Herem Aran Tribal History ᱦᱮᱲᱮᱢ ᱟᱲᱟᱝ

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Herem Aran Tribal History ᱦᱮᱲᱮᱢ ᱟᱲᱟᱝ To recovery extinct culture of tribal communities and is to present in our society for our betterment.

The main aim and object is to emphasis on tribal related historical roles of freedom fighters, important information before Independence of our country etc.

  সাঁওতাল বিদ্রোহের অবিসংবাদী নেতা ১। সিদো ও ২। কানহু মুরমুর অপর দুই সহোদর ভাই ৩। চাঁদ ও ৪। ভৈরব মুরমু  শ্যাম পারগানা প্...
17/05/2026

সাঁওতাল বিদ্রোহের অবিসংবাদী নেতা ১। সিদো ও ২। কানহু মুরমুর অপর দুই সহোদর ভাই ৩। চাঁদ ও ৪। ভৈরব মুরমু শ্যাম পারগানা প্রমুখ সমাজের বিশিষ্ট ব্যক্তিবর্গ । এছাড়াও নেতৃত্ব দিয়েছিলেন ৫। গার্ভু মাঝি ৬। বিরসিং মাঝি ৭। ডোমান মাঝি ৮। কিরতা মাঝি ৯। ভাদো মাঝি ১০। সুনয়া মাঝি ১১। গোচো মাঝি ১২। ত্রিভূবন মাঝি ১৩। মানসিং মাঝি ১৪। রূপু মাঝি ১৫। মেঘু মাঝি ১৬। চাঁদরায় মাঝি ১৭। বিক্রম মাঝি ১৮। রাম পারগানা ১৯। সুঁদরা মাঝি

নলহাটি থানার গেড়িয়াপানি গ্রামের সাজাপ্রাপ্ত বন্দিকে ১৮৫৫ সালের ১০ ডিসেম্বর বাঁকুড়া জেলে স্থানান্তর করা হয়। ১। জগু মাঝি (৬০) ২। দুর্লভ মাঝি (১৬) ৩। মুনিয়া মাঝি (১৫) ৪। দীনু কর্মকার (২৩) ৫। বলরাম মাঝি (১৬) ৬। মুড়িয়া মাঝি (১৫) ৭। গোপাল মাঝি ৮। সুন্দরী মাঝি (৪৬) ৯। রণজিৎ মাঝি (২৭) ১০।শমুঙ্গলি মাঝি (৪০) ১১। সোনা মাঝি (১৬) ১২। সূর্য মাঝি (৩৩) ১৪। নিমাই মাঝি (৩৯) ১৫। শ্যাম মাঝি (৩৬) ১৬। মেঘরাই মাঝি

১৮৫৫ সালের ডিসেম্বর মাসে সিউড়ি জেল থেকে এককালীন ২২ জন বন্দিকে হাজারিবাগ জেলে হস্তান্তর করা হয় তাদের মধ্যে কয়েক জনের নাম পাওয়া যাচ্ছে
১। সিংরাই মাঝি (২৯) ২। নফর পাল (৪৯) ৩। শ্যামলাল পাহাড়িয়া (৩৭) ৪। পরশ মাঝি (১৬) ৫। চন্দ্র মাঝি (১৮) ৬। সালকো মাঝি (৩৪) ৭। সিংরাই মাঝি (৪০) ৮। নক্ষণ মাঝি (১৮)

মহিলারাও এই যুদ্ধে সক্রিয় ভূমিকা নিয়েছিলেন । তাঁদের মধ্যে কয়েকজন হলেন ১। রাধা ২। হিরা ৩। তালা ৪। মুনি ৫। ভবানি ৬। ফুলমনি ৭। রুকনি ৮। মানকো ৯। কাঞ্চনি ১০। সোনা ১১। ডিলগি প্রমুখ।

তাছাড়াও বিভিন্ন জাতির মানুষ সাঁওতাল বিদ্রোহে অংশগ্রহণ করে ছিল যেমন কামার , কুমোর , তেলি , গোয়ালা , চামার , ভুঁইয়া বাগদি , হাড়ি , ডোম , ইত্যাদি হিন্দু জাতির এবং মোমিন (মুসলমান) রাও যোগ দিয়েছিলেন । -- বন্দী হিসেবে ৫২ খানা গ্রামের সাঁওতাল ১৯১ জন , ন্যাস ৩৪জন , ডোম ৫ জন , ধাঙ্গড় ৬ জন , কোল ৭ জন , গোয়ালা ১ জন , ভুঁইয়া ৬ জন ও রাজোওয়াড় ১ জনের নাম জানা যায় ( তথ্য: সাঁওতাল বিদ্রোহের অমর কাহিনী , আবদুল্লা রসুল) ।

১৮৫৫ সালের ৪ ডিসেম্বর ভাগলপুর নিজামত আদালতে সিদু সহ ৫ জন সাঁওতালের ফাঁসির হুকুম হয় । অন্য ৫ জনের যাবজ্জীবন জেল ঘোষনা করা হয়। তাঁরা হলেন ১। হিঙ্গু চৌধুরি ২। ছুকু ডোম ৩। বুধন ডোম ৪। জরাড়ন ডোম এবং ৫। ভোলা ডোম ।
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নাগাম রেনাঃ কাথা
12/05/2026

নাগাম রেনাঃ কাথা

   #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ                                   ゚  ゚    ゚
12/05/2026

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तिलकामांझी मुर्मू:राष्ट्र के प्रथम शहीद भारत:- के इतिहास में बाबा तिलका मांझी मुर्मू प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे,जिन्होंन...
11/02/2026

तिलकामांझी मुर्मू:राष्ट्र के प्रथम शहीद

भारत:- के इतिहास में बाबा तिलका मांझी मुर्मू प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे,जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाया और देश की आजादी के लिए अपना बलिदान कर दिया। आदिवासी समाज के लोग इस महान व्यक्तित्व को कभी नहीं भूल सकता इतिहासकारों ने आदिवासियों की पूर्ण उपेक्षा की है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनका नाम सहदेव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अमर शहीदों में तिल का मांझी मुर्मू को प्रथम शाहिद का गौरव प्राप्त है। वह एक महान योद्धा था जिसमें सभी कोई आदर करता था और आज भी उनकी पुण्यतिथि पुण्य आत्मा का स्मरण कर अपने आप को भाग्यवान समझते हैं।
जहां उनको फांसी दी गई थी उसे वर्तमान में तिलका मांझी मुर्मू चौक से नामकरण किया गया है। तिलका मांझी के नाम से एक मोहल्ला भी बसा हुआहै। भागलपुर विश्वविद्यालय जिसकी स्थापना सन 1960 में की गई थी का नामकरण बिहार सरकार ने तिलका मांझी मुर्मू भागलपुर विश्वविद्यालय नाम से सन 1993 में क्या है।
भागलपुर जिला के इतिहास में संतालों के पूर्वज इस इलाके में बहुत पहले सेही मौजूद थे। 1700 ईस्वी के पूर्व संतानों को खेरवार के नाम से जाना जाता था। संथाली लोकगीत में भी अभी भी गया जाता है। संथलों के पूर्वज खरवार नाम से भागलपुर क्षेत्र जो बंगाल का जंगल तराई कहा जाता था और निवास करते आए हैं। रोहतास गार्डन में संथाल मुंडा खरवार खड़िया चेरीपुरा आदि जनजातियाँ शासन करते थे। इनखेरवार जाति ईसा पूर्व ईस्वी को रोहतास में निवास करने का प्रमाण मिलता है।641ईस्वी के आसपास हर्षवर्धन ने मगध को अपने अधिकार में लेकर अपने को राजा घोषित किया। यहां खैरवार वंश का 350 ईस्वी पूर्व का ऐतिहासिक प्रमाण मिलता है। रोहतास गार्ड के एक मंदिर जिसे मुंडेश्वर कहते हैं कि सिलपत में खेरवार मंदिर में ब्रह्म लिपि में लिखा हुआ था। डॉक्टर गौरी शंकर उजाले लिपियों का प्रयोग का समय पांचवी शादी ईस्वी पूर्व से 350 ईस्वी सन माना है।
आदिवासी जनजाति पूर्व से ही शोषण थी और अभीभी विभिन्न तरीके से इन लोगों का शोषण किया जा रहा है, अंग्रेजों की नीति फूट डालो राज करो अभीभी जारी है। वर्तमान में तिलकामांझी मुर्मू को लेकर विशेष मिशन चलाया जा रहा है जिनके तहत आदिम जनजाति पहाड़ियों को बरगला कर तिल का मांझी जनजाति पहाड़िया थे, जैसी चर्चाएं चल रही है। राजनीति रोटी सीखने के लिए विभिन्न संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं,वास्तविक्ता कुछ और है। तिलका मांझी संथाल जाति के थे उनके गोत्र मुर्मू (ठाकुर )पुरोहित का दर्जा प्राप्त है।
तिलका मांझी मुर्मू का जन्म भागलपुर जिला के अंतर्गत सुलतानगंज थाना के तिलकपुर गांव में 11 फरवरी 1750 ई को हुआ था। पिता का नाम सुंदा उर्फ सुंदर मांझी मुर्मू माता का नाम सुमी था। यानी रूपा नमक संताल लड़की से उनकी शादी हुई थी। तिलका मांझी मुर्मू दूरदर्शी मिलन समारोह कर्मठ और कुशल तीरंदाज थे। धून के पक्के एक स्वतंत्रता के पुजारी थे। अंग्रेजों को चुनौती देते हुए भारतवर्ष में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था। तिलका मांझी मुर्मू ने संथलों एवं अन्य आदिवासी भाइयों को अंग्रेजों की दोरंगी नीति शोषण करने के लिए फूट डालो राज करो के षड्यंत्रकारी रवैया से भली भाती अवगत कराया। वे अपनी मातृ भूमि को रक्षा करने एवं अपने आय को स्वतंत्र रहने की प्रेरणा देते रहते थे। इसका नारा था स्वतंत्रता व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है। कोई भी व्यक्ति दूसरे को गुलाम बनकर नहीं रख सकता।
तिलका मांझी चौक पर आदम कद तिलका मांझी मुर्मू प्रस्तर प्रतिमा सरकार की ओर से स्थापित की गई है। जो प्रतिवर्ष 11 फरवरी को उनकी जयंती मनाई जाती है। भागलपुर विश्वविद्यालय के साथ तिलकामांझी मुर्मू का नाम जोड़कर उसे वीर सेनानी को सही ढंग से सामान दिया गया है। स्थापित प्रतिमा के नीचे शीला पाठ में सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी सहित तिलका मांझी मुर्मू (जन्म 11 फरवरी 1750 ईस्वी पुण्यतिथि एवं 1785 ईस्वी)अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जन क्रांति का नेतृत्व करते हुए उन्होंने भागलपुर के प्रथम क्रूर कलेक्टर अगस्टेन क्लिफ्लैंड को अपने तीर का निशाना बनाकर स्वतंत्रता संग्राम का बीजारोपण किया। असीम यातनाओं के बाद उन्हें फांसी दी गई। तिलका मांझी मुर्म को अंग्रेजों से घृणा
थी ही किंतु क्लिफलैंड के राक्षसी व्यवहार से उसकी गिरना अस्थाई रूप से बदल गई। कल आयरलैंड तिलकामांझी मुर्मू को जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहता था। ज्यों-ज्यों हो समय बीतता जा रहा था और सरकारी प्रयास सफल हो रहे थे आदिवासी जनमानस में त्यो -त्यो तिलका भगवान होता जा रहा था। इस कारण जमींदार भी उसे भयभीत रहने लगे थे जमींदारों का दबाव सरकार पर संघर्ष को किसी तरह से अंत करने के लिए सिफारिश कर रहे थे। तिलका मांझी मुर्मू भी कई फ्रेंड को समाप्त कर अंग्रेजों ने दहशत फैलाना चाहते थे। उसने कल फ्रेंड की दिनचर्या के अनुसार अपनी तैयारी पूरी कर ली थी। सड़क के किनारे ताड़ वृक्ष पर तीर-धनुष लेकर चढ़कर छुप गए और क्लिफ्लैंड की आने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ समय बाद खाली फ्रेंड घोड़े पर स्वर होकर आता हुआ दिखाई पड़ा और तिलका मांझी मुर्मू ने तीर साध
कर उसके सीने पर छोड़ दिया। क्लिफ्लैंड घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। 30 नवंबर 1783 ईस्वी को तिलकामांझी मुर्मू ने विषैला वनों को वर्षा कर अपने वीर संतालों को बेदर्द
मौत का बदला ले लिया। घायल क्लिफ्लैंड एक महीना 12दिन तक जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष करता रहा और अंतत: इस लंबे संघर्ष में 13 जनवरी 1784 ईस्वी को मात्र 29 वर्ष की आयु में ही वह मौत का शिकार हो गया। अंग्रेजी हुकूमत का मनोबल ना टूटे इसलिए क्लिफलैंड की हत्या को बीमारी के रूप में दर्ज किया।
तदन रूप विलियम होजेज से एक बुलेटिन भी जारी कर दिया गया कि क्लिफ्लैंड पहले से रोग ग्रस्त था। उसे बुलेटिन के अनुसार उसे मृत्यु प्रांत हुगली के तट पर दफनाया गया। इतना ही नहीं हेस्टिंग्स ने क्लिफ्लैंड के लिए एक स्मारक निर्माण करने का आदेश दिया जिसमें स्मारत के रूप में उसे नेक दिल दूर अंदाज और पहाड़ियों का हितैषी कहकर दिखाया गया (भागलपुर जिला के गजेटियर) लोगों का विश्वास था कि उसे भागलपुर स्थित तिलहा कोठी में ही दफना दिया गया। क्लिफ्लैंड की मृत्यु की खुशी में तिलका मांझी मुर्मू और उनके साथी जब आनंद मना रहे थे,रात्रि का समय था, वह दुश्मनों से निश्चित थे, इस घड़ी इनको पकड़ने के लिए पहाड़िया सेवा के सी अध्यक्ष सरदार जबरा पहाड़िया जो पहले से लगे हुए थे, ने तिलकामांझी मुर्मू की सीन पर दवा बोल दिया और धोखा से गिरफ्तार कर भागलपुर के अंग्रेज अधिकारियों को सौंप दिया।
अंग्रेज अधिकारी तिलकामांझी मुर्मू के जनता के बीच स्थापित प्रतिष्ठा को गिराने के लिए उसे चार घोड़े से रस्सी से बांधकर सड़क पर भीड़ के सामने घसीटते हुए घोड़े मार रहा था। घोड़े के टांगों से बंद तिलका मांझी मुर्मू का शरीर छत विचित्र हो गया। जितना खत्म घोड़ा रोका,अभी भी तिलकामांझी मुर्मू बोलने की चेष्टा कर रहे थे। तिलका मांझी मुर्मू को कठोर यातनाएं दी जा रही थी। उनके मुंह से केवल एक ही शब्द निकल रहा था हुल-हुल -हुल -हुल होगा। अंग्रेज अफसर तुरंत अपने भी चिल्लाया हैंग हिम हैंग हिम हैंग हिम ---हैंग। भागलपुर शहर के चौक के पास बरगद के पेड़ पर बाबा तिलका मांझी मुर्मू के लहू लोहान शरीर को फांसी पर झूलने के लिए जल्द नहीं मिले, अंत में एक अंग्रेज ने यह काम पूरा किया। 13 जनवरी सन 1785 ई को तिल का मांझी मुर्मू ने अंतिम सांस ली और सदा के लिए लाखों लाख आदिवासी परिवार को रोता बिलखता छोड़ इस संसार से कुछ कर गए।
राजमहल मिट्टी में तिलका मांझी मुर्मू का खून बिखरा हुआ का डाला गया। इस आदर्श से उत्प्रेरित पुनः 70 वर्षों के पश्चात 1805 पर 56 में सिद्धों मुर्मू कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में संतानों ने अंग्रेजों के विरोध का झंडा लहराया आज स्वतंत्रता सेनानी के लिए यह क्षेत्र तिल का मांझी मुर्मू के नाम पर एक पर्यटक स्थल बन गया है।

17/01/2026

SANTALI ARAN RENAK KHANDRITET// SANTALI PARSI//JITHU KISKU//2025 #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ ゚ ゚ ゚viral2026

  DISA DOHOE TENAKদিসৗ দহয় তেনাঃ #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ                                   ゚  ゚    ゚
13/01/2026

DISA DOHOE TENAK
দিসৗ দহয় তেনাঃ
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  BADAE TENAK  #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ                                   ゚  ゚    ゚
24/12/2025

BADAE TENAK #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ ゚ ゚ ゚

  বৗড়তি বাডায়তেনাঃ মেনাঃ খান কমেন্ট তালাতে সদর তাবুন পে BARTI BADAE TAHEN KHAN SODOR TABON PE  #ᱦᱮᱲᱮᱢᱟᱲᱟᱝ             ...
13/12/2025

বৗড়তি বাডায়তেনাঃ মেনাঃ খান কমেন্ট তালাতে সদর তাবুন পে
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