Ujjval mishra

Ujjval mishra Advocate and legal advisor
Civil and criminal cases

गाजीपुर कोर्ट में एक सनसनीखेज मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा वाकया सामने आया जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया।जब जज ने आर...
12/06/2026

गाजीपुर कोर्ट में एक सनसनीखेज मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा वाकया सामने आया जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया।
जब जज ने आरोपी से सवाल किया कि “अगर तुम्हें छोड़ दिया जाए तो क्या करोगे?” — इस पर आरोपी ने बेखौफ जवाब दिया, “फिर से हत्या करूंगा।”
यह सुनते ही अदालत का माहौल सन्न हो गया। आरोपी के इस खतरनाक और निर्भीक रवैये को देखते हुए कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और उसे फांसी की सजा सुनाते हुए कहा — “इसे मरते दम तक लटकाया जाए।”
⚖️ यह फैसला न सिर्फ एक अपराधी को सजा देने का है, बल्कि समाज में कानून का डर और न्याय की ताकत को भी दर्शाता है।
ऐसे अपराधियों के लिए सख्त सजा ही समाज को सुरक्षित बना सकती है।

12/06/2026

'पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि पति ने 13 दिनों तक अपनी पत्नी से बात करने से इनकार किया, इसे किसी भी तरह से क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना आम बात है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है। इसके बाद जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत पति की सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की। कोर्ट ने उसका पासपोर्ट उसे वापस करने का आदेश भी दिया।

सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने कहा:

"इसलिए किसी ठोस सबूत के बिना मरने वाली पत्नी से तेरह दिनों तक बातचीत न करने को इस मामले के तथ्यों के आधार पर किसी भी तरह से क्रूरता के दायरे में नहीं रखा जा सकता। वैवाहिक जीवन में मतभेद होना स्वाभाविक है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है, लेकिन यह ऐसा मामला भी नहीं है, जहां अपीलकर्ता और मरने वाली पत्नी के बीच कोई झगड़ा हुआ हो, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया हो।"
इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा: "अभियोजन पक्ष ने व्हाट्सएप चैट के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि अपीलकर्ता ने मृतक महिला को कोई मैसेज नहीं भेजा, इसलिए कोई बातचीत नहीं हुई। हालांकि, हमारी राय में व्हाट्सएप पर मैसेज न भेजना ही काफी नहीं है, क्योंकि बातचीत सामान्य फ़ोन कॉल के ज़रिए भी हो सकती थी।" इसके अनुसार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया।

08/06/2026

RTI आवेदक को भर्ती परीक्षा की मेरिट लिस्ट और मार्क्स पाने का अधिकार, लेकिन सोशल मीडिया पर पब्लिश नहीं कर सकते: सिक्किम हाईकोर्ट

सिक्किम हाईकोर्ट ने सिक्किम पब्लिक सर्विस कमीशन (SPSC) को निर्देश दिया कि वह सिक्किम सर्विसेज़ (कंबाइंड रिक्रूटमेंट) परीक्षा, 2022 में शामिल हुए उम्मीदवारों की एक संयुक्त मेरिट लिस्ट और इंटरव्यू के मार्क्स उपलब्ध कराएं। कोर्ट ने RTI आवेदक से यह वचन भी लिया कि इस जानकारी को किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पब्लिश नहीं किया जाएगा। सूचना आयोग के जानकारी देने के आदेश का पालन करने की SPSC की सहमति को दर्ज करते हुए, जस्टिस मीनाक्षी मदन राय ने "राज्य जन सूचना अधिकारी को RTI आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि यदि आवेदक सोशल मीडिया पर जानकारी पब्लिश न करने के अपने वचन का उल्लंघन करता है तो 'आवश्यक कदम उठाए जाएंगे'।"

मामले की पृष्ठभूमि यह विवाद 18 फरवरी, 2025 को दायर RTI आवेदन से शुरू हुआ, जिसमें अकाउंट्स ऑफिसर, अंडर सेक्रेटरी और डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के पदों पर भर्ती के लिए सिक्किम सर्विसेज़ (कंबाइंड रिक्रूटमेंट) मेन्स परीक्षा, 2022 पास करने वाले उम्मीदवारों के बारे में जानकारी मांगी गई। आवेदक ने सफल उम्मीदवारों की सूची, उनके रोल नंबर और मार्क्स के साथ-साथ दिव्यांग (PWD) श्रेणी के उम्मीदवारों से संबंधित जानकारी भी मांगी थी।

केवल आंशिक जानकारी मिलने के बाद आवेदक ने SPSC के भीतर प्रथम अपीलीय प्राधिकरण से संपर्क किया। प्राधिकरण ने केवल उस उम्मीदवार के संबंध में जानकारी देने का निर्देश दिया जिसने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 11(1) के तहत सहमति दी थी, जबकि यह माना कि जिन उम्मीदवारों ने सहमति देने से इनकार कर दिया था, उनके मार्क्स अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत छूट के कारण उजागर नहीं किए जा सकते। इस फैसले से असंतुष्ट होकर आवेदक ने सिक्किम सूचना आयोग के समक्ष दूसरी अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक परीक्षा से संबंधित जानकारी किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन नहीं करती है और RTI Act की धारा 8 या 9 में शामिल छूटों द्वारा संरक्षित नहीं है।

हुक्का बार चलाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं, यह गतिविधि 'रेस एक्स्ट्रा कमर्शियम' के दायरे में आती है: इलाहाबाद हाईकोर्टइला...
27/05/2026

हुक्का बार चलाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं, यह गतिविधि 'रेस एक्स्ट्रा कमर्शियम' के दायरे में आती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि नागरिकों के पास हुक्का बार चलाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, क्योंकि ऐसी गतिविधियां 'रेस एक्स्ट्रा कमर्शियम' (वाणिज्य से बाहर/परे की चीज़ें) के कानूनी सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं। यह टिप्पणी जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की डिवीज़न बेंच ने एम्पेरियो ग्रैंड प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह कंपनी लखनऊ में होटल और रेस्टोरेंट का कारोबार करती है।

24/05/2026

सार्वजनिक जगह पर अपमान साबित हुए बिना केवल जातिसूचक शब्द बोलना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि केवल जातिसूचक शब्द बोल देना या सामान्य गाली-गलौज करना, यदि वह सार्वजनिक दृष्टि में न हो तो अपने आप SC/ST Act के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 27 सितंबर 2023 को विशेष जज, SC/ST Act, सारण, छपरा द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

23/05/2026

गंगा इफ्तार | हिंदू समुदाय से माफ़ी मांगने और 'माँ गंगा' का जीवन भर सम्मान करने के वादा पर मिली आरोपियों को जमानत

जस्टिस राजीव लोचन की बेंच ने कहा कि आरोपियों ने कोर्ट में बिना शर्त माफ़ी मांगकर "सच्चा पछतावा" दिखाया। इसी बेंच ने पहले एक अलग आदेश के ज़रिए 5 अन्य सह-आरोपियों को भी राहत दी थी।

सिंगल जज ने उन्हें राहत देते हुए यह टिप्पणी की, "ऊपर दिए गए पैराग्राफ़ में कही गई बातें, साथ ही आवेदकों के वकील की दलीलें, आवेदकों पर लगाए गए आरोपों के लिए उनके सच्चे पछतावे को दिखाती हैं... सप्लीमेंट्री हलफ़नामे में जो माफ़ीनामा है और वकीलों की जो दलीलें हैं, कोर्ट की राय में, वे दिल से निकली हुई लगती हैं।"

22/05/2026

सीजेआई सूर्यकांत साहब की सफाई के बाद काकरोज में भारी गिरावट आई है
क्योंकि परजीवी बुद्धिजीवी में परिवर्तित हो गए हैं।

18/05/2026

वाराणसी इफ्तार विवाद | 'गंगा में मांसाहारी भोजन के अवशेष फेंकने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं': इलाहाबाद हाईकोर्ट

बेंच ने कहा, "यह मामला मुस्लिम समुदाय के सदस्यों से जुड़ा है, जो रोज़ा इफ्तार पार्टी कर रहे थे। इस इफ्तार पार्टी के दौरान, भोजन करते समय मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा मांसाहारी भोजन किए जाने की बात कही गई। फिर उन पर आरोप है कि उन्होंने बचा हुआ भोजन गंगा नदी में फेंक दिया। कोर्ट की निष्पक्ष राय में इस तथ्य को सही तौर पर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कहा जा सकता है।"

कोर्ट ने टिप्पणी की, "ज़मानत अर्ज़ी के समर्थन में कोर्ट में जो हलफ़नामे दायर किए गए हैं, साथ ही आवेदकों के वकील की दलीलें भी आवेदकों पर लगाए गए आरोपों के प्रति सच्ची पछतावे को दर्शाती हैं।"

16/05/2026

'होस्टाइल गवाह की गवाही का इस्तेमाल बरी करने के लिए भी किया जा सकता है, सिर्फ़ दोषी ठहराने के लिए नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा रद्द की

Cause Title: TALARI NARESH VERSUS THE STATE OF TELANGANA

पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: ...
15/05/2026

पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने टिप्पणी की, "एक बार जब कोर्ट संज्ञान ले लेता है और समन जारी कर देता है तो आरोपी को बस इतना करना होता है कि वह उस कोर्ट के सामने पेश हो और कार्यवाही में शामिल हो। आरोपी को सेशंस कोर्ट या हाईकोर्ट (जैसा भी मामला हो) में जाकर अग्रिम ज़मानत की गुहार क्यों लगानी चाहिए? शिकायत वाले मामले में आरोपी को गिरफ्तार करने की पुलिस के पास कोई शक्ति नहीं होती, जब तक कि उस कोर्ट द्वारा समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो।"

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