वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

Share

Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र, Education, Karmakanda Prasiksana Kendra, Varanasi.

संस्थापकः त्रिस्कन्धज्योतिर्विद् दीपक चन्द्र भट्टः

उद्देश्य- प्राचीन भारतीय विद्या कला की विभिन्न धाराओं का प्रशिक्षण अनुसंधान एवं प्रयोग ।

सम्पर्क सूत्र-8765421583

13/06/2026
13/06/2026

'षड् दर्शन शास्त्र' संक्षिप्त-परिचय 👉

हिन्दू समाज ने 'चार-वेदों' के साथ ही 'छ:शास्त्रों' का नाम भी कई बार सुना है । लेकिन हमारा सामान्य हिन्दू-समाज इनसे अन्जान ही है । तो 'विद्वत्समाज' का यह दायित्व बनता है कि 'हिन्दू-समाज' अपने धर्मशास्त्रों को ठीक से जाने और उनके ज्ञान के आधार पर,परमात्मा की सत्ता का अनुभव करके,उसको प्राप्त करे ।

इन छ:शास्त्रों को वेदों का सहकारी 'षड्-दर्शन' अथवा 'दर्शन-शास्त्र' भी कहा जाता है । हमारे ऋषियों ने वेदों में यत्र-तत्र बिखरे,भगवत्प्राप्ति करानेवाले सूत्रों को समेटकर,जिज्ञासु-साधकों के हितार्थ,इन 'छ:दर्शनशास्त्रों' को प्रकट किया है, जिनके आधार पर हम 'वेदवाणी' को ठीक-ठीक समझकर श्रीभगवान् को प्राप्त सकते हैं ।

ये षड्-दर्शन 'आस्तिक-वैदिक-दर्शन' भी कहलाते हैं । ये हमारे 'तर्कशास्त्र' व 'श्रद्धाशास्त्र' भी हैं,जिन्हें पढ़कर-समझकर,मनुष्य की बुद्धि विकसित होती है और वह सांसारिक-वासनाओं से भ्रमित न होकर धर्म,अधर्म,सत्य,असत्य आदि विषयों को समझते हुए कभी भ्रान्त नहीं होता और अपनी 'साधना' से परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है ।

इन दर्शन-शास्त्रों को पढ़कर,जिज्ञासु की सभी शंकाओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है । इन षड्-दर्शनों का 'संक्षिप्त-परिचय' इस प्रकार है।

:१: न्यायशास्त्र :---
इसके रचयिता 'महर्षि गौतम' हैं । इस शास्त्र का मुख्य विषय-'तर्क' है । जो अपनी 'लौकिक-वैदिक' प्रबल 'युक्तियों' के आधार पर,'ब्रह्म सत्यं' इस सिद्धान्त को 'प्रतिष्ठित' करता है । जिससे साधक अपने आस-पास फैले हुए संसार में से 'सत्य-स्वरूप-ब्रह्म' और असत्यरूप 'मायिक-संसार' को छाँटकर,अलग करके,सत्य-परमात्मा को प्राप्त कर लेता है । 'न्याय-दर्शन' की रचना का यही उद्देश्य है ।

:२: वैशेषिकशास्त्र :---
इसकी रचना महर्षि 'कणाद' ने की है । इस शास्त्र का प्रधान-विषय- 'प्राकृत-पदार्थों' का 'ईश्वरोपयोगी विशेष-ज्ञान' प्राप्त करना है ।'
सृष्टि में उत्पन्न प्राणियों के उपयोग के लिये ईश्वर ने संसार में जिन-जिन पदार्थों का निर्माण किया है,उनके 'विशिष्ट-गुण-दोष व परिणामों' का विचार करके,कैसे उन्हें ईश्वरोपयोगी' बनाते हुए साधक,ईश्वर को पा सकता है । ये ही इस शास्त्र का विषय है ।

:३: सांख्यशास्त्र :---
इसके रचनाकार 'भगवान्-श्रीकपिल' हैं । इसका मुख्य-विषय-
'जिज्ञासुओं को प्रकृति के '२४ लौकिक-तत्वों' की संख्या व एकमात्र अलौकिक 'पुरुषतत्व' (ब्रह्मतत्व) का परिज्ञान कराना है ।'
प्रकृति के सबसे 'सूक्ष्म-कणों' से कैसे 'सृष्टि की उत्पत्ति' होती है ? कैसे सभी पदार्थों में प्राकृतिक-समानता होते हुए भी,कुछ विशेषता है ? यह समझाते हुए,ये शास्त्र पूर्णरूप से प्रकृति और आत्मा में भेद बतलाकर,ईश्वर की प्राप्ति कराता है ।

:४: योगशास्त्र :---
इसके रचनाकार हैं 'महर्षि पतंजलि' । 'योग' का मुख्य-अर्थ है 'परमात्मा से जोड़ देना ।'

इस साधन-पद्धति में 'अष्ट-साधन-सोपानों' १-यम,२-नियम,३-आसन,४-प्राणायाम,५-प्रत्याहार,६-ध्यान,७-धारणा, और ८-समाधि का क्रमश: आश्रय करते हुए,साधक सभी दुखों से रहित होकर,'ब्रह्मसुख' की अनुभूति करते हुए,'मोक्ष' (ब्रह्म में लय) प्राप्त करता है ।

:५: मीमांसा :---
इसकी रचना 'महर्षि जैमिनि' ने की है । इसका प्रमुख-विषय है- 'वैदिक-कर्मकांड' और उसकी मर्यादाओं का पालन करने से साधक-मनुष्य,भौतिक-सुख के साथ-साथ अपने जीवन के परम-लक्ष्य 'मोक्ष' (ब्रह्म में लय) को पा सकता है,इसका परिज्ञान कराना है ।'

:६: वेदान्तशास्त्र (ब्रह्मसूत्र) :---
इसकी रचना 'श्रीकृष्ण-द्वैपायन भगवान् श्रीवेदव्यासजी' ने की है । इसका मुख्य विषय है-
'ईश्वर के अलौकिक-स्वरूप और उसके अलौकिक-गुणों का वर्णन करना ।' जिन्हें जानकर साधक-मनुष्य, भगवद्विषयक सभी शंकाओं से निवृत्त होकर,उनकी उपासना में लगे और उनका भजन करते हुए, मोक्ष प्राप्त करे ।
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

30/05/2026

सुभाषित का अभ्यास करते हुए गुरुकुल के छात्रगण

गते शोको न कर्तव्यो" एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का पहला हिस्सा है। इसका अर्थ और भाव जीवन में सकारात्मकता और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए बेहद प्रेरणादायक है।

इस श्लोक का पूरा चरण और उसका अर्थ निम्नलिखित है।

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः॥

अर्थ - गते शोको न कर्तव्यो: बीते हुए समय (अतीत) का शोक या पछतावा नहीं करना चाहिए।

भविष्यं नैव चिन्तयेत् - भविष्य की चिंताओं में नहीं डूबना चाहिए।

वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः- जो बुद्धिमान (विचक्षण) लोग होते हैं, वे हमेशा वर्तमान में जीते हैं और अपना कर्म करते है।

व्यावहारिक संदेश:यह श्लोक हमें सिखाता है कि अतीत में हुई गलतियों पर दुखी होने या कल क्या होगा, यह सोचकर वर्तमान को खराब करने से कुछ हासिल नहीं होता। सच्चा ज्ञान और बुद्धिमानी इसी में है कि हम आज (वर्तमान) में पूरी ऊर्जा के साथ कार्य क�

Photos from वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र's post 27/05/2026

द्वादश भावों में भिन्न भिन्न राशियों के फल

26/05/2026

संस्कृत संभाषण का अभ्यास करते हुए गुरुकुल के छात्रगण
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र

26/05/2026

संस्कृत संभाषण का अभ्यास करते हुए गुरुकुल के छात्रगण
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र #गुरुकुल

25/05/2026

संस्कृत संभाषण का अभ्यास करते हुए छात्रगण
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र

24/05/2026

हाथ के पर्वतों की स्थिति
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र

24/05/2026

संस्कृत संभाषण का अभ्यास करते हुए गुरुकुल के छात्र
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र
#गुरुकुल

24/05/2026

गुरुकुल के छात्रों द्वारा संस्कृत संभाषण का अभ्यास
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र
087654 21583
#वेदादि_ज्योतिष_कर्मकाण्ड_शिक्षण_प्रशिक्षण_केंद्र

Want your school to be the top-listed School/college in Varanasi?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Telephone

Website

Address


Karmakanda Prasiksana Kendra
Varanasi
221005