Pathak's Current Affairs

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अभ्यर्थियों के संवेदनशील और समर्पित ?

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03/04/2022

डाटा बेस की मजबूती से अपराध की कमर तोड़ने की हसरत!

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 को लेकर आशाओं और आशंकाओं पर मंथन जारी

✍️गणेश दत्त पाठक
मेंटर@ PATHAK'S IAS
(अभ्यर्थियों की विशेष मांग पर)

तकनीक सबकुछ बदलता जा रहा है। बदलाव की गति इतनी तीव्र है कि व्यवस्था के हर आयाम महज दो चार वर्षों में ही बदल जा रहे हैं। अपराध के संदर्भ में भी देखा जा रहा है कि उसकी प्रवृति भी तकनीक के साथ तारतम्य बनाकर बदलती जा रही है। जबकि सुरक्षा एजेंसियों को तकरीबन 100 साल पुराने कई कानूनों के आधार पर अपराधियों का मुकाबला करना पड़ रहा है। इसी विसंगति को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार द्वारा अपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 संसद के पटल पर रखा गया है। सरकार का तर्क आपराधिक पहचान प्रक्रिया को तकनीकी आधार पर तर्कसंगत बनाने का है तो विपक्ष मानवाधिकार और मूल अधिकारों के उल्लंघन को लेकर सशंकित दिख रहा है। विधेयक के कुछ दिनों में अधिनियम बन जाने की संभावना दिख रही है तो आशाओं और आशंकाओं के बादल भी उमड़ घुमड़ रहे हैं।

भारत में संगठित अपराध रही बड़ी चुनौती

भारत के लिए संगठित अपराध एक बड़ी चुनौती रही है। समय के साथ तकनीकी विकास ने अपराधियों के लिए एक अनुकूल व्यवस्था का सृजन भी किया है। अपराधी तकनीकी सुविधाओं का सहारा लेकर आपराधिक गतिविधियों को आसानी से अंजाम देते दिख जाते हैं। कानूनी सीमाओं और तकनीकी अनुपयुक्तताओं के कारण पुलिस अपराधियों को सजा दिलाने में कई बार नाकाम रहती है, जिससे सजा नहीं मिलने के कारण अपराधियों का मनोबल भी बढ़ता जाता है। भारतीय लोकतंत्र में अपराध के राजनीतीकरण और राजनीति के अपराधीकरण ने समस्या की विकारालता को और बढ़ाया है। इसी संदर्भ में एक बड़ी पहल करते हुए केंद्र सरकार आपराधिक प्रक्रिया( पहचान) विधेयक 2022 को लाइ है। जिससे अपराधियों के संदर्भ में एक मजबूत डेटाबेस राष्ट्रीय स्तर पर तैयार हो सके तथा अभियोजन और अपराध संबंधी दोष सिद्धि में सुरक्षा एजेंसियों को मदद मिल सके।

पुरानी व्यवस्था से अपराधियों के मजबूत डेटाबेस बनाने में परेशानी

गौरतलब है कि भारत में तकरीबन 100 साल पुराने कैदी पहचान अधिनियम के तहत ही अपराधियों के पहचान का काम किया जा रहा था। जिसके तहत अपराधियों के फिंगर प्रिंट और फुट प्रिंट लिया जाता था और वह भी मजिस्ट्रेट की अनुमति से। इससे अपराधियों के पहचान में समस्या आ रही थी। तकनीकी सुविधा से लैस होकर अपराधी अपनी गतिविधियों को अंजाम देकर भी पुलिस के चंगुल से बचे रह जाते हैं। कानून की सीमाओं के कारण सुरक्षा एजेंसियां उनकी पहचान तक कायम नहीं रख पाती हैं। कोई मजबूत डाटा बेस नहीं होने से अभियोजन और अपराध के संदर्भ में दोष सिद्धि में भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

अपराधियों से संबंधित जानकारी 75 साल तक रहेगी पुलिस के पास

अपराधियों के पहचान से संबंधित मजबूत डाटा बेस के सृजन के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने अपराधिक प्रक्रिया( पहचान) विधेयक 2022 को संसद के पटल पर रखा है। जिसके संसद द्वारा पास कर देने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अधिनियम बन जाने की संभावना है। इससे अपराधियों से जुड़ी सारी जानकारी का रिकॉर्ड पुलिस रख पाएगी। सजायाफ्ता, आरोपी, या अन्य के शरीर का माप पुलिस ले पाएगी। फिंगर प्रिंट के साथ रेटीना का फोटो, ब्लड सैंपल, हस्ताक्षर का नमूना पुलिस एकत्रित कर सकेगी। हालांकि इसके लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति की आवश्यकता यथावत ही रहेगी। ये सभी एकत्रित डाटा राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पास 75 साल तक सुरक्षित रहेगा। साथ ही, अपराधियों द्वारा माप देने का विरोध भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 186 के तहत अपराध होगा।

आपराधिक गतिविधियों के विश्लेषण में मिलेगी सहायता

सरकार का तर्क है कि इससे एकत्रित और संग्रहित भौतिक और जैविक नमूनों से आपराधिक गतिविधियों के विश्लेषण में भारी मदद मिल जाएगी। इससे जांच एजेंसियों को बहुत मदद मिलेगी। अभियोजन में भी मदद मिलेगी। अदालतों में दोष सिद्धि की दर में बढ़ोतरी होगी। कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रभावकारिता में वृद्धि होगी। मजबूत डाटा बेस से अपराधियों की तत्काल पहचान सुनिश्चित होगी। इससे सुरक्षा एजेंसियों के समय और संसाधन की भी भारी मात्रा में बचत होगी।

मानवाधिकारों और मूलाधिकारों के उल्लंघन की आशंका

यद्यपि सरकार आपराधिक प्रक्रिया( पहचान) विधेयक के तमाम लाभ गिना रही है। परंतु विपक्ष इस विधेयक का जबरदस्त विरोध कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि इस विधेयक से भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार तथा निजता के मूल अधिकार का उल्लंघन होगा। साथ ही, विपक्ष का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) का भी उल्लंघन होगा। जिसके अनुसार किसी भी आरोपी को अपने खिलाफ गवाह बनने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता है। जबकि विधेयक में जैविक जानकारी के संग्रह के लिए बल प्रयोग निहित है, जिसमें नार्को परीक्षण और ब्रेन मैपिंग भी शामिल हो सकती है। विपक्ष का यहां तक कहना है कि भारतीय पुलिस की कार्यशैली कभी कभी बेहद नकारात्मक हो जाती है। ऐसे में उसे विशिष्ट अधिकार मानवाधिकारों के उल्लंघन को बढ़ावा दे सकते हैं। कुछ विशेषज्ञ विधेयक के कुछ अस्पष्ट प्रावधानों की तरफ भी इशारा कर रहे हैं जैसे माप और अन्य शब्दावली का प्रयोग। साथ ही, इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को विशेषज्ञ संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में उल्लिखित मानवाधिकारों का उल्लंघन बता रहे हैं।

पुलिस की तकनीकी श्रेष्ठता के लिए किए जा रहे हैं उपाय

संगठित अपराध और नक्सलवाद तथा आतंकी चुनौतियों के संदर्भ में भारत में पुलिस भी स्मार्ट बनकर तकनीक के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रयास कर रही है। पुलिस को अत्याधुनिक संचार उपकरण और हथियार भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली(सीसीटीएनएस) पर काम आगे बढ़ चुका है। सेंट्रल फिंगर प्रिंट ब्यूरो आदि संस्थान भी मजबूत डेटाबेस तैयार करने में जुटे हुए हैं। गृह मंत्रालय सेंट्रल फिंगर प्रिंट ब्यूरो (सीएफपीबी) और NIST फिंगरप्रिंट इमेज सॉफ्टवेयर (एनएफआईएस) के डेटाबेस के एकत्रीकरण का काम भी कर रहा है। थाने स्तर पर भी प्रत्येक राज्य में ई प्रशासन संबंधी बुनियादी सुविधाओं को एकत्रित करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
परंतु आपराधिक गतिविधियों संबंधी चुनौतियां बढ़ती जा रही है।

अपराध एक बहुआयामी समस्या तो समाधान भी होंगे बहुआयामी

अपराध वास्तव में एक बहुआयामी समस्या है। अपराध नियंत्रण के लिए राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक प्रशासनिक स्तर पर भी समन्वित प्रयास करने होंगे केवल पुलिस के डेटाबेस की मजबूती ही अपराध नियंत्रण की गारंटी नहीं हो सकती है। साथ ही, तकनीक के बदलते कलेवर को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों की तकनीकी सक्षमताओं में बढ़ोतरी भी करना होगा। मानवाधिकारों के संरक्षण को तरजीह भी देनी होगी क्योंकि यह जाना माना तथ्य है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी अपराध के लिए उर्वर मृदा की उपलंब्धता को सुनिश्चित करता है।

आपराधिक प्रक्रिया( पहचान) विधेयक समय की मांग दिखाई देती है। क्योंकि 5जी और 6 जी के दौर में डाटा हर जगह बेहद प्रासंगिक हो जायेगा। अगर भारतीय पुलिस डाटा के मामले में मजबूत नहीं रहेगी तो व्यवस्था के संचालन में उसके अप्रासंगिक हो जाने का खतरा भी बना रहेगा। और यह स्थिति निश्चित तौर पर जनकल्याणकारी व्यवस्था के हित में तो कदापि नहीं हो सकती है।

02/04/2022

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