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प्रेरणास्रोत आत्मबल बढ़ाने वाला इतिहास ।ऐतिहासिक कलाकारों ने भारतीयों का मनोबल तोड़ने की भांति भांति की कला से इतिहास लि...
21/08/2023

प्रेरणास्रोत आत्मबल बढ़ाने वाला इतिहास ।

ऐतिहासिक कलाकारों ने भारतीयों का मनोबल तोड़ने की भांति भांति की कला से इतिहास लिखा है। वे कहते हैं कि मुट्ठी भर आक्रांता आए और उन्होंने पूरे देश पर कब्जा कर लिया। लेकिन यह बात एकदम झूठ है।

क्या आप जानते है, की महमूद गजनवी, जिसने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था, उसका साम्राज्य 3,400,000 वर्ग किमी (1,300,000 sq mi ) मे फैला हुआ था जो की आज के भारत से भी बड़ा लैंड एरिया है।

और यदि केवल गुजरात का देखें, जहां सोमनाथ था, तो पूरा का पूरा गुजरात ही महमूद गजनवी के साम्राज्य से कम से कम 35 गुणा छोटा था। यह आक्रमण वैसा ही था जैसे किसी गांव पर अमेरिका का हमला हो जाएं। लेकिन भारतीयों की वीरता को देखें, इतने बड़े साम्राज्य के स्वामी को भी उन्होंने पीछे धकेलने को मजबूर कर दिया, वह भी मुट्ठी भर सेना लेकर। मुट्ठी भर सेना तो हमारी थी। वह तो विशाल लूटेरा दल था ।

बहुत से मित्र अपना और दूसरे लोगों का मनोबल यह कहकर भी तोड़ते है की सोमनाथ में ब्रह्मण लोग अवतार की प्रतीक्षा में बैठे रहें और गजनवी सोमनाथ लूटकर चला गया। जबकि सत्य यह है की उस समय के सोमनाथ क्षेत्र का राजा कौन था ? यह पता कीजिए?

वहां केवल ब्राह्मणों का नहीं , बल्कि जैनों का भी पूरा प्रभाव था। लेकिन समाज का हर गलती का ठीकरा ब्राह्मणों पर फोड़ने की आदत जो है। और वहां जैनी हो या ब्रह्मण, अवतार की प्रतीक्षा नहीं करते, तो करते भी क्या ? कल्पना कीजिए, किसी एक व्यक्ति को मारने 100 लोग आ जाएं, तो वह अवतार की और ही देखेगा ।।

2 दिन तक सोमनाथ के ब्रह्मण हों या जैनी, अपना गला कटवाते रहे, उसके बाद ही सोमनाथ पर गजनवी कब्जा कर सका था, सोमनाथजी मंदिर को लूट सका था। बाकी भक्तों की अरदास झूठी भी कहां गई ? परमारों की सेना कोई अवतार बनकर ही सोमनाथ की रक्षा के लिए प्रस्तुत हुई, और उन्होंने गजनवी सेना को वापस लौटने पर मजबूर भी किया।

वैसे अवतार का नाम लेने से भी कुछ मित्र भड़क जाते है। तो हम उनसे यही कहते है। अगर थोड़ा जानी मानी व्यक्ति भी वचन दे दे, प्रधानमंत्री वचन दे दे, तो भी हम भरोसा करते है। यहां तो भगवान ने हमें वचन दिया है : " यदा यदा हि धर्मस्य ....।" ज्ञात तो है न उनका वचन ?? जब भी धर्म की हानि होगी, मैं आ जाऊंगा ।। तो क्या अब भगवान के वचनों पर भी भरोसा नहीं करें ??

अमेरिका से लेकर मध्य एशिया तक मूर्तिपूजक थे, किंतु आज कहां है? अमेरिका कुछ दिन में स्पेनिश सैनिकों से हार गया और आज वे एक सम्पूर्ण ईसाई देश है।

मध्य एशिया को मुस्लिमों ने जीत लिया और पूरा क्षेत्र मुस्लिम हो गया, इंडोनेशिया ने तो व्यापार के लिए ही धर्म बदल लिया।

किंतु भारत? आज तक अजेय है, 1,300 वर्ष से लगातार देश का एक बड़ा हिस्सा युद्ध में संलग्न रहा, मंदिर टूट गए, जातियों में विभाजित हो गए किंतु एक चीज महत्वपूर्ण हैं, हम अब भी हैं और पूरी मजबूती से हैं।

हम हिंदू है, हम भारतीय है।

भारतीय का अर्थ गलत न पाले, राजा भरत की भूमि भारत है और उनके वंशज मात्र भारतीय है।

.... तो हम ज़िंदा कैसे हैं? यदि हमारे पूर्वज युद्ध हारते ही रहे, तो हम 1200 साल से जिंदा कैसे हैं? आजकल लोगों की एक सोच ...
21/08/2023

.... तो हम ज़िंदा कैसे हैं?

यदि हमारे पूर्वज युद्ध हारते ही रहे, तो हम 1200 साल से जिंदा कैसे हैं? आजकल लोगों की एक सोच बन गई है कि राजपूतों ने लड़ाई तो की,
लेकिन वे एक हारे हुए योद्धा थे, जो कभी अलाउद्दीन से हारे, कभी बाबर से हारे, कभी अकबर से, कभी औरंगज़ेब से...।

क्या वास्तव में ऐसा ही है ?

यहां तक कि समाज में भी ऐसे कई दिग्भ्रमित राजपूत हैं, जो महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान
जैसे कालजयी योद्धाओं को महान तो कहते हैं,
लेकिन उनके मन में ये हारे हुए योद्धा ही हैं!

महाराणा प्रताप के बारे में ऐसी पंक्तियाँ गर्व के साथ सुनाई जाती हैं -

"जीत हार की बात न करिए, संघर्षों पर ध्यान करो"

"कुछ लोग जीतकर भी हार जाते हैं, कुछ हारकर भी जीत जाते हैं।"

असल बात ये है कि हमें वही इतिहास पढ़ाया जाता है, जिनमें हम हारे हैं, क्योंकि हमारा मनोबल कम हो,ये कुकृत्य चाटुकार वामपंथियो द्वारा किया गया ।

मेवाड़ के राणा सांगा ने 100 से अधिक युद्ध लड़े,
जिनमें मात्र एक युद्ध में पराजित हुए और आज उसी एक युद्ध के बारे में दुनिया जानती है, उसी युद्ध से राणा सांगा का इतिहास शुरु किया जाता है और उसी पर ख़त्म...

राणा सांगा द्वारा लड़े गए खंडार, अहमदनगर, बाड़ी, गागरोन, बयाना, ईडर, खातौली जैसे युद्धों की बात आती है, तो शायद हम बता नहीं पाएंगे और अगर बता भी पाए तो उतना नहीं जितना खानवा के बारे में बता सकते हैं ।

भले ही खातौली के युद्ध में राणा सांगा अपना एक हाथ व एक पैर गंवाकर दिल्ली के इब्राहिम लोदी को दिल्ली तक खदेड़ दे, तो वो मायने नहीं रखता,
बयाना के युद्ध में बाबर को भागना पड़ा हो
तब भी वह गौण है...

इनके लिए मायने रखता है तो खानवा का युद्ध जिसमें मुगल बादशाह बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया!

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बात आती है तो, तराईन के दूसरे युद्ध में गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया!

तराईन का युद्ध तो पृथ्वीराज चौहान द्वारा लडा गया आखिरी युद्ध था, उससे पहले उनके द्वारा लड़े गए युद्धों के बारे में कितना जानते हैं हम ?

इसी तरह महाराणा प्रताप का ज़िक्र आता है तो हल्दीघाटी नाम सबसे पहले सुनाई देता है ।

हालांकि इस युद्ध के परिणाम शुरु से ही विवादास्पद रहे, कभी अनिर्णित माना गया, कभी अकबर को विजेता माना तो हाल ही में महाराणा को विजेता माना!

बहरहाल, महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा, चावण्ड, मोही, मदारिया, कुम्भलगढ़, ईडर, मांडल, दिवेर जैसे कुल 21 बड़े युद्ध जीते व 300 से अधिक मुगल छावनियों को ध्वस्त किया!

महाराणा प्रताप के समय मेवाड़ में लगभग 50 दुर्ग थे, जिनमें से तकरीबन सभी पर मुगलों का अधिकार हो चुका था व 26 दुर्गों के नाम बदलकर मुस्लिम नाम रखे गए, जैसे उदयपुर बना मुहम्मदाबाद, चित्तौड़गढ़ बना अकबराबाद...

फिर कैसे आज उदयपुर को हम उदयपुर के नाम से ही जानते हैं ?... ये हमें कोई नहीं बताता!

असल में इन 50 में से 2 दुर्ग छोड़कर शेष सभी पर महाराणा प्रताप ने विजय प्राप्त की थी व लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर दोबारा अधिकार किया था!

दिवेर जैसे युद्ध में भले ही महाराणा के पुत्र अमरसिंह ने अकबर के काका सुल्तान खां को भाले के प्रहार से कवच समेत ही क्यों न भेद दिया हो, लेकिन हमें तो सिर्फ हल्दीघाटी युद्ध का इतिहास पढाएगे, बाकी युद्ध तो सब गौण हैं इसके आगे!

महाराणा अमरसिंह ने मुगल बादशाह जहांगीर से 17 बड़े युद्ध लड़े व 100 से अधिक मुगल चौकियां ध्वस्त कीं, लेकिन हमें सिर्फ ये पढ़ाया जाता है कि 1615 ई. में महाराणा अमरसिंह ने मुगलों से संधि की | ये कोई नहीं बताएगा कि 1597 ई. से 1615 ई. के बीच क्या क्या हुआ..!

महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्ग बनवाए, कई ग्रंथ लिखे, विजय स्तंभ बनवाया, ये हम जानते हैं, पर क्या आप उनके द्वारा लड़े गए गिनती के 4-5 युद्धों के नाम भी बता सकते हैं ?

महाराणा कुम्भा ने आबू, मांडलगढ़, खटकड़, जहांजपुर, गागरोन, मांडू, नराणा, मलारणा, अजमेर, मोडालगढ़, खाटू, जांगल प्रदेश, कांसली, नारदीयनगर, हमीरपुर, शोन्यानगरी, वायसपुर, धान्यनगर, सिंहपुर, बसन्तगढ़, वासा, पिण्डवाड़ा, शाकम्भरी, सांभर, चाटसू, खंडेला, आमेर, सीहारे, जोगिनीपुर, विशाल नगर, जानागढ़, हमीरनगर, कोटड़ा, मल्लारगढ़, रणथम्भौर, डूंगरपुर, बूंदी, नागौर, हाड़ौती समेत 100 से अधिक युद्ध लड़े व अपने पूरे जीवनकाल में किसी भी युद्ध में पराजय का मुंह नहीं देखा!

चित्तौड़गढ़ दुर्ग की बात आती है तो सिर्फ 3 युद्धों की चर्चा होती है :
1) अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को पराजित किया,
2) बहादुरशाह ने राणा विक्रमादित्य के समय चित्तौड़गढ़ दुर्ग जीता;
3) अकबर ने महाराणा उदयसिंह को पराजित कर दुर्ग पर अधिकार किया!

क्या इन तीन युद्धों के अलावा चित्तौड़गढ़ पर कभी कोई हमले नहीं हुए ? इस तरह राजपूतों ने जो युद्ध हारे हैं, इतिहास में हमें वही पढ़ाया जाता है ।

बहुत से लोग हमें ज्ञान देते हैं कि राजपूतों के पूर्वजों ने सही रणनीति से काम नहीं लिया, घटिया हथियारों का इस्तेमाल किया इसीलिए हमेशा हारे हैं...। अब उन्हें किन शब्दों में समझाएं कि उन्हीं हथियारों से राजपूतों ने अनगिनत युद्ध जीते हैं, मातृभूमि का लहू से अभिषेक किया है, सैंकड़ों वर्षों तक विदेशी शत्रुओं की आग उगलती तोपों का अपनी तलवारों से सामना किया है और बार बार शत्रुओं को धूल चटाई है।

भारत में एक से बढ़कर एक योद्धा हुए है, इनमें एक नाम था "समुद्र गुप्त" जिस का नाम इतिहास के एक कोने में ही सिमट के रहा गया, जिसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है, वो इन मुगलों को भगा भगा के मारा कुत्ते की तरह -- अफगान, ईरान, इराक कहीं भी नहीं छोड़ा इनकी बेटी को उठा लाया साथ में ईरान,इराक़ दहेज में लेके आया था। साथ ही 3 बार विश्व विजय के लिए निकला था। लेकिन ऐसे योद्धा को गुमनाम कर दिया।

हम जानते हैं कि वास्तव में हमारा इतिहास भारत से प्रेम करने वाली विचारधारा ने लिखा ही नहीं है,
और कहीं न कहीं पक्षपात पूर्ण इतिहास को
मान्यता भी मिली है हमारे देश में...। अब इतिहास का विद्वानों द्वारा पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। ताकि आप और हम अपने गौरवशाली भारत के चक्रवर्ती सम्राटों और महापुरुषों के बारे में वास्तविक इतिहास पढ़ सकें और आने वाली पीढ़ियां हमें वही समझे, जो वास्तव में हम थे और हिंदुस्तान के उन वास्तविक वीरों को शत शत नमन कर सकें !

भिखना पहाड़ी पटना में भिखना पहाड़ी नामक मुहल्ला है। भिखना पहाड़ी का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था। इसी पहाड़ी पर अशोक ...
21/08/2023

भिखना पहाड़ी

पटना में भिखना पहाड़ी नामक मुहल्ला है। भिखना पहाड़ी का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था। इसी पहाड़ी पर अशोक के पुत्र महेंद्र रहते थे।
19 वीं सदी के आखिरी दशक में लाॅरेंस वाडेल ने भिखना पहाड़ी की जाँच की थी। उन्होंने लिखा है कि भिखना पहाड़ी 40 फीट ऊँची और 1 मील के घेरे में है।
भिखना पहाड़ी पर मठ है। मठ में मूर्ति है। मूर्ति का नाम भिखना कुँवर है, जिसकी पूजा होती है।
भिखना कुँवर दरअसल भिक्खु कुमार हैं और भिक्खु कुमार वास्तव में कुमार महेंद्र हैं। वहीं महेंद्र जो सम्राट अशोक के पुत्र थे।
संदर्भ: डिस्कवरी आॅफ दी इग्जैक्ट साइट आॅफ असोकाज क्लासिक कैपिटल आॅफ पाटलिपुत्र ( 1892 ).

अरबी में खजूर को तमर कहते हैं...जब अरब व्यापारी भारत आते थे तो वह अपने साथ लाई खजूर को बेचते थे और इसे तमर अलअरब या तमर ...
20/08/2023

अरबी में खजूर को तमर कहते हैं...जब अरब व्यापारी भारत आते थे तो वह अपने साथ लाई खजूर को बेचते थे और इसे तमर अलअरब या तमर ए अरब कहते थे..

जब वह भारत आए और उन्होंने इमली खाई तो बड़ी अच्छी लगी क्योंकि यह खट्टी मीठी और दिखने में खजूर के जैसी थी तब इसका नाम तमर अल हिंद या तमर ए हिंद कहा गया... वह अरब से तमर अल अरब लाकर भारत में बेचते और भारत से इमली यानी तमर अल हिंद लेजाकर यूरोप में देते।
यूरोपियन इसका नाम तमर अल हिंद नही कह सकते थे एक्सेंट की वजह से उन्होंने इसे टैमर हिंड कहना शुरू किया। इस तरह इमली का अंग्रेजी नाम Tamarind पड़ा!

विभाजन - विभीषिकागिलगिट – बाल्टिस्तानभारतीय उपमहाद्वीप मे सबसे पहले जहां युनियन जॅक उतरा, वह स्थान है गिलगिट - बाल्टीस्त...
16/08/2023

विभाजन - विभीषिका

गिलगिट – बाल्टिस्तान

भारतीय उपमहाद्वीप मे सबसे पहले जहां युनियन जॅक उतरा, वह स्थान है गिलगिट - बाल्टीस्तान. दिनांक है 1 अगस्त 1947. मूलतः गिलगीट – बाल्टिस्तान प्रदेश अनेक राजवंशों के हाथों जाते – जाते, उन्नीसवी शताब्दी मे जम्मू कश्मीर के डोगरा राजाओं के नियंत्रण मे आया था.

यह प्रदेश अत्यंत सुंदर है. प्रकृति ने यहा मुक्तहस्त से अपना सौंदर्य लुटाया है. यहां उत्तुंग चोटियों वाले पहाड, पाताल तक गई हुई खाई, घने जंगल, बर्फ. सब कुछ है. शांत स्वभाव के खूबसूरत लोग, खुली और शानदार हवा, खुषनुमा माहौल और बेहद आकर्षक निसर्ग, इस प्रदेश की सुंदरता को बढाते है. साथ ही यह प्रदेश सामरिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इसकी सीमाएं पाकिस्तान, चीन अफगाणिस्तान और भारत को जोड़ती है. इस पूरे क्षेत्र में पत्थरों पर उकेरी गयी मूर्तियां मिलती है, जिनमे अधिकतम गौतम बुद्ध की मूर्तियां है.

1885 मे इस प्रदेश के सामरिक महत्व को समझ कर अंग्रेजो ने इसकी सुरक्षा करनी चाही. उन्हे रशिया से डर था कि कही रशियन्स इस पर कब्जा न करले. इसलिये अंग्रेजों के आधीन, कश्मीर के तत्कालीन महाराजा रणवीर सिंह ने गिलगिट एजेन्सी का निर्माण किया. यह एक प्रकार का सुरक्षा दल था, जिसका नियंत्रण अंग्रेजों के हाथों मे था. लेकिन इस पूरे प्रदेश पर प्रशासनिक नियंत्रण महाराजा रणवीर सिंह का ही था.

1935 तक विश्व का परिदृश्य काफी कुछ बदल गया था. विश्व युद्ध के बादल दूर से दिखाई दे रहे थे. ऐसे मे इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को सीधे अपने हाथों मे लेने के लिए अंग्रेजो ने डोगरा राजाओं के साथ समझौता किया. इसके तहत गिलगिट – बाल्टिस्तान का प्रदेश, 75,000 रुपये मे साठ वर्ष के लिए महाराजा ने अंग्रेजों को लीज पर दे दिया. किंतु जब विश्व युद्ध समाप्त हुआ और अंग्रेजों को भारत छोडना ही पडेगा यह स्पष्ट हुआ, तो लीज के समय से पहले, अंग्रेजो ने इस क्षेत्र को महाराजा हरिसिंह को सौंप दिया. इसलिये भारतीय उप - महाद्वीप मे सबसे पहले, अर्थात 1 अगस्त, 1947 को, उगते सूरज के साथ यहां युनियन जॅक उतारा गया.

किंतु कश्मीर पाकिस्तान में नही होना यह पाकिस्तानी नेताओ को बहुत अखर रहा था. पाकिस्तान के नाम मे तो कश्मीर था, पर हकीकत मे नही. इसलिये पाकिस्तान के नेताओ ने जम्मू कश्मीर की फौजो मे सेंध लगाना प्रारंभ किया.

एक अगस्त को जब अंग्रेजो ने ‘गिलगिट एजन्सी’, अर्थात गिलगिट - बाल्टिस्तान का नियंत्रण महाराजा हरसिंह को सौंपा, तो महाराजा की तैयारी बहुत ज्यादा नही थी. अंग्रेजो ने यहा 'गिलगिट स्काऊट' नाम की बटालियन तैनात की थी. इसमे कुछ अंग्रेज अधिकारी को छोड दे, तो सारी बटालियन मुस्लिम थी. 1 अगस्त को यह सारी फौज भी महाराजा के पास आ गयी. महाराज ने इस प्रदेश के गवर्नर ब्रिगेडियर घंसारा सिंह की नियुक्ती की. साथ ही ‘गिलगिट स्काऊट’ के मेजर डब्ल्यू. ए. ब्राऊन और कॅप्टन ए. एस. मेथीसन यह अधिकारी भी कुछ दिनों के लिए दिये. ‘गिलगिट स्काऊट’ का सुबेदार मेजर बाबर खान भी इन सबके साथ था.

अक्टूबर के दुसरे सप्ताह से पाकिस्तानी सेनाओं ने कश्मीरी सेना मे बगावत करवाना प्रारंभ किया. 8– 9 अक्टूबर 1947 को होलार (वर्तमान मे पाक अधिकृत कश्मीर में) मे तैनात ‘2 जे के इन्फंट्री’ के हिंदू जवानों के साथ मुस्लिम जवानों की झडप हुई. कोटली - रावलपिंडी रोड पर स्थित सहनसा इस तहसील मुख्यालय पर भी पाकिस्तानी सेना के जवानों ने स्थानिक युवकों के वेश मे हमला किया.

यह सारे समाचार दिल्ली मे गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को मिल रहे थे. इसी बीच अपने राजगुरू स्वामी संत देव के प्रभाव मे आकर महाराजा हरी सिंह, स्वतंत्र 'डोगरीस्तान' की कल्पना पर काम कर रहे थे. यह सब देखते हुए सरदार पटेल ने तत्काल प्रभाव से दो काम किये. पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ती मेहरचंद महाजन को उन्होने जम्मू एंड काश्मीर प्रांत का प्रधानमंत्री (मुख्य सचिव) का दायित्व लेने के लिए कहा. इसके लिए उन्होने महाराजा हरी सिंह को तैयार किया. दिनांक 15 अक्तूबर को मेहरचंद महाजन ने कश्मीर के प्रधानमंत्री पद का दायित्व स्वीकार किया. सरदार पटेल ने दुसरा काम किया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक, श्री गुरुजी से अनुरोध किया की वे श्रीनगर जाकर महाराजा हरी सिंह को भारत में विलय के लिए तैयार करे.

दिनांक 17 अक्तूबर को शुक्रवार था. इस दिन विशेष वायुयान से श्री गुरुजी श्रीनगर गये. मेहरचंद महाजन सारा समन्वय कर रहे थे. शनिवार दिनांक 18 अक्टूबर को महाराजा के निवासस्थान पर श्री गुरुजी और महाराजा की भेट हुई. इस भेट के दौरान कुंवर कर्ण सिंह भी उपस्थित थे. उनके पांव मे प्लास्टर होने के कारण वे बिस्तर पर थे. महाराजा ने श्री गुरुजी से कहा, "मेरा पूरा राज्य पाकिस्तान से घिरा हुआ है. सारे रास्ते सियालकोट और रावलपिंडी होकर जाते है. लाहोर यह हमारे लिए सबसे निकट का एअरपोर्ट है. ऐसी परिस्थिती मे भारत मे विलय कैसे कर दू?" श्री गुरुजी ने उन्हे समझाया कि “आप एक हिंदू राजा है. पाकिस्तान मे विलीन होने से आपकी हिंदू प्रजा को, आपके हिंदू सिद्धांतों को कडा संघर्ष करना पडेगा. रास्ते तो निकाले जा सकते हैं, बनाए जा सकते हैं.” प्रधानमंत्री मेहेरचंद महाजन ने भी श्री गुरुजी की बात का समर्थन किया. महाराजा ने विलय के लिये अपने तैयारी दिखाई. उन्होने श्री गुरुजी को 'तोसा' (काश्मिरी शाल) भेट की.

श्री गुरुजी दिनांक 19 अक्टूबर को दिल्ली वापस पहुंचे. उन्होंने महाराजा की स्विकृती वल्लभभाई पटेल को बताई. पटेल ने विलय के कागजात तैयार करने के लिए अपने विश्वस्त अधिकारियों को बताया. इधर, ‘श्री गुरुजी का महाराजा से मिलना और महाराजा का भारत के विलय के पक्ष मे तैयार होना’ यह बाते कराची मे जिन्ना और लियाकत अली खान तक पहुंच रही थी. उन्होने तत्काल पाकिस्तानी सेना को सामान्य नागरिकों के वेश मे कश्मीर पर आक्रमण करने को कहा.

दिनांक 22 अक्तूबर की शाम से पाकिस्तानी सेनाओंने कश्मीर की सीमा के अंदर घुसना प्रारंभ किया. यह समाचार मिलते ही, महाराजा ने भारत सरकार से सेना भेजने का आग्रह किया. किंतु नेहरू ने कहा, ‘जब तक विलय पत्र पर हस्ताक्षर नही होते, सेना नही जायेगी’. अंततः 25 अक्टूबर को विलय पत्र पर हस्ताक्षर हुए (श्री गुरुजी और महाराजा की भेट के ठीक एक सप्ताह के बाद) और 26 अक्टूबर बर से भारतीय सेना हवाई रास्ते से श्रीनगर पहुंचने लगी. लेकिन तब तक पाकिस्तानी सेनाओं ने कोटली, मीरपुर, मुजफ्फराबाद जैसे क्षेत्र हथिया लिये थे.

इसी बीच, पाकिस्तानी सेना के आक्रमण का समाचार मिलते ही 'गिलगिट स्काऊट' के मुस्लिम जवानों ने, सुबेदार मेजर बाबर और मेजर डब्ल्यू. ए. ब्राऊन के नेतृत्व में ‘गिलगिट एजन्सी’ के गव्हर्नर ब्रिगेडियर घंसारा का बंगला घेर लिया और उन्हे बंदी बना लिया. ब्रिगेडियर घंसारा के साथ जो थोडे डोगरा हिंदू जवान थे सभी को मौत के घाट उतारा गया..!

1 अगस्त, 1947 को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त हुआ गिलगिट – बाल्टिस्तान, 31 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तानी फौजों के अधीन,पुनः गुलाम बन गया.

भारतीय सेना ने आधे - अधुरे संसाधनों के बावजूद भी पाकिस्तानी सेना को न केवल रोक रखा था, वरन् पाकिस्तानी सेना पिछे हटने लगी थी. भारतीय सेना के अधिकारी नेहरू को आश्वस्त कर रहे थे की अगले सात या आठ दिनो मे हम कश्मीर को पाकिस्तान से मुक्त करा देंगे. किंतु नेहरू ने यह माना नही और कश्मीर का मामला वे युनो मे ले गये. तब से लेकर अब तक, कश्मीर की यह समस्या हमारे देश के लिए नासूर बनी है..!
(क्रमशः)

जो शहीद हुए हैं : नीरा आर्य(जेल में जब अंग्रेजो द्वारा स्तन काटे गए नीरा के) भारत वर्ष की आज़ादी पूरी दुनिया में सबसे विच...
16/08/2023

जो शहीद हुए हैं : नीरा आर्य

(जेल में जब अंग्रेजो द्वारा स्तन काटे गए नीरा के)

भारत वर्ष की आज़ादी पूरी दुनिया में सबसे विचित्र प्रकार की हैं। भारत की आज़ादी के बारे में कुछ बात बड़ा ही आश्चर्यजनक हैं जैसे की कहा जाता है "बिन खड्ग बिन ढाल गाँधी तूने कर दिया कमाल" इसका अर्थ यह हुआ की बिना किसी हिंसा के गाँधी जी आपने भारत को आज़ादी दिलाकर कमाल कर दिया। लेकिन क्या सही में बिना एक बून्द खून बहाए गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलन मात्र से भारत को आज़ादी मिली नीरा आर्य के जीवन पर एक मूवी निकलने की भी खबर कई बार आई हैं। नीरा आर्या एक महान देशभक्त, क्रन्तिकारी, जासूस, सवेदनशील लेखक, जिम्मेदार नागरिक, साहसी और स्वाभिमानी महिला थी। जिन्हे गर्व और गौरव के साथ याद किया जाता हैं। हैदराबाद की महिला नीरा आर्या को पेदम्मा कहते थे।नीरा आर्या ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्राण की रक्षा के लिए सेना में अफसर अपने पति जयकांतदास की हत्या कर दी थी। मौका देखकर जयकांत दास ने सुभाष चंद्र बोस पर गोलियाँ दागी लेकिन वो गोली सुभाष बाबू के ड्राइवर को जा लगी लेकिन इस दौरान नीरा आर्या ने अपने पति जयकांत दास के पेट में खंजर घोप कर हत्या कर दी और सुभाष बाबू के प्राणो की रक्षा की।अपने पति हत्या करने के कारण सुभाष बाबू ने नीरा आर्या को नागिन कहा था। आज़ाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब दिल्ली के लाल किले में मुक़दमे चला तब आज़ाद हिन्द फौज के सभी सिपाही बरी कर दिए गए लेकिन नीरा आर्या अपने अंग्रेज अफसर पति की हत्या के आरोप में काले सजा सुनाई गई तथा वह इन्हे घोर यातनाएँ दी गई। आज़ादी के बाद नीरा आर्या ने फूल बेच कर जीवन यापन किया।नीरा आर्या के भाई बसंत कुमार ने भी आज़ादी के बाद सन्यासी बनकर जीवन यापन किया था। स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका पर नीरा आर्या ने अपनी आत्मकथा भी लिखी हैं।
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उर्दू लेखिका फरहाना ताज को नीरा आर्या ने अपने जीवन के अनेक प्रसंग सुनाये थे। प्रसंगो के आधार पर फरहान ताज ने एक उपन्यास भी लिखा हैं, आज़ादी के जंग में नीरा आर्या के योगदान को रेखांकित किया गया हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में काला पानी सजा के दौरान उनके साथ हुवे अमानवीय घटना के बारे में लिखा हैं की"मैं जब कोलकत्ता जेल से अंडमान के जेल में पहुँची, तो हमारे रहने का स्थान वही कोठरियाँ थी, जिनमे अन्य राजनितिक अपराधी महिला रही थी अथवा रहती थी।हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कम्बल का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी हैं जैसे-तैसे जमीं पर लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल ले कर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेक कर चला गया। कम्बलो का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा लेकिन कम्बलो को पाकर संतोष भी आया।अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।सूर्य निकलते ही मुझे खिचड़ी मिली और लोहार भी आ गया, हाथ का सांकल काटते समय चमड़ा भी कटा परन्तु पैरो में से आड़ी-बेड़ी काटते समय केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरो की हड्डी को जाँचा की कितनी पुष्ट हैं। मैंने एक बार दुखी होकर कहा "क्या अँधा हैं, जो पैर में मारता हैं ? पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे क्या कर लोगी ? उसने मुझे कहा था। तुम्हारे बंधन में हूँ कर भी क्या सकती हूँ ? फिर मैंने उसके ऊपर थूक दिया और बोला औरत की इज़्ज़त करना सीखो। जेलर भी साथ में था उसने कड़क आवाज में कहा "तुम्हे छोड़ दिया जाएगा, यदि तुम सुभाष चंद्र बोस का ठिकाना बता दोगी"भारत के पाठ्यपुस्तकों से पता चलता हैं की पूरी दुनिया में एकमात्र आज़ादी भारत की आज़ादी हैं जिसको बिना खडग बिना ढाल यानि की बिना हिंसा के एक क्रूर हिंसात्मक शासक(अंग्रेज) से प्राप्त किया गया हैं। जबकि अन्य कई इतिहासकारो का कहना हैं की लाखो क्रांतिकारियों के प्राणो के बलिदान का परिणाम भारत की आज़ादी हैं।तथ्यों पर ध्यान देने से पता चलता हैं की गुलामी काल में जिन्होंने अपने पेट और अपने स्वार्थ की चिंता से दूर सिमित संसाधन होते हुवे भी अंग्रेजो से स्वतंत्रता की लड़ाइ लड़ते हुवे अपने प्राण दे दिए उनको भुला दिया गया और जिन्होंने अंग्रेजो के साथ उनके महलो में लंच डिनर किया, उनके साथ हवाई जहाज पर घूमें।

मातृशक्तिवैज्ञानिक शोधों के आधार पर भी यही सिद्ध होता है कि जैविक प्रजातियों में शक्ति का स्रोत माता की अण्ड कोशिका से ग...
25/03/2023

मातृशक्ति

वैज्ञानिक शोधों के आधार पर भी यही सिद्ध होता है कि जैविक प्रजातियों में शक्ति का स्रोत माता की अण्ड कोशिका से गर्भस्थ भ्रूण को प्रदत्त '' सूत्र कणिका'' (Mitochondrial DNA) ही है, जो आक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन द्वारा भोजन से प्राप्त रसायनों को एडेनोशिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) में बदल कर कोशिकाओं की सक्रियता के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं।

सूत्र कणिकाएं वस्तुत: यूकैरियोटिक कोशिकाओं के नाभिक द्रव्य के एक बहुत ही छोटे हिस्से में स्थित माइटोकॉन्ड्रियल (कणिका) के अन्दर पाए जाने वाले गोलाकार छल्ले के आकार वाले गुणसूत्र हैं। साधारण रूप से हाथ हिलाने में ही हाथ की कोशिकाओं को अरबों ए टी पी का उपयोग करना पड़ता है। अत: जैविक प्रजातियों को अपनी क्रियाशीलता को बनाए रखनें के लिए माता द्वारा प्रदत्त इसी शक्ति गृह से आवश्यकतानुसार ऊर्जाएंं प्राप्त करनी पड़ती है।

माता को यह विशिष्ट तत्व अनुवाशिंक रूप से अपनी माता से शत प्रतिशत प्राप्त होते हैं, जबकि पिता के ​शुक्राणुओं में उपलब्ध सूत्र कणिकाएं जननांग पथ में गति करते और अण्डकोशिका में निषेचन काल में पूर्णत: नष्ट हो जाती है।

इस प्रकार मातृ विरासत से प्राप्त इस मातृ ​शक्ति(सूत्र कणिका) का मूल स्त्रोत आदिशक्ति से ही निष्पक्ष प्रमाणित होता है। यही कारण रहा कि भारत में रबी और खरीफ नवान्नों का उपभोग करनें से पूर्व वासन्तिक व शारदीय नवरात्रि के व्रत अनुष्ठान की परम्परा है। जिसके द्वारा मानव कोशिकाओं में पाए जानें वाले सूत्र कणिकाओं को समुचित विश्राम दिया जाता है ताकि भोज्य रसायनों से ऊर्जा उत्पादन की उनकी क्षमताओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। साथ साथ इसके मूल स्त्रोत अर्थात आदिशक्ति को भी अत्यन्त श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।

We get 50% of nucleotic DNA from the mother and 50% from the father.

But we get 100% mitochondrial DNA from the mother. Mitochondria and their DNA only come from the mother to the baby.

Mitochondria produce ATP. ATP is the source of energy in our body. So, we receive power from our mother. And our mother gets it from her mother and our father also gets it from his mother.

This is very interesting that in Hinduism the god of power is mother - Adi Shakti or Maa Shakti, our mother. The scientific understanding over the ages and years is very clear.

All the Vedic pujas and yagnas and the perfect mantra of Maa Durga work on a subtle level to excite and empower us.

आप सभी को #नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं

यह चित्र टॉम लाफ़टीन जॉनसन का है जो अमेरिका में एक उद्योगपति एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर के साथ साथ अमेरिका के बड़े...
04/02/2023

यह चित्र टॉम लाफ़टीन जॉनसन का है जो अमेरिका में एक उद्योगपति एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर के साथ साथ अमेरिका के बड़े शहर क्लीवलैंड के चार बार मेयर भी थे।

एक दिन ये अपने घर के गैराज में कुछ प्रयोग कर रहे थे उनके सामने एक बिजली का छोटा सा मोटर था।

सभी जानते हैं कि बिजली के मोटर में बीच में एक कोर होता है और चारों तरफ एक आर्मेचर होता है आर्मेचर में बिजली का प्रवाह डाला जाता है जिससे एक मैग्नेटिक फील्ड बनती है और उसमें मैटिक फील्ड की वजह से बीच में जो कोर होता है वह तेजी से घूमने लगता है और इसी के उल्टे सिद्धांत पर बिजली का जनरेटर काम करता है।

तुरंत इनके विचार उनके मन में एक क्रांतिकारी विचार आया उन्होंने सोचा जब आर्मेचर गोल है तब कोर उसके बीच में घूम रहा है तो यदि आर्मेचर को लंबवत रूप में फैला दिया जाए तो क्या होता है।

फिर उन्होंने जब प्रयोग किया तब यह देखकर हैरान रह गए की रॉकेट की गति से कोर एक तरफ से दूसरी तरफ भागा।

उसके बाद इन्होंने 1906 में अमेरिका के पेटेंट कार्यालय में एक ऐसे ट्रांसपोर्ट सिस्टम का पेटेंट हासिल कर लिया जिसे दुनिया आज मैगलेव यानी मैग्नेटिक लेविगेशन के नाम से जानती है।

इन्होंने यह विचार दिया कि बगैर पहिए के भी ट्रेन को चलाया जा सकता है यानी मैग्नेटिक लेविगेशन के द्वारा रेल की पटरीओं में एक मैग्नेटिक फील्ड होगा यानी बिजली के मोटर में जो काम आर्मेचर करती है वह काम रेल की पटरीया करेंगी और बिजली के मोटर में जो काम कोर करता है वह काम खुद ट्रेन करेगा लेकिन इस ट्रेन में पहिए नहीं होंगे यह रेल की पटरी यानी आर्मेचर से कुछ मिली मीटर ऊपर उठकर मैग्नेटिक फील्ड पर दौड़ेगा।

आज मैग्लेव ट्रेन जर्मनी में और चीन में चल रही है जिन की गति 900 किलोमीटर से लेकर 1100 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।

लेकिन इस मैग्लेव ट्रेन की सबसे नुकसान वाली बात यह है कि इन्हें बहुत ज्यादा बिजली चाहिए यानी यह बिजली का बहुत ज्यादा खपत करती हैं इसीलिए यह आर्थिक रूप से कई देशों द्वारा नकार दी गई हैं।

फिर टेस्ला कंपनी के मालिक एलन मस्क ने इस पर रिसर्च किया वह यह जानना चाहते हैं थे कि मैग्नेटिक लेविगेशन यानी मैगलेव ट्रेन में इतनी ज्यादा बिजली क्यों लगती है। तब उन्हें पता चला कि हमारे वायुमंडल में जो हवा होती है उसके फ्रिक्शन की वजह से मैग्लेव ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम को बहुत ज्यादा बिजली चाहिए क्योंकि 90% ऊर्जा वायुमंडल के फ्रिक्शन की वजह से बर्बाद हो जाती है।

फिर एलन मस्क के दिमाग में और भी ज्यादा क्रांतिकारी विचार आया कि यदि एक ऐसा ट्यूब बना दिया जाए जिसमें वैक्यूम के द्वारा पूरी हवा निकाल दिया जाए और उसमें भी यही मैग्नेटिक आर्मेचर और कोर का सिद्धांत हो तब क्या होता है

उसके बाद उन्होंने अमेरिका के नवादा के रेगिस्तान में एक हाइपरलूप बनाकर इसका प्रयोग किया फिर यह देखकर वैज्ञानिक चौक गए कि बेहद कम बिजली में हाइपरलूप चलाया जा सकता है क्योंकि रूप में से हवा निकाल देने से पॉड को फ्रिक्शन का सामना नहीं करना पड़ता इसीलिए बेहद तेज स्पीड में यानी बुलेट की स्पीड में पॉड जिसमें यात्री बैठे होते हैं वह हाइपरलूप में एक जगह से दूसरी जगह चला जाता है।

हाइपरलूप का पेटेंट भी हो गया है। अमेरिका के कई शहरों में इसकी मंजूरी दे दिया है दुबई में भी लग रहा है भारत सरकार भी इस पर विचार कर रही है क्योंकि इसमें बहुत कम बिजली लगती है और इसे बनाने में किसी मेट्रो के बनाने की अपेक्षा बहुत कम खर्चा आता है।

02/09/2022

तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

सब कुछ पाया इस जीवन में,
फिर भी इच्छाएं बाकी हैं
दुनिया से हमने क्या पाया,
यह लेखा-जोखा बहुत हुआ,
इस जग ने हमसे क्या पाया,
बस ये गणनाएं बाकी हैं।

इस भाग-दौड़ की दुनिया में
हमको इक पल का होश नहीं,
वैसे तो जीवन सुखमय है,
पर फिर भी क्यों संतोष नहीं !

क्या यूं ही जीवन बीतेगा,
क्या यूं ही सांसें बंद होंगी?
औरों की पीड़ा देख समझ
कब अपनी आंखें नम होंगी ?
मन के अंतर में कहीं छिपे
इस प्रश्न का उत्तर बाकी है।

मेरी खुशियां, मेरे सपने
मेरे बच्चे, मेरे अपने
यह करते-करते शाम हुई
इससे पहले तम छा जाए
इससे पहले कि शाम ढ़ले

कुछ दूर परायी बस्ती में
इक दीप जलाना बाकी है।
तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

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