20/10/2024
रविवार का दिन था, और सभी बच्चे बहुत उत्साहित थे क्योंकि सुनीता दीदी ने उन्हें अपने घर बुलाया था। जब सब बच्चे इकट्ठा हो गए, तो दीदी ने कहा, "आज मैं तुम्हें स्वतंत्रता संग्राम और एक महान क्रांतिकारी, भगत सिंह, की कहानी सुनाने वाली हूँ।"
बच्चे उत्सुकता से बैठ गए। टोलू ने झट से पूछा, "दीदी, भगत सिंह कौन थे?"
सुनीता दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, "भगत सिंह एक बहुत ही बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। वे केवल 23 साल की उम्र में ही शहीद हो गए, लेकिन उनके विचार और साहस ने पूरे देश को प्रेरित किया। उनका सपना था कि हमारा देश आज़ाद हो और हर नागरिक को न्याय मिले।"
इशिका ने जिज्ञासा से पूछा, "दीदी, भगत सिंह को बचपन में क्या चीज़ें पसंद थीं?"
"अरे, यही तो मैं तुम्हें बताने वाली हूँ!" दीदी ने कहना शुरू किया। "जब भगत सिंह छोटे थे, तब वे बहुत ध्यान से अपने आसपास के माहौल को देखते थे। एक दिन उनके चाचा अजित सिंह और उनके पिता अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की बात कर रहे थे। उस दिन से भगत सिंह के मन में आज़ादी का बीज बोया गया।"
अब रौनक ने हाथ उठाकर पूछा, "दीदी, क्या भगत सिंह बचपन से ही इतने बहादुर थे?"
दीदी ने जवाब दिया, "हाँ, बिल्कुल! एक बार की बात है, जब भगत सिंह ने अपने पिता से पूछा कि ‘पिस्तौल से आज़ादी मिलती है क्या?’ उनके पिता ने उन्हें समझाया कि असली आज़ादी विचारों और लोगों के संघर्ष से आती है। उस दिन भगत सिंह ने मन ही मन ठान लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगे जिससे भारत को आज़ादी मिल सके।"
मोना ने बीच में टोका, "लेकिन दीदी, वे तो इतने छोटे थे! क्या उनके मन में डर नहीं था?"
इस बार इशिका ने जवाब दिया, "नहीं मोना, भगत सिंह ने कभी डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने किताबें पढ़कर अपने विचार मजबूत बनाए। वे महात्मा गांधी और लाला लाजपत राय से बहुत प्रेरित थे।"
तभी अंकित ने उत्सुकता से पूछा, "दीदी, भगत सिंह ने और कौन-कौन से काम किए थे?"
दीदी ने आगे बताया, "जब वे बड़े हुए, तो उन्होंने एक संगठन बनाया और अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरू की। उन्होंने अंग्रेजों को यह दिखाया कि युवा भी देश के लिए कुछ कर सकते हैं।"
खुशी ने अपनी जिज्ञासा जाहिर करते हुए पूछा, "तो क्या भगत सिंह ने भी गांधीजी की तरह अहिंसा का रास्ता अपनाया था?"
दीदी ने धीरे से समझाया, "नहीं खुशी, भगत सिंह का मानना था कि कभी-कभी हमें अन्य तरीकों से भी लड़ाई लड़नी पड़ती है। उन्होंने लाहौर में असेम्बली पर बम फेंककर अंग्रेजों को चौंका दिया, लेकिन उस बम से किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। उनका मकसद किसी को चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि अंग्रेजों को जागरूक करना था।"
टोलू ने हैरानी से पूछा, "दीदी, फिर अंग्रेजों ने उनके साथ क्या किया?"
दीदी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और जेल में डाल दिया। लेकिन जेल में भी भगत सिंह ने हार नहीं मानी। वे अपने साथियों के साथ भूख हड़ताल पर बैठे, ताकि कैदियों को बेहतर अधिकार मिल सकें।"
आरव ने गंभीरता से पूछा, "दीदी, क्या उन्होंने सच में भूख हड़ताल की थी? कितने दिनों तक?"
मोना ने जवाब दिया, "हाँ आरव, भगत सिंह और उनके साथियों ने 116 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। यह दिखाता है कि वे केवल अपनी आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि सभी के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे।"
तभी रौनक ने कहा, "इतनी बहादुरी! लेकिन दीदी, उनका क्या हुआ?"
दीदी ने थोड़े गम्भीर स्वर में बताया, "अंग्रेजों ने उन्हें और उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फाँसी दे दी। लेकिन भगत सिंह ने आखिरी वक्त तक मुस्कुराते हुए कहा कि उनके विचार कभी नहीं मरेंगे।"
बच्चे थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। इशिका ने फिर कहा, "भगत सिंह ने हमें सिखाया कि अपने विचारों के लिए हमेशा खड़ा रहना चाहिए। हमें उनके बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए।"
अब खुशी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो दीदी, हम भगत सिंह को याद कैसे कर सकते हैं?"
सुनीता दीदी ने कहा, "तुम लोग अपने जीवन में ईमानदारी और बहादुरी से काम करोगे, तो वही भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हमेशा सच के रास्ते पर चलो और कभी अन्याय के सामने मत झुको।"
अंकित ने जोश में कहा, "हम भी भगत सिंह की तरह बहादुर बनेंगे!"
सभी बच्चों ने एक साथ कहा, "हाँ, हम भी हमेशा सच्चाई और हिम्मत से काम करेंगे!"
दीदी ने अंत में सभी बच्चों को टॉफी दी और कहा, "आज से तुम सब भी छोटी-छोटी बातों में बदलाव लाकर अपने देश के अच्छे नागरिक बन सकते हो। यही भगत सिंह की सच्ची याद है।"
सभी बच्चे मुस्कुराते हुए घर की ओर लौटे, इस संकल्प के साथ कि वे हमेशा सही के लिए खड़े रहेंगे और अपने देश का सम्मान करेंगे।