Radhasoami Heritage

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History and Principles of Santmat Radhasoami.

14/10/2025

मेरी नाव है मझधार,
तुम खेवट हुशियार हो।

परम गुरु दातार समद हुज़ूर स्वमीजी महाराज का वचन है कि, जो बचपन से तैरना सीख रहा है उनसे दरिया में भी डाल दो तो पार निकल जाएगा। पर बुढ़ापे में जिसके नौ द्वार बहने लगे वह भला अब क्या सीखेगा वह तो डूबेगा ही डूबेगा।
कुछ ऐसा ही हालत आज जीव की हैं।

जिन्हें लगता है कि परमार्थ तो बुढ़ापे का सौदा है। जब शरीर में कुछ करने की ताकत ना बचे तब बैठे-बैठे सुमिरन-भजन करते रहो।

जीव नादान नहीं जानता कि जब जहाज डूबने लगता है, तब उसका हर बोझा कम करना और जहाज को खाली करना आवश्यक हो जाता है। तब ही कोई जहाज किनारे तक पहुंच पाता है।

जगत में जीवन भर जीव भौतिक कर्मों का अनावश्यक बोझा जमा करता रहता है। फिर उसे ही अपनी कमाई समझ कर मोह के बंधनों से जकड़ कर सम्भाले रखता है और अंत समय में यही सांसारिक कर्म बोझ उसकी नैय्या को भव सागर में डुबो देता है। वर्तमान के कर्मों के अनुसार भविष्य की जून का निर्धारित होना और प्राप्त होना ही, जीव का भव सागर में डूबना है।

अभी जब खुद को संभालने का समय है, तब हम बोझा बढ़ाने में लगे हैं। घर-परिवार, समाज सब आवश्यक है। इन सभी के प्रति जीव को अपने कर्तव्यों और दायित्वों का आवश्यकता व समर्थ अनुसार पालन करना आवश्यक है। ध्यान रहे कर्तव्य और दायित्व कर्म फल की श्रेणी में नहीं आते हैं। इनका पालन करने से कर्मों का बोझा नहीं बढ़ता, बल्कि पिछले कर्मों का बोझा काटता ही है। यह उपयोग की श्रेणी में आता है। पर आवश्यकता से अधिक जो कुछ भी है, वह उपभोग की श्रेणी में आता है और कर्मों का बोझ ही बढ़ाता है।

कलयुग में काल यानी समय का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। बहुत मंहगा और कीमती हो गया है समय। हर किसी के पास तंगी है। बड़ी मुश्किल से मिल पाता है समय। ऐसे में संसार को छोड़ कर भव सागर को पार करने के लिए तैरना सीखने का समय किसके पास है। और अगर हो भी तो पार जाना कौन चाहता है ? वह तो अपने बोझे के साथ डूबेगा ही डूबेगा।

यही हाल हमारा भी है। अभी थोड़ा व्यापार संभाल लें, थोड़ी संपदा जोड़ लें, परिवार में मेरे बिना सब चौपट हो जाएगा, थोड़ा इन सब को भी देख लें। थोड़ा उसको भी देख लें, सभी बस ऐसे ही जीवन निकाल रहे हैं।
.....तैरना कब सीखोगे ?

संसार सागर में लालसाओं, कामनाओं और कर्मों के बोझ से दरकती और टूटती हुई नाव में बैठे हैं। और एक दौड़ जीतने की होड़ में भागे चले जा रहे हैं,
....ना जाने कहाँ !

सभी साध, महात्माओ और संतों ने पुकार पुकार कर कहा और कह रहे हैं। लेकिन हमारे पास समय ही कहां है।

यहां तक कि दो खाली घड़े भी हमने अपने साथ नहीं रखे हैं, कि जिनके सहारे अंत समय में तैर कर हम इस जगत जाल के भव सागर को पार कर सकें। एक घड़ा है वक़्त के सतगुरु पूरे की सच्ची सरन और दूसरा है सतसंग । उनको भी हमने अहंकार और दौलत के दिखावे से भर रखा है । क्योंकि जिनको जीवन भर दिखावे, अहंकार और दौलत से भरे रहने की आदत होती है, वे एक क्षण के लिए भी अपने घट को इनसे खाली और साफ करने के लिए राजी नहीं हो पाते।
अंततः
'दया धार अपना कर लीजै,
काल जाल से न्यारा कीजै।'

पर करनी कर पाना और परमार्थ कमा पाना इनके वास्ते कठिन है।

'सतगुरु स्वामी सदा सहाय'

सप्रेम राधास्वामी
www.radhasoamiheritage.org
(परमपुरुष पूरणधनी समद हुज़ूर स्वमीजी महाराज के महापवित्र निज अंशों व संतमत विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रति कार्यरत व समर्पित).

14/10/2025

परमार्थी सूचना

वास्ते
राधास्वामी मत से सम्बंधित सभी प्रेमी सतसंगी भाई व बहनों के।

मैं मनोज भाई पटेल
(सचिव - राधास्वामी हेरिटेज ट्रस्ट, सूरत गुजरात).

आप सभी सत्संगी भाई और बहनो को सूचित करता हूं कि, कुल मलिक राधास्वामी दयाल की दया व मौज से बड़वाह, मध्य प्रदेश में संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु संस्था द्वारा जमीन ली गई है। जहां परमपुरुष पूरनधनी हजूर स्वामीजी महाराज के महा पवित्र निज चैतन्य अंश केश कलश की स्थापना दिन गुरुवार, दिनांक 28 मार्च 2024 को संस्था द्वारा की गई है।

संस्था के मुख्य उद्देश्य -
परमपुरुष पूरनधनी समद हुज़ूर स्वामीजी महाराज की महापवित्र धरोहर निज चैतन्य अंशों के दर्शन व संतमत विश्वविद्यालय की, जिज्ञासु व अभिलाषी जीवों के परमारथी हित में स्थापना करना है।

जहां राधास्वामी मत की शिक्षाओं के प्रसार व अन्य परमार्थी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भवन निर्माण व अन्य आवश्यक व्यवस्था करने की आवश्यकता है।
अभी तक स्थापना स्थल पर बाउंड्री हेज व फलों के पेड़ लगाय गये हैं और ट्यूबेल बोरिंग का कार्य और बिजली कनेक्शन के लिए ट्रांसफार्मर की खरीद व लगवाई का कार्य किया गया है। यह सब कार्य व गुरुद्वारा दया सागर का निर्माण कार्य व अन्य कार्यवाही सत्संगी भाई व बहनों के सहयोग से ही की गई है और ज़ारी है। अभी महापपित्र चैतन्य अंश स्थापना स्थल पर एक के बाद और बहुत सा कार्य सतसंग व सत्संगियों की आवश्यक सुविधा व हित में करना बाकी है। इसलिए मैं आप सभी सत्संगी भाई और बहनों से विनम्र निवेदन करता हूं कि, कुल मलिक की प्रेरणा से जो ट्रस्ट बनाई गई है और जो कि कुल मलिक परमपुरुष पूरनधनी समद हुज़ूर स्वामीजी महाराज की योजना थी की, उचित समय आने पर राधास्वामी मत की शिक्षाओं पर आधारित गुरुद्वारा व संतमत विश्वविद्यालय का निर्माण होगा। तो आप सभी सत्संगी भाई और बहनों से विनम्र अनुरोध है कि, स्वेच्छा अनुसार इस पावन कार्य में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान करें।
कुल मालिक ही हर घट में प्रेरक और पालक है। सो जो भी प्रेमी सतसंगी भाई व बहन इस परमार्थ कार्य में सहयोग करना चाहते हैं। वे संस्था सचिव से सम्पर्क कर सकते हैं।

सम्पर्क सूत्र -
श्री मनोज भाई पटेल.
# 9979294606.
सचिव,
राधास्वामी हेरिटेज ट्रस्ट.
सूरत, गुजरात.

NEFT/IMPS/RTGS :
RADHASOAMI HERITAGE TRUST

BANK : Bank of Baroda

Branch : Dumbhal surat

A/C NO. : 26690200001933

IFSC CODE : BARB0DUMSUR

Radhasoami | Radhasoami Heritage Trust | Surat 14/10/2025

शब्द धार : 111.
SV2/255/56.

'एक व्रता भक्ति'

जो पति व्रता स्त्री होती है वह सिवाय अपने पति के और किसी को पुरुष नहीं जानती है। उसके लिए तो बाकी सब नामर्द ही होते हैं। बल्कि पति के घर पहुंच कर माता-पिता की प्रीत भी भूल जाती है।
...इसी तरह जो सतगुरु पूरे को सेव रहे हैं, उनको भी चाहिए कि, सिवाय अपने सतगुरु वक़्त के और किसी को भी अपना मालिक और मुक्तिदाता ना समझें। फिर जो पिछले वक़्त के सतगुरु हो चुके हैं, उनका मान भी तभी तक रक्खे जब तक कि अपने वक़्त के सस्तगुरु पूरे की खोज पूरी ना हो जाए और उनसे से मेला ना हो जाए। और जब वक़्त के सतगुरु पूरे मिल जाएं तो सभी पिछलों की टेक और मान्यता से खुद को अलग कर ले और किसी को भी वक़्त के सतगुरु से बढ़ कर बड़ा और महान ना जाने। ना तो कोई व्यक्ति और ना ही स्थान। एक पति व्रता की तरह जो कुछ समझे अपने वक्त के सतगुरु को ही जाने और किसी भी अगले पिछले पर भाव ना लाए।

जो बिचौलिया होते हैं उनका काम सगाई और शादी करवा कर स्त्री और पुरुष को मिला भर देना ही होता है। और स्त्री को समझाते हैं कि, सिवाय अपने पति के और किसी से प्रीत ना रखना और हमसे भी ऐसी प्रीत रखना जैसा गैरों के संग व्यवहार किया जाता है।
..इसी तरह जितने भी पिछले संत मार्गीय महात्मा हुए हैं, सबने बिचौलिए का ही काम किया है यानी अपनी बानी और ग्रंथ में सब जगह लिख गए हैं कि, अपने वक़्त के सतगुरु पूरे की खोज कर के उनकी सरन पड़ो।

सो जिसने उनके वचन माने और अपने वक़्त के सतगुरु पूरे की खोज कर के पूरी सचौटी के साथ उनकी सरन ली और भक्ति कमाई, तो अब उसको चाहिए कि अब सतगुरु वक़्त को ही अपना सच्चा मालिक जाने और पिछले सभी से नाता गैर का माने। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि पिछले हो चुके संत महात्माओं का कुछ मान ना रहा। हो चुके सभी संत और महात्मा हरचंद अपने वक्त के पूरे थे। पर अब वर्तमान में उनके वचन और शिक्षाएं प्रेरक तो हो सकती हैं, पर प्रेरणा तो वक्त के सतगुरु पूरे से ही मिलेगी।

एकनिष्ठा से ही एकाग्रता का उदय होता है, जो कि जीव को कभी भी मार्ग और लक्ष्य से भटकने नहीं देती।
'सतगुरु स्वामी सदा सहाय'

सप्रेम राधास्वामी
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14/10/2025

'नाम भेद अमोलक है'

संसार के सभी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय 'नाम' की बड़ी महिमा करते हैं और कहते नहीं थकते की, 'कलयुग नाम आधारा'। कोई एक नाम, कोई दो, तो कोइ तीन या चार तक पहुंच कर चुक गए। पांचवां नाम जो इस जगत का है ही नहीं, तो इस जगत की रीत से तो किसी को कभी मिला नहीं, ना ही मिल सकता है। 'यही कारण है कि, संसार के किसी भी सैद्धांतिक धर्म, मत या सम्प्रदाय में इसका भेद नहीं मिलता और ना ही मिल सकता है। यह महापवित्र पांचवां नाम इस ब्रह्माण्ड से परे का है। जिसका भेद 'राधास्वामी' मत की शिक्षाओं में और दीक्षा सतगुरु वक़्त द्वारा उपदेश के वक़्त दी जाती है। जो कि ना तो इस जगत के हैं और ना ही इस जगत में हैं। उनका सिलसिला हर वक़्त सत्य देश से कायम रहता है। जिसे साधारण जीव उनके वचनों पर अमल किये बिना कभी जान और समझ ही नहीं सकता। सिर्फ अपने वक़्त के सतगुरु पूरे की खोज ही कर सकता है। उसके लिए भी सच्ची लगन, द्रढ़ विश्वास, निश्छल प्रेम, निर्मल मन और पूर्ण समर्पण का होना आवश्यक है।
इस रीत से 'राधास्वामी मत' किसी भी रीत से एक सांसारिक और सैद्धांतिक मत नहीं है। जो लोग राधास्वामी नाम के सच्चे भाव और वास्तविक अर्थों से परिचित हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि, 'राधास्वामी' तो इस जगत में हो ही नही सकती। फिर जो पांचवें नाम के भेद से अनजान हैं, वे ही अपनी ओछी और सांसारिक बुद्धि के अनुसार राधा और स्वामी को अलग-अलग लिखते और समझते हैं। जो कि इस मत और मार्ग की अवधारणा से बिल्कुल विलग और विपरीत है। इस मत और मार्ग की शुरुआत ही पिण्ड के नाके से शुरू होती है और यात्रा धुर पर पहुंच कर पूरी होती है।
यही सच्ची और पूरी मुक्ति का भेद भी है।

'राधास्वामी' मत के आदि प्रणेता समद गुरु राधास्वामी दयाल हुज़ूर स्वामीजी महाराज, जो कि ना तो इस जगत के थे और ना ही इस जगत में थे। जिन्हें कुल जीवों ने समद हुज़ूर स्वामीजी महाराज के दैहिक स्वरूप में जाना, (कोई प्रश्न ?) सो आपने सच्चे नाम के वर्णात्मक और ध्वनात्मक दोनों ही रूपों का भेद बतलाया है। की ,
'आदि शब्द से श्रवण शब्द फिर शब्द से धुन और धुन से वर्ण बनता है। इस रीत से जीव वर्णात्मक नाम से एकाग्रता द्वारा ध्वनात्मक नाम या धुन, फिर धुन में लीनता द्वारा श्रवण शब्द और श्रवण में रिक्तता द्वारा आदि शब्द को प्राप्त हो सकता है।'
पांच नाम के 'सुमिरन' के माध्यम से 'राधास्वामी मत' की शिक्षा, निर्देशों और सिद्धांतों के अनुसार अंतर अभ्यास द्वारा नाम के इस भेद और 'धुर पद' को पाया जा सकता है। जो कुल का आदि और मूल है।

* पर प्रश्न अब भी वही है कि, पांचवां नाम क्या है ?
तो यदि आप 'राधास्वामी दयाल' को परमात्मा समझते हैं और 'सुरत' को आत्मा के रूप में देखते हैं। तो आपको यह लेक्चर अभी यहीं पर छोड़ देना चाहिए।
...फिर भी यदि 'पांचवें नाम' का भेद पाने की चाह सच्ची हैं, तो पहले कुछ दिन किसी प्रेमी सतसंगी या साध का संग करना चाहिए। तब ही अंतर में सच्ची जिज्ञासा और 'परम सत्य की खोज' पैदा हो सकती है। जो कि महा पवित्र पांचवां नाम है।

कुछ लोग जो खुद को 'राधास्वामी मत' का सच्चा गुरु मानते हैं। उनका कहना है कि, सभी जीव पांच नाम का भेद जानना चाहते हैं। तो वे उनसे कुछ दिन या वर्ष बेगारी करवा कर * 'ज्योत-निरंजन , ओंकार , रारँ , सोहंग , सतनाम.' का पहाड़ा पढ़ा देते हैं। इसमें 'राधास्वामी' नाम का कहीं ज़िक्र भी नहीं आता और I.D. card बना कर अपने डेरे या आश्रम , बाग बगीचों के एनुअल शेड्यूल से बांध देते हैं। उनका सारा जोर बस इसी बात पर रहता है कि ...
सिमरन करो - या जाप करते रहो ?
और...
भक्ति करो - या सेवा करते रहो ?

या फिर पिछले हो चुके संत वी महात्माओं की टेक बंधवा कर जड़ कर देते हैं।
अब करते रहो जीवन भर 'सेवा'...

जब कि सच तो यह है कि,

'नाम वर्णात्मक गाऊं, दुधा विधि भेद बतलाऊँ।

राधास्वामी नाम जो गावे सोई तरे,
कल क्लेश सब नाश,
सुख पावे सब दुख हरे।
ऐसा नाम अपार कोई भेद ना जानहिं,
जो जाने सो पार बहुरि ना जग में जन्महिं।

लखायक है यही धुन का।
बिना गुरु फल नहीं किनका।।

जबकि अपने मूल रूप में ना तो यह प्रेम का पथ है, ना भक्ति मार्ग है, ना ही ज्ञान मार्ग है। 'राधास्वामी मत' सच्ची लगन, द्रढ़ विश्वास, निश्छल प्रेम, निर्मल मन और पूर्ण समर्पण पर आधारित 'गुरु मत' है।
यह लीनता का 'ज्ञात मार्ग' है। जिसमें जो कुछ भी है, इस जगत में और इस जगत से परे भी। वह सब कुछ अपने मूल स्वरूप सहित समाया हुआ है।

'सतगुरु स्वामी सदा सहाय'

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14/10/2025

शब्द धार : 41.
SV2/84-86.

'सतगुरु दाता दात हैं'

सतगुरु वक़्त की सरन के बिना अंतर में कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। जब यह जीव सतगुरु वक़्त की सेवा में रह कर और उनकी मौज में राजी रह कर परमारथी करनी करे तब ही थोड़ी बहुत कुछ अंतर दृष्टि खुल सकती है। जीव अपनी बुद्धि बल से चाहे कितनी ही मेहनत कर ले। पर सच्चे नाम की प्राप्ति जो कि ब्रह्मांड और अंतरिक्ष यानी निरंजन से भी परे की धार है। सो सतनाम की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह विद्या बुद्धि वालों का मत नहीं है। जब सतगुरु वक़्त राज़ी व प्रसन्न होंगे तब ही सच्चे नाम की दात बख्शेंगे।

जैसे आग पर मोम नहीं ठहरता वैसे ही यह नर देहि संसार की आशाओं, तृष्णाओं और भोगों की आग में दिन रात पिघलती जाती है। बड़भागी हैं वे जीव, जिन्हें इस जीवन में सतगुरु पूरे मिल गए हैं और उनकी संगत में वे अपना तन, मन और धन खर्च कर रहे हैं।

"साध के संग से पाव घड़ी में कोटि जन्म के पाप कट जाते हैं।" सा.व.2/86.
पाव यानी चौथाई घड़ी।
एक घड़ी होती है 22.5 मिनट।
पाव घड़ी होती है 5.625 मिनट।

तो कोटि जन्म का अर्थ आप करोड़ जन्म भी समझ सकते हैं और विभिन्न स्तरों या जूनों में जन्म भी समझ सकते हैं। दोनों ही बातें सही हैं। पर शर्त यही है कि साध सच्चा और पूरा होना चाहिए। पहले तो सच्चे साध का मिलना और जीव के लिए उन्हें पहचान पाना ही कठिन है और यदि भाग से मिल भी गए तो संसारी व्रत्तियों में डूबे जीव से उनका संग किया नहीं जाता। सो जब तक संग ना होगा, तब तक प्रेम भी ना होगा और ना ही प्रतीत ही आ सकती है। यहां प्रतीत का भाव अन्तरी खिंचाव या आकर्षण से समझना चाहिए। यह अंतर की पुकार है। फिर जब यही प्रतीत करनी में प्रकट होती है, तब यही सेवा कहलाती है।

तो जब तक अंतर में प्रेम ही ना हो, तब तक प्रतीत कैसे हो सकती है। फिर जहां अन्तरी प्रेम और प्रतीत ही ना हो वहां दया की कद्र कैसे हो सकती है ? तो जब तक सतगुरु पूरे की दया मेहर प्राप्त ना हो, जीव का काज नहीं बन सकता। इस से समझना चाहिए कि, साध संग जीव के लिए परमार्थ का मुख्य अंग है। इसके बिना परमार्थ नहीं बन सकता।

जो यह पूरा जन्म ही सतगुरु पूरे की खोज में निकल जाए तो भी कोई हर्ज या नुकसान नहीं है। बल्कि अन्तरी और रूहानी तौर पर फायदा ही है। क्योंकि सतगुरु की खोज और कुल मालिक से मिलने की सच्ची लगन होने से जीव फिर से मनुष्य जून और जन्म का अधिकारी हो जाएगा। काल उस जीव की जून घटा नहीं सकता। इसके उलट अगर जीव तीरथ, मूरत, व्रत, नियम, आचार, सिद्धि-शक्ति, ब्रह्म ज्ञान और कर्म-काण्ड के रगड़ों झगड़ों में फंस जाता, तो नर देहि भी हाथ से जाती और चार खान चौरासी के दुख और कष्ट क्लेश भी भुगतने पड़ते।

देखा कि जब ब्रह्मा, विष्णु,महादेव और तैंतीस कोटि देवता, जिनका यह ब्रह्म सृष्टि और जगत रचना का सारा पसारा फैलाया हुआ है, जब ये सभी जन्म-मरण में फंसे हुए हैं, तब जीव जो कि निकृष्ट, नादान और असमर्थ है, और इन्हीं ब्रह्माण्डीय शक्तियों की आशा बांधे बैठा है। वह भला जन्म-मरण और कर्म फल के चक्र से कैसे बच सकता है ?

पर जो भाग से सतगुरु पूरे मिल जाएं तो यह सभी जिनका अभी ऊपर ज़िक्र किया है। सो ये तो सभी जीव, मनुष्य और ब्रह्माण्डीय शक्तियां तो जन्म मरण और चौरासी में ही पड़े रहेंगे, पर सतगुरु का प्रेमी भक्त और प्यारी सुरत सतगुरु पूरे की दया मेहर, कृपा और निज बल को पा कर अपने निज रूप और निज धाम को अवश्य ही पा जाएगी।
* इसे ही जीव का पूरा उद्धार व सुरत की सच्ची मुक्ति कहा गया है।

अब और अधिक खुल कर क्या कहूँ ?
जो इस वचन पर यकीन नहीं है तो, पोथी में संतों के वचनों की गवाही ले लो। और जो ना इस वचन पर यकीन है और ना ही संतों के वचन की प्रतीत है। तो भाई चार खान चौरासी का रास्ता खुला है।
यदि तुम्हारे लिए संसारी कर्म ही प्रधान हैं, तो तुम्हारे लिए घर वापसी का अभी समय नहीं आया है।

'सतगुरु स्वामी सदा सहाय'

राधास्वामी हेरिटेज
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14/10/2025

'अंतर गाजे इक तूरा'

*आज का विषय है कि,
वक़्त के सतगुरु या जिंदा गुरु हमें क्या उपदेश देते हैं या कौन से वचन फरमाते हैं ?
क्या उनके वचनों का कोई अर्थ भी है या अपनी रौ में, यूं ही कुछ बड़बड़ाते रहते हैं ?
जब कि, कोई भी जीव उद्धार के मार्ग पर तब ही आएगा जब कि उसका वक़्त मुनासिब आ जाएगा। यानी हर सुरत का उद्धार तब ही होगा, जब कि होना चाहिए।
तब फिर, सतगुरु वक़्त के यूं ही बार-बार एक ही बात को तरह-तरह से समझाने और जीव को लगातार सावधान करते रहने का क्या कारण है ?
और.....
वे ऐसा क्यों करते हैं ?

भक्त मूलक दास जी फरमाते हैं कि -
'सब बाजा ह्रदय बजे, प्रेम पखावज तान।
मंदिर ढूँढत को फिरे, मिल्यो बजावनहर।।'

भावार्थ है कि,
सभी बानी और वचन ह्रदय घट भीतर अंतर में ही बज रहे हैं। पर जीव का ध्यान संसार के सौदों, रंगीनियों और महफ़िल में ऐसा फंसा है कि, उसे अपने भीतर हर वक़्त गाजने वाली उस अनहद बानी 'शब्द धुन' की कुछ खबर ही नहीं है। इसी कारण मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे और तीरथ में उसे ढूंढता फिरता है, जिसे वह जानता ही नहीं बस मान लिया है । कोई वह जो उसे उसके होने की वजह बता सके और वापस घर पहुंचा सके। पर वह उसे वहां नहीं मिलता, इसी से जीव भटक-भटक कर भी प्यासा ही रह जाता है और विधि के विधान में डूब जाता है।

जगत के हर घाट पर उसके कानों में ग्रंथ, पोथी, शास्त्र और कूटनीति और राजनीति की बातें ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती हैं। फिर भला वह घट भीतर की मीठी अनहद तान को कैसे सुन सकता है...? जब तक कि उसे अंतर की प्रेम पखावज को बजाने वाला कोई ना मिल जाए। यही वक़्त का जिंदा सतगुरु वक्त है। जो जीव के ह्रदय के तरों को तान कर, एक सुर में जोड़ देता है। यह अंतर का सुर ही अनंत, अपार, अनहद और अनामी है। अंतर में इसी शब्द धुन की डोर को थाम कर जीव, ब्रह्म के पार निज घर वापस पहुंच सकता है। जहां बिना किसी बाजे के अनहद सुर निकल रहे हैं, यही 'चैतन्य धुन' है और इसी सुर अंतर के पांच नाम हैं।

पर यह तब ही सम्भव है, जब कि कोई इन सुरों को बजाने वाला धुर का ज्ञाता और धुन का भेदी, हमारे अंतर के तानों को तान कर इस अंतर बानी से हमें जोड़ दे।

'सतगुरु खोजो री प्यारी, तेरे भले की कहूँ।
गुरु तो पूरा ढूंढ, तेरे भले की कहूँ।।'

एक जीव के वास्ते मनुष्य जन्म का यही परम लक्ष्य है कि, जीवन को उसके परम अर्थ में जीते हुए निज घर वापसी का मार्ग प्रशस्त करता रहे। और फिर लौट कर ना आए।

जब अंतर में धुन प्रकट हो जाती है तब जबान की भाषा गौड़ और गुप्त हो जाती है। तब जो अंतर बानी खुलती है वह अलौकिक है। इसी लिए संतों ने सतगुरु के वचनों को अलौकिक पराबानी कहा है। तब भला किसे फिक्र है भाषा के व्याकरण और उच्चारण की ? भाषा तो कई भाषाओं का मिश्रण और 'खिचड़ी' भी हो सकती है। हमें तो बस अंतर के भावों को ही समेटना और समझना चाहिए, जो कि परम शुद्ध होता है।

यह अंतर के सुर ही हैं, जो भाव बन कर ह्रदय में, शब्द बन कर वाणी में और वचन बन कर भाषा में प्रकट होते हैं। सो जिसने भावों की भाषा को समझना सीख लिया, उसे तो सतगुरु के वचन सदा प्यारे ही लगेंगे।

पर कलयुग का ऐसा प्रभाव है कि, वाचक ज्ञानियों, ग्रंथ गुरुओं और पिछली लकीरें पीटने और पिटवाने वालों की भीड़ लगी है और बढ़ती ही जा रही है। अगर इन लोगों ने अपना कारोबार चलाया और रोजगार बनाया तो भी ठीक, पर रास्ता तो सीधा और सही बताते। आज लोगों के ह्रदय सूखे पड़े हैं। ऐसे में अंतर रस की कौन कहे और कौन सुने ? अंतःकरण में सूखी रेत की आंधियां चल रही हैं। जिधर देखो, हर तरफ विकार ही विकार उड़ रहे हैं। प्यासे तो सभी हैं, पर मृगमरीचिका के पीछे दौड़ रहे हैं।

सो संतों की बानी और वचन तो तब ही समझ में आएंगे, जब जीव जगत की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ते-दौड़ते थक कर निढाल हो जाएगा। तब ही मन का हौमें, आपः और 'मैं' शांत हो सकता है।
..तब उसकी याद आती है जो बुलबुल हज़ार शीरीं अंतर का सुर सुना सके और जनम-जनम से टूटे तार जोड़ सके।

'सतगुरु दीजे प्रेम दात मोहे'

सप्रेम राधास्वामी
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Radhasoami | Radhasoami Heritage Trust | Surat 07/10/2025

जिज्ञासा .....24.

भक्ति का क्या अर्थ है ...?

मालिक कुल के चरणों में प्रेम प्रीत और प्रतीत का होना ही भक्ति है।
यह सच्चे मन से तब ही हो सकती है जब कि अंतर में सतगुरू और मालिक के दर्शन मिलते है। यह दर्शन भी गजब हैं। यह देह स्वरूप का दर्शन नहीं है, जैसा कि हम जगत में पाते हैं। ये दर्शन प्रकाशमय-शब्दस्वरूप यानी नूरानी होते हैं और अंतर घट शब्द की धुन व ज्ञान के प्रकाश से भर जाता है। यही सच्चा दर्शन है।

चूंकि सुरत-शब्द अभ्यासी को कभी-कभी ध्यान, भजन या अर्धचेतन खुमारी की हालत में संत सतगुरू व शब्द स्वरूप मालिक के दर्शन अंतर में होने लगते हैं , तो उसकी सच्ची भक्ति उसी वक्त से शुरू होती है और दिन प्रति दिन प्रेम व लगन द्रढ़ता से बढती जाती है।

पिंड से न्यारा होने पर स्थूल वर्तमान कर्म कट चुके होते हैं। त्रिकुटी पद पर पहुंचने पर यह प्रेम व भक्ति निश्छल हो जाती है। इस पद पर सूक्ष्म कर्मों का मैल धुल जाता है और त्रिकुटि पद से आगे बढने पर मानसरोवर के घाट पर कर्मों का कारण भी कट जाता है। मानसरोवर के घाट से आगे बढ़ने पर सच्ची व निर्मल भक्ति शुरू हो जाती है और अगम पद पर पहुंचने पर भक्ति पूर्ण हो जाती है। इससे आगे अकह अपार अगाध राधास्वामी के चरणों में पहुंच कर सुरत को सच्चा व पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।

'सप्रेम राधास्वामी'

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