19/12/2022
जीव को परमेश्वर काअंश कहा गया है। जिस प्रकार जल के प्रपात में से पानी के अनेक छोटे- छोटे झरने उत्पन्न होते और विलय होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न जीवधारी परमात्मा मेंसे उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। आस्तिकता वह शुद्ध दृष्टि है जिसकेआधार पर मनुष्य अपने जीवन की रीति- नीति का क्रम ठीक प्रकार बना सकने में समर्थ होता हैं। ‘‘हमईश्वर के पुत्र हैं, महान्महत्ता, शक्तिएवं सामर्थ्य के पुंज हैं। अपने पिता के उत्तराधिकार में हमें वह प्रतिभा उपलब्धहै, जिससेअपने संबंधित जगत का, समाजएवं परिवार का सुव्यवस्थित संचालन कर सकें। ईश्वर की विशेष प्रसन्नता, अनुकंपा एवं सहायता प्राप्त करने के लिएहमें परमेश्वर का आज्ञानुवर्ती धर्म परायण होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी में भगवान्व्याप्त है, इसलिएहमें हर किसी के साथ सज्जनता का व्यवहार करना चाहिए। संसार के पदार्थों का निर्माणसभी के लिए है, इसलिएअनावश्यक उपयोग न करें। पाप से बचें, क्योंकि पाप करना अपने ईश्वर के साथ ही दुर्व्यवहार करना है।कर्म का फल ईश्वरीय विधान का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए सत्कर्म करें और सुखी रहें, दुष्कर्मों से बचें ताकि दुःख न सहनपड़ें। ये भावनाएँ एवं मान्यताएँ जिसके मन में जितनी ही गहरी होंगी, जो इन्हीं मान्यताओं के अनुरूप अपनी रीति- नीति बना रहा होगा, वह उसी अनुपात में आस्तिक कहलाएगा। ’’ मनुष्य को अनंतप्रतिभा प्रदान करने के उपरांत परमात्मा ने उसकी बुद्धिमत्ता परखने का भी एक विधानबनाया है। उपलब्ध प्रतिभा का वह सदुपयोग कर सकता है या नहीं, यही उसकी परीक्षा है। जो इस परीक्षा मेंउत्तीर्ण होता है, उसेवे उपहार मिलते हैं, जिन्हेंजीवन मुक्ति, परमपद, अनंत ऐश्वर्य,सिद्धावस्था,ऋषित्व एवं देवत्व आदि नामों से पुकारतेहैं, जोअसफल होता है, उसेकक्षा में अनुत्तीर्ण विद्यार्थी की तरह एक वर्ष और पढ़ने के लिए चौरासी लाखयोनियों का एक चक्कर पूरा करने के लिए रोक लिया जाता है। यह बुद्धिमत्ता कीपरीक्षा इस प्रकार होती है कि चारों ओर पाप,प्रलोभन,स्वार्थ,लोभ,अहंकार एवं वासना, तृष्णा के शस्त्रों से सज्जित शैतान खड़ारहता है और दूसरी ओर धर्म, कर्तव्य, स्नेह, संयम की मधुर मुस्कान के साथ विहँसता हुआ भगवान्। इन दोनों मेंसे जीव किसे अपनाता है, यही उसकी बुद्धि की परीक्षा है,यह परीक्षा ही ईश्वरीय लीला है। इसीप्रयोजन के लिए संसार की ऐसी विलक्षणता द्विविधापूर्ण स्थिति बनी है। हम में सेअनेक दुर्बल व्यक्ति शैतान के प्रलोभन में फँसते और गला कटाते हैं। विवेक कुंठितहो जाता है। भगवान् पहचानने में नहीं आता,सन्मार्ग पर चलना नहीं बन पड़ता और हमचौकड़ी चूक कर मानव जीवन में उपलब्ध हो सकने वाले स्वर्णिम सौभाग्य से वंचित रहजाते हैं। ईश्वर पर अटूट विश्वास और उसकी अविच्छिन्न समीपता का अनुभव, इसी स्थिति को आस्तिकता कहते हैं। उसकानाम ‘उपासना’ है। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है,कोई गुप्त,प्रकट स्थान उसकी उपस्थिति से रहित नहीं, वह सर्वान्तर्यामी घट- घट की जानता है। सत्कर्म ही उसे प्रियहै। धर्म मार्ग पर चलने वाले को ही वह प्यार करता है। इतना ही मान्यता तो ईश्वरभक्त में विकसित होनी ही चाहिए। इस प्रकार की निष्ठा जिसमें होगी वह न शरीर सेदुष्कर्म करेगा और न मान में दुर्भावों को स्थान देगा। इसी प्रकार जिसको ईश्वर केसर्वव्यापक और न्यायकारी होने का विश्वास है,वह कुमार्ग पर पैर कैसे रखेगा? आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता। जो कुकर्मीहै उसकी आस्तिकता को एक विडंबना या प्रवंचना ही कहना चाहिए। ईश्वर का दंड एवंउपहार ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचाजाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं औरक्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है।न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तन, अर्चन करके उसे उसके नियम विधान सेविचलित नहीं किया जा सकता है। अपना पूजन स्मरण या गुणगान करने वाले के साथ यदि वहपक्षपात करने लगे, तबउसकी न्याय- व्यवस्थाका कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन मेंरखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवंअव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेर खाता फैल जाएगा। फिर कोईउसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशामदी या रिश्वतखोर नाम से पुकाराजाने लगेगा, जोचापलूस स्तुति कर दे, उससेप्रसन्न, जोपुष्प- नैवेद्यभेंट करें, उससेप्रसन्न। भगवान् को हमसर्वव्यापक एवं न्यायकारी समझकर गुप्त या प्रकट रूप से अनीति अपनाने का कभी भी, कहीं भी साहस न करें। ईश्वर के दंड सेडरें। उसका भक्तवत्सल ही नहीं भयानक रौद्र रूप भी है। उसका रौद्र रूप ईश्वरीय दंडसे दंडित असंख्यों रुग्ण, अशक्त, मूक, बधिर, अंध, अपंग, कारावास एवं अस्पतालों में पड़े हुए कष्टों से कराहते हुए लोगोंकी दयनीय दशा को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। केवल वंशी बजाने वाले और रास रचानेवाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें, उसका त्रिशूलधारी भी एक रूप है,जो असुरता और निमग्न दुरात्माओं का नृशंसदमन, मर्दनभी करता है। न्यायनिष्ठ जज को जिस प्रकार अपने सगे संबंधियों, प्रशंसक मित्रों तक को कठोर दंड देनापड़ता है, फाँसीएवं कोड़े लगाने की सजा देने को विवश होना पड़ता है,वैसे ही ईश्वर को भी अपने भक्त- अभक्त का,प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना उसके शुभ- अशुभ कर्मों का दंड पुरस्कार देना होताहै। ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा। सत्कर्म न करते हुए भी विविध- विध सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करतेरहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा,ऐसा सोचना नितांत भूल है। उपासना काउद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन,यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नताके प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत- प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करें, भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर वे भीसत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करें यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठचिह्न है। पापों से डर और पुण्य से प्रेम,यही तो भगवद्-भक्त के प्रधान चिह्न हैं। कोई व्यक्तिआस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी तिलक,जनेऊ,कंठी,माला,पूजा-पाठ स्नान,दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन्भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है। आस्तिक कीमान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथउदारता, आत्मीयताएवं सेवा सहायता से भरा मधुर व्यवहार करना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है- प्रेम जो प्रेमी है, वह भक्त है। भक्ति भावना का उदय जिसकेअंतःकरण में होगा, उसकेव्यवहार में प्रेम की अजस्र निर्झरिणी बहने लगेगी। वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापकदेखेगा और सभी से अत्यंत सौम्यता पूर्ण व्यवहार करके अपनी भक्ति भावना का परिचयदेगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर- अचर में छिपे हुए परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सकाऔर तदनुरूप अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सका,मानना चाहिए कि उसे ईश्वर दर्शन का लाभमिल गया। अपने में परमेश्वर को और परमेश्वर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टिजिसे प्राप्त हो गई, समझनाचाहिए कि उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्या 👏