31/01/2024
भारत की एक बहादुर कौम राजपूत,सन् 1840 में काबुल में युद्ध में 8000 पठान मिलकर भी
1200 राजपूतो का मुकाबला 1 घंटे भी नही कर पाये।
वही इतिहासकारो का कहना था की चित्तोड की तीसरी लड़ाई जो 8000 राजपूतो और 60000 मुगलो के मध्य हुयी थी , वहा अगर राजपूत 15000 होते तो अकबर भी जिंदा बचकर नहीं जाता।
"इस युद्ध में 48000 सैनिक मारे गए थे जिसमे 8000
राजपूत और 40000 मुग़ल थे वही 10000 के करीब
घायल थे"।
और दूसरी तरफ गिररी सुमेल की लड़ाई में 15000 राजपूत, 80000 तुर्को से लडे थे, इस पर घबराकर शेर शाह सूरी ने कहा था "मुट्टी भर बाजरे (मारवाड़) की खातिर हिन्दुस्तान की सल्लनत खो बैठता "।
उस युद्ध से पहले जोधपुर महाराजा मालदेव जी नहीं गए
होते तो शेर शाह ये बोलने के लिए जीवित भी नही रहता।
इस देश के इतिहासकारो ने और स्कूल कॉलेजो की किताबो मे आजतक सिर्फ वो ही लडाई पढाई जाती है, जिसमे हम कमजोर रहे। वरना बप्पा रावल और राणा सांगा जैसे योद्धाओ का नाम तक सुनकर मुगल की औरतो के गर्भ गिर जाया करते थे।
रावत रत्न सिंह चुंडावत की रानी हाडा का त्यागपढाया नही गया, जिन्होने अपना सिर काटकर दे दिया था।
पाली के आउवा के ठाकुर खुशहाल सिंह को नही पढाया जाता, जिन्होंने एक अंग्रेज के अफसर का सिर काटकर किले पर लटका दिया था।
जिसकी याद मे आज भी वहां पर मेला लगता है। दिलीप सिंह जूदेव जी के बारे मे नही पढ़ाया जाता, जिनके कारण एक लाख आदिवासियों ने फिर से सनातन धर्म अपनाया था।
महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर
महाराणा प्रताप सिंह
महाराजा रामशाह सिंह तोमर
वीर राजे शिवाजी
राजा विक्रमाद्तिया
वीर पृथ्वीराजसिंह चौहान
हमीर देव चौहान
भंजिदल जडेजा
राव चंद्रसेन
वीरमदेव मेड़ता
बाप्पा रावल
नागभट प्रतिहार(पढियार)
मिहिरभोज प्रतिहार(पढियार)
राणा सांगा
राणा कुम्भा
रानी दुर्गावती
रानी पद्मनी
रानी कर्मावती
भक्तिमति मीरा मेड़तनी
वीर जयमल मेड़तिया
कुँवर शालिवाहन सिंह तोमर
वीर छत्रशाल बुंदेला
दुर्गादास राठौर
कुँवर बलभद्र सिंह तोमर
मालदेव राठौर
बाबू वीर कुँवर सिंह
महाराणा राजसिंह
विरमदेव सोनिगरा
राजा भोज
राजा हर्षवर्धन बैस
बन्दा सिंह बहादुर
राऊ बज्जर सिंह राठौड़
इन जैसे महान योद्धाओं को नही पढ़ाया/बताया जाता है, जिनके नाम के स्मरण मात्र से ही शत्रुओं के शरीर में आज भी कंपकंपी शुरू हो जाती है।
जय हिंद 🙏
31/01/2024
पुण्य तिथि....राणा सांगा
जन्म: 12 April 1482 चित्तौरगढ़
मृत्यु: 30 जनवरी, 1528 माण्डलगढ (भीलवाड़ा)
पिता: राणा रायमल
जीवनसंगी: रानी कर्णावती
बच्चे: उदय सिंह, भोजराज , रतन सिंह, विक्रमादित्य सिंह
राष्ट्रीयता: भारतीय
धर्म : हिन्दू
महाराणा कुम्भा के बाद महाराणा संग्रामसिंह जो कि सांगा के नाम से प्रसिद्ध है. मेवाड़ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक हुआ. उसने अपने शक्ति के बल पर मेवाड़ सम्राज्य का विस्तार किया एवं राजपूताना के सभी नरेशों को अपने अधीन संगठित किया.
रायमल की मृत्यु के बाद 1509 में राणा सांगा मेवाड़ का महाराणा बना. सांगा ने अन्य राजपूत सरदारों के साथ शक्ति को संगठित किया
इन्होने पड़ोसी राज्य गुजरात के शासक महमूद से भी संघर्ष किया. कुम्भाकालीन गौरव प्राप्त करने की दृष्टि से मुस्लिम शक्तियों के के विरुद्ध संघर्ष करना जरुरी था. सांगा का गुजरात के बादशाह से 1520 में संघर्ष हुआ था. जिसमें सांगा विजयी रहे थे.
इसी प्रकार मालवा के सुलतान महमूद खिलजी को भी सांगा ने परास्त कर जेल में कैद कर दिया. बाद में अच्छा व्यवहार करने की शर्त पर उसे रिहा कर दिया. राणा सांगा ने अपनी शक्ति को संगठित कर दिल्ली सल्तनत के अधीनस्थ मेवाड़ के निकटवर्ती भागों को अपने राज्य में मिलाना शुरू कर दिया.
सन 1517 में दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी व सांगा में खतौली का युद्ध हुआ, जिसमे सुलतान बुरी तरह पराजित हुआ. पराजय के बाद सुलतान को सांगा ने बाड़ी के युद्ध में और पराजित किया. स्थानीय साहित्य में उल्लेख मिलता है कि राणा सांगा ने कई बार दिल्ली, मांडू और गुजरात के सुल्तानों को पराजित किया था.
राणा सांगा के युद्ध और उपलब्धियाँ
पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहीम लोदी को परास्त कर दिल्ली सल्तनत पर बाबर ने अधिकार कर लिया. उसके लिए असली चुनौती सांगा ही थे. क्योकिं उस समय राणा सांगा ही एकमात्र ऐसें व्यक्ति थे जो दिल्ली पर शासन स्थापित करने की क्षमता रखते थे.
उस समय शक्ति का केंद्र मेवाड़ बन गया. सभी पडौसी राज्य राणा सांगा की शक्ति को मान्यता देने लगे थे. कर्नल टॉड के अनुसार 7 उच्च श्रेणी के राजा, 9 राव व 104 सरदार सदैव उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे.
बाबर और राणा सांगा के मध्य सता की स्थापना को लेकर संघर्ष निश्चिन्त था. बाबर ने प्रारम्भ में धौलपुर व कालवी पर अधिकार कर लिया. बयाना पर सांगा का अधिकार था.
सांगा ने बयाना के युद्ध में मुगलों को बुरी तरह पराजित किया था. मुग़ल सैनिकों ने सांगा के शौर्य के किस्से बाबर व अन्य सैनिकों को बताये. इससे बाबर की सेना का मनोबल टूटा.
राणा सांगा और बाबर के मध्य खानवा का युद्ध
सन 1527 में बाबर व राणा सांगा के मध्य खानवा का युद्ध हुआ. राणा के प्रहार से मुग़ल सेना प्रारम्भ में विचलित होने लगी. बाबर ने राजपूतों के पाश्र्व भाग पर आक्रमण कर दिया. इसी बिच तीर लगने से राणा घायल हो गया. राणा को बेहोश अवस्था में युद्ध के मैदान से हटा दिया.
होश आने पर राणा सांगा ने पुनः बाबर से लड़ने की इच्छा प्रकट की, लेकिन सामंतो ने खानवा में हुए विनाश की बात कहकर, ऐसा नही करने की सलाह दी.
तभी सांगा ने प्रतिज्ञा की ” कि जब तक वह बाबर को हरा नही देगा, वापिस चित्तोड़ नही जाएगा” राणा सांगा ने जनवरी 1528 में बाबर के विरुद्ध चंदेरी के मोदिनिराय की सहायता के लिए प्रस्थान किया. लेकिन कालपी से थोड़ा दूर स्वास्थ्य खराब होने के कारण 30 जनवरी 1528 को इनका देहांत हो गया.
महाराणा सांगा अंतिम हिन्दू सम्राट था जिसने अपने नेतृत्व में सभी राजपूत शासकों को को विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा करने और उनसे वीरतापूर्ण मुकाबला करने के लिए संगठित किया.
राणा सांगा का व्यक्तित्व और इतिहास में स्थान
महाराणा के नेतृत्व में 108 राजा महाराजा लड़ते थे. उन्होंने सदैव निरंतर युद्ध, शौर्य और पराक्रम से देश की रक्षा की. इसी भावना से प्रेरित होकर जनता ने भी महाराणा का पूरा साथ दिया.
राणा सांगा ने इसी प्रेरणा से दिल्ली, मांडू और गुजरात के शासकों को हराया ही नही बल्कि उन्हें बंदी बनाकर छोड़ दिया.
राजपूताने के सभी राजा व बाहरी राजा भी राणा सांगा की अधीनता व मेवाड़ के गौरव के कारण उसके झंडे के नीचे लड़ना अपना गौरव समझते थे. ‘राणा सांगा’ के शरीर पर 80 घाव तथा युद्ध में एक हाथ और पैर क्षतिग्रस्त होने पर भी उनका शरीर वज्र की तरह मजबूत था.
उन्होंने हिम्मत मर्दानगी और वीरता को अपनाकर अपने आप को अमर बना दिया. हरबिलास शारदा लिखते है कि ‘मेवाड़ के महाराणाओं में राणा सांगा सर्वाधिक प्रतापी शासक हुए. उन्होंने अपने पुरुषार्थ के द्वारा मेवाड़ को उन्नति के शिखर पर पहुचाया.
इतना होने पर भी अनतः “राणा सांगा” विदेशी शत्रु की कुटिल चाल और युद्ध कौशल को नही समझ पाये और युद्ध की नवीन तकनीक को नही अपना सके. इसका शत्रु ने लाभ उठाया.
31/01/2024
यह पानी की बोतल, नाइक गुलाब सिंह (वीर चक्र मरणोपरांत, 13 कुमाऊं रेजिमेंट) की है। इसपर पड़े गोलियों के निशान शत्रु की फायरिंग का घनत्व बता रहे हैं जो युद्ध की भीषणता को समझाने में पर्याप्त हैं। नवंबर 1962 में लद्दाख में रेज़ांगला की लड़ाई में चीनी मशीन गन की स्थिति पर गुलाब सिंह ने सीधे हमला किया। इस लड़ाई में उस दिन अमर होने वाले 114 भारतीय सैनिकों में से एक नाइक गुलाब सिंह भी थे जो हरियाणा रेवाड़ी के मनेठी गाँव में पैदा हुए थे। इस टुकड़ी के 120 वीरों की वजह से ही आज लद्दाख भारत का हिस्सा बना हुआ है।
मेजर-जनरल इयान कार्डोज़ो अपनी पुस्तक "परम वीर, अवर हीरोज इन बैटल" में लिखते हैं:
जब रेज़ांग ला को बाद में बर्फ हटने के बाद फिर से देखा गया तो खाइयों में मृत जवान पाए गए जिनकी उँगलियाँ अभी भी अपने हथियारों के ट्रिगर पर थी ... इस कंपनी का हर एक आदमी कई गोलियों या छर्रों के घावों के साथ अपनी ट्रेंच में मृत पाया गया। मोर्टार मैन के हाथ में अभी भी बम था। मेडिकल अर्दली के हाथों में एक सिरिंज और पट्टी थी जब चीनी गोली ने उसे मारा ...। सात मोर्टार को छोड़कर सभी को एक्टिव किया जा चुका था और बाकी सभी मोर्टार पिन निकाल दागे जाने के लिए तैयार थे। यह संसार का सबसे भीषण लास्ट स्टैंड वारफेयर था जहाँ 120 वीरों ने वीरता से लड़ते हुए 1300 चीनी सैनिकों को मार डाला था और लद्दाख को चीन द्वारा कब्जाने के मसूबों पर पानी फेर दिया।
स्वतंत्रता की कीमत चुकानी होती है, यह मुफ़्त में नहीं मिलती ...
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