18/09/2023
Sadanand Chakre AWGP
"vichar kranti abhiyan" "Hamara yug Nirman satsankalp "gyan Ganga abhiyan"
18/09/2023
10/08/2023
ईश्वर की सत्ता और उसकी अनुभूति
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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भौतिक जगत की कई शक्तियाँ ऐसी हैं जिन्हें प्रत्यक्ष नेत्रों द्वारा नहीं देखा जा सकता। विद्युत शक्ति स्वयं अदृश्य रहती है। आँखों से न दीखते हुए भी उसके अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। बल्ब में प्रकाश फैलाती, पंखे से हवा बिखेरती, हीटर में गर्मी देती तथा विशालकाय मशीनों, कारखानों को चलाने के लिए ऊर्जा देती, सतत वह अपनी सत्ता का परिचय देती है। चुम्बकीय शक्ति दिखाई नहीं पड़ती, पर प्रचण्ड आकर्षण शक्ति उसकी सत्ता का बोध कराती है। प्रकाश, ऊर्जा, गर्मी, विद्युत शक्ति के गुण हैं, उसकी प्रतिक्रियाएँ हैं, मूल स्वरूप नहीं। मूल स्वरूप तो अभी तक परमाणु की सत्ता की भाँति विवादास्पद बना हुआ है। गुणों का बोध ज्ञानेन्द्रियों द्वारा होता है। नेत्रों में ज्योति न होने पर न तो प्रकाश दिखाई पड़ सकता है और न ही पंखे का चलना दृष्टिगोचर हो सकता है। आँख के साथ शरीर की त्वचा भी अपनी सम्वेदन क्षमता गँवा बैठे, तो जिन्होंने कभी विद्युत शक्ति की सामर्थ्य नहीं देखी है उनके लिए बिजली की सत्ता का अस्तित्व संदिग्ध ही बना रहेगा। यही बात चुम्बक के साथ लागू होती है।
पृथ्वी का गुरुत्व बल प्रत्यक्ष कहाँ दीखता है? वस्तुओं के नीचे गिरने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उसमें कोई ऐसी आकर्षण शक्ति है, जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। यही वह प्रमाण है जिसके आधार पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति की उपस्थिति को स्वीकारना पड़ता है। ऐसी कितनी ही शक्तियाँ हैं जो नेत्रों से नहीं दिखाई पड़ती, किन्तु उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। फूल में सुगन्ध होती है यह सर्वविदित है। गन्ध को नेत्र कहाँ देख पाते हैं। घ्राणेन्द्रियों द्वारा गन्ध की मात्र अनुभूति होती है। उनमें सौन्दर्य होता है जो हर किसी को मुग्ध करता है। सौन्दर्य की होने वाली अनुभूति को किस रूप में प्रत्यक्ष दिखाया जा सकता है? फूल की सुगन्ध एवं सौन्दर्य की अनुभूति, घ्राण शक्ति एवं नेत्र ज्योति से रहित व्यक्ति नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्तियों के उसकी विशेषता से इन्कार करने पर भी तथ्य अपने स्थान पर यथावत बना रहता है।
खाद्य पदार्थों के गुण धर्म उनके भीतर सन्निहित होते हैं। उनके स्वाद को देखा नहीं, स्वादेन्द्रिय के ठीक रहने पर मात्र अनुभव किया जा सकता है। जिनकी जिह्वा जन्म से ही रोग ग्रस्त हो, स्वाद का अनुभव नहीं कर पाती हो, उनके लिए यह आश्चर्य, अविश्वास एवं कौतूहल का विषय बना रहेगा कि वस्तुओं में स्वाद भी होता है। जिह्वा से अनुभूति होते हुए स्वाद के मूल स्वरूप का दर्शन कर सकना सर्वथा असम्भव है। गन्ध का वास्तविक रूप कैसा होता है, यह दृष्टिगम्य नहीं अनुभूतिगम्य है।
विविध प्रकार की भौतिक शक्तियों का परिचय उनके गुण-धर्मों, विशेषताओं के आधार पर मिलता है और यह भी तभी सम्भव है जब ज्ञानेन्द्रियाँ उनकी विशेषताओं, सम्वेदनाओं को ग्रहण कर पाने में सक्षम हो। इतने पर भी उनके मूल स्वरूप का दर्शन कर पाना न तो अब तक सम्भव हुआ है और न ही निकट भविष्य में सम्भावना ही है, क्योंकि शक्ति का कोई स्वरूप नहीं होता। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई रूपी प्रत्यक्ष मापदण्ड की सीमा में वस्तुएँ आती हैं, शक्तियाँ नहीं। इस तथ्य को कोई भी विज्ञ, विचारशील, तार्किक अथवा वैज्ञानिक भी मानने से इन्कार नहीं कर सकता।
19/12/2022
पुराने कुसंस्कारीअभ्यासों को निरस्त करने के लिए नए उत्साह से,साहसपूर्वक सत्प्रयोजनों को दैनिक क्रियाकलापमें सम्मिलित करना पड़ता है और बार- बार उभरने वाली पशु- प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए कड़ा रुख अपनाना पड़ता है।इस प्रकार अपने आप से जूझने को ही संयम समझना चाहिए। अर्जुन की भूमिका, इस अपने से संघर्ष करने (महाभारत)में प्रत्येक कर्मयोगी को निभानी पड़तीहै। जीवन एक युद्धस्थली है, जिसमें मनुष्य को सतत कामुक प्रतिकूलविचारों से लेकर चिर संचित प्रवृत्तियों तक एवं ऋतुकाल की बदलती परिस्थितियों सेलेकर वातावरण में अस्वाभाविक परिवर्तन से जूझना पड़ता है। जीवनी शक्ति, जो उसे मानसिक रूप से लड़ सकने योग्य साहसीएवं उसके शरीर संस्थान को रोगी होने से बचाती है,एक ही अनुदान की परिणति हे- संयम जो इसे अपनाता है, वह न रोगी होता है न दुःखी। वह जीवनसंग्राम में कभी दुःखी नहीं होता तथा विशृंखलित अस्त-व्यस्त विचार उसे प्रभावित नहीं कर पाते।संयम एवं संघर्ष एक- दूसरेके पर्यायवाची हैं तथा असंयम की परिणति ही दीन-हीन दरिद्रता,रोग-शोक के रूप में होती है। जीवन देवता कीउपासना तब ही भली प्रकार संभव है, जब अपने जीवन रसों को व्यर्थ बहाना छोड़कर मनुष्य उन्हेंसृजनात्मक चिंतन व कर्तव्य में नियोजित करें। यदि व्यक्ति असंयम के दुष्परिणामोंको समझ जाए, तोभूतल पर स्वर्ग आ जाए तथा दुःख दारिद्रय सर्वथा समाप्त हो जाए। जीवन सम्पदा के चारक्षेत्र हैं- इंद्रियशक्ति, समयशक्ति, विचारशक्ति, धन(साधन) शक्ति। आरंभ की तीन तो ईश्वर प्रदत्तहैं। चौथी इन तीनों के संयुक्त प्रयत्न से भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ द्वाराअर्जित की जाती हैं। जो व्यक्ति इन्हें दैवी विभूतियाँ मानकर इनका सुनियोजन करताहै, अभावसे भरे संसार में रहते हुए भी साधन एकत्र कर लेता है। शारीरिक सामर्थ्य, वाणी का सही उपयोग एवं समय सम्पदा का सहीसुनियोजन करने के लिए ये विभूतियाँ भगवान् ने बहुत सोच-समझकर मानव को विरासत में दी हैं। दस इंद्रियों में दोप्रमुख हैं, जिनमेंसे एक जिह्वा तथा दूसरी जननेन्द्रिय है। जिसने इनको वश में कर लिया, समझो उसने शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को प्राप्त कर लिया है।जिह्वा संयम से शारीरिक स्वास्थ्य तथा जननेन्द्रिय के संयम से मनोबल अक्षुण्ण रहताहै। जिह्वा का शरीरगत स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। जिह्वा स्वाद को प्रधानता देकरऐसे पदार्थों को खाती रहती है, जो अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी होते हैं। स्वाद-स्वाद में भोजन की मात्रा बढ़ने से पेटखराब तथा असंख्य रोग हो जाते हैं। समय संयम में शिथिलतारहने से मनुष्य निश्चित रूप से आलसी और प्रमादी बनता है। नियमितता न रहने से जोकिया जाता है, वहआधा- अधूरारहता है। समय का सदुपयोग, सुनियोजित श्रम से ही किया जा सकता है। आलस्य का अर्थ है- शारीरिक श्रम से बचना तथा प्रमाद, मानसिक जड़ता का नाम हे। शरीर बलवान होतेहुए भी व्यक्ति श्रम से जी चुराए, तो उसे प्रमाद कहा जाता है। हमारे सबसे समीपवर्ती शत्रु आलस्यऔर प्रमाद ही हैं। जो समय देवता की अवहेलना करते हैं,वे जीवन को निरर्थक बिता कर चलते बनतेहैं। समय के असंयमी ही अल्पजीवी कहलाते हैं,भले ही उनकी आयु कुछ भी हो। समय ईश्वरप्रदत्त सम्पदा है। उसे श्रम में मनोयोगपूर्वक नियोजित करके विभिन्न प्रकार कीसंपदाएँ, विभूतियाँअर्जित की जा सकती हैं। जो समय गँवाता है,उसे जीवन गँवाने वाला ही समझा जाता है। समय की तरह ही विचार प्रवारको भी सत्प्रयोजनों में निरत रखा जाए। उत्कृष्ट उपयोगी विचारों को मर्यादा मेंसीमाबद्ध रखने से वे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगते हैं और महत्त्वपूर्ण प्रतिफलउत्पन्न करते हैं। मनोनिग्रह के अभ्यास से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मेंमहत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। नित्य विचारों की अनगढ़ता अस्त- व्यस्तता से बचना चाहिए। विचारों कोसुनियोजित कर लक्ष्य विशेष से जोड़कर लौकिक व आत्मिक जगत में लाभान्वित होनाचाहिए। व्यक्ति जो भी कार्य करता है, वह विचारों की परिणति है। ‘‘जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही करता है।’’ इस उक्ति को सदैवस्मरण रखना चाहिए। विचारों को आवारा कुत्तों की तरह अचिंत्य चिंतन में भटकने नदेने का नित्य अभ्यास करना चाहिए। विचारों को हर समय उपयोगी दिशाधारा के साथनियोजित करके रखना चाहिए। अनगढ़, अनुपयुक्त, निरर्थक विचारों से जूझने के लिए सद्विचारों की सेना को पहलेसे ही तैयार रखना चाहिए। अचिंत्य चिंतन उठते ही जूझ पड़ें और उन्हें निरस्त करकेभगा दें। चिड़िया घर में बड़ा होता है, उसमें पशु- पक्षियों का घूमने- फिरने की आजादी होती है,पर बाहर जाने नहीं दिया जाता, ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भीबरती जाए, उन्हेंजहाँ- तहाँबिखरने न दिया जाए। परिश्रम एवं मनोयोग काप्रत्यक्ष फल धन है। भौतिक एवं आत्मिक दोनों क्षेत्रों में व्यक्ति को अपव्यय कीछूट नहीं है। पैसा चाहे अपना हो या पराया,मेहनत से कमाया गया हो या मुफ्त में मिलाहो, उसेहर हालत में जीवनोपयोगी, समाजोपयोगी सामर्थ्य मानना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग मात्र सत्प्रयोजनों हेतुही व्यय करना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग तीन संपदाएँ भगवत् प्रदत्त हैं। अतः धन को कालदेवता एवं श्रम देवता का सम्मिलित अनुदान मानना चाहिए। जैसी दूरदर्शिता समय औरविचार के अपव्यय के लिए बरतने की है, वैसी ही धन पर भी लागू होती है। बचाया धन परमार्थ में ही लगानाठीक रहता है। बुद्धिमानी इसी में है कि जितना भी कमाया जाए, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जोकमाए हुए धन का सदाशयता में उपयोग नहीं करता,वह घर में दुष्प्रवृत्तियों को आमंत्रितकरता है। लक्ष्मी उसी घर में फलती- फूलती है, जहाँ उसका सदुपयोग होता है। आडम्बरयुक्त विवाह, प्रदर्शन,फैशन परस्ती में अनावश्यक खर्च करने सेउपार्जन का सही उपयोग नहीं होता। यहीं से सामाजिक अपराधों को बढ़ावा मिलता है।पारिवारिक कलह, मुकदमेबाजीआदि भी इन्हीं कारणों से उपजती है। समुद्र संचय नहीं करता,मेघ बनकर बरस जाता है, तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटतीहैं। यदि वह भी कृपण हो, संचय करने लगता, तो नदियाँ सूख जातीं, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो घनघोर बरसने लगता तोअतिवृष्टि की विभीषिका आ जाती। अतः समन्वित नीति ही ठीक है। ध्यान रखना चाहिए किजो उपार्जन से बचाया जाए, उसे उचित प्रयोजन में नियोजित कर दें। कमाने में न अनीति बरतीजाए और न उपेक्षा। खर्च करने में सज्जनता एवं सत्परिणामों की जाँच पड़ताल रखी जाएअन्यथा संपन्नता, दरिद्रतासे भी अधिक घातक सिद्ध होती है। इससे समाज में दूषित परंपराएँ पनपती है। धन केलक्ष्मी कहते हैं। सत्प्रयोजन में लगे तो लक्ष्मी,अपव्यय किया जाए,अनीति से कमाया या खर्च किया जाए तो वहमाया है। माया का नाश सदैव हुआ है। संयम पर न टिक पाने काकारण उसका स्वरूप न समझ पाना है। स्वरूप न समझ पाने से व्यक्ति उसी तरह फँस जातेहैं, जैसेअंधेरी रात में मार्ग में भरे पानी को सूखी जमीन समझकर व्यक्ति उसमें पैर फँसादेता है। स्वरूप एवं महत्त्व समझना कठिन नहीं है,परंतु उसके लिए मनुष्य को पूरा प्रयासतथा नित्य प्रति अभ्यास करना होगा। स्वरूप और महत्त्व समझने के लिए आवश्यक उद्योगन कर पाना भी असंयम की वृत्ति की ही प्रतिक्रिया है। अतः जो संयम का लाभ लेनाचाहें वे उसका स्वरूप और महत्त्व समझें। संयम काँप एक पक्ष जहाँ अनावश्यक अपव्ययको रोकना है, वहाँदूसरी हो उसे सृजनात्मक कार्यों हेतु नियोजित करना भी है। सामर्थ्य तभी श्रेयस्करपरिणाम उत्पन्न करती है, जब उसे अस्त- व्यस्तता एवं अनुपयुक्तता से बचाकर सृजनात्मक सत्प्रयोजनों केलिए प्रयुक्त किया जाए। सप्तर्षियों की बैठकहोने वाली थी। उससे पूर्व ही वेदव्यास को महाभारत लिखकर देना था। समय कम था, तो भी उन्होंने गणेश जी की मदद ली औरमहाभारत लिखना प्रारंभ कर दिया। महाभारत समय से पूर्व ही लिख गया। अंतिम श्लोकलिखाते व्यास जी ने कहा- गणेश आश्चर्य है कि पूरा महाभारत लिख गया और इस बीच आप एक शब्दभी नहीं बोले। गणेश जी ने कहा- भगवन् इस संयम के कारण ही हम लोग वर्षों का कार्य कुछ ही दिनमें संपन्न करने में समर्थ हुए हैं। बातों में समय नष्ट करने से काम �
युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्या 👏
19/12/2022
आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता की सत्प्रवृत्ति का प्रभाव पहले अपने सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए।हमारा सबसे निकटवर्ती संबंधी हमारा शरीर है। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यकहै। शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे ही संजोने- सँवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों ही ढंग अकल्याणकारी हैं। हमेंसंतुलन का मार्ग अपनाना चाहिए। हमारा सदा सहायक सेवकशरीर है। वह चौबीसों घंटे सोते- जागते हमारे लिए काम करता रहता है। वह जिस भी स्थिति में हो, अपनी सामर्थ्य भर आज्ञा पालन के लिएतत्पर रहता है। सुविधा- साधनों के उपार्जन में उसी का पुरुषार्थ काम देता है। इतना हीनहीं, वरन्समय- समयपर अपने- अपनेढंग से अनेक प्रकार के रसास्वादन भी कराती रहती हैं। नेत्र, कान,नाक,जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञानतंतु अपने- अपनेढंग के रसास्वादन कराते रहते हैं। इन विशेषताओं के कारण ही आत्मा उसकी सेवा- साधना का मुग्ध हो जाती है और अपने सुखही नहीं अस्तित्व तक को भूल कर उसी में पूरी तरह रम जाती है। उसका सुख- दुःख मानापमान आदि अपनी निज की भाव- संवेदना में सम्मिलित कर लेती है। यहघनिष्ठता इतनी अधिक सघन हो जाती है कि व्यक्ति,आत्मा की सत्ता,आवश्यकता तक को भूल जाता है और शरीर कोअपना ही आपा मानने लगता है। उसका अंत हो जाने पर तो जीवन की इतिश्री ही मान लीजाती है। ऐसे वफादार सेवक कोसमर्थ, निरोगएवं दीर्घजीवी बनाए रखना प्रत्येक विचारशील का कर्तव्य है। चाहते तो सभी ऐसा ही हैं, पर जो रहन-सहन आहार-विहार अपनाते हैं, वह विधा ऐसी उल्टी पड़ जाती है कि उसकेकारण अपने प्रिय पात्र को अपार हानि उठानी पड़ती है,इतना अत्याचार सहना पड़ता है कि उसकाकचूमर तक निकल जाता है और रोता- कलपता दुर्बलता और रुग्णता से ग्रसित होकर व्यक्ति असमय में हीदम तोड़ देता है। यह सब अज्ञान के कारणहोता है, जोहोश सँभालने से पूर्व ही अभिभावकों के अनाड़ीपन के कारण वह अपने ऊपर लाद लेता है।स्वस्थ- समर्थरहना कुछ भी कठिन नहीं है। प्रकृति के संकेतों का अनुसरण करने भर से यह प्रयोजनसिद्ध हो सकता है। प्रकृति के सभी जीवधारी यही करते और दुर्घटना जैसी आकस्मिकपरिस्थितियों को छोड़कर साधारणतया निरोग रहते और समयानुसार अपनी मौत मरते हैं।प्रकृति के संदेश- संकेतोंको जब सृष्टि के सभी जीवधारी मोटी बुद्धि होने पर भी समझ लेते हैं तो कोई कारणनहीं कि मनुष्य जैसा बुद्धिजीवी उन्हें न अपना सके। प्रकृति के स्वास्थ्य रक्षा केनियम व्यवहार में अति सरल हैं। उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले यंत्र इसी शरीरमें लगे हैं, जोतत्काल यह बता देते हैं कि क्या करना चाहिए,क्या नहीं?मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं काअनुशासन मानने भर से उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। आहार- विहार का ध्यान रखने के स्वास्थ्य रक्षाकी समस्या हल हो जाती है। आहार प्रमुख पक्ष है,जिसे स्वास्थ्य,अनुशासन का पूर्वार्द्ध कहा जा सकता है।उत्तरार्द्ध में विहार आता है, जिसका तात्पर्य होता है नित्य कर्म,शौच,स्नान,शयन,परिश्रम,संतोष आदि। इन्हीं के संबंध में समुचितजानकारी प्राप्त कर लेने और उनका परिपालन करते रहने से एक प्रकार से आरोग्य काबीमा जैसा हो जाता है। शरीर को ईश्वर केपवित्र निवास के रूप में मान्यता देना उचित है। यह तथ्य ध्यान में बना रहे तो शरीरके प्रति निरर्थक मोहग्रस्तता से बचकर, उसके प्रति कर्तव्यों का संतुलित निर्वाह संभव है। मंदिर कोसजाने, सँवारनेमें भगवान् को भुला देना निरी मूर्खता है,किंतु देवालयों को गंदा, तिरस्कृत,भ्रष्ट,जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है। शरीररूपी मंदिर को मनमानी बुरी आदतों के कारण रुग्ण बनाना प्रकृति की दृष्टि में बड़ाअपराध है। उसके फलस्वरूप पीड़ा, बेचैनी, अल्पायु, आर्थिक हानि, तिरस्कार जैसे दंड भोगने पड़ते हैं। रुग्णता या बीमारीकहीं बाहर से नहीं आती। विकार तो बाहर से भी प्रविष्ट हो सकते हैं तथा शरीर केअंदर भी पैदा होते हैं, किंतु शरीर संस्थान में उन्हें बाहर निकाल फेंकने की अद्भुतक्षमता विद्यमान है। मनुष्य अपने इंद्रिय असंयम द्वारा जीवनी शक्ति को बुरी तरहनष्ट कर देता है। आहार- विहार के असंयम से शरीर के पाचन तंत्र,रक्त संचार,मस्तिष्क,स्नायु संस्थान आदि पर भारी आघात पड़ताहै। बार- बारके आघात से वे दुर्बल एवं रोगग्रस्त होने लग जाते हैं। निर्बल संस्थान अंदर केविकारों को स्वाभाविक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाते। फलस्वरूप वे शरीर में एकत्रितहोने लगते हैं तथा अस्वाभाविक ढंग से बाहर निकलने लगते हैं। यही स्थिति बीमारी कहलातीहै। स्वस्थ रहने पर ही कोईअपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी, वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न करसकेगा। दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलम्बन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है।भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने मेंसमर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितनाउपयोगी हो सकता है? मनुष्य जन्म अगणितविशेषताओं और विभूतियों से भरा पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊँचा उठेजितना अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है,पर यह संभव तभी है, जब कि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जोजितनों के लिए, जितनाउपयोगी और सहायक सिद्ध होता हैं, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरोंके अभ्युदय में योगदान करते उसी में बन पड़ता है,जो स्वस्थ,समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है।इसलिए अनेक दुःखद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है।प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवनउतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूर्वक जिया जा सके। कुछ अपवादों को छोड़करअस्वस्थता अपना निज का उपार्जन है। भले ही वह अनजाने में,भ्रमवश या दूसरों की देखा- देखी उसे न्यौत बुलाया गया हो। सृष्टि केसभी प्राणी जीवन भर निरोग रहते हैं। मरणकाल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है। मनुष्यकी उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्यखाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भीकचूमर निकल सकता है। पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ती है। बिना पचा सड़ता है औरसड़न रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है,रोग का लक्षण उभर पड़ता है। कामुकता कीकुटेब जीवनी शक्ति का बुरी तरह क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का हरण करलेती है। अस्वच्छता, पूरीनींद न लेना, कड़ेपरिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसे कुटेब भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का कारण बनतेहैं। खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है। भयका आक्रोश जैसे उतार- चढ़ावभरे ज्वार- भाटेभी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बनाकर रहते हैं। शरीर को निरोग बनाकररखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठा कर हर व्यक्ति आरोग्य एवंदीर्घजीवी पा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त, व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण कठिन नहीं है। स्वाद को नहींस्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनाई जानी संभवहै। सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचितविश्राम देकर हर बार तरोताजा बना लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यहसब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुरदुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी हीन और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं। शारीरिक आरोग्य केमुख्य आधार आत्म संयम एवं नियमितता ही हैं। इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों केसहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आवश्यकता पड़नेपर औषधियों का सहारा लाठी की तरह लिया तो जा सकता है,किंतु चलना तो पैरों से ही पड़ता है।शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है, उसे बनाए रखना इन्हीं माध्यमों से संभवहै। शरीर को प्रभु मंदिर की तरह ही महत्त्व दें।
युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्या 👏
19/12/2022
जीव को परमेश्वर काअंश कहा गया है। जिस प्रकार जल के प्रपात में से पानी के अनेक छोटे- छोटे झरने उत्पन्न होते और विलय होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न जीवधारी परमात्मा मेंसे उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। आस्तिकता वह शुद्ध दृष्टि है जिसकेआधार पर मनुष्य अपने जीवन की रीति- नीति का क्रम ठीक प्रकार बना सकने में समर्थ होता हैं। ‘‘हमईश्वर के पुत्र हैं, महान्महत्ता, शक्तिएवं सामर्थ्य के पुंज हैं। अपने पिता के उत्तराधिकार में हमें वह प्रतिभा उपलब्धहै, जिससेअपने संबंधित जगत का, समाजएवं परिवार का सुव्यवस्थित संचालन कर सकें। ईश्वर की विशेष प्रसन्नता, अनुकंपा एवं सहायता प्राप्त करने के लिएहमें परमेश्वर का आज्ञानुवर्ती धर्म परायण होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी में भगवान्व्याप्त है, इसलिएहमें हर किसी के साथ सज्जनता का व्यवहार करना चाहिए। संसार के पदार्थों का निर्माणसभी के लिए है, इसलिएअनावश्यक उपयोग न करें। पाप से बचें, क्योंकि पाप करना अपने ईश्वर के साथ ही दुर्व्यवहार करना है।कर्म का फल ईश्वरीय विधान का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए सत्कर्म करें और सुखी रहें, दुष्कर्मों से बचें ताकि दुःख न सहनपड़ें। ये भावनाएँ एवं मान्यताएँ जिसके मन में जितनी ही गहरी होंगी, जो इन्हीं मान्यताओं के अनुरूप अपनी रीति- नीति बना रहा होगा, वह उसी अनुपात में आस्तिक कहलाएगा। ’’ मनुष्य को अनंतप्रतिभा प्रदान करने के उपरांत परमात्मा ने उसकी बुद्धिमत्ता परखने का भी एक विधानबनाया है। उपलब्ध प्रतिभा का वह सदुपयोग कर सकता है या नहीं, यही उसकी परीक्षा है। जो इस परीक्षा मेंउत्तीर्ण होता है, उसेवे उपहार मिलते हैं, जिन्हेंजीवन मुक्ति, परमपद, अनंत ऐश्वर्य,सिद्धावस्था,ऋषित्व एवं देवत्व आदि नामों से पुकारतेहैं, जोअसफल होता है, उसेकक्षा में अनुत्तीर्ण विद्यार्थी की तरह एक वर्ष और पढ़ने के लिए चौरासी लाखयोनियों का एक चक्कर पूरा करने के लिए रोक लिया जाता है। यह बुद्धिमत्ता कीपरीक्षा इस प्रकार होती है कि चारों ओर पाप,प्रलोभन,स्वार्थ,लोभ,अहंकार एवं वासना, तृष्णा के शस्त्रों से सज्जित शैतान खड़ारहता है और दूसरी ओर धर्म, कर्तव्य, स्नेह, संयम की मधुर मुस्कान के साथ विहँसता हुआ भगवान्। इन दोनों मेंसे जीव किसे अपनाता है, यही उसकी बुद्धि की परीक्षा है,यह परीक्षा ही ईश्वरीय लीला है। इसीप्रयोजन के लिए संसार की ऐसी विलक्षणता द्विविधापूर्ण स्थिति बनी है। हम में सेअनेक दुर्बल व्यक्ति शैतान के प्रलोभन में फँसते और गला कटाते हैं। विवेक कुंठितहो जाता है। भगवान् पहचानने में नहीं आता,सन्मार्ग पर चलना नहीं बन पड़ता और हमचौकड़ी चूक कर मानव जीवन में उपलब्ध हो सकने वाले स्वर्णिम सौभाग्य से वंचित रहजाते हैं। ईश्वर पर अटूट विश्वास और उसकी अविच्छिन्न समीपता का अनुभव, इसी स्थिति को आस्तिकता कहते हैं। उसकानाम ‘उपासना’ है। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है,कोई गुप्त,प्रकट स्थान उसकी उपस्थिति से रहित नहीं, वह सर्वान्तर्यामी घट- घट की जानता है। सत्कर्म ही उसे प्रियहै। धर्म मार्ग पर चलने वाले को ही वह प्यार करता है। इतना ही मान्यता तो ईश्वरभक्त में विकसित होनी ही चाहिए। इस प्रकार की निष्ठा जिसमें होगी वह न शरीर सेदुष्कर्म करेगा और न मान में दुर्भावों को स्थान देगा। इसी प्रकार जिसको ईश्वर केसर्वव्यापक और न्यायकारी होने का विश्वास है,वह कुमार्ग पर पैर कैसे रखेगा? आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता। जो कुकर्मीहै उसकी आस्तिकता को एक विडंबना या प्रवंचना ही कहना चाहिए। ईश्वर का दंड एवंउपहार ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचाजाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं औरक्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है।न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तन, अर्चन करके उसे उसके नियम विधान सेविचलित नहीं किया जा सकता है। अपना पूजन स्मरण या गुणगान करने वाले के साथ यदि वहपक्षपात करने लगे, तबउसकी न्याय- व्यवस्थाका कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन मेंरखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवंअव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेर खाता फैल जाएगा। फिर कोईउसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशामदी या रिश्वतखोर नाम से पुकाराजाने लगेगा, जोचापलूस स्तुति कर दे, उससेप्रसन्न, जोपुष्प- नैवेद्यभेंट करें, उससेप्रसन्न। भगवान् को हमसर्वव्यापक एवं न्यायकारी समझकर गुप्त या प्रकट रूप से अनीति अपनाने का कभी भी, कहीं भी साहस न करें। ईश्वर के दंड सेडरें। उसका भक्तवत्सल ही नहीं भयानक रौद्र रूप भी है। उसका रौद्र रूप ईश्वरीय दंडसे दंडित असंख्यों रुग्ण, अशक्त, मूक, बधिर, अंध, अपंग, कारावास एवं अस्पतालों में पड़े हुए कष्टों से कराहते हुए लोगोंकी दयनीय दशा को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। केवल वंशी बजाने वाले और रास रचानेवाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें, उसका त्रिशूलधारी भी एक रूप है,जो असुरता और निमग्न दुरात्माओं का नृशंसदमन, मर्दनभी करता है। न्यायनिष्ठ जज को जिस प्रकार अपने सगे संबंधियों, प्रशंसक मित्रों तक को कठोर दंड देनापड़ता है, फाँसीएवं कोड़े लगाने की सजा देने को विवश होना पड़ता है,वैसे ही ईश्वर को भी अपने भक्त- अभक्त का,प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना उसके शुभ- अशुभ कर्मों का दंड पुरस्कार देना होताहै। ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा। सत्कर्म न करते हुए भी विविध- विध सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करतेरहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा,ऐसा सोचना नितांत भूल है। उपासना काउद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन,यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नताके प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत- प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करें, भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर वे भीसत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करें यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठचिह्न है। पापों से डर और पुण्य से प्रेम,यही तो भगवद्-भक्त के प्रधान चिह्न हैं। कोई व्यक्तिआस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी तिलक,जनेऊ,कंठी,माला,पूजा-पाठ स्नान,दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन्भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है। आस्तिक कीमान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथउदारता, आत्मीयताएवं सेवा सहायता से भरा मधुर व्यवहार करना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है- प्रेम जो प्रेमी है, वह भक्त है। भक्ति भावना का उदय जिसकेअंतःकरण में होगा, उसकेव्यवहार में प्रेम की अजस्र निर्झरिणी बहने लगेगी। वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापकदेखेगा और सभी से अत्यंत सौम्यता पूर्ण व्यवहार करके अपनी भक्ति भावना का परिचयदेगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर- अचर में छिपे हुए परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सकाऔर तदनुरूप अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सका,मानना चाहिए कि उसे ईश्वर दर्शन का लाभमिल गया। अपने में परमेश्वर को और परमेश्वर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टिजिसे प्राप्त हो गई, समझनाचाहिए कि उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्या 👏
19/12/2022
युग निर्माण जिसे लेकरगायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है। उसी आधार परहमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होतेहैं, इसेअपना घोषणा- पत्रभी कहा जा सकता है। हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसेनित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करें औरशेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढ़ा जाना चाहिए। संकल्प की शक्ति अपारहै। यह विशाल ब्रह्माण्ड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है। परमात्मामें इच्छा उठी ‘एकोऽहं बहुस्याम’ मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ,उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयारहो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़- खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यदि ऐसीआकांक्षा न जगी होती, आवश्यकताअनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिनपूरे कर रहा होता। इच्छा जब बुद्धिद्वारा परिष्कृत होकर दृढ़ निश्चय का रूप धारण कर लेती है,तब वह संकल्प कहलाती है। मन काकेन्द्रीकरण जब किसी संकल्प पर हो जाता है,तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नहींरहती। मन की सामर्थ्य अपार है, तो सफलता के उपकरण अनायास ही जुटते चले जाते हैं। बुरेसंकल्पों की पूर्ति के लिए भी जब साधन बन जाते हैं,तो सत्संकल्पों के बारे में तो कहना हीक्या है? धर्मऔर संस्कृति को जो विशाल भवन मानव जाति के सिर पर छत्रछाया की तरह मौजूद है, उसका कारण ऋषियों का सत्संकल्प ही है।संकल्प इस विश्व की सबसे प्रचंड शक्ति है। विज्ञान की शोध द्वारा अगणित प्राकृतिकशक्तियों पर विजय प्राप्त करके वशवर्ती बना लेने का श्रेय मानव की संकल्प शक्ति कोही है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प,उद्योग,साहित्य,कला,संगीत आदि विविध दिशाओं में जो प्रगतिहुई आज दिखाई पड़ती है, उसके मूल में मानव का संकल्प ही सन्निहित है, इसे प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष कह सकते हैं।आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए जब मनुष्य किसी दिशा विशेष में अग्रसर होने केलिए दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसकी सफलता में संदेह नहीं रह जाता। आज प्रत्येक विचारशीलव्यक्ति यह अनुभव करता है कि मानवीय चेतना में वे दुर्गुण पर्याप्त मात्रा में बढ़चले हैं, जिनकेकारण अशान्ति और अव्यवस्था छाई रहती है। इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकताअनिवार्य रूप से प्रतीत होती है, पर यह कार्य केवल आकांक्षा मात्र से पूर्ण न हो सकेगा, इसके लिए एक सुनिश्चित दिशा निर्धारितकरनी होगी और उसके लिए सक्रिय रूप से संगठित कदम बढ़ाने होंगे। इसके बिना हमारीचाहना एक कल्पना मात्र बनी रहेगी। युग निर्माण सत्संकल्प उसी दिशा में एकसुनिश्चित कदम है। इस घोषणापत्र में सभी भावनाएँ धर्म और शास्त्र की आदर्श परंपराके अनुरूप एक व्यवस्थित ढंग से सरल भाषा में संक्षिप्त शब्दों में रख दी गई औरचिंतन करें तथा यह निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरोंको उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म-निर्माण पर सारा ध्यान केंद्रित किया गयाहै। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसाकरने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है।बूँद- बूँदजल के मिलने से ही समुद्र बना है। एक- एक अच्छा मनुष्य मिलकर ही अच्छा समाज बनेगा। व्यक्ति निर्माणका व्यापक स्वरूप ही युग निर्माण के रूप में परिलक्षित होगा। प्रस्तुत युग निर्माण सत्संकल्प की भावनाओं का स्पष्टीकरणऔर विवेचन पाठक इसी पुस्तक के अगले लेखों में पढ़ेंगे। इस भावनाओं को गहराई सेअपने अंतःकरणों में जब हम जान लेंगे, तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग आकांक्षा के रूप मेंप्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेक देवता, अनेक महामानव, नर तन में नारायण रूप धारण करके प्रगट हो पड़ेंगे। युगपरिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है, वह पहले आकांक्षा के रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार कासूक्ष्म स्वरूप यह युग निर्माण सत्संकल्प है, इसके महत्त्व का मूल्यांकन हमें गंभीरतापूर्वक ही करनाचाहिए। युग निर्माण सत्संकल्प का प्रारूप निम्न प्रकार हैहमारायुग निर्माण सत्संकल्प —हम ईश्वर कोसर्वव्यापी, न्यायकारीमानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे। —शरीर को भगवान् कामंदिर समझकर आत्म- संयमऔर नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे। —मन को कुविचारों औरदुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रख रहेंगे। —इंद्रिय संयम, अर्थ संयम,समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यासकरेंगे। — अपने आपको समाज का एकअभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे। —मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे औरसमाजनिष्ठ बने रहेंगे। —समझदारी, ईमानदारी,जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एकअविच्छिन्न अंग मानेंगे।—चारों ओर मधुरता, स्वच्छता,सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्नकरेंगे। — अनीति से प्राप्तसफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे। —मनुष्य के मूल्यांकनकी कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं,उसके सद्विचारों और सत्कर्मों कोमानेंगे। —दूसरों के साथ वहव्यवहार न करेंगे, जोहमें अपने लिए पसंद नहीं। —नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे। —संसार मेंसत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय,प्रभाव,ज्ञान,पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूपसे लगाते रहेंगे।—परम्पराओं की तुलनामें विवेक को महत्त्व देंगे। —सज्जनों को संगठितकरने, अनीतिसे लोहा लेने और नव- सृजनकी गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे। —राष्ट्रीय एकता एवंसमता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे। —मनुष्य अपने भाग्य कानिर्माता आप है, इसविश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठबनाएँगे, तोयुग अवश्य बदलेगा। —‘‘हम बदलेंगे- युग बदलेगा’’,‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्णविश्वास है।
युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्या 👏
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