01/03/2022
दर्पण
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रसोई में खाना बना रही नव्या के कानों में शहद में डूबे, मिश्री घुले हुए बोलों के टुकड़े पहुँच रहे थे। सुनते हुए उसका मन-मस्तिष्क बार-बार मायके की मखमली गलियों में पहुँच जा रहा था, जहाँ माँ के ममतामयी आँचल की शीतल छाया लहराती दिख रही थी।
"मेरी राजकुमारी के बाल कितने सुन्दर हैं, एकदम रेशमी!...किसी की नज़र ना लगे!"
नव्या की सास मालिनी देवी उसकी इकलौती ननद शुचि के बालों में तेल लगाते उसकी बलाएँ लेती हुई बोलती जा रही थीं।
"ओफ्फो ममा! अब बस करो, कितना और लगाओगी। मुझे पार्लर जाना है, फेशियल और स्पा के लिए, अब छोड़ो आप अपना देसी नुस्खा!"
मोबाइल फोन की स्क्रीन में खोयी हुई शुचि को अचानक ध्यान आया कि उसे देर हो रही है, उसकी सहेलियाँ आती ही होंगी, जिनके साथ उसने ब्यूटीपार्लर जाना तय किया हुआ था।
"ठीक है बेटा, चली जाना...लेकिन सनस्क्रीन लोशन लगा कर जाना! मैंने बादाम भिगोए थे रात में तुम्हारे लिए। छील कर भी रखे हैं, खा कर जाना!...और हाँ! मसूर की दाल भी दूध में भिगो कर रखी है, नव्या को बोल देती हूँ, पीस कर रख देगी। ज़रूर लगा लेना चेहरे पर, खूब लुनाई आती है उससे...और रात में वो न्यूट्रीशन वाला लोशन लगाया था कि नहीं सोने से पहले?... बड़ी मुश्किल से मिला है, कई मेडिकल स्टोर की खाक छानने के बाद... वैसे तो मेरी लाडो पहले से ही बड़ी सलोनी है, पर मैं चाहती हूँ कि सगाई और शादी वाले दिन दुनिया में सबसे सुन्दर दिखे! ...मेरा होने वाला दामाद भी तो लाखों में एक है, एकदम राजकुमार!" प्यार भरी हुई बोली के एक-एक शब्द से दर्प भी छलका पड़ रहा था।
इस मध्यम-वर्गीय परिवार में माँ-बेटी के लाड़-दुलार वाला यह दृश्य आजकल लगभग रोज की ही बात हो चली थी, जब से शुचि का ब्याह उनसे कहीं अमीर घर के सुयोग्य बेटे से तय हुआ था। उच्च-व्यवसायी, सम्पन्न घर का सुदर्शन, सौम्य लड़का और छोटा सुखी परिवार। लड़के वालों की माँग केवल इतनी थी कि लड़की अति सुंदर, उच्च शिक्षित, गृहकार्यों में दक्ष हो तथा विवाह समारोह का आयोजन बहुत ही धूमधाम, शानो-शौक़त से हो। दहेज की कोई विशेष माँग नहीं थी, बस जो कन्यापक्ष स्वेच्छा से देना चाहे।
इस ममत्व से सराबोर वातावरण में अचानक दृश्य परिवर्तन हुआ जब शुचि के चिल्लाने का स्वर सुनाई दिया,
"ममाsss मेरी लेदर वाली नयी जूती भीगी कैसे दिख रही है! किसने किया यह?"
"अरे! वह तो मैंने नव्या को पॉलिश करने बोला था!...अरी नव्या! कहाँ मर गयी? क्या कर दिया जूती का तूने! शुचि को देर हो रही है और...एक काम ढंग से नहीं कर सकती निकम्मी!"
मालिनी देवी आपे से बाहर होतीं रोज की तरह बहू को कोसने लग गयीं।
बहू नव्या जो सास के लिए चाय और ननद शुचि के लिए बादाम शेक लिए आ खड़ी हुई थी, दोनों में से किसी को दिखाई नहीं दी थी अब तक।
"मम्मी जी! मैंने तो अच्छे से पॉलिश करके जूती सँभाल कर रख दी थी, दीदी के कमरे में ...कहाँ है, दिखाइएगा मुझे!" अकारण के आरोप से सहम-सी गयी थी बेचारी।
जूतियाँ हाथ में लेकर बोली, "चमक से ऐसी दिख रही दीदी! भीगी नहीं है जरा भी।"
"अच्छा, अच्छा! बहस मत कर! ...कोई काम कभी ढंग से करती नहीं है न, तो शुचि को लगा होगा...ले बेटा पी ले ये शेक जल्दी से, तुझे देर हो रही न!"
मालिनी देवी चाय का कप हाथ में लेती हुई बोलीं।
बादाम शेक का एक घूँट पीते ही शुचि मुँह बनाकर बोली, "कैसा फीका-फीका सा लग रहा है भाभी! न जाने कब तुम्हारे हाथों में स्वाद आयेगा ममा के जैसा!"
"फीका तो नहीं था दीदी! मैंने बनाते समय चख कर देखा था थोड़ा सा...!" नव्या धीमी आवाज में अटकती हुई बोली।
"अरी करमजली!...बनवाया मैंने शुचि के लिए और पहले पीकर जूठा तूने कर दिया।...तभी फीका लग रहा इसे!" मालिनी देवी जलती आँखों से नव्या को देखती हुई चीख पड़ीं।
तब तक शेक का पूरा गिलास खाली कर चुकी शुचि मुँह बिचकाती कहने लग गयी, "जाने दो ममा! इनके मायके में किसी ने कुछ अच्छा सिखाया ही नहीं इन्हें!...और ये सब स्पेशल चीजें कभी देखी भी नहीं होंगी अपने घर में तो लालच लग आती होगी! "
इससे पहले कि शुचि की बात पूरी हो पाती, बड़ी देर से सास-ननद की अकारण, लगातार भर्त्सना सुन रही नव्या को अचानक न जाने क्या हुआ, वह हमेशा की तरह सिर झुका लेने के बजाए विचित्र सी दृष्टि से दोनों को घूरने लगी। उसका यह कृत्य दोनों माँ-बेटी के लिए एकदम अप्रत्याशित-सा था।
"देख, देख! इसकी बद्तमीज़ी....कैसे बिना बोले जबान-दराज़ी कर रही है!"
आँखों से अंगारे बरसाती सास की यह बात सुन कर भी आज नव्या ने न नज़रें नीची कीं, न सिर गड़ाया ज़मीन पर, उल्टे उन्हें देख मुस्कुराने लगी और...और फिर धीरे से हँसना शुरू कर दिया। पहले धीमी हँसी, फिर तेज, और तेज। क्रमशः उसकी हँसी का स्वर ऊँचा होता चला गया। ...हा हा हा!...हा हा हा!! वह हँसती चली गयी, बस हँसती चली गयी...!!!
यह अति असाधारण घटना थी दोनों माँ-बेटी के लिए। असम्भव! ऐसा कैसे हो सकता है?
पहले तो कुछ पलों के लिए दोनों भौंचक्की सी उसे देखती रह गयीं। फिर शुचि को जैसे होश आया तो उसने घबरा कर नव्या को कन्धों से पकड़ कर झिंझोड़ डाला।
"क्क..क्या कर रही हो भाभीsss!...पागल हो गयी हो क्या?"
मालिनी देवी अभी भी उसे आग्नेय दृष्टि से देखती हिक़ारत से बोलीं,
"अरे ये तो है ही मनहूस!...मेरी बेटी से जलती रहती है हर घड़ी!...इतने बड़े घर में उसकी शादी होते देख कर सहा नहीं जा रहा है इससे, छोटे घर की है न!"
नव्या की हँसी अचानक रुक गयी। हतप्रभ-सी उन दोनों को एकटक थोड़ी देर देखती रही। फिर सिर नीचे करके एकाएक रोने को हो आयी। कुछ ही देर में फूट-फूट कर रोने लगी। फिर रोती चली गयी, रोती ही चली गयी।
न जाने क्या था उसके रुदन में, उसकी आँखों से झरती करुणा में, मालिनी देवी को अचानक अपने हृदय में मरोड़ सा उठता अनुभव हुआ। शायद उनके भीतर की सास को पीछे धकेल कर कुछ क्षण के लिए माँ सामने आ गयी थी। उस माँ को कुछ और नहीं सूझा तो उसने नव्या को दोनों हाथों से पकड़ कर पास ही सोफे पर बिठाया और बाजू के टेबल पर रखा गिलास पानी से भरकर पकड़ा दिया।
दो-चार घूँट पानी पीकर नव्या थोड़ी सामान्य होती लगी तब उन्होंने गहरी दृष्टि से उसे देखते हुए पूछा, "ये एकाएक क्या हो गया था तुझे री!...तू तो कभी ऐसा नहीं करती थी! ...मेरा तो दिल ही बैठ गया था कि इसके ऊपर कोई साया-वाया तो नहीं आ गया।"
शुचि भी जो हैरानी से उसे ताके जा रही थी, बोल पड़ी, "भाभी डरा ही दिया था तुमने तो...क्या हुआ था अचानक?"
नव्या ने सिर झुका लिया, कुछ न बोलते हुए। चुपचाप एकटक नीचे फर्श को देखने लगी।
"तेरी तबीयत तो ठीक है?...अरी बोल न कुछ!...मेरा मन बहुत घबरा रहा है अब!"
मालिनी देवी उसे हिलाती हुई ध्यान से देखने लगीं।
नव्या ने धीरे से सप्रयास अपनी गर्दन उठायी, सूनी नज़रों से माँ-बेटी की आँखों में झाँकने की कोशिश की, कुछ खोया हुआ तलाशने की भी।
"अब कुछ बोलो भी!" माँ-बेटी की सम्मिलित ध्वनि थी।
दोनों की सवाल करती आँखों में नव्या को पहली बार थोड़ी-बहुत भावनाओं की तपिश महसूस हुई। शायद तभी लंबे समय से हिमशिला सा पड़ा उसका हृदय पिघलने लगा। वह धीरे-धीरे अस्पष्ट स्वर में बोलने का प्रयास लगी,
"मेरी माँ भी ऐसे ही लाड़ लड़ाती थी मुझे मम्मी जी! उनकी आँखों का तारा थी मैं!...मेरे माथे पर आयी एक शिकन उन्हें बेचैन कर देती थी!...मुझे काम सिखाते समय इतनी कोमलता से बोलती थीं कि कुछ भी सीखना कभी पता ही नहीं चला। फिर जब मेरा ब्याह तय हुआ यहाँ, उसके बाद तो मुझे तिनका भी नहीं उठाने देती थीं हाथों से कि उनकी नाज़ुक कली थक न जाए, कभी पानी का एक गिलास नहीं धोने दिया कि हथेली की लाली न घट जाए, सलोनापन फीका न पड़ जाये, जैसे आप दीदी के लिए सोचती हैं!...मगर आज कोई देखने वाला नहीं है,... हाथों की कोई जगह नहीं बची जहाँ कटा या जला न हो, खाना बनाते, झाड़ू-पोंछा-बर्तन करते...बचा-खुचा डिटर्जेंट की मार से फटा हुआ है!"
दोनों का जी धक्क से रह गया सुनकर पहली बार। हैरत की बात थी कि दोनों नव्या को डाँटने या बहस करने के बदले चुपचाप चित्रलिखित सा उसे देख रही थीं आज।
नव्या का स्वर अब स्पष्ट हो चला था।
"मेरी दादीमाँ की बोली कानों में अमृत रस घोलती थी मम्मी जी! सोनचिरैया बोलती थीं वो मुझे...चाची, बूआ, मौसी ...अपनी सभी मामियों तक की लाड़ली थी मैं। सब ही मीठा बोलते थे, कड़वा कभी सुना नहीं था...और आज एक मीठी बोली को तरसते हैं मेरे कान!" नव्या ने सिसकारी सी ली।
"कभी ममता की मूरत रही मेरी माँ भी कितनी बदल चुकी है मायके में!...विदाई के वक्त मुझसे वादा लिया था, आज से ससुराल ही तुम्हारा घर है लाड़ो!...अपने घर को हमेशा जोड़ कर रखना!...मायके के संस्कारों पर कभी आँच न आने देना बिटिया!"
"शायद नज़र कमज़ोर हो गयी हैं अब उनकी...मेरी खोखली हँसी, झूठी मुस्कान पहचान में नहीं आती उन्हें, समझ में आता है...पर क्या मेरा पीला पड़ता चेहरा, गड्ढों में धँसती जा रही आँखें भी नहीं दिखती उनको? ...'बेटी के ससुराल का मामला नाज़ुक होता है, कुछ भी बोलना सही नहीं होता...उससे बेटी का अहित हो सकता है!' मैंने सुना था, वह मेरी दादी से एक बार कह रही थीं।"
"मेरी शादी के समय मेरे भैया जब घर पर चढ़ रहे कर्ज़ के बारे में चिंता जता रहे थे, तो पापा ने बोला था, एक ही बेटी है, अच्छी हैसियत वाले घर में ब्याह हो रहा है, थोड़ी क़ीमत तो चुकानी पड़ेगी बेटा, राज करेगी अपनी नव्या वहाँ! ...अपनी राजकुमारी को वहाँ सब रानी बनाकर रखेंगे, देखना!" एक सिसकारी भरी उसने और बोलना ज़ारी रखा,
"...राजकुमारी..रानी...कौन होती हैं ये, कैसी होती हैं, कैसे रहती हैं ससुराल में, कोई नहीं देखता बाद में!"
नव्या की साँस भर आयी थी लगातार बोलते-बोलते। वह कुछ पलों के लिए जैसे ही चुप हुई, ऐसा लगा जैसे सन्नाटा पसर गया है वहाँ पर। उसकी सास और ननद के मन-मस्तिष्क में जैसे विचारों का झंझावात चलने लगा था। मालिनी देवी को एकाएक लगा जैसे नव्या के हाथों में दो फलकों वाला दर्पण है जिसके एक फलक में उनका अपना भूतकाल और दूसरे फलक में बेटी का भविष्य झलक रहा है और दोनों ही ओर तेजी से दृश्य परिवर्तित होते जा रहे हैं।
"आप बोलती हैं न मम्मी जी, कि जलती हूँ मैं शुचि दीदी के अमीर ससुराल, उनके सुखी भविष्य के बारे में जान कर!...नहीं मम्मी जी, मेरा दिल धड़कता रहता है आशंकाओं से, लगता रहता है, मेरी अपनी ही कहानी जस की तस दोहरायी जाने वाली है!...बस अपनी बेटी और दूसरे की बेटी का मात्र फर्क है, बाकी सब कुछ एक जैसा है!" कुछ समय की खामोशी के बाद नव्या का बुदबुदाता स्वर उभरा।
मालिनी देवी को लगा, उनकी समस्त इन्द्रियाँ कान और आँखों में बदल गयी हैं। जो उन्होंने कभी सुन कर भी नहीं सुना था, देख कर भी नहीं देखा था, अब सब चलचित्र सा दिख रहा था उन्हें। अपनी माँ, अपना मायका, अपना ख़ुद का बचपन, किशोरावस्था, नवयौवन और विवाह। सब उन्हें आँखों के सामने तैरता दिखने लगा। य..यह..यह सब अस्फुट स्वर में कौन बोल रहा है, उनके सामने? नव्या बोल रही है??...नहीं, नहीं!...यह शुचि बोल रही है शायद!!...अरे नहीं, यह तो वे स्वयं ही बोल रही हैं!!!
और सोच के बवंडरों के बीच तभी देखा उन्होंने, धीरे-धीरे नव्या का चेहरा, शुचि के चेहरे में और शुचि का नव्या के चेहरे में बदलता जा रहा है। बेटी और बहू, दोनों के चेहरे आपस में ऐसे गड्डमड्ड हो रहे थे कि एकाएक उन्हें उनमें अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा।...और फिर एक घड़ी ऐसी आ गयी, जब उन्होंने नव्या और शुचि को एक साथ गले से लगा कर, बाँहों में भर कर भींच लिया और भरभरा कर रो पड़ीं।