अधूरा प्रेम

अधूरा प्रेम

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एक कहानी अधूरेपन की सत्य कहो स्पष्ट कहो कहो न सूंदर झूठ चाहे कोई खुश रहे चाहे जाए रूत

18/07/2026

किसी व्यक्ति को खोने के जितने भी तरीकें हैं

उनमें से मृत्यु सबसे दयालु तरीका है...!!!

14/07/2026

खुद को "मारने" के लिए एक आत्महत्या ही विकल्प नहीं...

किसी से "प्रेम" हो, और उससे "विवाह" न हो

आदमी ऐसे भी मर सकता है....

16/06/2026

होती जो एक कत्ल की इजाज़त मुझे,

खुद को बड़ी बेरहमी से मार देता...😑

15/06/2026

गर्दिश में ना अपना सितारा होता ,
गर काश वो शख़्स हमारा होता .....

13/06/2026

जिसने समंदर देने का वादा किया हो, अगर वहीं, बूंद-बूंद के लिए तरसता छोड़ दे...

तो मलाल तो रहेगा ना 'माधव'...!

13/06/2026

लड़के भी होते हैं - फूलों के हकदार,
उन्हें भी चाहिए होती है किसी के स्पर्श की गर्माहट, किसी का कंधा,
लिखे हुए खत।

11/06/2026

तुम मुझे नुक़सान देने वाला नहीं पाओगे...!!♥️

हम जैसे रुख़्सत हो जाते हैं, दुख नहीं देते...!!🌸

10/06/2026

सभी दुखों से अधिक पीड़ा लगाव की होती है

जो असहनीय होती है...!❤️‍🩹

10/06/2026

सजा तो मुझे मिलनी ही थी मोहब्बत में,

मैंने भी तो कई दिल तोड़े थे तुझे पाने के लिए।

09/06/2026

एक दोस्त ने कभी ओवरथिंकिंग और स्ट्रेस से बचने का एक बड़ा सीधा सा नुस्खा बताया था। उसने कहा था कि जब भी मन हद से ज़्यादा बेचैन हो, भीतर विचारों का बवंडर उठ रहा हो, तो बस शांत होकर कुछ देर चंद्रमा को देख लेना। चंद्र की वह शीतल किरणें मन के सारे उद्वेग को सोख लेती हैं, सब शांत कर देती हैं।

एक वक़्त था जब मैं उसकी इस बात को बहुत नियम से मानता था। जब भी भीतर कुछ टूटता, मैं भागकर छत पर चला जाता।

आज न जाने कितने दिनों, शायद कितने महीनों बाद मैं छत पर आया हूँ।

आकाश की तरफ नज़र उठाई, पर वहाँ कुछ नहीं है। शशि आकाश में है ही नहीं। जिसे मन को सुकून देने के लिए ढूँढ रहा था, उसका कहीं नामोनिशान नहीं है। वहाँ सिर्फ एक स्याह, घना, और दम घोंटता हुआ काला धुआँ फैला है।

मैं रोज़मर्रा की इस अंधी दौड़ में इतना खो गया कि वक़्त का हिसाब ही भूल गया। मुझे अब शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का भेद तक याद नहीं रहता।

ऐसा लग रहा है जैसे मैंने प्रेमांशु को खो दिया है...
या अपनी ही बेरुख़ी से उसे खुद से बहुत दूर कर दिया है।

मैं उस सूने, काले आसमान को लगातार एकटक निहारे जा रहा हूँ। पर वहाँ चंद्रमा की वह जानी-पहचानी शीतलता नहीं है। उस अंतहीन कालेपन को देखते-देखते अचानक एक अजीब सा अहसास होता है मुझे लगता है जैसे मैं आसमान को नहीं, बल्कि खुद के ही भीतर की किसी काली परछाई को देख रहा हूँ। वही अंधकार, वही शून्यता, जो इस वक़्त मेरे भीतर पसरी हुई है, बाहर आसमान पर भी बिछी है।

क्या जो खोया है, वो सिर्फ आसमान का चांद है...
या मेरे भीतर का वो सुकून??

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