21/09/2025
शिक्षा संस्थानों को बेवजह कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है?
कल शहर में एक घटना हुई — एक लड़के ने एक लड़की को चाकू मार दिया। यह एक व्यक्तिगत मामला था या क्या था ये तो जांच का विषय है, जिसका किसी संस्था या संगठन से सीधा-सीधा कोई लेना–देना नहीं था। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ उन्मादी युवाओं ने इसमें भी कोचिंग संस्थानों को बीच में घसीट लिया। सवाल उठाया कि कोचिंग चलाने वाले ही बच्चों को बिगाड़ रहे हैं।
यह सोच न केवल हास्यास्पद है बल्कि बेहद चिंताजनक भी है।
क्योंकि यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गलती या अपराध का ठीकरा शिक्षा संस्थानों के सिर पर फोड़ा जाएगा, तो फिर तो शहर में होने वाली हर छोटी–बड़ी घटना का दोष भी इन्हीं पर डाल देना चाहिए।
उदाहरण के लिए, उसी दिन शहर में ताले टूटे, चोरियाँ हुईं। अब क्या यह भी कहा जाएगा कि बाहर से पढ़ने आने वाले छात्र चोरी करके अपना खर्चा निकाल लेते हैं? अगर मोहल्ले में बिजली चली जाए, तो क्या यह भी मान लिया जाएगा कि कोचिंग पढ़ने वाले बच्चों ने मीटर उखाड़ लिया?
यह तर्क उतना ही हास्यास्पद है जितना यह कहना कि क्रिकेटर हार गए तो गणित की किताबें जिम्मेदार हैं।
कोचिंग संस्थान बच्चों को ज्ञान देने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने और उज्जवल भविष्य बनाने का कार्य करते हैं। लाखों परिवार ऐसे संस्थानों की बदौलत अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर और सफल इंसान बनते हुए देखते हैं। लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत गलती या अपराध कोचिंग से जोड़ा जाने लगे तो यह न केवल शिक्षा का अपमान है बल्कि समाज को गुमराह करने वाली सोच भी है।
सही मायने में, बच्चों के संस्कार और उनके निजी फैसले परिवार और समाज से आते हैं। शिक्षा संस्थान सिर्फ पढ़ाई का माध्यम होते हैं। यदि हर अपराध का ठीकरा शिक्षा पर फोड़ना शुरू कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञान से भरोसा खो बैठेंगी।
समाज को चाहिए कि निजी मामलों को निजी ही रहने दे। शिक्षा को राजनीति और उन्माद से दूर रखे। कोचिंग या स्कूल को बेवजह कटघरे में खड़ा करने से न तो समस्या का समाधान होगा और न ही समाज आगे बढ़ पाएगा।
शिक्षा वह साधन है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है — इसे विवादों का नहीं, विकास का माध्यम बनने दें।