Foundation for Indian Scientific Heritage

Foundation for Indian Scientific Heritage An innovative research initiative to draw the Best from the Past and Present for Better Future.

Indian Scientific Heritage Awareness and Applications is a vast domain of multidisciplinary and multidimensional research potentials. All traditional knowledge systems orally perpetuated, do have very practical eco-friendly harmonising aspects. we hope to serve the purpose of preserving and promoting such resources and resource persons.

21/06/2024

अश्रु
ऋग्वेद (१०/९५/१२-१३) में उर्वशी पुरूरवा संवाद में २ बार अश्रु का उल्लेख है। मन्त्र १२ में पुरूरवा कहते हैं कि उर्वशी के चले जाने से उसका पुत्र पिता को नहीं देख अश्रु बहायेगा। मन्त्र १३ में उर्वशी कहती है कि इच्छित वस्तु नहीं मिलने पर अश्रु निकलता है।
कदा सूनुः पितरं जात इच्छाच्चक्रन्नाश्रु वर्तयद्विजानन्।
को दंपती समनसा वि युयोदध यदग्निः श्वशुरेषु दीदयत्॥१२॥
प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्ये शिवायै।
प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यस्तं नहि मूर आपः॥१३॥ (ऋक्, १०/९५)
यजुर्वेद (२५/९) में अश्रु सृष्टि क्रम में उत्पन्न पदार्थ कहा है। इसके बाद हिरण्यगर्भ से सृष्टि क्रम कहा है (हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे-यजु २५/१०)। गोपथ ब्राह्मण के प्रथम मन्त्र में कहा है कि सृष्टि निर्माण के श्रम से प्रजापति के ललाट से स्वेद निकला। उसके प्रवाह ने धारण किया, वह धारा हुयी। उसमें जनन होने से वह जाया हुई। उससे उत्पन्न पुत्र पुर जैसे पिण्ड बने, वह पुरुष हुआ।
प्रजापति (स्रष्टा तत्त्व) के अक्ष से जो अश्रु निकला वह परोक्ष में अश्व कहा गया-ऊर्जा स्रोत या धारा गति का कारण।
प्रजापतेरक्ष्यश्वयत्। तत् परापतत् ततो अश्वः समभवत्, यत् अश्वयत्, तत् अश्वस्य अश्वत्वम्। (शतपथ ब्राह्मण, १३/३/१/१, तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/५/४, आदि)।
अथ यत् अश्रु संक्षरितम् आसीत् सो अश्रुः अभवत्, अश्रुः ह वै तं अश्व इति आचक्षते परोऽक्षम् (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११)
सूर्य या सूर्यों के समूह ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) से जो अश्रु रूप अश्व निकल रहा है, वह सौरमण्डल की सीमा ३३ अहर्गण के बाद ३४वें में दीखता है।
सौर्य्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९)
वारुणो हि देवतया अश्वः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/२/६)- ब्रह्माण्ड में फैला जल जैसा पदार्थ ताराओं को धारण किये है (अवाप्नोति) अतः उसे वाः (वारि) कहते हैं, और उसका क्षेत्र वरुण है (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/६)।
एक का रोना रुदन है, समूह का रोना क्रन्दन है। सूर्य का अश्रु (तेज, वायु) जहां तक फैला है वह सौर मण्डल रोदसी है। रुदन करने वाला रुद्र है, १०० सूर्य व्यास दूरी तक तीक्ष्ण ताप है, वह रुद्र क्षेत्र हुआ। उसके बाद चन्द्र कक्षा से शान्त शिव क्षेत्र आरम्भ होता है। आरम्भ स्रोत शिर है, अतः शिव के ललाट पर चन्द्र है। सौर वायु ३००० सौर व्यास तक जाती है (विष्णु पुराण, २/८/२), उसके बाद शिवतर क्षेत्र है। ग्रह कक्षा ६००० सूर्य व्यास दूरी तक है, उसके बाद सौर मण्डल की सीमा (व्यास = १५७.५ लाख सूर्य व्यास-विष्णु पुराण, २//८/३) तक शिवतम क्षेत्र है। उसके बाद सदाशिव क्षेत्र है।
ब्रह्माण्ड क्रन्दसी है। उसके बाद पूर्ण विश्व प्रायः एक जैसा स्थिर है, उसे संयती कहते हैं।
इमे वै द्यावापृथिवी रोदसी । (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/४/२, ६/७/३/२, ७/३/१/३०)
द्यावापृथिवी वै रोदसी । (ऐतरेय ब्राह्मण, २/४१)
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने (ऋग्वेद, १०/१२१/६, वाजसनेयी यजुर्वेद, ३२/७, तैत्तिरीय संहिता, ४/१/८/५)
यं क्रन्दसी संयती विह्वयेते (ऋग्वेद, २/१२/८)
मनुष्य अश्रु का उल्लेख अथर्व वेद में है।
अश्रूणि कृपमाणस्य यानि जीतस्य वावृतुः। (अथर्व, ५/१९/१३) = जो अश्रु निर्बल जीते गये मनुष्य के बहते हैं।
प्रतिघ्नाना अश्रुमुखी कृधुकर्णी च क्रोशतु। विकेशी पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव॥ (अथर्व, ११/९/७)
हे शत्रुनाशक वीर। तेरे आक्रम्ण से शत्रु के वीर मरने पर उसकी स्त्री केश खोल कर आभूषण रहित आंसुओं से भरे मुख से छाती पीटती हुय़ी आक्रोश करे।
अश्रु के भेद सुश्रुत संहिता, उत्तर तन्त्र, अध्याय ५५ में हैं।
मन्यागलस्तम्भ शिरि विकारा, जृम्भोपघातात् पवनात्मकाः स्युः।

13/06/2024
13/06/2024

श्री मोहन चरण माझी जी (मध्य मे) को उड़ीसा का मुख्यमंत्री चुने जाने की हार्दिक शुभकामनायें।

13/06/2024

From Mauritius 🇲🇺 🕉 🚩

13/06/2024
13/06/2024
13/06/2024

Eastern Ghats Biodiversity Centre crafts biodegradable pots from cow and elephant dung, empowering tribal artisans sustainably.

13/06/2024
13/06/2024

Dandavat Pranams 🙏 to Maharshi Patanjai who coined a Sutra of Cosmic Primordial Seed🔥Om🔥

13/06/2024

ON THE OCCASION OF G.D. SAVARKAR'S BIRTH ANNIVERSARY :

Ganesh Damodar Savarkar was an Indian politician, activist and revolutionary. He was popularly known as Babarao Savarkar. He was the founder of the Abhinav Bharat Society. He led an armed uprising against the British colonial power in India.

On this occasion, the National Archives of India pays tribute by presenting a glimpse of the telegram of the Government of Bombay suggesting the release of the political prisoner, G.D. Savarkar on the grounds of his ill health, dated 31st August 1922.



PMO India
Ministry of Culture, Government of India
Gajendra Singh Shekhawat
Rao Inderjit Singh

Address

19-16-3 Aranthabettu, Chelyar Road Srinivasnagar PO
Surathkal
575025

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