वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

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वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र, Education, Karmakanda Prasiksana Kendra, Varanasi.

संस्थापकः त्रिस्कन्धज्योतिर्विद् दीपक चन्द्र भट्टः

उद्देश्य- प्राचीन भारतीय विद्या कला की विभिन्न धाराओं का प्रशिक्षण अनुसंधान एवं प्रयोग ।

सम्पर्क सूत्र-8765421583

20/09/2026

देशान्तर से स्थानीय समय निकालने का नियम-

नियम - मानक देशान्तर और जन्मस्थान के देशान्तर का अंतर निकालें। प्रत्येक 1° के अंतर के लिए 4 मिनट तथा प्रत्येक 1′ (कला) के लिए 4 सेकंड का समय अंतर मानें।

जन्मस्थान मानक देशान्तर से पूर्व में हो → समय जोड़ें।

जन्मस्थान मानक देशान्तर से पश्चिम में हो → समय घटाएँ।
सूत्र - देशान्तर का अंतर × 4 = समय का अंतर

1. पूर्व का उदाहरण — पटना
पटना = 85°13′
मानक देशान्तर = 82°30′
85°13′
- 82°30′
---------
2°43′
2°43′ × 4 = 10 मिनट 52 सेकंड
पटना मानक देशान्तर से पूर्व में है, इसलिए समय जोड़ेंगे।
यदि मानक समय 10:00:00 है:
10:00:00 + 00:10:52 = 10:10:52
अतः पटना का स्थानीय समय = 10:10:52

2. पश्चिम का उदाहरण — अंबाला
अंबाला = 76°52′
मानक देशान्तर = 82°30′
82°30′
- 76°52′
---------
5°38′
5°38′ × 4 = 22 मिनट 32 सेकंड
अंबाला मानक देशान्तर से पश्चिम में है, इसलिए समय घटाएँगे।
यदि मानक समय 8:24:00 है:
8:24:00 − 00:22:32 = 8:01:28
अतः अंबाला का स्थानीय समय = 8:01:28
याद रखने का सबसे सरल सूत्र
पूर्व = जोड़
पश्चिम = घटाव
1° = 4 मिनट
1′ = 4 सेकंड

वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

19/09/2026

शीघ्र ही सप्तवर्गीय जन्मकुण्डली निर्माण की कक्षा प्रारंभ हो रही है। (WhatsApp ग्रुप ज्वाइन करें।)👇👇

श्राद्धपक्ष के लिए विशेष(संकलित)❗जय महादेव❗ ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्...
18/09/2026

श्राद्धपक्ष के लिए विशेष
(संकलित)
❗जय महादेव❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

॥ श्री गणेशनारायण भगवान् की आठ गायत्री ॥१. श्रीकृष्ण यजुर्वेद में"तत्कराटाय विद्महे, हस्तिमुखाय धीमहि।तन्नो दन्ती प्रचोद...
17/09/2026

॥ श्री गणेशनारायण भगवान् की आठ गायत्री ॥

१. श्रीकृष्ण यजुर्वेद में

"तत्कराटाय विद्महे, हस्तिमुखाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥"

२. तैत्तिरीय आरण्यक एवं श्रीलिङ्गपुराण में

"तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥"

३. श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष में

"एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥"

४. श्रीअग्निपुराण में

"लम्बोदराय विद्महे, महोदराय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥"

५. श्रीअग्निपुराण में

"महोल्काय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥"

६. श्रीगरुडपुराण में

"महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥"

७. श्रीभविष्यपुराण में

"महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥"

८. श्रीभविष्यपुराण में ही

"महागणपतये विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥"

The worship of God's grace and the whole process.Har Har Mahadev विश्वकर्मा भगवान की पूजा पद्धति एवं संपूर्ण यज्ञ विधि ह...
17/09/2026

The worship of God's grace and the whole process.
Har Har Mahadev
विश्वकर्मा भगवान की पूजा पद्धति एवं संपूर्ण यज्ञ विधि
हर हर महादेव 🙏 वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

पुण्याहवाचन प्रयोग के कक्षा के कुछ नोट्सवेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र
16/09/2026

पुण्याहवाचन प्रयोग के कक्षा के कुछ नोट्स
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

15/09/2026

🙏 तर्पण एवं श्राद्ध — पितृऋण से मुक्ति का सनातन मार्ग 🙏

सनातन धर्म में तर्पण और श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अपने पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और उत्तरदायित्व प्रकट करने की महान परंपरा है।

जिस प्रकार देवताओं के लिए पूजा और ऋषियों के लिए सम्मान का विधान है, उसी प्रकार पितरों के लिए तर्पण, पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान बताया गया है।

🌿 तर्पण का अर्थ है—श्रद्धापूर्वक जल आदि के द्वारा पितरों को तृप्ति प्रदान करना।

🪔 श्राद्ध का मूल भाव है—श्रद्धा से किया गया कर्म। इसमें केवल विधि का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, उचित संकल्प, पात्रता, काल, दिशा और विधि का ज्ञान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

📖 शास्त्रों में पितृकर्म का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। देवतर्पण, ऋषितर्पण, दिव्य पितृतर्पण, यमतर्पण, मनुष्यतर्पण तथा स्वकीय पितरों के तर्पण आदि विभिन्न विधियों के माध्यम से इस परंपरा की व्यापकता को समझा जा सकता है।

✨ पितरों का स्मरण केवल पितृपक्ष तक सीमित नहीं है। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि तथा पार्वण आदि विभिन्न अवसरों पर श्राद्ध एवं तर्पण के विधान बताए गए हैं।

🙏 आइए, पितृकर्म को केवल परंपरा के रूप में न करके शास्त्रसम्मत विधि, मंत्रों के अर्थ और उसके पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य को समझें और आने वाली पीढ़ी तक इस ज्ञान को पहुँचाएँ।

॥ श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम् ॥

🔱 तर्पण सीखें — विधि समझें — मंत्रों का अर्थ जानें — पितृपरंपरा को सुरक्षित रखें।

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15/09/2026

🌿 ॥ तर्पण विधि — शास्त्रीय परम्परा को सरल रूप में समझें ॥ 🌿

तर्पण केवल जल अर्पित करने का नाम नहीं है।
इसके पीछे शास्त्रसम्मत विधि, उचित क्रम, सम्बन्ध, मन्त्र, कुश, तिल, यज्ञोपवीत की स्थिति और अञ्जलि की संख्या—इन सभी का विशेष महत्त्व है।

इस विषय के अध्ययन में हमने तर्पण की व्यवस्था को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास किया है—

🔸 देवतर्पण — देवताओं का तर्पण किस प्रकार और किस स्थिति में किया जाता है।
🔸 ऋषितर्पण — ऋषियों एवं आचार्य परम्परा का तर्पण।
🔸 सनकादि तर्पण — सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार आदि का विशेष विचार।
🔸 मनुष्यतर्पण — मनुष्यतर्पण में निवीत अर्थात् कंठी की व्यवस्था।
🔸 पितृतर्पण — पितरों के तर्पण का क्रम एवं प्राचीनावीती/अपसव्य की व्यवस्था।
🔸 यमादि तर्पण — यम आदि के तर्पण का विधान।
🔸 अञ्जलि विचार — देव, सनकादि एवं पितरों को कितनी अञ्जलि दी जाए।
🔸 कुश का प्रयोग — देव, मनुष्य और पितृ तर्पण में कुश के अग्र, मध्य और मूल का विचार।
🔸 तिल का महत्त्व — तिलमिश्रित तर्पण कब करना चाहिए और किन परिस्थितियों में निषेध है।
🔸 पात्र एवं स्थान — तर्पण के लिए पात्र, शुद्ध स्थान और जल का विचार।
🔸 तीर्थ एवं विशेष अवसर — तीर्थ, विशेष तिथि, गंगा तथा प्रेतपक्ष में तिलमिश्रित तर्पण का विशेष विधान।
🔸 पितृ-सम्बन्ध एवं गोत्र — तर्पण में सम्बन्ध, नाम और गोत्र का महत्त्व।

🙏 तर्पण का मूल भाव है—श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए तृप्ति की भावना से जल अर्पित करना।

🌿 तर्पण = श्रद्धा + स्मरण + शुद्धता + सम्बन्ध + शास्त्रीय विधि

यह विषय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और कर्मकाण्ड-अध्येताओं के लिए उपयोगी है, जो तर्पण की केवल सामान्य विधि नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे शास्त्रीय नियम और सूक्ष्म विधान को समझना चाहते हैं।

📖 अध्ययन करें • समझें • शास्त्रीय विधि से आचरण करें

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15/09/2026

🌿 ॥ तर्पण विधि — शास्त्रीय परम्परा को सरल रूप में समझें ॥ 🌿

तर्पण केवल जल अर्पित करने का नाम नहीं है।
इसके पीछे शास्त्रसम्मत विधि, उचित क्रम, सम्बन्ध, मन्त्र, कुश, तिल, यज्ञोपवीत की स्थिति और अञ्जलि की संख्या—इन सभी का विशेष महत्त्व है।

इस विषय के अध्ययन में हमने तर्पण की व्यवस्था को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास किया है—

🔸 देवतर्पण — देवताओं का तर्पण किस प्रकार और किस स्थिति में किया जाता है।
🔸 ऋषितर्पण — ऋषियों एवं आचार्य परम्परा का तर्पण।
🔸 सनकादि तर्पण — सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार आदि का विशेष विचार।
🔸 मनुष्यतर्पण — मनुष्यतर्पण में निवीत अर्थात् कंठी की व्यवस्था।
🔸 पितृतर्पण — पितरों के तर्पण का क्रम एवं प्राचीनावीती/अपसव्य की व्यवस्था।
🔸 यमादि तर्पण — यम आदि के तर्पण का विधान।
🔸 अञ्जलि विचार — देव, सनकादि एवं पितरों को कितनी अञ्जलि दी जाए।
🔸 कुश का प्रयोग — देव, मनुष्य और पितृ तर्पण में कुश के अग्र, मध्य और मूल का विचार।
🔸 तिल का महत्त्व — तिलमिश्रित तर्पण कब करना चाहिए और किन परिस्थितियों में निषेध है।
🔸 पात्र एवं स्थान — तर्पण के लिए पात्र, शुद्ध स्थान और जल का विचार।
🔸 तीर्थ एवं विशेष अवसर — तीर्थ, विशेष तिथि, गंगा तथा प्रेतपक्ष में तिलमिश्रित तर्पण का विशेष विधान।
🔸 पितृ-सम्बन्ध एवं गोत्र — तर्पण में सम्बन्ध, नाम और गोत्र का महत्त्व।

🙏 तर्पण का मूल भाव है—श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए तृप्ति की भावना से जल अर्पित करना।

🌿 तर्पण = श्रद्धा + स्मरण + शुद्धता + सम्बन्ध + शास्त्रीय विधि

यह विषय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और कर्मकाण्ड-अध्येताओं के लिए उपयोगी है, जो तर्पण की केवल सामान्य विधि नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे शास्त्रीय नियम और सूक्ष्म विधान को समझना चाहते हैं।

📖 अध्ययन करें • समझें • शास्त्रीय विधि से आचरण करें

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🌿 ॥ तर्पण विधि — शास्त्रीय परम्परा को सरल रूप में समझें ॥ 🌿तर्पण केवल जल अर्पित करने का नाम नहीं है।इसके पीछे शास्त्रसम्...
15/09/2026

🌿 ॥ तर्पण विधि — शास्त्रीय परम्परा को सरल रूप में समझें ॥ 🌿

तर्पण केवल जल अर्पित करने का नाम नहीं है।
इसके पीछे शास्त्रसम्मत विधि, उचित क्रम, सम्बन्ध, मन्त्र, कुश, तिल, यज्ञोपवीत की स्थिति और अञ्जलि की संख्या—इन सभी का विशेष महत्त्व है।

इस विषय के अध्ययन में हमने तर्पण की व्यवस्था को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास किया है—

🔸 देवतर्पण — देवताओं का तर्पण किस प्रकार और किस स्थिति में किया जाता है।
🔸 ऋषितर्पण — ऋषियों एवं आचार्य परम्परा का तर्पण।
🔸 सनकादि तर्पण — सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार आदि का विशेष विचार।
🔸 मनुष्यतर्पण — मनुष्यतर्पण में निवीत अर्थात् कंठी की व्यवस्था।
🔸 पितृतर्पण — पितरों के तर्पण का क्रम एवं प्राचीनावीती/अपसव्य की व्यवस्था।
🔸 यमादि तर्पण — यम आदि के तर्पण का विधान।
🔸 अञ्जलि विचार — देव, सनकादि एवं पितरों को कितनी अञ्जलि दी जाए।
🔸 कुश का प्रयोग — देव, मनुष्य और पितृ तर्पण में कुश के अग्र, मध्य और मूल का विचार।
🔸 तिल का महत्त्व — तिलमिश्रित तर्पण कब करना चाहिए और किन परिस्थितियों में निषेध है।
🔸 पात्र एवं स्थान — तर्पण के लिए पात्र, शुद्ध स्थान और जल का विचार।
🔸 तीर्थ एवं विशेष अवसर — तीर्थ, विशेष तिथि, गंगा तथा प्रेतपक्ष में तिलमिश्रित तर्पण का विशेष विधान।
🔸 पितृ-सम्बन्ध एवं गोत्र — तर्पण में सम्बन्ध, नाम और गोत्र का महत्त्व।

🙏 तर्पण का मूल भाव है—श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए तृप्ति की भावना से जल अर्पित करना।

🌿 तर्पण = श्रद्धा + स्मरण + शुद्धता + सम्बन्ध + शास्त्रीय विधि

यह विषय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और कर्मकाण्ड-अध्येताओं के लिए उपयोगी है, जो तर्पण की केवल सामान्य विधि नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे शास्त्रीय नियम और सूक्ष्म विधान को समझना चाहते हैं।

📖 अध्ययन करें • समझें • शास्त्रीय विधि से आचरण करें

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