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26/12/2025

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(Hindi me)
Maths, science
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अंधेरे का बुलावा: रूहों की प्यास (भाग १)आर्यन के हाथ में जो डायरी थी, वह सिर्फ कागज का पुलिंदा नहीं था, बल्कि एक पोर्टल ...
26/12/2025

अंधेरे का बुलावा: रूहों की प्यास (भाग १)
आर्यन के हाथ में जो डायरी थी, वह सिर्फ कागज का पुलिंदा नहीं था, बल्कि एक पोर्टल था। उसके पन्नों को पलटते ही कमरे का तापमान अचानक गिर गया। खिड़की के शीशे पर बाहर से किसी ने जोर से हाथ मारा— ठक... ठक... ठक! आर्यन ने घबराकर बाहर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। सिर्फ सूखी पत्तियों का शोर था। जब वह वापस पलटा, तो उसके होश उड़ गए। डायरी का जो पन्ना खुला था, उस पर ताजे खून की एक बूंद गिरी थी, जो धीरे-धीरे फैल रही थी और एक शब्द बना रही थी: आ... जा... आर्यन ने अपने कानों को ढका, क्योंकि उसे अपने दिमाग के अंदर हजारों चीखें सुनाई देने लगी थीं। उसे समझ आ गया कि यह कोई सामान्य खोज नहीं होने वाली।

आर्यन और उसके दोस्त जब राजस्थान के उस गुमनाम गांव के पास पहुँचे, तो सूरज डूब रहा था। गांव के बाहर एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जिसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं। साहब, आगे मत जाओ, बूढ़े ने अपनी फटी हुई आवाज में कहा। वहां मिट्टी इंसानों की खुशबू पहचानती है। अगर एक बार उसने तुम्हें पकड़ लिया, तो तुम्हारी रूह को भी कफन नसीब नहीं होगा। समीर ने इसे मजाक समझकर टाल दिया और कैमरे से रिकॉर्डिंग जारी रखी। लेकिन बूढ़ा जोर-जोर से हंसने लगा, ऐसी हंसी जो किसी मरे हुए इंसान के गले से निकल रही हो। भूत कैद नहीं होते साहब... वो बस अपना ठिकाना बदलते हैं। और आज रात... उनका ठिकाना तुम बनने वाले हो।

वे उस पुरानी हवेली में रुके जो गांव के बिल्कुल बीचों-बीच थी। जैसे ही रात के १२ बजे, रोहन को प्यास लगी। वह अंधेरे गलियारे से होते हुए किचन की तरफ गया। टॉर्च की रोशनी में उसे दिखा कि फर्श पर कुछ चिपचिपा पदार्थ है। जब उसने रोशनी डाली, तो देखा कि पूरे फर्श पर कच्चा मांस बिखरा हुआ है। उसने डरते हुए ऊपर छत की ओर देखा। उसकी चीख गले में ही फंस गई। ऊपर छत से एक औरत उल्टी लटकी हुई थी। उसके बाल फर्श तक आ रहे थे और उसकी आँखों की जगह सिर्फ खाली गड्ढे थे। वह औरत धीरे से मुस्कराई और बोली— भूख लगी है... बहुत प्यास लगी है। रोहन पीछे हटा और भागने की कोशिश की, लेकिन जिस दरवाजे से वह आया था, वह गायब हो चुका था। वहां सिर्फ एक काली, ठंडी दीवार थी।

हॉल में बैठे आर्यन, समीर और तारा ने रोहन की एक दबी हुई चीख सुनी। वे दौड़कर वहां पहुँचे, लेकिन किचन खाली था। रोहन गायब था। रोहन! मजाक मत कर भाई! समीर चिल्लाया। तभी समीर के हाथ में पकड़े हुए कैमरे का नाइट विजन ऑन हुआ। कैमरे की छोटी स्क्रीन पर जो दिख रहा था, वह नग्न आँखों से नहीं दिख रहा था। समीर ने देखा कि आर्यन के ठीक पीछे एक धुंधला साया खड़ा है, जिसने आर्यन के गले पर अपना लंबा हाथ रखा हुआ है। उस साये के काले नाखून आर्यन की खाल के अंदर धंस रहे थे। आर्यन... हिलना मत, समीर की आवाज थरथरा रही थी।

अचानक, पूरे घर की लाइटें एक साथ फूट गईं। अंधेरे में सिर्फ एक आवाज गूँजी— चबाने की आवाज... जैसे कोई सूखी हड्डी तोड़ रहा हो। तारा ने अपनी जेब से एक माचिस निकाली और तीली जलाई। रोशनी होते ही उन्होंने देखा कि फर्श पर रोहन का चश्मा पड़ा था, जो खून से लथपथ था। और दीवार पर ताजा खून से लिखा था: एक गया, तीन बाकी। आर्यन ने कांपते हाथों से अपनी डायरी निकाली। उसे अब समझ आया कि उसके दादाजी ने क्या गलती की थी। डायरी का अगला पन्ना हवा के एक झोंके से खुद-ब-खुद पलटा। वहां लिखा था: इस हवेली की आत्माएं तब तक शांत नहीं होंगी, जब तक वे चारों दिशाओं में चार बलियां न चढ़ा दें। पहली बलि— उत्तर दिशा। अब दक्षिण की बारी है।

दक्षिण की ओर समीर खड़ा था। समीर के पैरों के नीचे की जमीन अचानक दलदल की तरह नरम होने लगी। बचाओ! आर्यन! मुझे कोई नीचे खींच रहा है! समीर के पैर फर्श के अंदर धंसते जा रहे थे, जैसे फर्श पत्थर नहीं बल्कि किसी दानव का मुंह हो। आर्यन और तारा ने उसका हाथ पकड़कर पूरी ताकत से खींचने की कोशिश की, लेकिन नीचे से ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अनगिनत हाथों ने समीर को जकड़ रखा है। तभी समीर के शरीर से एक भयानक आवाज आई— कड़क! उसके पैर की हड्डियां टूट चुकी थीं। समीर दर्द से तड़प उठा और पलक झपकते ही उसे फर्श निगल गया।

अब सिर्फ आर्यन और तारा बचे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि वे एक-दूसरे के दिल की धड़कन साफ सुन सकते थे। तभी एक भारी आवाज आई, जैसे कोई लोहे की भारी जंजीर पत्थर पर घसीट रहा हो। खटर... खटर... खटर... वह आवाज सीधे उनकी ओर ही बढ़ रही थी। तारा ने आर्यन का हाथ कसकर पकड़ लिया। आर्यन को महसूस हुआ कि तारा का हाथ बर्फ जैसा ठंडा है। उसने टॉर्च की रोशनी तारा के चेहरे पर डाली। तारा उसकी तरफ नहीं देख रही थी, उसकी गर्दन १८० डिग्री पीछे मुड़ चुकी थी और वह पीछे की ओर देख रही थी जहां से जंजीरों की आवाज आ रही थी। उसने फुसफुसाते हुए कहा— आर्यन, पीछे मत देखना... वह मेरे बिल्कुल पीछे खड़ा है।

क्या मैं इस दहशत को आगे बढ़ाते हुए भाग २ लिखूँ?
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Horror stories रात के ठीक 2:17 बजे आरव की नींद खुली।कमरे में अजीब सी ठंड थी। पंखा बंद था, खिड़की बंद थी, फिर भी ऐसा लग र...
25/12/2025

Horror stories

रात के ठीक 2:17 बजे आरव की नींद खुली।
कमरे में अजीब सी ठंड थी। पंखा बंद था, खिड़की बंद थी, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई बर्फीली साँस उसकी गर्दन पर पड़ रही हो। वह उठकर बैठ गया।
तभी उसे महसूस हुआ—
कमरे में वह अकेला नहीं था।
दीवार के पास… कुछ खड़ा था।
न पूरी तरह इंसान, न पूरी तरह परछाई।
उसका शरीर टेढ़ा था, गर्दन असामान्य रूप से लंबी, और आँखें…
आँखें नहीं थीं। बस दो काले गड्ढे।
आरव की आवाज़ गले में ही अटक गई।
वह चीज़ धीरे-धीरे बोली—
“भागने की कोशिश मत करना…”
आरव ने चीखना चाहा, लेकिन मुँह से आवाज़ नहीं निकली। तभी अचानक सब गायब हो गया।
कमरा फिर से सामान्य।
“सपना था…”
उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी उसने देखा—
उसके मोबाइल पर 17 मिस्ड कॉल थे…
उसी समय के। 2:17 AM।
और कॉल करने वाला नंबर…
उसका अपना।
डर के मारे उसने लाइट जलाई और दरवाज़े की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने हैंडल पकड़ा, दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
बाहर उसका घर नहीं था।
वह किसी लंबे, अंधेरे कॉरिडोर में खड़ा था। दीवारों से पानी टपक रहा था। फर्श पर काले हाथों के निशान थे, जैसे किसी ने घिसटते हुए निकलने की कोशिश की हो।
पीछे से किसी ने फुसफुसाया—
“यहाँ से कोई बाहर नहीं गया…”
आरव भागा।
भागते-भागते उसने एक दरवाज़ा खोला।
अंदर…
वह खुद बैठा था।
चेहरा नीचे झुकाए।
आरव ने काँपती आवाज़ में कहा,
“तू… तू कौन है?”
वह दूसरा आरव धीरे-धीरे सिर उठाकर मुस्कुराया।
उसके दाँत इंसानी नहीं थे।
“मैं वो हूँ जो भाग नहीं पाया।”
तभी पीछे से तेज़ क़दमों की आवाज़ आई।
कॉरिडोर में वही चीज़ आ रही थी—
लंबी गर्दन, उलटी टाँगें, और ज़मीन पर घिसटता हुआ शरीर।
आरव ने दरवाज़ा बंद किया।
कमरे की दीवारों पर अब शब्द उभर रहे थे—
खून से नहीं…
अंदर से रिसते हुए।
“यह जगह तुम्हारे डर से बनी है।”
“हर बार जब तुम बचने की सोचोगे…”
“हम और पास आएँगे।”
आरव रोने लगा।
अचानक ज़मीन धँस गई।
वह नीचे गिरता चला गया…
गिरता… गिरता…
और एक कमरे में आ गिरा।
वहाँ 12 लोग बैठे थे।
सबके चेहरे एक जैसे थे—
उसके।
सब एक साथ बोले—
“हम सबने भागने की कोशिश की।”
आरव चिल्लाया,
“बाहर का रास्ता कहाँ है??”
सब हँस पड़े।
एक ने अपनी गर्दन घुमाई—180 डिग्री—और बोला,
“यही तो मज़ाक है… बाहर कभी था ही नहीं।”
तभी लाइट बंद।
अंधेरे में किसी ने उसका हाथ पकड़ा।
हाथ ठंडा था…
हड्डियों जैसा।
वही आवाज़ फिर आई—
“अब तुम भी यहीं रहोगे।”
अचानक आरव की आँख खुली।
वह अपने बिस्तर पर था।
सुबह हो चुकी थी।
वह हँसने लगा—
“सपना था… बस सपना…”
लेकिन तभी उसने देखा—
उसकी परछाई…
दीवार पर नहीं थी।
वह उसके पीछे खड़ी थी।
और मुस्कुरा रही थी।
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