12/06/2025
यह कहानी है शुभम राठौड़ की जो कभी ढाबे पर बर्तन धोते थे, और आज एक इंजीनियर हैं।
शुभम कहते हैं- "मुझे पैसे नहीं, सिर्फ एक थाली खाना मिलता था। मैं चाहता हूँ कि कोई बच्चा मेरी तरह ढाबे पर काम करने को मजबूर न हो।"
जब वो सिर्फ 13 साल के थे, तब घर की हालत इतनी खराब थी कि उन्हें राजस्थान के प्रतापगढ़ से मध्य प्रदेश के मंदसौर आना पड़ा। तभी उन्होंने एक ढाबे पर रात की शिफ्ट में काम करना शुरू किया जहाँ पैसे नहीं सिर्फ खाना मिलने लगा।
उनके सपने, उनका भविष्य अँधेरे से धीरे था लेकिन बदलाव की रोशनी दिखाई दी।
मई 2009 में, कैलाश सत्यार्थी की टीम 'बचपन बचाओ आंदोलन' ने शुभम को उस ढाबे से आज़ाद कराया। फिर बाल आश्रम में उनका जीवन बदला, उन्हें पढ़ाई, किताबें और एक नया सपना मिला।
वहीं से उन्होंने बच्चों के लिए आवाज़ उठानी शुरू की बाल पंचायत बनाई और बच्चों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की।
बाद में, उन्होंने लक्ष्मी देवी इंजीनियरिंग कॉलेज, अलवर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। कॉलेज में भी उन्होंने जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाया और जागरूकता अभियान चलाए।
आज, वह पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में एसोसिएट इंजीनियर हैं और अशोका यूनिवर्सिटी में यंग इंडिया फेलो के रूप में काम कर रहे हैं।
वो कहते हैं "अगर मुझे उस वक्त बचाया न गया होता, तो आज भी मैं ढाबे पर बर्तन धो रहा होता। हर बच्चे को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हक़ मिलना चाहिए।"
आइये World Day Against Child Labour के दिन हम भी अपने आप से एक वादा करें और अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश करें कि हर बच्चे को बचपन मिले, पढ़ाई मिले और उड़ने का मौका मिले।
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