सांदीपनि गुरुकुल स्वाध्याय केंद्र

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🌹 #गुप्त_सप्तशती_और_कुञ्जिका_स्तोत्र🌹सात सौ मन्त्रों की “श्री दुर्गा सप्तशती”, का पाठ करने से साधकों का जैसा कल्याण होता...
26/07/2026

🌹 #गुप्त_सप्तशती_और_कुञ्जिका_स्तोत्र🌹
सात सौ मन्त्रों की “श्री दुर्गा सप्तशती”, का पाठ करने से साधकों का जैसा कल्याण होता है, वैसा-ही कल्याणकारी गुप्त-सप्तशती का पाठ है। यह “गुप्त-सप्तशती” प्रचुर मन्त्र-बीजों के होने से आत्म-कल्याणेछु साधकों के लिए अमोघ फल-प्रद है।

इसके पाठ का क्रम :- प्रारम्भ में “कुञ्जिका-स्तोत्र”, उसके बाद “गुप्त-सप्तशती”, तदन्तर “स्तवन” का पाठ करें।

कुञ्जिका-स्तोत्र ::

पूर्व-पीठिका :-

श्रृणु देवि, प्रवक्ष्यामि कुञ्जिका-मन्त्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेन चण्डीजापं शुभं भवेत्॥1॥

न वर्म नार्गला-स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासं च न चार्चनम्॥2॥

कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्। अति गुह्यतमं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥ 3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्व-योनि-वच्च पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।

पाठ-मात्रेण संसिद्धिः कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्॥ 4॥

अथ मंत्र ::

ॐ श्लैं दुँ क्लीं क्लौं जुं सः ज्वलयोज्ज्वल ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल प्रबल-प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।

इति मंत्रः॥

इस “कुञ्जिका-मन्त्र” का यहाँ दस बार जप करें। इसी प्रकार “स्तवन-पाठ” के अन्त में पुनः इस मन्त्र का दस बार जप कर “कुञ्जिका स्तोत्र” का पाठ करें।

कुञ्जिका स्तोत्र मूल-पाठ ::

नमस्ते रुद्र-रूपायै, नमस्ते मधु-मर्दिनि। नमस्ते कैटभारी च, नमस्ते महिषासनि॥

नमस्ते शुम्भहंत्रेति, निशुम्भासुर-घातिनि। जाग्रतं हि महा-देवि जप-सिद्धिं कुरुष्व मे॥

ऐं-कारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका॥ क्लीं-कारी कामरूपिण्यै बीजरूपा नमोऽस्तु ते।

चामुण्डा चण्ड-घाती च यैं-कारी वर-दायिनी॥ विच्चे नोऽभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि॥

धां धीं धूं धूर्जटेर्पत्नी वां वीं वागेश्वरी तथा। क्रां क्रीं श्रीं मे शुभं कुरु, ऐं ॐ ऐं रक्ष सर्वदा॥

ॐ ॐ ॐ-कार-रुपायै, ज्रां-ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि, शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥

ह्रूं ह्रूं ह्रूं-काररूपिण्यै ज्रं ज्रं ज्रम्भाल-नादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवानि ते नमो नमः॥

मन्त्र ::

अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराविर्भव, आविर्भव, हं सं लं क्षं मयि जाग्रय-जाग्रय, त्रोटय-त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा॥ म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा, कुञ्जिकायै नमो नमः॥

सां सीं सप्तशती-सिद्धिं, कुरुष्व जप-मात्रतः॥

इदं तु कुञ्जिका-स्तोत्रं मंत्र-जाल-ग्रहां प्रिये। अभक्ते च न दातव्यं, गोपयेत् सर्वदा श्रृणु॥

कुंजिका-विहितं देवि यस्तु सप्तशतीं पठेत्। न तस्य जायते सिद्धिं, अरण्ये रुदनं यथा॥

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्।

गुप्त-सप्तशती ::

ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-बटुकैर्हां गणेशस्य माता।

स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-मार्गे॥

हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-देवी समस्ता।

हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे नमस्ते॥1॥

ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-मुण्डौ प्रचण्डे।

खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे स्वरुपे॥

हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।

हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते॥2॥

ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान् हन्यमाने।

घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-रावे॥

निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-नेत्रे।

हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते नमस्ते॥3॥

ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले, कोकिलेनानुरागे।

मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-मारि गुह्ये॥

तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-निधाने।

ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते नमस्ते॥4॥

ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-रुपेण चक्रे।

त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं पूर्व-वर्णे॥

ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते, कोशिनि कोश-पत्रे।

स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे नमस्ते॥5॥

ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।

ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने प्रधाने॥

द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे काल-मुण्डे।

सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे नमस्ते॥6॥

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-योनि-स्वरुपे।

वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-रुढे॥

स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-जाले।

किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे, ऐन्द्रि मातर्नमस्ते॥7॥

ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-नाथे।

सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-भक्षे प्रचण्डे॥

जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं समुद्रे।

देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-काली नमस्ते॥8॥

ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-स्वरुपा।

त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं कुमारी महेन्द्री॥

ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-मार्गे।

पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-चण्डी नमस्ते॥9॥

हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-विघ्नान्त-विघ्ने।

गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-साध्ये॥

वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं निनादे।

हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी, त्वां महेशीं नमामि॥10॥

स्तवन ::

या देवी खड्ग-हस्ता, सकल-जन-पदा, व्यापिनी विशऽव-दुर्गा।

श्यामांगी शुक्ल-पाशाब्दि जगण-गणिता, ब्रह्म-देहार्ध-वासा॥

ज्ञानानां साधयन्ती, तिमिर-विरहिता, ज्ञान-दिव्य-प्रबोधा।

सा देवी, दिव्य-मूर्तिर्प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥1॥

ॐ हां हीं हूं वर्म-युक्ते, शव-गमन-गतिर्भीषणे भीम-वक्त्रे।

क्रां क्रीं क्रूं क्रोध-मूर्तिर्विकृत-स्तन-मुखे, रौद्र-दंष्ट्रा-कराले॥

कं कं कंकाल-धारी भ्रमप्ति, जगदिदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती-

हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥2॥

ॐ ह्रां ह्रीं हूं रुद्र-रुपे, त्रिभुवन-नमिते, पाश-हस्ते त्रि-नेत्रे।

रां रीं रुं रंगे किले किलित रवा, शूल-हस्ते प्रचण्डे॥

लां लीं लूं लम्ब-जिह्वे हसति, कह-कहा शुद्ध-घोराट्ट-हासैः।

कंकाली काल-रात्रिः प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥3॥

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोर-रुपे घघ-घघ-घटिते घर्घराराव घोरे।

निमाँसे शुष्क-जंघे पिबति नर-वसा धूम्र-धूम्रायमाने॥

ॐ द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती, सकल-भुवि-तले, यक्ष-गन्धर्व-नागान्।

क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥4॥

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भद्र-काली, हरि-हर-नमिते, रुद्र-मूर्ते विकर्णे।

चन्द्रादित्यौ च कर्णौ, शशि-मुकुट-शिरो वेष्ठितां केतु-मालाम्॥

स्त्रक्-सर्व-चोरगेन्द्रा शशि-करण-निभा तारकाः हार-कण्ठे।

सा देवी दिव्य-मूर्तिः, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥5॥

ॐ खं-खं-खं खड्ग-हस्ते, वर-कनक-निभे सूर्य-कान्ति-स्वतेजा।

विद्युज्ज्वालावलीनां, भव-निशित महा-कर्त्रिका दक्षिणेन॥

वामे हस्ते कपालं, वर-विमल-सुरा-पूरितं धारयन्ती।

सा देवी दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥6॥

ॐ हुँ हुँ फट् काल-रात्रीं पुर-सुर-मथनीं धूम्र-मारी कुमारी।

ह्रां ह्रीं ह्रूं हन्ति दुष्टान् कलित किल-किला शब्द अट्टाट्टहासे॥

हा-हा भूत-प्रभूते, किल-किलित-मुखा, कीलयन्ती ग्रसन्ती।

हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥7॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कपालीं परिजन-सहिता चण्डि चामुण्डा-नित्ये।

रं-रं रंकार-शब्दे शशि-कर-धवले काल-कूटे दुरन्ते॥

हुँ हुँ हुंकार-कारि सुर-गण-नमिते, काल-कारी विकारी।

त्र्यैलोक्यं वश्य-कारी, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥8॥

वन्दे दण्ड-प्रचण्डा डमरु-डिमि-डिमा, घण्ट टंकार-नादे।

नृत्यन्ती ताण्डवैषा थथ-थइ विभवैर्निर्मला मन्त्र-माला॥

रुक्षौ कुक्षौ वहन्ती, खर-खरिता रवा चार्चिनि प्रेत-माला।

उच्चैस्तैश्चाट्टहासै, हह हसित रवा, चर्म-मुण्डा प्रचण्डे॥9॥

ॐ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री स च शिखि-गमना त्वं च देवी कुमारी।

त्वं चक्री चक्र-हासा घुर-घुरित रवा, त्वं वराह-स्वरुपा॥

रौद्रे त्वं चर्म-मुण्डा सकल-भुवि-तले संस्थिते स्वर्ग-मार्गे।

पाताले शैल-श्रृंगे हरि-हर-नमिते देवि चण्डी नमस्ते॥10॥

रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते वा।

संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते वा॥

व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च दुर्गे।

रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥11॥

इत्येवं बीज-मन्त्रैः स्तवनमति-शिवं पातक-व्याधि-नाशनम्।

प्रत्यक्षं दिव्य-रुपं ग्रह-गण-मथनं मर्दनं शाकिनीनाम्॥

इत्येवं वेद-वेद्यं सकल-भय-हरं मन्त्र-शक्तिश्च नित्यम्।

मन्त्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते प्रार्थितां मन्त्र-सिद्धिम्॥12॥

चं-चं-चं चन्द्र-हासा चचम चम-चमा चातुरी चित्त-केशी।

यं-यं-यं योग-माया जननि जग-हिता योगिनी योग-रुपा॥

डं-डं-डं डाकिनीनां डमरुक-सहिता दोल हिण्डोल डिम्भा।

रं-रं-रं रक्त-वस्त्रा सरसिज-नयना पातु मां देवि दुर्गा॥13॥

25/07/2026
शिवपूजन विधि
25/07/2026

शिवपूजन विधि

25/07/2026
कल्याण वृष्टि स्तोत्रम।।श्रीगणेशाय नमः! श्री त्रिपुरसुन्दरीये नमः।।                ॥ क॥कल्पान्तोदित-चण्डभानु-विलसद्-देह-...
24/07/2026

कल्याण वृष्टि स्तोत्रम।।
श्रीगणेशाय नमः! श्री त्रिपुरसुन्दरीये नमः।।
॥ क॥
कल्पान्तोदित-चण्डभानु-विलसद्-देह-प्रभामण्डिता
कालाम्भोद-समान-कुन्तल-भरा कारुण्यवारां निधिः।
काद्यर्णाङ्कित-मन्त्रराज-विलसत्-कूट-त्रयोपासिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥१॥

॥ ए॥
एतत्-प्राभव-शालिनीति निगमैरद्याप्यनालोचिता
हेमाम्भोज-मुखी चलत्-कुवलय-प्रस्पर्धमानेक्षणा।
एणाङ्कांश-समान-फाल-फलक-प्रोल्लासि-कस्तूरिका
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥२॥

॥ ई॥
ईषत्-फुल्ल-कदम्ब-कुण्डल-महा-ईषत्-फुल्ल-कदम्ब-कुण्डल-महालावण्य-गर्वागर्वापहा स्निग्ध-स्वच्छ-सुदन्त-कान्ति-विलसन्मन्द-स्मिताऽलंकृता।
ईशित्वाद्यखिलेष्ट-सिद्धि-फलदा भक्त्या नतानां सदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥३॥

॥ ल॥
लक्ष्यालक्ष्यावलग्न-देश-विलसद्-रोमावली-वल्लरी वृत्त-स्निग्ध-फल-द्वय-भ्रम-करोत्तुङ्ग-स्तनी सुन्दरी।
रक्ताशोक-शुभ-प्रपाटल-दुकूलाच्छादिताङ्गी मुदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥४॥

॥ ह्रीं॥
ह्रींङ्कारी सुर-वाहिनी जल-गभीरावर्तनाभिर्धन-
श्रोणी-मण्डल-भार-मन्द गमना-काञ्ची-कलापोज्ज्वला ।
शुण्डादण्ड-सुवर्ण-वर्ण-कदली-काण्डोपमोरु-द्वयी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥५॥

॥ ह॥
हस्त-प्रोज्ज्वलदिक्षु-कार्मुक-लसत्-पुष्पेषु-पाशांकुशा
ह्याद्यर्णाङ्कित-मन्त्रराज-निलया हारादिभिर्भूषिता।
हस्त-प्रान्त-रणत्-सुवर्ण-वलया हर्यक्ष-सम्पूजिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥६॥

॥ स॥
संरक्ताम्बुज-पाद-युग्म-विलसन्मञ्जु-क्वणन्नूपुरा संसारार्णव-तारणैक-तरणिर्लावण्य-वारां निधिः ।
लीला-लोल-तमं शुकं मधुरया संलालयन्ती गिरा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥७॥

॥ क॥
कल्याणी करुणा-रसार्द्र-हृदया कल्याण-सन्दायिनी काद्यर्णाङ्कित-मन्त्र-लक्षित-तनुस्तन्वी तमो-नाशिनी ।
कामेशाङ्क-विलासिनी कल-गिरामावास-भूमिः शिवा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ८॥

॥ ह॥
हन्तुं दानव-पुङ्गवं रण-भुवि प्रोच्चण्ड-भण्डाभिधं
हर्यक्षाद्यमरार्थिता भगवती दिव्यां तनूमाश्रिता ।
श्रीमाता ललितेत्यचिन्त्य-विभवैर्नाम्नां सहस्रैः स्तुता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ९॥

॥ ल॥
लक्ष्मीर्वाग-गजादिभिर्बहु-विधैः रूपैः स्तुताऽपि स्वयं
नी-रूपा गुण-वर्जिता त्रि-जगतां माता च चिद्-रूपिणी ।
भक्तानुग्रह-कारणेन ललितं रूपं समासादिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १०॥

॥ ह्रीं॥
ह्रीङ्कारैक-परायणार्त-जनता-संरक्षणे दीक्षिता
हार्दासं तमसं व्यपोहित-मलं भूष्णुर्हर-प्रेयसी ।
हत्यादि-प्रकटाघ-सङ्घ-दलने दक्षा च दाक्षायणी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ११॥

॥ स॥
सर्वानन्द-मयी समस्त-जगतामानन्द-सन्दायिनी
सर्वोत्तुङ्ग-सुवर्ण-शैल-निलया सा सार-साक्षी सती ।
सर्वैर्योगि-चयैः सदैव विचिता साम्राज्य-दान-क्षमा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १२॥

॥ क॥
कन्या-रूप-धरा गलाब्ज-विलसन्मुक्ता-लताऽलंकृता
कादि-क्षान्तमनु-प्रविष्ट-हृदया कल्याण-शीलान्विता ।
कल्पान्तोद्भट-ताण्डव-प्रमुदिता श्रीकाम-जित्-साक्षिणी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १३॥

॥ ल॥
लक्ष्या भक्ति-रसार्द्र-हृत्-सरसिजे सद्भिः सदाऽऽराधिता
सान्द्रानन्द-मयी सुधाकर-कला खण्डोज्ज्वलन्मौलिका ।
शर्वाणी शरणागताऽऽर्ति-शमिनी सच्चिन्मयी सर्वदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १४॥

॥ ह्रीं॥
ह्रीङ्कार-त्रय-सम्पुटाऽति-महता मन्त्रेण सम्पूजिता
होत्री चन्द्र-समीरणाऽग्नि-जल-भू-भास्वन्नभो-रूपिणी ।
हंसः सोहमिति प्रकृष्ट-धिषणैराराधिता योगिभिः
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १५॥

॥ श्रीं॥
श्रीङ्काराम्बुज-हंसिकाऽऽश्रित-जन-क्षेमङ्करी शङ्करी
श‍ृङ्गारैक-रसाकरस्य मदनस्योज्जीविका-वल्लरी ।
श्रीकामेशरहः-सखी च ललिता श्रीमद्-गुहाऽऽराधिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १६॥

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