27/08/2026
🌧️ छुट्टी के दिन भी स्कूल साथ चलता है… 🏫
आज छुट्टी है…
घर पर बैठी हूँ…
लेकिन दिमाग में स्कूल की घंटी बज रही है! 😅🔔
🍲 कल स्कूल में दाल-रोटी बननी है…
✅ आटा है या नहीं?
✅ दाल पर्याप्त है या नहीं?
✅ प्याज और टमाटर बचे हैं या खत्म?
✅ सब्ज़ियाँ आज ही ले जानी होंगी या कल मिल जाएँगी?
क्योंकि मेरा स्कूल कस्बे से करीब 5–6 किलोमीटर अंदर है।
वहाँ हर सामान आसानी से नहीं मिलता…
और मिल भी जाए तो कई बार दोगुने दाम पर! 💸
बाहर ₹100 की चीज़…
गाँव में ₹150–₹200 तक! 😟
और एक चिंता ये भी रहती है कि स्कूल का समय सुबह 7:45 बजे पहुँचने का होता है और हम उससे काफी पहले, करीब 6:30 बजे घर से निकलते हैं।
अब अगर कोई जरूरी सामान सुबह लेकर जाना रह गया तो…
❓ उस समय दुकान खुली होगी या नहीं?
❓ इतनी सुबह सामान मिल पाएगा या नहीं?
क्योंकि स्कूल पहुँचने के बाद सामान लेने के लिए वापस कस्बे की तरफ जाना भी आसान नहीं है।
इसलिए स्कूल की व्यवस्था चलाना भी किसी मिशन से कम नहीं…
हर सामान सोच-समझकर खरीदना पड़ता है।
कुछ भूल गए तो—
“मैडम, गाँव से मंगवा लीजिए…”
और फिर मजबूरी का फायदा उठाने वाले तैयार! 😅
मतलब…
🏠 घर की रसोई भी दिमाग में
🏫 स्कूल की रसोई भी दिमाग में
और ऊपर से आज सुबह से घंघरी बारिश हो रही है… 🌧️
बारिश होते ही मन स्कूल पहुँच जाता है—
❓ रसोई का सामान खुले में तो नहीं रह गया?
❓ छत से पानी तो नहीं टपक रहा?
❓ कमरों में पानी तो नहीं भर गया?
❓ रसोई में पानी तो नहीं आ रहा?
❓ अनाज और तेल सुरक्षित हैं या नहीं?
❓ बिजली की कोई समस्या तो नहीं हुई?
❓ दरवाजे-खिड़कियाँ ठीक से बंद हैं या नहीं?
❓ परिसर में पानी जमा होकर बच्चों के लिए खतरा तो नहीं बन गया?
और मैं…
अपने स्कूल से करीब 35 किलोमीटर दूर बैठी हूँ। 🚗
फिर भी मन वहीं अटका हुआ है… ❤️
कब फोन आ जाए—
📞 “मैडम, स्कूल में पानी भर गया है…”
📞 “मैडम, कमरों में पानी आ गया है…”
📞 “मैडम, छतें चू रही हैं…”
📞 “मैडम, सामान खराब हो रहा है…”
और फिर…
छुट्टी, छुट्टी नहीं रह जाती! 😅
एक इंचार्ज प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारियाँ सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं होतीं—
📚 बच्चों की पढ़ाई
🍛 मध्यान्ह भोजन
🧂 रसोई का सामान
🧹 साफ-सफाई
🏫 भवन की स्थिति
💧 पानी और बिजली
🛡️ बच्चों की सुरक्षा
⚠️ अचानक आने वाली हर समस्या
स्कूल अगर कस्बे से दूर और गाँवों के बीच हो, त