एकदम से हम पे प्यार की बारिश होने लगी ।
मैं किसी का हो जाऊं ,ऐसी गुजारिश होने लगी।।
यह सब बस पास आने का बहाना था।।।
मैं खो गया उनकी कातिलाना अदाओं में।
यह समझ ही ना पाया कि उनकी अदाएं ही नहीं।।
उनका सोच भी कातिलाना था।।।
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12/07/2025
unka mann naav jaisa ,mera isque samander jitna tha...
so unhone apni kasti kinara kar liya....
19/05/2025
अंजाना गली पराया घर यहां।
रूम मेरा पर अपना है।।
मन तो बसता है गांव में।
अब जो बस एक सपना है।।
आया तो हूं खाली हाथ ।
मन में बहुत पर सपना है ।।
जीवन के यह खेल निराले।
मन की भट्ठी में तपना है।।
मन तो बसता है गांव में।
अब जो बस एक सपना है।।
अपने थे वे दूर हुऐं।
अब कोई और ही अपना है।।
मन में दर्द दवा करके।
पैसे का स्वाद भी चखना है।।
मन तो बसता है गांव में।
अब जो बस एक सपना है।।
पापा के डाट से डरना भी।
भाई-बहन के झगडे पड़ना है।
मां की लाड से दुर हुए।
जीवन की राह भटकना हैं।
मन तो बसता है गांव में।
अब जो बस एक सपना है।।
अंजाना गली पराया घर यहां।
रूम मेरा पर अपना है।।
मन तो बसता है गांव में।
अब जो बस एक सपना है।।
25/09/2024
आज मैं कौन सा ड्रेस पहनू शॉर्ट्स या बैकलेस।
अरे कोई सा भी पहन ले तेरे ऊपर सभी अच्छे लगते हैं।
वह तो सही है, लेकिन मैं चाहती हूं कि आज पार्टी का सेंटर आफ अट्रैक्शन में रहूं लोग मुझे ही देखते रहें।
तब तो कुछ भी न पहनना ही बेहतर है।
आपको भी पता है कि आपको बैठने तक में दिक्कत होगी, फिर भी आपको शॉर्ट्स ही पहनी है। टांगे जांघ तक पूरी देखनी चाहिए। कपड़े बैकलेस होनी चाहिए और दुपट्टा भी नहीं लेंगे।
आधी छाती और पूरी पीठ दिखाओगे तो लोग घूरेंगे हीं देखेंगे ही । अगर आप चाहती हो कि कोई आपको ऑब्जेक्टिवफाइ ना करें तो पहले खुद को ऑब्जेक्ट की तरह पेश करना बंद करो सेंटर आफ अट्रैक्शन बनना है तो अपने व्यक्तित्व , व्यवहार, आचरण ,अपने प्रतिभा को मजबूत बनाओ । हम हमारी अंतरात्मा है यह शरीर तो एक वस्तु ही है और इसे निखारोगे तो लोग इस्तेमाल ही करना चाहेंगे।
स्वतंत्रता के आड़ में अधनंगी कपड़े पहनकर, सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन के चक्कर में पहले तो खुद ही अपने आप को एक वस्तु की तरह पेश करते हैं और जब उन्हें कोई घूरता है या देखता है तो लोग उन्हें ऑब्जेक्टिवफाइ कर रहे होते हैं । उनकी नज़रें गंदी होती है और नियत भी।
किसी भी जीव को देख लो अपने विपरीत लिंग के प्रति अट्रैक्शन होता ही है। यह प्राकृतिक देन है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी भी तरह के हिंसा के पक्ष में हूं , लेकिन जलती हुई आग को बुझाने के लिए घी नहीं पानी डालते हैं।
हमारे इस लेख से आप कितना सहमत है आपके विचार के लिए कमेंट बॉक्स में आपका इंतजार है।
क्या आपको नहीं लगता कि हम गलत को सही करते-करते न जाने सही के साथ कितना गलत कर चुके हैं। एक को बचाने के राह पर चले थे पर कब दूसरे को कुचल दिए पता ही नहीं चला।
देखिए मैं इन चीजों के खिलाफ नहीं हूं। लड़कियों को भी लड़कों के बराबर की अधिकतर होनी चाहिए तो अधिकार बराबरी का भी तो होना चाहिए।लेकिन क्या यह सही है ?सोच कर जरूर बताना ।पहले इस पोस्ट को पूरा जरूर पढ़ें....
अब आप ही बताओ यह कैसी समानता है?
शादी में यह तो देखा जाता है कि लड़का क्या करता है,उसके पास कितना बैंक बैलेंस है,उसकी नौकरी कैसी है, उसकी पुश्तैनी प्रॉपर्टी कितनी है ?लेकिन इसके विपरीत लड़की पक्ष से दहेज लेना जुर्म है। अगर आप यह देखते हैं की लड़के का बैंक बैलेंस कितना है लड़के की प्रॉपर्टी कितनी है तो उसके बराबर प्रॉपर्टी देकर लड़की को भी विदा करें ताकि जीवन के दोनों पहिए समान रूप से चलेंगे।अगर साइकिल के एक पहिए में हवा हो और दूसरे पहिए में ना हो तो साइकिल बैलेंस होकर नहीं चलती। तो क्या लड़के की प्रॉपर्टी देखना लड़की के लिए दहेज के समान नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से लड़की पक्ष ज्यादा दहेज लेता है।एक पुरुष अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी अकेला अपनी कंधे पर उठाकर चलता है।
अब आप ही बताओ क्या यह समानता है?
सफर में महिलाओं के लिए रिजर्व सीट होते हैं, अगर कोई पुरुष बैठा है और महिला आ गई तो सीट उनको दीजिए वह महिला है लेकिन अगर कोई पुरुष बीमार भी है तो उन्हें सीट नहीं मिल सकता क्योंकि वह एक पुरुष है। उनकी पैदाइश थोड़ी ना हुई है वह तो टाटा कंपनी से मैन्युफैक्चर होकर आए हैं उनको पीड़ा नही होती ।
अब आप ही बताओ क्या यह समानता है?
शादी टूटना किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता है, इसमें परिवार बिखर जाते हैं ,लेकिन
अगर तलाक होती है तो लड़की का खर्चा लड़का उठाएंगा लेकिन क्यों लड़के का खर्चा भी तो लड़की उठा सकती है?
अब आप ही बताओ क्या यह समानता है?
अगर किसी ऐसे दंपति की तलाक हो जिनका कोई बच्चा भी हो तो बच्चे को मां को सौंप दिया जाता है, क्यों भाई साहब पिता उसकी परवरिश नहीं कर सकता क्या? मैं कोर्ट में अपने बच्चे से मिलने के लिए एक बाप को रोते बिलखते तरसते देखा है। आखिर में पैसा तो उसे ही देना है फिर इसके पास क्यों नहीं रह सकता? नहीं ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि महिला पुरुष की अपेक्षा ज्यादा जिम्मेदार होती है। वह बच्चे को ज्यादा प्यार करेगी।
लेकिन अगर एक प्रेमी जोड़ा भाग जाए और शादी कर ले तब जिम्मेदारी लड़के की होती है क्योंकि यह लड़का है इसी ने बहलाया फुसलाया होगा, फिर लड़की की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। तब उसका प्यार भाड़ में चला जाता है। जबकि हकीकत यह होती है कि भागने में ज्यादा जिम्मेदार लड़की होती है हमेशा।
अगर कहीं किसी बात का विवाद हो गया हो तो विवाद में पहले महिला पक्ष का सुना जाएगा क्योंकि पुरुष है तो वह गलत ही होगा जरूर इसी ने कुछ किया होगा। तब बराबरी उनकी तेल लेने चली जाती है।
सच तो यह है कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को उसका अधिकार दिलाते दिलाते याह समाज कब महिला प्रधान बन गया हमें पता ही नहीं चला।
08/09/2024
"सनातन हिंदू धर्म "
जो सभी जीवों के लिए मंगल और सुख की कामना करता है। यह श्लोक इसकी पुष्टि करता है:-
सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
अर्थ:
सब लोग सुखी हों
सब लोग निरोगी हों
सब लोग अच्छा देखें
सब लोग अच्छा बोलें और सुनें।
ऐसा विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं है। मुझे गर्व है कि मैं इस धर्म से जुड़ा हूं। जय हिंद ।।।
जय जनमानस ।।।
जय सनातन ।।।।।
कीतना अजीव है न, कभी आप भी सोच कर देखना.....
मेरे पड़ोस में एक वक्ति रहने आया था।
छूटी का दीन था, दोपहर के करीब 2 या 3 बजे होंगे मैं लंच करके थोड़ा आराम करने के मूड में था की डोरवेल बजी, मैंने देखा कोई अंजान वक्ती था उसे कुछ मदद चाहिए थी। वह मेरे ही विल्डिंग में नए किराए दार थे। मैंने कुछ सामान ऊपर रूम तक ले जाने में उनकी मदद की तो बदले में उनके घर चाय पीने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हा, सौभाग्य ! हम प्राइवेट नौकरी वाले हैं न ,मौका ही नही लगता कभी किसी के यहां जाने का। बातो बातों में मैंने पूछ ही लिया :_बेचलर हो
नही ,फैमिली भी है साथ में। वो कल आएगी छोटा बच्चा है तो मैंने मना कर दिया था।
और कौन कौन है आपके फैमिली में?
बस जी हमारा छोटा परिवार है, मैं मेरी बीबी और दो बच्चे। पहला सात साल है और दूसरा 1 साल का। छोटा परिवार, सुखी परिवार।
बहुत दुःख की बात है , आपके माता पिता दुनिया में नही रहे, भगवान उनकी आत्मा को.... ( बीच में ही उसने मुझे टोका)
अरे नही _नही ऐसी बात नही, वो अभी स्वास्थ है गांव मे है।
ओह सॉरी वैसे आप कितने भाई हैं।
जी मैं भाई में तो अकेला हूं।
तो आपकी मम्मी पापा गांव में किसके साथ है?
वह दोनों अकेले ही है गांव में अपनी पुश्तैनी मकान हैं, और मैं महीने में उनके खर्चे के लिए पैसे भेज दिया करूंगा।
आपने बताया कि आपकी फैमिली में चार लोग हैं आप,आपकी बीवी और दो बच्चे।
जी हां ...........
आज की व्याही लड़की तो उनकी फैमिली बन गई लेकिन जिनकी वजह से वो खुद इस दुनियां में है और जिस फैमिली का वो खुद हिस्सा था वो फैमिली उसकी फैमिली में नही है
क्या यह सही है मां-बाप के फैमिली में बच्चे तो होते हैं, लेकिन बच्चे की फैमिली में मां-बाप नहीं ।
अक्सर परदेसी से पूछो तो यही कहते हैं कि हम फैमिली के साथ रहते हैं, या इस बार घर से आऊंगा तो फैमिली लेकर आऊंगा।
उनके फैमिली में उनके बच्चे तो है,लेकिन वो नही जिनके वो खुद बच्चे हैं।।।।।।।।
कितनी पीरा होती है उन मां बाप को, जो अपनी पूरी जवानी जिस बच्चे को जवान करने में लगा दी यह सोचकर की बुढ़ापे का सहारा बनेगा । वही उन्हें बेसहारा छोड़ जाता है।
और कितना अजीब भी है ,अब वह भी वही सोच रहा है जो कभी उनके मां बाप ने सोची थी।।।।।
क्या आप भी अपनी फैमिली के साथ रहते हैं? आपके महत्वपूर्ण विचार के लिए कमेंट बॉक्स में आपका इंतजार रहेगा।
30/08/2024
अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मूझे,
अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मूझे।
क्योंकि जिसको जितनी जरूरत थी,
उतना ही पहचाना मुझे।।
और तजुर्बा मेरा तुझसे ही है,
और तजुर्बा में तूझसे ही है ऐ जिन्दगी ।
अब सोंच समझकर आजमाना मुझे।।
जीवन जीना भी एक कला है। यह संसार एक रंगमंच है और हम सभी इसके कलाकार हैं। ऐसी धारणा तो आपने सुनी ही होगी, लेकिन आज मैं आपको अपनी समझ से अवगत करवाना चाहता हूँ।
मेरा मानना है कि जीवन एक सफर की तरह होता है, और समय का हर एक पल सफर में स्टेशन की तरह होता है। लेकिन सफर का सबका अपना-अपना अनुभव होता है। कुछ लोग अपनी सीट के लिए लड़ते-झगड़ते सफर को पूरा करते हैं, तो कुछ लोग अपनी सीट बांटकर प्यार से बातें करते सफर करते हैं। कुछ लोग अपनी सामान की निगरानी में सफर कर लेते हैं, तो कुछ लोग खिड़की से बाहरी नज़ारों का लुफ्त उठाते हैं। कुछ लोग इस सफर से कुछ लेकर घर जाते हैं, तो कुछ लोगों का कुछ खो जाता है। कोई दोस्त बनते हैं और नए दुश्मन भी लेकिन सभी बस इस सफर के लिए। सफर के बाद न तो हम उन्हें याद रखते हैं और न ही वो हमें । हाँ, कभी-कभी कोई ऐसा खास मिल जाता है जिसका ज़िक्र हमारे ज़बान पर किसी बहाने से आ जाता है, लेकिन सफर तो आखिर सफर है।
किसी एक पल में हम इस संसार में आते हैं और तब से हमारा सफर शुरू हो जाता है। इस सफर में हमें ऐसे लोगों से मुलाकात होती है जो हमसे पहले अपना सफर शुरू कर चुके होते हैं और कुछ ऐसे लोगों से भी जो हमसे बाद में इस सफर को शुरू करते हैं। कुछ लोगों का सफर छोटा होता है तो हमसे बाद में आते हैं लेकिन हमसे पहले ही चले जाते हैं, कुछ लोग हमसे बाद में आते हैं लेकिन हमसे बाद में जाते हैं। कुछ लोग हमसे पहले आकर भी हमसे बाद में जाते हैं, तो हम किसी से पहले या बाद में जाते हैं। अपनों से बिछड़ने का दुःख और मिलने की खुशी किसे नहीं होती लेकिन मुझे लगता है कि हमें जीवन भी सफर की तरह ही जीना चाहिए। जीवन के बाद क्या है कोई नहीं जानता। इसीलिए तो किसी ने कहा है "चार दिन की जिंदगी फिर अंधेरी रात"। वास्तव में जिंदगी चार दिन की ही होती है बचपन, यौवन, वयस्क और बुढ़ापा। हमें इस चार दिन को हंसते खिलखिलाते मुस्कुराते खुशियां बांटते हुए जी लेना चाहिए न कि आपसी मतभेद में लड़ते झगड़ते नफरत करते।
आपकी सोच के लिए कमेंट बॉक्स में आपका इंतजार रहेगा। जय हिंद ,जय जनमानस।।।
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