Director at Mehta Commerce Coaching Centre

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Director at Mehta Commerce Coaching Centre MCCC

14/02/2024

*🌹हमारे वैलेंटाइन्स !!🌹*

*जिस माँ की कोख में*
*हम रहे महीने पूरे Nine !*
*वो ही हैं हमारी पहली*
*और असली Valentine !!*

🌹
*जो बहन-भाई देखना चाहते हैं*
*अपने भाई-बहन को Fit -n- Fine !*
*वो ही है हमारे दूसरे*
*और प्यारे Valentine !!*

🌹
*जिस पिता को जिम्मेदारियों से,*
*कभी नही मिलता Resign !*
*वो ही हैं हमारे तीसरे*
*और सर्वश्रेष्ठ Valentine !!*

🌹
*हमें देखकर जिन*
*दादी-दादा, नानी-नाना*
*की आँखों में*
*आ जाता है Shine !*
*वो ही हैं हमारी चौथे*
*और स्नेही Valentine !!*

🌹
*जिन बुआ-फूफाजी*
*और मौसा- मौसी जी*
*के प्यार को*
*नहीं कर सकते Define !*
*वो ही हैं हमारे पांचवें*
*और स्पैशल Valentine !!*

🌹
*जिन मित्रों के बीच*
*नहीं होती है*
*जाति और धर्म की Line !*
*वो ही हैं हमारे छठे*
*और खास Valentine !!*

🌹
*जो जीवन साथी*
*हमारे काम आते हैं,*
*सुख-दुख में हर Time !*
*वो ही है हमारे सातवें*
*और जन्म-जन्म के Valentine !!*

🌹
*जिन बेटा-बेटी ने कर दी,*
*हमारी ज़िंदगी Design !*
*वे ही हैं हमारे आठवें*
*और लाड़ले Valentine !!*

🌹
*तो ये हैं सारे हमारे*
*एक दूसरे के लिए*
*सच्चे प्रेम के Sign !*
*हम सब ही हैं,*
*एक दूसरे के Valentine !!*

*🌹"Happy*
*Valentine's Week !!"🌹*
🌹💞🌹❣️🌹💞🌹

20/06/2022

*यात्रा बहुत छोटी है*
एक बुजुर्ग महिला बस में यात्रा कर रही थी। अगले पड़ाव पर, एक मजबूत, क्रोधी युवती चढ़ गई और बूढ़ी औरत के बगल में बैठ गई। उस क्रोधी युवती ने अपने बैग से कई बार चोट पहुंचाई।

जब उसने देखा कि बुजुर्ग महिला चुप है, तो आखिरकार युवती ने उससे पूछा कि जब उसने उसे अपने बैग से मारा तो उसने शिकायत क्यों नहीं की?

बुज़ुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया: "इतनी तुच्छ बात पर चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आपके बगल में मेरी यात्रा बहुत छोटी है, मैं अगले पड़ाव पर उतरने जा रही हूं।"

यह उत्तर सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य है: "इतनी तुच्छ बात पर चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारी यात्रा एक-साथ बहुत छोटी है।"

हम में से प्रत्येक को यह समझना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा समय इतना कम है कि इसे बेकार तर्कों, ईर्ष्या, दूसरों को क्षमा न करना, असंतोष रखना और बुरा व्यवहार दर्शाना आदि में खर्च करना, ऊर्जा की हास्यास्पद बर्बादी है।

क्या किसी ने आपका दिल तोड़ा? शांत रहें।
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने आपको धोखा दिया, धमकाया, धोखा दिया या अपमानित किया? आराम करें - तनावग्रस्त न हों
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने बिना वजह आपका अपमान किया? शांत रहें। इसे नजरअंदाज करो।
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी पड़ोसी ने ऐसी टिप्पणी की जो आपको पसंद नहीं आई? शांत रहें। उसकी ओर ध्यान मत दो। उसे माफ कर दो।
यात्रा बहुत छोटी है।

किसी ने हमें जो भी समस्या दी है, याद रखें कि हमारी यात्रा उसके साथ बहुत छोटी है।

हमारी यात्रा की लंबाई कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि वह अपने पड़ाव पर कब पहुंचेगा।
हमारी एक-साथ यात्रा बहुत छोटी है।

*आइए हम दोस्तों और परिवार की सराहना करें।*
*आइए हम आदरणीय, दयालु और क्षमाशील बनें।*

*क्योंकि आखिरकार हम कृतज्ञता और आनंद से भर जाएंगे after all*
*हमारी एक-साथ यात्रा बहुत छोटी है।*

*अपनी मुस्कान सबके साथ बाँटिये ना....💐💐*
*हमारी यात्रा बहुत छोटी है!*
जय श्री कृष्ण

🙏 सुनील कुमार मेहता

01/03/2022

दर्पण
____________________________________________
रसोई में खाना बना रही नव्या के कानों में शहद में डूबे, मिश्री घुले हुए बोलों के टुकड़े पहुँच रहे थे। सुनते हुए उसका मन-मस्तिष्क बार-बार मायके की मखमली गलियों में पहुँच जा रहा था, जहाँ माँ के ममतामयी आँचल की शीतल छाया लहराती दिख रही थी।
"मेरी राजकुमारी के बाल कितने सुन्दर हैं, एकदम रेशमी!...किसी की नज़र ना लगे!"
नव्या की सास मालिनी देवी उसकी इकलौती ननद शुचि के बालों में तेल लगाते उसकी बलाएँ लेती हुई बोलती जा रही थीं।
"ओफ्फो ममा! अब बस करो, कितना और लगाओगी। मुझे पार्लर जाना है, फेशियल और स्पा के लिए, अब छोड़ो आप अपना देसी नुस्खा!"
मोबाइल फोन की स्क्रीन में खोयी हुई शुचि को अचानक ध्यान आया कि उसे देर हो रही है, उसकी सहेलियाँ आती ही होंगी, जिनके साथ उसने ब्यूटीपार्लर जाना तय किया हुआ था।
"ठीक है बेटा, चली जाना...लेकिन सनस्क्रीन लोशन लगा कर जाना! मैंने बादाम भिगोए थे रात में तुम्हारे लिए। छील कर भी रखे हैं, खा कर जाना!...और हाँ! मसूर की दाल भी दूध में भिगो कर रखी है, नव्या को बोल देती हूँ, पीस कर रख देगी। ज़रूर लगा लेना चेहरे पर, खूब लुनाई आती है उससे...और रात में वो न्यूट्रीशन वाला लोशन लगाया था कि नहीं सोने से पहले?... बड़ी मुश्किल से मिला है, कई मेडिकल स्टोर की खाक छानने के बाद... वैसे तो मेरी लाडो पहले से ही बड़ी सलोनी है, पर मैं चाहती हूँ कि सगाई और शादी वाले दिन दुनिया में सबसे सुन्दर दिखे! ...मेरा होने वाला दामाद भी तो लाखों में एक है, एकदम राजकुमार!" प्यार भरी हुई बोली के एक-एक शब्द से दर्प भी छलका पड़ रहा था।
इस मध्यम-वर्गीय परिवार में माँ-बेटी के लाड़-दुलार वाला यह दृश्य आजकल लगभग रोज की ही बात हो चली थी, जब से शुचि का ब्याह उनसे कहीं अमीर घर के सुयोग्य बेटे से तय हुआ था। उच्च-व्यवसायी, सम्पन्न घर का सुदर्शन, सौम्य लड़का और छोटा सुखी परिवार। लड़के वालों की माँग केवल इतनी थी कि लड़की अति सुंदर, उच्च शिक्षित, गृहकार्यों में दक्ष हो तथा विवाह समारोह का आयोजन बहुत ही धूमधाम, शानो-शौक़त से हो। दहेज की कोई विशेष माँग नहीं थी, बस जो कन्यापक्ष स्वेच्छा से देना चाहे।
इस ममत्व से सराबोर वातावरण में अचानक दृश्य परिवर्तन हुआ जब शुचि के चिल्लाने का स्वर सुनाई दिया,
"ममाsss मेरी लेदर वाली नयी जूती भीगी कैसे दिख रही है! किसने किया यह?"
"अरे! वह तो मैंने नव्या को पॉलिश करने बोला था!...अरी नव्या! कहाँ मर गयी? क्या कर दिया जूती का तूने! शुचि को देर हो रही है और...एक काम ढंग से नहीं कर सकती निकम्मी!"
मालिनी देवी आपे से बाहर होतीं रोज की तरह बहू को कोसने लग गयीं।
बहू नव्या जो सास के लिए चाय और ननद शुचि के लिए बादाम शेक लिए आ खड़ी हुई थी, दोनों में से किसी को दिखाई नहीं दी थी अब तक।
"मम्मी जी! मैंने तो अच्छे से पॉलिश करके जूती सँभाल कर रख दी थी, दीदी के कमरे में ...कहाँ है, दिखाइएगा मुझे!" अकारण के आरोप से सहम-सी गयी थी बेचारी।
जूतियाँ हाथ में लेकर बोली, "चमक से ऐसी दिख रही दीदी! भीगी नहीं है जरा भी।"
"अच्छा, अच्छा! बहस मत कर! ...कोई काम कभी ढंग से करती नहीं है न, तो शुचि को लगा होगा...ले बेटा पी ले ये शेक जल्दी से, तुझे देर हो रही न!"
मालिनी देवी चाय का कप हाथ में लेती हुई बोलीं।
बादाम शेक का एक घूँट पीते ही शुचि मुँह बनाकर बोली, "कैसा फीका-फीका सा लग रहा है भाभी! न जाने कब तुम्हारे हाथों में स्वाद आयेगा ममा के जैसा!"
"फीका तो नहीं था दीदी! मैंने बनाते समय चख कर देखा था थोड़ा सा...!" नव्या धीमी आवाज में अटकती हुई बोली।
"अरी करमजली!...बनवाया मैंने शुचि के लिए और पहले पीकर जूठा तूने कर दिया।...तभी फीका लग रहा इसे!" मालिनी देवी जलती आँखों से नव्या को देखती हुई चीख पड़ीं।
तब तक शेक का पूरा गिलास खाली कर चुकी शुचि मुँह बिचकाती कहने लग गयी, "जाने दो ममा! इनके मायके में किसी ने कुछ अच्छा सिखाया ही नहीं इन्हें!...और ये सब स्पेशल चीजें कभी देखी भी नहीं होंगी अपने घर में तो लालच लग आती होगी! "
इससे पहले कि शुचि की बात पूरी हो पाती, बड़ी देर से सास-ननद की अकारण, लगातार भर्त्सना सुन रही नव्या को अचानक न जाने क्या हुआ, वह हमेशा की तरह सिर झुका लेने के बजाए विचित्र सी दृष्टि से दोनों को घूरने लगी। उसका यह कृत्य दोनों माँ-बेटी के लिए एकदम अप्रत्याशित-सा था।
"देख, देख! इसकी बद्तमीज़ी....कैसे बिना बोले जबान-दराज़ी कर रही है!"
आँखों से अंगारे बरसाती सास की यह बात सुन कर भी आज नव्या ने न नज़रें नीची कीं, न सिर गड़ाया ज़मीन पर, उल्टे उन्हें देख मुस्कुराने लगी और...और फिर धीरे से हँसना शुरू कर दिया। पहले धीमी हँसी, फिर तेज, और तेज। क्रमशः उसकी हँसी का स्वर ऊँचा होता चला गया। ...हा हा हा!...हा हा हा!! वह हँसती चली गयी, बस हँसती चली गयी...!!!
यह अति असाधारण घटना थी दोनों माँ-बेटी के लिए। असम्भव! ऐसा कैसे हो सकता है?
पहले तो कुछ पलों के लिए दोनों भौंचक्की सी उसे देखती रह गयीं। फिर शुचि को जैसे होश आया तो उसने घबरा कर नव्या को कन्धों से पकड़ कर झिंझोड़ डाला।
"क्क..क्या कर रही हो भाभीsss!...पागल हो गयी हो क्या?"
मालिनी देवी अभी भी उसे आग्नेय दृष्टि से देखती हिक़ारत से बोलीं,
"अरे ये तो है ही मनहूस!...मेरी बेटी से जलती रहती है हर घड़ी!...इतने बड़े घर में उसकी शादी होते देख कर सहा नहीं जा रहा है इससे, छोटे घर की है न!"
नव्या की हँसी अचानक रुक गयी। हतप्रभ-सी उन दोनों को एकटक थोड़ी देर देखती रही। फिर सिर नीचे करके एकाएक रोने को हो आयी। कुछ ही देर में फूट-फूट कर रोने लगी। फिर रोती चली गयी, रोती ही चली गयी।
न जाने क्या था उसके रुदन में, उसकी आँखों से झरती करुणा में, मालिनी देवी को अचानक अपने हृदय में मरोड़ सा उठता अनुभव हुआ। शायद उनके भीतर की सास को पीछे धकेल कर कुछ क्षण के लिए माँ सामने आ गयी थी। उस माँ को कुछ और नहीं सूझा तो उसने नव्या को दोनों हाथों से पकड़ कर पास ही सोफे पर बिठाया और बाजू के टेबल पर रखा गिलास पानी से भरकर पकड़ा दिया।
दो-चार घूँट पानी पीकर नव्या थोड़ी सामान्य होती लगी तब उन्होंने गहरी दृष्टि से उसे देखते हुए पूछा, "ये एकाएक क्या हो गया था तुझे री!...तू तो कभी ऐसा नहीं करती थी! ...मेरा तो दिल ही बैठ गया था कि इसके ऊपर कोई साया-वाया तो नहीं आ गया।"
शुचि भी जो हैरानी से उसे ताके जा रही थी, बोल पड़ी, "भाभी डरा ही दिया था तुमने तो...क्या हुआ था अचानक?"
नव्या ने सिर झुका लिया, कुछ न बोलते हुए। चुपचाप एकटक नीचे फर्श को देखने लगी।
"तेरी तबीयत तो ठीक है?...अरी बोल न कुछ!...मेरा मन बहुत घबरा रहा है अब!"
मालिनी देवी उसे हिलाती हुई ध्यान से देखने लगीं।
नव्या ने धीरे से सप्रयास अपनी गर्दन उठायी, सूनी नज़रों से माँ-बेटी की आँखों में झाँकने की कोशिश की, कुछ खोया हुआ तलाशने की भी।
"अब कुछ बोलो भी!" माँ-बेटी की सम्मिलित ध्वनि थी।
दोनों की सवाल करती आँखों में नव्या को पहली बार थोड़ी-बहुत भावनाओं की तपिश महसूस हुई। शायद तभी लंबे समय से हिमशिला सा पड़ा उसका हृदय पिघलने लगा। वह धीरे-धीरे अस्पष्ट स्वर में बोलने का प्रयास लगी,
"मेरी माँ भी ऐसे ही लाड़ लड़ाती थी मुझे मम्मी जी! उनकी आँखों का तारा थी मैं!...मेरे माथे पर आयी एक शिकन उन्हें बेचैन कर देती थी!...मुझे काम सिखाते समय इतनी कोमलता से बोलती थीं कि कुछ भी सीखना कभी पता ही नहीं चला। फिर जब मेरा ब्याह तय हुआ यहाँ, उसके बाद तो मुझे तिनका भी नहीं उठाने देती थीं हाथों से कि उनकी नाज़ुक कली थक न जाए, कभी पानी का एक गिलास नहीं धोने दिया कि हथेली की लाली न घट जाए, सलोनापन फीका न पड़ जाये, जैसे आप दीदी के लिए सोचती हैं!...मगर आज कोई देखने वाला नहीं है,... हाथों की कोई जगह नहीं बची जहाँ कटा या जला न हो, खाना बनाते, झाड़ू-पोंछा-बर्तन करते...बचा-खुचा डिटर्जेंट की मार से फटा हुआ है!"
दोनों का जी धक्क से रह गया सुनकर पहली बार। हैरत की बात थी कि दोनों नव्या को डाँटने या बहस करने के बदले चुपचाप चित्रलिखित सा उसे देख रही थीं आज।
नव्या का स्वर अब स्पष्ट हो चला था।
"मेरी दादीमाँ की बोली कानों में अमृत रस घोलती थी मम्मी जी! सोनचिरैया बोलती थीं वो मुझे...चाची, बूआ, मौसी ...अपनी सभी मामियों तक की लाड़ली थी मैं। सब ही मीठा बोलते थे, कड़वा कभी सुना नहीं था...और आज एक मीठी बोली को तरसते हैं मेरे कान!" नव्या ने सिसकारी सी ली।
"कभी ममता की मूरत रही मेरी माँ भी कितनी बदल चुकी है मायके में!...विदाई के वक्त मुझसे वादा लिया था, आज से ससुराल ही तुम्हारा घर है लाड़ो!...अपने घर को हमेशा जोड़ कर रखना!...मायके के संस्कारों पर कभी आँच न आने देना बिटिया!"
"शायद नज़र कमज़ोर हो गयी हैं अब उनकी...मेरी खोखली हँसी, झूठी मुस्कान पहचान में नहीं आती उन्हें, समझ में आता है...पर क्या मेरा पीला पड़ता चेहरा, गड्ढों में धँसती जा रही आँखें भी नहीं दिखती उनको? ...'बेटी के ससुराल का मामला नाज़ुक होता है, कुछ भी बोलना सही नहीं होता...उससे बेटी का अहित हो सकता है!' मैंने सुना था, वह मेरी दादी से एक बार कह रही थीं।"
"मेरी शादी के समय मेरे भैया जब घर पर चढ़ रहे कर्ज़ के बारे में चिंता जता रहे थे, तो पापा ने बोला था, एक ही बेटी है, अच्छी हैसियत वाले घर में ब्याह हो रहा है, थोड़ी क़ीमत तो चुकानी पड़ेगी बेटा, राज करेगी अपनी नव्या वहाँ! ...अपनी राजकुमारी को वहाँ सब रानी बनाकर रखेंगे, देखना!" एक सिसकारी भरी उसने और बोलना ज़ारी रखा,
"...राजकुमारी..रानी...कौन होती हैं ये, कैसी होती हैं, कैसे रहती हैं ससुराल में, कोई नहीं देखता बाद में!"
नव्या की साँस भर आयी थी लगातार बोलते-बोलते। वह कुछ पलों के लिए जैसे ही चुप हुई, ऐसा लगा जैसे सन्नाटा पसर गया है वहाँ पर। उसकी सास और ननद के मन-मस्तिष्क में जैसे विचारों का झंझावात चलने लगा था। मालिनी देवी को एकाएक लगा जैसे नव्या के हाथों में दो फलकों वाला दर्पण है जिसके एक फलक में उनका अपना भूतकाल और दूसरे फलक में बेटी का भविष्य झलक रहा है और दोनों ही ओर तेजी से दृश्य परिवर्तित होते जा रहे हैं।
"आप बोलती हैं न मम्मी जी, कि जलती हूँ मैं शुचि दीदी के अमीर ससुराल, उनके सुखी भविष्य के बारे में जान कर!...नहीं मम्मी जी, मेरा दिल धड़कता रहता है आशंकाओं से, लगता रहता है, मेरी अपनी ही कहानी जस की तस दोहरायी जाने वाली है!...बस अपनी बेटी और दूसरे की बेटी का मात्र फर्क है, बाकी सब कुछ एक जैसा है!" कुछ समय की खामोशी के बाद नव्या का बुदबुदाता स्वर उभरा।
मालिनी देवी को लगा, उनकी समस्त इन्द्रियाँ कान और आँखों में बदल गयी हैं। जो उन्होंने कभी सुन कर भी नहीं सुना था, देख कर भी नहीं देखा था, अब सब चलचित्र सा दिख रहा था उन्हें। अपनी माँ, अपना मायका, अपना ख़ुद का बचपन, किशोरावस्था, नवयौवन और विवाह। सब उन्हें आँखों के सामने तैरता दिखने लगा। य..यह..यह सब अस्फुट स्वर में कौन बोल रहा है, उनके सामने? नव्या बोल रही है??...नहीं, नहीं!...यह शुचि बोल रही है शायद!!...अरे नहीं, यह तो वे स्वयं ही बोल रही हैं!!!
और सोच के बवंडरों के बीच तभी देखा उन्होंने, धीरे-धीरे नव्या का चेहरा, शुचि के चेहरे में और शुचि का नव्या के चेहरे में बदलता जा रहा है। बेटी और बहू, दोनों के चेहरे आपस में ऐसे गड्डमड्ड हो रहे थे कि एकाएक उन्हें उनमें अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा।...और फिर एक घड़ी ऐसी आ गयी, जब उन्होंने नव्या और शुचि को एक साथ गले से लगा कर, बाँहों में भर कर भींच लिया और भरभरा कर रो पड़ीं।

27/02/2022

परम मित्र कौन है.....

एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे।
एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था। एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।

दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।
और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में कभी कभी मिलता था।

एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था।

अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला
"मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो ?

वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं।*

उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है।

फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।

वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए।
फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।
*अब आप सोच रहे होंगे कि... वो तीन मित्र कौन है...?*

*तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार ।*

जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं।
सब से पहला मित्र है हमारा अपना 'शरीर' हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है। एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।

दूसरा मित्र है शरीर के 'सम्बन्धी' जैसे :- माता - पिता, भाई - बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह - दोपहर शाम मिलते है।

और तीसरा मित्र है :- हमारे 'कर्म' जो सदा ही साथ जाते है।
अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।

दूसरा मित्र - सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक "राम नाम सत्य है" कहते हुए जाते हैं तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।

और तीसरा मित्र आपके कर्म हैं। कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।

अब अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी.!

जय जय श्रीराधे सुनील कुमार मेहता

25/02/2022

अहसास ...

मालती मात्र १७ की थी जब उसका विवाह सुधीर के साथ सम्पन्न हुआ था । उसने जब से सपने देखना शुरू किया था तभी से सोंचना भी उसका मन भी फूलों जैसा महका था सुधीर के साथ।
यह उम्र ही होती है जब आप रंगीन और रूमानी दुनिया में रहते हैं ।
जिंदगी सतरंगी लगती है जिससे बहुत से सपने और उम्मीदें जुड़ी होती हैं ।
मालती भी आंखों में सुनहरे भविष्य के रंगीन सपने सजाए पति के साथ ससुराल आई है।
तथा जीवन के हर रीति रिवाजों को निभाते हुए सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी ।
यों कि कभी- कभार पति-पत्नी के सहज ही तर्क- वितर्क ,
स्नेह भरे उपालंभ के बीच उसे अपने पति की अति अनुशासन प्रियता खटक जाती है ।
दिन हफ्तों में बदले ,हफ्ते महीनों में और महीने साल में बदल गए।
चौंतीस साल बीत चुके हैं शादी के मालती और सुधीर के दो प्यारे-प्यारे बच्चे हुए जिनकी परवरिश दोनों ने बहुत जतन से की है ।
अब वे सब भी अपनी योग्यता अनुसार महानगरों में सेटल हो गए हैं।
मालती के अनुसार वैवाहिक जीवन में भी समय- समय पर प्रेम में संशोधन की आवश्यकता होती है, जिससे सहजता और तरलता बनी रहे ,
पर क्या सुधीर भी ऐसा सोंचते हैं ?
शायद नहीं इन सब से अनभिज्ञ उनकी दुनिया किताबों और पठन- पाठन तक सीमित रहती ।
बावजूद इसके मालती ने कभी शिकायत न की है।
उम्र के पचासवें दशक में पंहुची मालती अब पोते पोतियों की दादी बन चुकी है । जीवन पर्यन्त उसने सुधीर में प्रेमी से अधिक पिता की परछाईं ही देखी है।

अब उसकी दिली इच्छा पति के सेवानिवृत्त होने पर शेष जीवन बच्चों के साथ हंसी- खुशी व्यतीत करने की है
परन्तु यह क्या ?
यहां भी उसकी सारी अकांक्षाओं पर तुषारापात करते हुऐ सुधीर ने अपना इक तरफा निर्णय सुना दिया ,
" मैं अपने घर को छोड़कर कँही नहीं जाने वाला " ।
मालती उफ्फ भी नहीं कर पाई ।
बच्चों ने भी हल्के ढंग से विरोध जताया फिर पिता की इच्छा जान शांत हो गये।

बड़े बेटे के गृहप्रवेश में सुधीर और मालती महानगर गये हुए हैं।
यहाँ उन्हें आए हुए लगभग तीन महीने बीत चुके हैं ,
मालती खूब खुश है।
उसका दिल लग गया है दिन भर बच्चों के साथ इधर-उधर घूमती डोलती फिरती है।
कि एक दिन सुधीर ने घर वापसी की इच्छा जाहिर कर दी ।
सुन कर मालती का मन सिकुड़ने लगा है।
फिर यह सोंच कर कि हर इच्छा की पूर्ति शायद संभव नहीं वह चुप है।
यों इन दिनों उसे भी अपने घर की याद तो सता ही रही थी जिसे वह जाहिर नहीं करती थी ।
उसने भी भारी मन से हामी भर दी ।
नियत दिन, नियत समय वे ट्रेन में बैठ गए ।
मालती के लिए तो रात इतनी लम्बी हो रही है मानों अनंत काल तक खत्म ही नहीं होगी ।
वे सुबह अपने शहर पंहुचे हैं चिरपरिचित गलियां जाने पहचाने लोग ।
आश्चर्य जो उदासी कल से मालती के चेहरे पर फैली थी वह एकदम से गायब हो गई
उसकी जगह एक उल्लसित आभा चमक रही है ,
जो घर के नजदीक पंहुच कर और भी उज्जवसित हो रही है
इस जगह से तो उसका सात जन्मों का नाता है वह इसे कैसे छोड़ सकती है ?

पति द्वारा निर्मित उसका अपना घर भी उदास -बेहाल अवस्था में जैसे कपनी गृहस्वामिनी की ही प्रतीक्षा कर रहा हो।
पल भर में सारे गिले शिकवे दूर कर मालती अपने घरौंदे की साज संवार में व्यस्त हो गई ।
सुधीर भी एक विचित्र उन्मादक , स्वाभाविक स्फूर्ति से भर उठे हैं ।
सारे दिन की साफ-सफाई के पश्चात फुर्सत मिलते ही संध्या काल में जब उसने सुधीर के कंधे पर सिर रखा तो अपने आप को एक विचित्र सुखद अहसास से घिरा हुआ पाया ।
सुधीर बुदबुदा उठे ,
" जिन्दगी की दूसरी पारी है मालती बगैर बच्चों के आए रीतेपन को हमें नयी उर्जा के साथ उमंग और खुशियों की प्राण वायु से भरना ही होगा ।
यह कहते हुए उसे दोनों बाजुओं में भर लिया " कितनी सुखद अनुभूति है सुधीर के इस रूप के दर्शन में " ।
और सहसा मालती ये गुनगुना उठी ,
" मेरे पिया का घर है ये मैं रानी हूँ इसकी " ।
बागीचे में लगे पेड़ों पर ओस झर रही है शनैः - शनैः ...💐💐

17/02/2022

*लता मंगेशकर के अंतिम शब्द**इस दुनिया में मौत से ज्यादा वास्तविक कुछ भी नहीं है।**दुनिया की सबसे महंगी ब्रांडेड कार मेरे गैरेज में खड़ी है।* *लेकिन मुझे व्हीलचेयर पर ले जाया जाता है!**इस दुनिया में हर तरह के डिजाइन और रंग के, महंगे कपड़े, महंगे जूते, महंगे साजो सामान सब मेरे घर में हैं।* *लेकिन मैं अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराए गए छोटे गाउन में हूंँ!**मेरे बैंक खाते में बहुत पैसा है लेकिन मेरे किसी काम का नहीं है।**मेरा घर मेरे लिए महल जैसा है लेकिन मैं अस्पताल में एक छोटे से बिस्तर पर लेटी हूंँ।**मैं इस दुनिया के फाइव स्टार होटलों में घूमती रही।* *लेकिन अब मुझे अस्पताल में एक लैब से दूसरी लैब में ट्रांसफर किया जा रहा है!**एक समय था जब 7 हेयर स्टाइलिस्ट रोजाना मेरे बाल बनाते थे।* *लेकिन आज मेरे सिर पर बाल नहीं हैं।**मैं दुनिया भर में कई तरह के 5 स्टार होटलों में भोजन करती रही हूंँ।**लेकिन आज दिन में दो गोलियां और रात में नमक की एक बूंद मेरी डाइट है।* *मैं दुनिया भर में अलग-अलग विमानों में उड़ रही था।* *लेकिन आज दो लोग अस्पताल के बरामदे में जाने में मेरी मदद करते हैं।* *किसी भी सुविधा ने मेरी मदद नहीं की।* *किसी भी तरह से सुकून नहीं।**लेकिन कुछ अपनों के चेहरे, उनकी दुआएं और इबादत मुझे जिंदा रखते हैं।**यह जीवन है, कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी दौलत के मालिक है, अंत में आप खाली हाथ जाते हैं, दयालु बनें, किसी की भी मदद करें जो आप कर सकते हैं।**धन और शक्ति के लिए लोगों को महत्व देने से बचें।**अच्छे इंसानों से प्यार करें, जो तुम्हारे लिए हैं उन्हें संजोए रखें, किसी को दुख मत दें, अच्छे बनें, अच्छा करें क्योंकि वही तुम्हारे साथ जाएगा।*😌

16/02/2022

50 वर्ष से अधिक उम्र वाले इस पोस्ट को सावधानी पूर्वक पढें, क्योंकि यह उनके आने वाले जीवन के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है : अब वो ज़माना नहीं रहा की पिछले जन्म का कर्जा अगले जन्म में चुकाना है आधुनिक युग में सब कुछ हाथों हाथ हैं l
** सु:खमय वृद्धावस्था **
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1:- 🎪 अपने स्वंय के स्थायी आवास पर रहें ताकि स्वतंत्र जीवन जीने का
आनंद ले सकें !
2 :- 💰अपना बैंक बैलेंस और भौतिक संपति अपने पास रखें, अति प्रेम में
पड़कर किसी के नाम करने की ना सोंचे !
3 :- अपने बच्चों 👭👬 के इस वादे पर निर्भर ना रहें कि वो वृद्धावस्था में
आपकी सेवा करेंगे, क्योंकि समय बदलने के साथ उनकी प्राथमिकता
भी बदल जाती है और कभी-कभी न चाहते हुए भी वे कुछ नहीं कर
पाते हैं !
4 :- उन लोगों को अपने मित्र 🗣👤👥 समूह में शामिल करें जो आपके
जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हों, यानी सच्चे हितैषी हों ! .. 🙏🙏
5 :- किसी के साथ 🙌 अपनी 🧑🏻 तुलना ना करें और ना ही किसी से कोई
उम्मीद रखें !
6 :- अपनी संतानों 👫👬के जीवन में दखल अन्दाजी ना करे , उन्हें अपने
तरीके से अपना जीवन जीने दें और आप 🤨 अपने तरीके से जीवन
व्यतीत करें !
7 :- आप अपनी वृद्धावस्था 👩‍🏫👨‍🏫 का आधार बनाकर किसी से सेवा
करवाने तथा सम्मान पाने का प्रयास कभी ना करें !
8 :- लोगों की 👩👦🏻👩👵🏻🧓🏿👴🏻 बातें सुनें 👂 लेकिन अपने स्वतंत्र
विचारों के आधार पर निर्णय लें !
9 :- प्रार्थना करें 🙏लेकिन भीख ना मांगें, यहाँ तक कि भगवान से भी
नहीं, अगर भगवान से कुछ मांगे तो सिर्फ माफी एंव हिम्मत !
10 :- अपने स्वास्थ्य 💪👈 का स्वंय ध्यान रखें चिकित्सीय परीक्षण के
अलावा अपने आर्थिक सामर्थ्य अनुसार अच्छा पौष्टीक भोजन खाएं
और यथा सम्भव अपना काम अपने हाथों से करें ! छोटे कष्टों पर
ध्यान ना दें, उम्र के साथ छोटी-मोटी शारीरीक 🤷‍♂ परेशानियां
चलती रहतीं हैं !
11 :- अपने जीवन को उल्हास पूर्वक 🤓🕵‍♀😎😍 जीने का प्रयत्न करें,
खुद प्रसन्न 🤪 रहें तथा दूसरों को भी प्रसन्न रखें !
12 :- प्रति वर्ष भ्रमण / छोटी - छोटी यात्रा पर एक या अधिक बार अवश्य
जाएं, इससे आपके जीने का नज़रिया भी बदलेगा !
13 :- किसी भी तरह के टकराव 🤫🤔 को टालें एंव तनाव रहित जीवन
को जिएं ! 😊
14 :- जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं रहता , चिंताएं 💁‍♀🤦🏻‍♂🙅‍♀भी नहीं,

🖤😒👌🙏


इस बात का विश्वास करें !
15 :- अपने सामाजिक दायित्वों, जिम्मेदारियों को अपने रिटायरमेंट तक
🚗🏡💰👩‍👩‍👦‍👦🙋‍♀🙋‍♂ पूरा कर लें, याद रखें .. !! जब तक आप अपने
लिए जीना शुरू नहीं करते हैं तब तक आप जीवित नहीं हैं .. !!
🙏😊🙏😊🙏😊🙏😊🙏 सुनील कुमार मेहता

15/02/2022

कहते हैं कि शादी के बाद बेटी का घर बसेगा या नहीं ये काफी हद तक बेटी की माँ पर निर्भर करता है।
आदर्शवादी लोग मानते हैं कि कन्यादान के बाद बिटिया के जीवन में हस्तक्षेप करना गलत है।

लड़कियों में बचपन से ही सहनशीलता का विकास करना चाहिए ताकि आगे चलकर वे ससुराल की विषम परिस्थितियों का सामना कर सकें।

लेकिन इस विषय में मेरा अपना एक अलग ही नज़रिया है।

मेरी पढ़ी-लिखी बेटी को अगर सिर्फ़ घर संभालने के नाम पर अपने सपने और कैरियर को छोड़ना पड़े तो मुझे उससे ऐतराज है

और मैं समझती हूँ कि हर माँ को होना चाहिए।

कितनी रातों की नींद और चैन गंवा कर, ना जाने कितनी ही चुनौतियों को पार करने के बाद कोई लड़की इस काबिल बनती है कि वो ज़माने की आँख में आँख मिला कर चल सके।

इस सुअवसर को मेरी बिटिया यूँ ही जाने देगी तो मुझे ऐतराज होगा, चाहे उसका कन्यादान ही क्यों न कर दिया हो।

मैं नहीं सिखा पाऊँगी उसको बर्दाश्त करना एक ऐसे आदमी को जो उसका सम्मान न कर सके।

कैसे सिखाए कोई माँ अपनी फूल सी बच्ची को कि पति की मार खाना सौभाग्य की बात है?

मैंने तो सिखाया है कोई एक मारे तो तुम चार मारो।

हाँ, मैं बेटी का घर बिगाड़ने वाली बुरी माँ हूँ, .........

लेकिन नहीं देख पाऊँगी उसको दहेज के लिए बेगुनाह सा लालच की आग में जलते हुए।

मैं विदा कर के भूल नहीं पाऊँगी, अक्सर उसका कुशल क्षेम पूछने आऊँगी। हर अच्छी-बुरी नज़र से, ब्याह के बाद भी उसको बचाऊँगी।

बिटिया को मैं विरोध करना सिखाऊँगी।

ग़लत मतलब ग़लत होता है, यही बताऊँगी। देवर हो, जेठ हो, या नंदोई, पाक नज़र से देखेगा तभी तक होगा भाई।

ग़लत नज़र को नोचना सिखाऊँगी, ढाल बनकर उसकी ब्याह के बाद भी खड़ी हो जाऊँगी।

“डोली चढ़कर जाना और अर्थी पर आना”, ऐसे कठिन शब्दों के जाल में उसको नहीं फसाऊँगी।

बिटिया मेरी पराया धन नहीं, कोई सामान नहीं जिसे गैरों को सौंप कर गंगा नहाऊँगी।

अनमोल है वो अनमोल ही रहेगी।

रुपए-पैसों से जहाँ इज़्ज़त मिले ऐसे घर में मैं अपनी बेटी नहीं ब्याहुँगी।

औरत होना कोई अपराध नहीं, खुल कर साँस लेना मैं अपनी बेटी को सिखाऊँगी।

मैं अपनी बेटी को अजनबी नहीं बना पाऊँगी।

हर दुःख-दर्द में उसका साथ निभाऊँगी, ज़्यादा से ज़्यादा एक बुरी माँ ही तो कहलाऊँगी।....

10/02/2022

#दिल_को_छूने_वाली_प्ररेणादायक_कहानी ..

#तलाक़_दूँगी , लेकिन मेरी भी एक शर्त है -:

जब मैं रात को घर पंहुचा तो मेरी पत्नी ने खाना लगाया। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और कहा मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात कहना है। वो शांत बैठकर खाना खा रही थी। उसकी आखों में कुछ दर्द सा साफ़ नज़र आ रहा था। अचानक मुझे नहीं पता कैसे कहूं मगर मुझे उसे बताना ही था। मैंने बड़ी शांति से कहा - मुझे तलाक चाहिए। लगा जैसे उसे मेरे शब्दों से कुछ फर्क नहीं पड़ा बल्कि उसने मुझसे पूछा क्यों तलाक चाहिए ?

मैंने उसके सवाल को अनसुना किया तो उसे गुस्सा आ गया। उसने चम्मच उठाकर फेंक दिया और जोर से चिल्लाई - तुम इन्सान नहीं हो ! उस रात, हमने एक दुसरे से बात नहीं की, वो रो रही थी !

मुझे पता था कि वो जानना चाहती थी कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारा रिश्ता टूटने की कगार पर आ गया। पर मेरे लिए उसके सवालों का जवाब दे पाना नामुमकिन था। मैं अब किसी और से (प्रिया नाम था उसका) प्यार करने लगा हूँ। अब मुझे उससे प्यार नहीं रहा। मैंने उसे उसके बरसो के प्यार की सजा दी थी।

भरे मन से मैंने तलाक के पेपर तैयार किये। उसमें लिखा था कि वह पूरा घर, कार और कंपनी की 30% शेयर ले सकती है इस तलाक के बदले में। लेकिन उसने उन पेपर्स को देखा और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

वो औरत जिसने मेरे साथ जीवन के दस साल बिताये थे वो आज मेरे लिए अनजान हो चुकी थी। मुझे इन दस सालों का जो उसने मेरे लिए बर्बाद किये। मगर मैं क्या करूँ जो हो चूका उसे मैं बदल नहीं सकता था। क्योंकि मैं किसी और से अपनी पत्नी से भी ज्यादा प्यार करने लगा था।

आख़िरकार उसके सब्र का बांध टूट गया और वो फुट-फुट कर मेरे सामने रोने लगी। मेरे लिए उसका रोना एक तरह से उसकी रिहाई की तरह था। तलाक की ये बात जो कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी अब बिलकुल साफ़ हो चुकी थी !

अगले दिन मैं घर काफी लेट आया। मैंने देखा कि वो टेबल पर बैठ कर कुछ लिख रही थी। मैंने शाम का खाना नहीं खाया था लेकिन फिर भी में सीधे ऊपर जाकर अपने कमरे में सो गया। क्योंकि पूरा दिन प्रिया के साथ रहने और कई जगह घूमने के बाद मैं थक गया था।

वो शायद रात को उसी टेबल पर लिखते-लिखते सो गई थी। सुबह उसने तलाक देने की शर्ते बताई। वो मुझसे कुछ भी लेना नहीं चाहती थी। उसे सिर्फ तलाक से पहले एक महीने का समय चाहिए था। उसने आग्रह किया कि इस एक महीने में हम दोनों वही पुराना वाला जीवन जीयें जितना संभव हो सके। क्योंकि आने वाले महीने में हमारे बेटे की परीक्षा है। वह नहीं चाहती थी कि हमारे टूटे रिश्ते का प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़े।

मुझे भी यह ठीक लगा। मगर वो कुछ और भी चाहती थी जेसे शादी के दिन मैं उसे उठा कर अपने शयनकक्ष तक ले गया था। उसी तरह हर रोज एक महीने तक मैं उसे शयनकक्ष से उठा कर मुख्य द्वार तक ले जाऊं। मुझे लगा यह पागलपन है मगर इन आखरी दिनों को थोडा अच्छा बनाने के लिए मैंने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली।

मेने प्रिया को अपनी पत्नी की सभी शर्ते बताई। वो हँसने लगी। उसे लगा मेरी पत्नी कितने भी तरीके अपना ले तलाक होना तो तय है।

मेरी पत्नी और मैं किसी से भी इस दौरान नहीं मिले थे। लेकिन उस दिन जब मैं उसे पहली बार उठाकर गेट तक लेकर गया तो हम दोनों काफी अजीब महसूस रहे थे। पीछे से हमारा बेटा भी खिलखिलाकर खुश हो रहा था।

अगले दिन यह काम थोडा सामान्य और आसान हो गया। वह मेरे सीने से लगी थी और मैं उसकी खुशबू महसूस कर रहा था। ऐसा लगा जेसे कई दिनों बाद मुझे ये खुशबू मिल रही थी या फिर कई दिनों से मैंने उसके होने का महसूस नहीं किया था। पहले जितनी उसमें वो कसाव नहीं था और चहरे पर कुछ हलकी झुर्रियाँ नजर आ रही थी। और बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। ये वही औरत थी जिसने अपने जीवन के 10 साल मुझे समर्पित किये थे।

चोथे दिन जब मैंने उसे उठाया तो वो पुरानी रोमाँच लौटने लगी थी। पांचवे और छठे दिन वो पुराना प्यार फिर जागने लगा। मैंने प्रिया को इस बारे में कुछ नहीं बताया था। अब उसे उठाना और आसन हो गया था। शायद हर रोज यह सब करने का मैं आदि हो गया था।

एक दिन वह अपनी पसंद की साड़ी निकाल रही थी। लेकिन कुछ खास नहीं ढूंढ पाई। उसने साँस भरते हुए कहा कि उसके सारे कपडे बड़े पड़ने लगे हैं। तब मुझे पता चला कि वह काफी दुबली हो गयी है और इसीलिए मैं उसे आसानी से उठा पा रहा था।

मेरे दिल को एक झटका सा लगा। उसने अपने दिल में काफी सारा दर्द छुपा रखा था पता नहीं कैसे मैं आगे बढ़ा और उसके सिर को छूकर देखा। अचानक हमारा बेटा आया और बोला कि पापा ये तो मम्मा को उठाकर बहार ले जाने का समय हो गया है। उसके लिए अपने पापा द्वारा मम्मा को इस तरह उठाकर ले जाते हुए देखना जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था।

मेरी बीवी ने हमारे बच्चे को बुलाया और जोर से उसे गले लगा लिया। मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। मुझे लगा कहीं मैं अपना निर्णय न बदल लूँ। मैंने अपनी पत्नी को रोज की तरह उठाया और बेडरूम से सिटींग रूम होते हुए हॉल तक लाया। उसने प्यार से अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के आस-पास रख दिए। मैंने उसे जोर से पकड़ रखा था बिलकुल हमारे सुहागरात की तरह।

मगर उसका इतना कम वजन मुझे परेशान कर रहा था। महीने के आखरी दिन जब मैंने उसे उठाया तो मेरे लिए एक कदम भी चल पाना मुश्किल हो रहा था। हमारा बेटा स्कूल जा चूका था। मैं अपनी कार से ऑफिस गया और कार से कूद कर बाहर आ गया बिना कार को लॉक किये। मुझे डर था कि अब एक पल की भी देरी मेरा इरादा बदल देगी। मैं उपर गया। प्रिया ने दरवाज़ा खोला और मेने उससे कहा - सॉरी प्रिया ! अब मैं अपनी पत्नी से तलाक नहीं लेना चाहता।

उसने मुझे देखा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा - तुम्हें बुखार तो नहीं है ? मैंने उसका हाथ हटाया और कहा - सॉरी प्रिया ! अब मुझे अपनी पत्नी से तलाक नहीं चाहिए।

हमारी शादीसुदा जिंदगी शायद हम दोनों के ध्यान न देने की वजह से बोरिंग हो गयी थी। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम एक-दुसरे से प्यार नहीं करते। अब मुझे एहसास हुआ है कि जिस दिन मैं उसे शादी करके अपने घर लाया था उस दिन से जीवन के आखरी दिन तक मुझे उसका साथ निभाना है।

प्रिया के होश उड़ गए। उसने मुझे एक जोरदार चाँटा जड़ दिया मेरे मुह पर। वह रोने लगी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और आकर अपने कार में बेठ गया।

आगे एक फुल वाले की दुकान पर रुका और अपनी प्यारी पत्नी के लिए एक सुंदर सा गुलदस्ता लिया। दूकानदार ने पूछा कि इस पर क्या लिखना है ? मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि "मैं तुम्हें जीवन के आखरी दिन तक यूँ ही उठाता रहूँगा मेरी अर्धांगिनी। "

उस शाम जब मैं घर आया हाथों में गुलदस्ता लिए। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैं उपर अपने कमरे की तरफ भाग कर गया। लेकिन तब तक वह मुझे छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थी हमेशा के लिए। वो कई महीनो से कैंसर से लड़ रही थी लेकिन मैं प्रिया के साथ इतना खोया हुआ था कि कभी ध्यान ही नहीं रहा।

उसे पता था वह जल्दी ही मुझे छोड़ कर जाने वाली है इसलिए वह मुझे और मेरे बेटे के रिश्ते को टूटने से बचाना चाहती थी। मैं नीच उससे तलाक लेना चाहता था लेकिन फिर भी उसने मुझे अपने बच्चे की नज़रों में एक प्यारा पति और पिता बना दिया था।

#जीवन_की_छोटी_छोटी_बातें_रिश्तों_में_बहुत_महत्त्व_रखती_है। #बड़ा_घर_बड़ी_कार_और_बैंक_बैलेंस_ये_खुशियों_का_हिस्सा_जरुर_बन_सकते_हैं_मगर_अपनों_के_बिना_इनकी_कोई_कीमत नहीं।

#मेरा_सबसे_यहीं_निवेदन_है_कि_कृपया_औरतों_कि_इज्ज़त_करें, #उन्हे_आपसे_कुछ_नहीं_चाहिए_उन्हें_बस_थोड़ी_इज्ज़त_थोड़ा_प्यार_और_थोड़ा_सा_टाइम_चाहिए।

ेरी_किसी_बात_से_किसी_को_दुःख_पंहुचा_हो_तो_माफ़ी_चाहता_हूँ🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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