24/01/2026
क्या है नया कानून?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी हो गया है। हालांकि, इसके लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। नए रेगुलेशन की सबसे अहम विशेषता यह है कि अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है।
नए कानून के तहत अब उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। अब तक जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों और प्रकोष्ठ मुख्य रूप से एससी-एसटी समुदाय तक सीमित थे। नए रेगुलेशन के बाद प्रत्येक संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित करना अनिवार्य होगा।
इसके साथ ही यूनिवर्सिटी स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी। इसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करना जरूरी होगा। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और उसे यूजीसी को भेजना अनिवार्य होगा।
क्या है विरोध का वजह ?
यूजीसी के रेगुलेशन के लागू होने के बाद सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों के बीच अगड़ी जातियों में असंतोष को लेकर सवाल उठ रहा है। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि इस नियम का दुरुपयोग हो सकता है। इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर विरोध के लिए 'सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)' का गठन किया है। इस रेगुलेशन के खिलाफ बड़े स्तर पर आंदोलन किया जा सके।
यूपी में भी इस मसले को लेकर चर्चा चल रही है। सोशल मीडिया पर भी अगड़ी जातियों से जुड़े कई इंफ्लुएंसर, यूट्यूबर और कार्यकर्ता इसके विरोध में अभियान चला रहे हैं। स्वामी आनंद स्वरूप की ओर से साझा किए गए एक वीडियो में सवर्ण समाज से एकजुट होने की अपील करते हुए तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद बहस तेज हो गई है।
सवर्ण वर्चस्व का सवाल
उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्ण समाज के वर्चस्व की बात कही जा रही है। आजादी के बाद से एससी-एसटी के लिए आरक्षण लागू है। ओबीसी को विश्वविद्यालयों में नामांकन में 1990 से तथा फैकल्टी भर्ती में 2010 से आरक्षण दिया गया। इसके बावजूद वंचित वर्गों की भागीदारी अब भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकी है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 लागू होने के 36 साल बाद भी दलित उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
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