21/08/2026
“बिहार में ₹112 करोड़ की लागत से नरेंद्र मोदी का भव्य मंदिर बनेगा, उसमें सोने की मूर्ति लगेगी और फिर भारत विश्वगुरु बन जाएगा!”
यह सुनकर शायद आपको भी लगे—क्या यह सच में विकास का मॉडल है, या फिर राजनीतिक भक्ति की हद?
अगर किसी व्यक्ति का यह दावा सही है कि एक जीवित राजनीतिक नेता के मंदिर के निर्माण पर ₹112 करोड़ खर्च किए जाएंगे, तो सबसे पहले सवाल होना चाहिए—इसका आधिकारिक स्रोत क्या है? पैसा कौन देगा और इसकी स्वीकृति किस सरकार या संस्था ने दी है?
सरकार का खजाना जनता के टैक्स से चलता है। उस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसी सार्वजनिक जरूरतों के लिए होना चाहिए। किसी जीवित नेता की मूर्ति या मंदिर के लिए सरकारी धन खर्च करने का सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि लोकतंत्र में नेता जनता के सेवक होते हैं, पूजनीय देवता नहीं।
और अगर कोई निजी व्यक्ति या संगठन अपनी निजी जमीन और अपने पैसे से ऐसा मंदिर बनाना चाहता है, तो वह अलग विषय है। लेकिन इसे सरकारी खर्च, सरकारी योजना या विकास से जोड़ने से पहले आधिकारिक प्रमाण जरूरी है।
भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए मंदिरों में नेताओं की मूर्तियां नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, रोजगार, वैज्ञानिक सोच और जवाबदेह शासन चाहिए।
इसलिए भावनाओं से नहीं—तथ्यों से सवाल पूछिए।