30/08/2021
हमीर देव चौहान की कहानी।
हमीर देव – राजस्थान की कहानी।
उस समय अलाउद्दीन बादशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा था। बादशाह का एक प्रिय सरदार मुहम्मद शाह था। बादशाह की मुहम्मद शाह पर बड़ी कृपा थी और इस वजह से वह बादशाह का चेहरा बन गया था। एक दिन मुहम्मद शाह ने हँसी में बात करते हुए ऐसी बात कह दी कि बादशाह गुस्से से लाल हो गया। उसने मुहम्मद शाह को फाँसी देने का आदेश दिया। बादशाह का आदेश सुनकर मुहम्मद शाह का जीवन सूख गया।
वह किसी तरह दिल्ली से भाग निकला। उसने अपनी जान बचाने के लिए कई राजाओं से प्रार्थना की, लेकिन किसी ने उसे आश्रय देना स्वीकार नहीं किया। सम्राट को नाराज करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। आपदा के कारण मुहम्मद शाह इधर-उधर भटक रहे थे। अंत में वह रणथंभौर के चौहान राजा हमीर के दरबार में गया। उसने राजा से उसकी जान बचाने की प्रार्थना की। राजा ने कहा – ‘राजपूत का पहला धर्म शरणार्थी की रक्षा करना है। तुम यहीं मेरे साथ रहो। जब तक मेरे जिस्म में जान है, कोइ तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता।
मुहम्मद शाह रणथंभौर में रहने लगे। जब बादशाह अलाउद्दीन को इस बात का पता चला तो उसने राजा हमीर को सन्देश भेजा- ‘मुहम्मद शाह मेरा भगोड़ा है। उसे मौत की सजा सुनाई गई है। आप इसे तुरंत मेरे पास भेजें। ‘
राजा हमीर ने उत्तर भेजा – मोहम्मद शाह मेरी शरण में आया है और मैंने उसकी रक्षा करने का वचन दिया है, भले ही मुझे सारी दुनिया से लड़ना पड़े, मैं भय और लालच में शरण नहीं छोड़ूंगा। राजा का पत्र पाकर अलाउद्दीन बहुत क्रोधित हुआ। उन्होंने इसे अपमान माना और साथ ही सेना को रणथंभौर पर छापा मारने के लिए कहा। टिड्डियों की तरह, पठानों की एक विशाल सेना ने मार्च किया, रणथंभौर के किले को 10 मील तक घेर लिया, अलाउद्दीन ने फिर से राजा को संदेश भेजा कि वह मोहम्मद शाह को भेज दे।
बादशाह समझ गया कि राजा हमीर बादशाह की विशाल सेना को देखकर डर जाएगा, लेकिन राजा हमीर ने स्पष्ट कर दिया कि वह किसी भी तरह से शरण नहीं छोडेगा। युद्ध शुरू हो गया। सम्राट की सेना बहुत बड़ी थी; लेकिन राजपूत योद्धा मौत के दो हाथ भी करने को तैयार थे। महीनों तक भयंकर युद्ध चलता रहा। दोनों पक्षों के हजारों वीर मारे गए। अंत में एक दिन मुहम्मद शाह ने स्वयं राजा हमीर से कहा – ‘महाराज! तुमने मेरी वजह से बहुत कुछ सहा है। मैं अब आपके नायकों का विनाश नहीं देखता। मुझे राजा के पास जाना है। ‘
राजा हमीर ने कहा – ‘मोहम्मद शाह! ऐसी बात दोबारा मत कहना। जब तक मेरे शरीर में जान है, तुम यहां से बादशाह के पास नहीं जा सकते। राजपूत का कर्तव्य है शरण-रक्षा। मैं प्राण देकर भी अपना कर्तव्य निभाऊंगा। जैसे-जैसे समय बीतता गया राजपूत सेना के सैनिक कम होते गए। रणथंभौर किले में खाने-पीने का सामान कम होने लगा। दूसरी ओर, दिल्ली से आने के बाद अलाउद्दीन की सेना में नई टूकडिया बढ़ती रहीं। अंत में रणथंभौर किले के सभी खाद्य पदार्थ समाप्त हो गए। राजा हमीर ने जौहर व्रत का पालन करने का फैसला किया। राजपूत महिलाएं जलती हुई चिता में कूद गईं और भगवा वस्त्र पहनकर सभी राजपूत किले के द्वार खोलकर चले गए।
वे अपने शत्रुओं से लड़ते हुए मारे गए। मुहम्मद शाह भी राजा हमीर के साथ युद्ध के मैदान में गए और युद्ध में मारे गए। जब विजयी सम्राट अलाउद्दीन रणथंभौर के किले में पहुंचा तो उसे जलती हुई चिता की राख और अंगारे ही मिले। शरणार्थी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर महापुरुष विश्व में भारत की इस पावन भूमि पर ही जन्में है