।
यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- तैत्तिरीय-शाखा, मैत्रायणीय शाखा, कठ-शाखा और कपिष्ठल-शाखा
शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- माध्यन्दिनीय-शाखा और काण्व-शाखा।
सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- कौथुम-शाखा और जैमिनीय-शाखा।
अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शौनक-शाखा और पैप्पलाद-शाखा।
उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं।

26/06/2024

हम बचपन से ही एक बात सुनते आ रहे हैं कि...

हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है... और, जब वो (शेषनाग) थोड़ा सा हिलते है... तो, भूकंप आता है...!

और, हर चीज को वैज्ञानिक नजरिये से देखने वाले आज के बच्चे... हमारे धर्मग्रंथ की इस बात को हँसी में उड़ा देते हैं...
सार तत्त्व समझने की बात है।

दरअसल, हमारी "पृथ्वी और शेषनाग वाली बात" महाभारत में इस प्रकार उल्लेखित है...

"अधॊ महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम; सवयं तवैषा विवरं परदास्यति।
इमां धरां धारयता तवया हि मे; महत परियं शेषकृतं भविष्यति।।"

(महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक)
इसमें ही वर्णन मिलता है कि... शेषनाग को ब्रह्मा जी धरती को धारण करने को कहते हैं... और, क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लेते हैं।
लेकिन इसमे लिखा है कि... शेषनाग को... हमारी पृथ्वी को... धरती के "भीतर से" धारण करना है... न कि, खुद को बाहर वायुमंडल में स्थित करके पृथ्वी को अपने ऊपर धारण करना है।
इसमें शेषनाग की परिभाषा है:

[विराम प्रत्ययाभ्यास पूर्वः संस्कार शेषोअन्यः]

अर्थात... रुक रुक कर, विशेष अभ्यास, पूर्व के संस्कार [चरित्र /properties] हैं... तथा, शेष माइक्रो/सूक्ष्म लहर हैं।
परिभाषा के अनुसार... कुल नाग (दीर्घ तरंग) और सर्प (सूक्ष्म तरंग) की संख्या 1000 हैं।
जिसमें से... शेषनाग {सूक्ष्म /दीर्घ तरंग} या शेषनाग की कुण्डलिनी उर्जा की संख्या 976 हैं... तथा, 24 अन्य नाग या तरंग हैं।

आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार भी... यांत्रिक लक्षणों के आधार पर पृथ्वी को स्थलमण्डल, एस्थेनोस्फीयर, मध्यवर्ती मैंटल, बाह्य क्रोड और आतंरिक क्रोड में बांटा गया है।
एवं, रासायनिक संरचना के आधार पर भूपर्पटी, ऊपरी मैंटल, निचला मैंटल, बाह्य क्रोड और आतंरिक क्रोड में बाँटा जाता है।

समझने वाली बात यह है कि...
पृथ्वी के ऊपर का भाग... भूपर्पटी प्लेटों से बनी है... और, इसके नीचे मैन्टल होता है... जिसमें मैंटल के इस निचली सीमा पर दाब ~140 GPa पाया जाता है।
और, मैंटल में संवहनीय धाराएँ चलती हैं... जिनके कारण स्थलमण्डल की प्लेटों में गति होती है।
और, इन गतियों को रोकने के लिए एक बल काम करता है... जिसे, भूचुम्बकत्व कहते है।
इसी भूचुम्बकत्व की वजह से ही... टेक्टोनिक प्लेट जिनसे भूपर्पटी का निर्माण हुआ है... और, वो स्थिर रहती है... तथा, उसमें कहीं भी कोई गति नही होती।

हमारे शास्त्रों के अनुसार... शेषनाग के हजारो फन हैं...
अर्थात, भूचुम्बकत्व में हजारों मैग्नेटिक वेब्स है।
और... शेषनाग के शरीर अंत में एक हो जाते हैं... मतलब एक पूंछ है...
मतलब कि... भूचुम्बकत्व की उत्पत्ति का केंद्र एक ही है।
इसी तरह ये कहना कि... शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पे टिका रखा है का मतलब हुआ कि... भूचुम्बकत्व की वजह से ही पृथ्वी टिकी हुई है।

और, शास्त्रों का ये कहना कि...
शेषनाग के हिलने से भूकंप आता है से तात्पर्य है कि... भूचुम्बकत्व के बिगड़ने (हिलने) से भूकंप आता है।
ध्यान रहे कि... हमारे वैदिक ग्रंथो में इसी "भूचुम्बकत्व को ही शेषनाग कहा गया" है।

जानने लायक बात यह है कि... क्रोड का विस्तार मैंटल के नीचे है अर्थात 2890 किमी से लेकर पृथ्वी के केन्द्र तक।
किन्तु यह भी दो परतों में विभक्त है, बाह्य कोर और आतंरिक कोर।
जहाँ, बाह्य कोर तरल अवस्था में पाया जाता है... क्योंकि यह द्वितीयक भूकंपीय तरंगों (एस तरंगों) को सोख लेता है।
इसीलिए, हमारे धर्मग्रंथों का यह कहना कि... पृथ्वी शेषनाग के फन पे स्थित है... मात्र कल्पना नहीं बल्कि एक सत्य है कि... पृथ्वी शेषनाग (भू-चुम्बकत्व) की वजह से ही टिकी हुई है या शेषनाग के फन पे स्थित है... और, उनके हिलने से ही भूकंप आते हैं।A
अब चूंकि, इतने गूढ़ और वैज्ञानिक रहस्य सबको एक एक समझाना बेहद दुष्कर कार्य था... इसीलिए, पूर्वजों ने इसे एक कहानी के रूप में पिरो कर हमारे ग्रंथों में संरक्षित कर दिया...!

11/01/2024

🌹🌷🚩 जय सियाराम जय श्री हनुमान जी 🌹🌷🚩शुभ रात्रि विश्राम 🌹🌷🚩
।। वायु के प्रकार ।।

सुंदरकांड के २५वें दोहे में तुलसीदासजी ने, जब हनुमानजी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है-

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।

अर्थात, जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो- भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमानजी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।

इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर सुंदरकांड में दिये गए ४९ प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजने और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ।

तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की ७ शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में ७ प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

ये ७ प्रकार हैं- १.प्रवह, २.आवह, ३.उद्वह, ४. संवह, ५.विवह, ६.परिवह और ७.परावह।

१. प्रवह-
पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

२. आवह-
आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

३. उद्वह-
वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

४. संवह-
वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

५. विवह-
पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

६. परिवह-
वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

७. परावह-
वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

इन सातो वायु के सात सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलों की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह ७*७= ४९। कुल ४९ मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं। है ना अद्भुत ज्ञान।

हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं।

साभार ...............
🌹🌷🚩 जय सियाराम जय श्री हनुमान जी🌹🌷🚩 शुभ रात्रि विश्राम 🌹🌷🚩

21/12/2023

एक बार नारदजी ने ब्रह्मा जी से पूछा-परमात्मा का सगुण और निर्गुण स्वरूप कैसा है?
ब्रह्माजी बोले- निर्गुण तत्व दिखाई नहीं देता क्योंकी जो दिखता है वह नाशवान होता है। जो रूप रहित है वह दिखाई कैसे देगा। उसी प्रकार सगुण रूप का अनुभव मुनिजनों के द्वारा ज्ञान से किये जा सकते हैं। ये दोनो विश्वास से जाना जा सकता है अविश्वास से कभी नहीं।

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