JAI Bhagwan ji

JAI Bhagwan ji Educationist

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01/12/2025

🌸 मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत साथी मेरी धर्मपत्नी श्री मति भतेरी देवी पूर्व सरपंच ग्राम पंचायत उचाना खुर्द (जींद) को 16वीं सालगिरह की ढेरों शुभकामनाएं 🏵️

आज हमारे साथ-जीवन के सफर के 16 साल पूरे हो गए—16 साल प्यार के, भरोसे के, हँसी-खुशी के, और एक-दूसरे का साथ निभाने के।

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि इन सालों में तुम्हारे होने से मेरी जिंदगी कितनी खूबसूरत बनी है। तुमने हर मुश्किल में साथ दिया, हर खुशी को और बड़ा बनाया, और घर को सिर्फ घर नहीं, बल्कि एक प्यारा सा “घराना” बनाया।

तुम्हारी मुस्कान मेरी सबसे बड़ी ताकत है, और तुम्हारा साथ मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य।
तुम सिर्फ मेरी पत्नी नहीं, बल्कि मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरी प्रेरणा और जीवन की सबसे खास शख्सियत हो।

🏵️धन्यवाद – इतना स्नेह, धैर्य और अपनापन देने के लिए।
🏵️धन्यवाद – मेरे कारोबार व जीवन की गौरवशाली यात्रा में साझेदार रहने के लिए ।
🏵️धन्यवाद – मेरे जीवन को पूर्णता प्रदान करने के लिए।

आज हम अपने जीवन के 17वे साल में प्रवेश कर चुके है इस अवसर पर हमारी इस 16 साल की खूबसूरत यात्रा को सलाम,
और आने वाले अनगिनत सालों को दिल से स्वागत।

✨ सालगिरह मुबारक हो, मेरे जीवनसाथी।
भगवान हमारी जोड़ी को हमेशा यूँ ही सलामत रखें । 🙏

आपकी शुभकामनाएं व आशीर्वाद भी आपेक्षित 🙏

*“बेटी को  स्वतंत्र बनाने के प्रयास में, उसे  स्त्री बनाना ही भूल गए…”*“हमारी संतानें हमारी नही सुनती, उनके जीवन में हम ...
08/09/2025

*“बेटी को स्वतंत्र बनाने के प्रयास में, उसे स्त्री बनाना ही भूल गए…”*

“हमारी संतानें हमारी नही सुनती,
उनके जीवन में हम जैसे
महत्वहीन हो गए हैं…”
कारण? ?
जिस उम्र में उसके मन में ममता, सहनशीलता और त्याग के बीज बोने थे… हमने वहाँ केवल महत्वाकांक्षा का जंगल उगा दिया…”

जब आपने अपनी बेटी को सिर्फ आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखा,
पर उसे “एक स्त्री” बनाना ही भूल गए।

यह मान लेना कि जीवन में केवल नौकरी, पदोन्नति और
आत्मनिर्भरता ही सब कुछ है —
यह सोच एक बड़ी भूल बन जाती है।

आज समाज में हम क्या देख रहे हैं?

🔹 विवाह में अनावश्यक देरी
🔹 लड़कियों द्वारा विवाह के लिए अत्यधिक और अव्यवहारिक शर्तें
🔹 विवाहित जीवन में
असंतुलन और अलगाव
🔹 और यहाँ तक कि
एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर

“जब माँ-बाप ने उसे सिर्फ
उड़ना सिखाया…
तो उसने लौटकर आना ही
नही सीखा…”

बचपन से ही बेटियों को सिखाया गया:
“पहले पढ़ाई पूरी करो”
“अब इतना पढ़ लिया है,
तो नौकरी भी करनी ही होगी”
“इतना खर्च और समय लगाया है,
तो कुछ बनकर दिखाना भी जरूरी है”

जब नौकरी मिल गई तो कहा:
“अब करियर की ग्रोथ जरूरी है, प्रमोशन आने वाला है — अभी शादी नही करूंगी”
“शादी तभी करूंगी जब लड़का
मेरे शहर में काम करता हो”
“मैं क्यूँ अपनी नौकरी छोड़ूँ?
“मैं किसी के लिए भी एडजस्ट
नही करूंगी”

इस बीच — उम्र बढ़ती गई…
माँ-बाप की भी… बेटी की भी…
और साथ ही बढ़ता गया तनाव…

लेकिन अब बेटियों को
कोई अंतर ही नही पड़ता।
माता-पिता कहते हैं:
“हमारी बेटी अब हमारी रही ही नही। उसके अंदर हमारे लिए कोई भावना, कोई संवेदना ही नही बची है…”

पर सोचिए, ऐसा हुआ क्यूँ?

क्योंकि जब उसके मन और चरित्र में “नारी के संस्कार” रोपित करने का समय था —
तब हमने उसके दिमाग में
एक ही बात बैठा दी की
“तुम्हें अपनी जिंदगी खुद बनानी है,
तुम्हें किसी पर निर्भर नही रहना है…”

और इसी प्रक्रिया में उसके भीतर से:

🔸 स्त्रियोचित कोमलता
🔸 संवेदनशीलता
🔸 त्याग और समर्पण
🔸 परिवार के लिए अपनापन

ये सब धीरे-धीरे मिटते चले गए…

और आज वही बेटी
इतनी “स्वतंत्र” हो गई है कि
ना उसे माता-पिता की जरूरत है
ना जीवनसाथी की।

बेटी को मजबूत बनाया,
लेकिन मुलायम दिल छीन लिया…
अब वो जीवन के फैसले लेती है —
पर दिल से नही, दिमाग से।”

मेरी यह बात न तो बेटियों की शिक्षा के विरोध में है, न ही किसी की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए।

“स्वतंत्रता आवश्यक है — पर स्त्रीत्व की पहचान उससे भी अधिक
आवश्यक है।”
“बेटी को पढ़ाओ, बढ़ाओ —
पर साथ ही उसे ‘नारी’ बनाओ, उसके भीतर संस्कार और संवेदना का दीप भी प्रज्वलित करो।”

वरना एक दिन वही बेटी,
ना आपकी रहेगी,
ना खुद की।

शत्रुओं को मित्र बना अपने विरोधियों को "समाप्त"किया अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने""""""""""""""""""""""""  अब्राहम...
12/08/2025

शत्रुओं को मित्र बना अपने विरोधियों को "समाप्त"किया अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने
""""""""""""""""""""""""
अब्राहम लिंकन बहुत संघर्षों के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, उनके विरोधी भी काम नहीं थे। राजनीति की दुनिया में आरोप, प्रत्यारोप और दोषारोपण का जो सिलसिला चलता है, उनसे वह भी अछूते नहीं रहे थे। उन्हें सताया गया, उन्हें खारिज करने की कोशिश की गई और झूठे आरोप तक लगाए गए, लेकिन अमेरिकी जनता ने उन्हें अपना नेता चुनकर ऐसे तमाम प्रयासों को निष्फल साबित कर दिया ।
जब लिंकन सर्वोच्च पद पर चुनकर आए तो एक राजनेता उन्हें बधाई देने आए और उनसे कहा कि अब उनके पास अपने विरोधियों को समाप्त करने का बेहतरीन अवसर है, उन्हें उनको अपमानित करने वाले लोगों को याद रखकर उनसे प्रतिशोध लेना चाहिए ,उनके किसी भी निर्णय का विरोध करने की क्षमता उनके आलोचकों में अब नहीं होगी । लिंकन बहुत ध्यान से उनकी बातों को सुनते रहे और अपनी चिर- परिचित मुस्कान के साथ बोले - "श्रीमान, आपको यह जानकर अति प्रसन्नता होगी कि जैसा आप बता रहे हैं मैं वैसा पहले से ही कर रहा हूं । मैं एक-एक कर अपने सभी विरोधियों को समाप्त करता जा रहा हूं । यह सुनकर राजनेता चकित हुए और लिंकन से इसे स्पष्ट करने को कहा लिंकन ने तुरंत कहा - "आप मेरी बात को गलत ना समझे" मैं अपने सभी आलोचकों, विरोधियों ,शत्रुओं से शालीन और मित्रवत व्यवहार कर रहा हूं, इससे प्रभावित होकर वे अब मेरे मित्र बनते जा रहे हैं , इस तरह से एक-एक कर उनमें से कोई भी मेरा शत्रु नहींरह जाएगा। क्या अपने विरोधियों को खत्म करके उन्हें अपना समर्थन बनाने का यह उपाय उचित नहीं है ? लिंकन की उदारता से चकित होकर वह राजनेता अपना मुंह लेकर वहां से चलता बना।
इस प्रकार अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के जीवन का यह रोचक प्रसंग हमें विनम्रता, उदारता के महत्व के बारे में बताता है और हमें भी ऐसे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। धन्यवाद 🙏

प्रोफेसर डॉ. लोपा मेहता, जो मुंबई के KEM मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर रहीं, एनाटॉमी डिपार्टमेंट की हेड थीं ।उन्होंने 78 साल क...
26/07/2025

प्रोफेसर डॉ. लोपा मेहता, जो मुंबई के KEM मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर रहीं, एनाटॉमी डिपार्टमेंट की हेड थीं ।
उन्होंने 78 साल की उम्र में Living Will बनाया, जब शरीर जवाब देने लगे और लौटने की कोई गुंजाइश न बचे, तब इलाज नहीं किया जाए। न वेंटिलेटर, न ट्यूब, न अस्पताल में बेवजह की दौड़। वो चाहती हैं कि आख़िरी वक़्त शांति से बीते, जहाँ इलाज की ज़िद नहीं, समझदारी हो।

डॉ. लोपा ने केवल ये दस्तावेज़ नहीं लिखा, एक शोध-पत्र भी प्रकाशित किया है ,जिसमें मृत्यु को एक स्वाभाविक, समय-निर्धारित, जैविक प्रक्रिया के रूप में समझाया। उनका कहना है कि आधुनिक चिकित्सा मृत्यु को कभी स्वतंत्र रूप में देख ही नहीं पाई। वो मानती रही कि मौत हमेशा किसी बीमारी की वजह से होती है, और अगर बीमारी का इलाज हो जाए तो मौत टाली जा सकती है। लेकिन शरीर का विज्ञान इससे कहीं ज़्यादा गहरा है।

उनका तर्क है ,शरीर कोई अनंत चलने वाला यंत्र नहीं है। यह एक सीमित प्रणाली है, जिसमें एक निश्चित जीवन-ऊर्जा होती है। यह ऊर्जा हमें किसी टंकी से नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर के माध्यम से मिलती है। वही सूक्ष्म शरीर जिसे अनुभव तो हर कोई करता है, पर देखा नहीं जा सकता ,मन, बुद्धि, स्मृति, और चेतना ,इन्हीं से मिलकर बना है यह सिस्टम ।

यह सूक्ष्म शरीर एक माध्यम है, जिससे जीवन-शक्ति आती है और पूरे शरीर में फैलती है। यही शक्ति शरीर को जीवित रखती है। यह नाड़ी, धड़कन, पाचन और सोचने की क्षमता ,सब कुछ उसी के भरोसे चलता है। लेकिन यह शक्ति अनंत नहीं है। हर शरीर में इसकी एक निश्चित मात्रा होती है। जैसे किसी मशीन में फिक्स बैटरी हो ,न ज़्यादा हो सकती है, न कम।
जितनी चाभी भरी राम ने उतना चले खिलौना टाइप ।

डॉ. लोपा लिखती हैं कि जब शरीर में मौजूद इस ऊर्जा का अंतिम अंश खर्च हो जाता है, तो सूक्ष्म शरीर अलग हो जाता है। यही वो क्षण होता है, जब देह स्थिर हो जाती है, और हम कहते हैं “प्राण निकल गया।”

यह प्रक्रिया न बीमारी से जुड़ी है, न किसी चूक से। यह शरीर की अपनी आंतरिक गति है, जो गर्भ में ही शुरू हो जाती है, और जब पूरी हो जाती है, तब मृत्यु होती है। इस ऊर्जा का व्यय हर पल होता रहता है एक-एक कोशिका, एक-एक अंग, धीरे-धीरे अपने जीवन की लंबाई पूरी करते हैं। और जब संपूर्ण शरीर का कोटा खत्म होता है, तब शरीर शांत हो जाता है।

मौत का समय कोई घड़ी से नापा गया क्षण नहीं होता। यह एक जैविक समय है ,हर व्यक्ति के लिए अलग। किसी का जीवन 35 साल में पूरा होता है, किसी का 90 में। लेकिन दोनों ही अपनी पूरी इकाई जीते हैं। कोई अधूरा नहीं मरता, अगर हम उसे मजबूरी या हार न कहें।

डॉ. लोपा ने अपने लेख में ये भी कहा है कि आधुनिक चिकित्सा जब मृत्यु को टालने की जिद करती है, तो वो केवल शरीर नहीं, पूरे परिवार को थका देती है। ICU में महीने भर की साँसें कभी कभी वर्षों की कमाई ले जाती हैं। रिश्तेदार कहते रह जाते हैं “अभी उम्मीद है”, पर मरीज की देह कब की कह चुकी होती है “बस अब बहुत हो गया।”

इसीलिए उन्होंने लिखा है कि जब मेरा समय आए, तो बस KEM ले जाना। जहाँ मुझे भरोसा है कि कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होगा। इलाज के नाम पर खिंचाई नहीं की जाएगी। मेरे शरीर को रोका नहीं जाएगा जाने दिया जाएगा।

अब सवाल ये है ,
क्या हम सबने अपने लिए ऐसा कुछ सोचा है?
क्या हमारा परिवार उस इच्छा का सम्मान करेगा?
क्या इच्छा का सम्मान करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान पा सकेगा?
क्या हमारे देश के अस्पतालों में ऐसी इच्छाओं की इज्‍जत बची है,
या अब भी हर सांस पर बिल बनेगा, और हर मौत पर आरोप?

सब इतना आसान नहीं लगता है, तर्क और इमोशन का मैनेजमेंट शायद सबसे कठिन कामों मेवसेवेक है ।

अगर मौत को एक नियत, शांत और शरीर के भीतर से तय प्रक्रिया की तरह देखना शुरू करें,
तो शायद मौत से डर भी कम हो, और डॉक्टर से उम्मीद भी थोड़ी सच्ची हो।

मुझे लगता है मौत से लड़ना बंद करना चाहिए,
उससे पहले जीने की तैयारी करनी चाहिए ।
और जब वो आए ,तो शांति से, गरिमा से उसे जाने देना चाहिए ।
बुद्ध की भाषा में मौत एक प्रमोशन है ।

लेकिन क्या मेरी ख़ुद की ये सोच 70 के बाद रह पायेगी?
हम खुद ही नहीं जानते है।

27/11/2023

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