11/06/2020
कृपया किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले और कोई कमेंट करने से पहले पोस्ट पूरी पढ़ने का कष्ट करें।
खुद घर बैठकर, सरकार से लॉक डाउन के दौरान तनख्वाह प्राप्त करके भी "No school, No fees" का नारा लगाने वाले और जिन्होंने लॉक डाउन में अपने व्यवसाय चलने के बावजूद और कमाई करने के बावजूद भी स्कूल फीस ना देने की ठान रखी है, वो RIP लिख कर झूठी संवेदना व्यक्त करने का कष्ट भी ना उठाएं।
आज मैं दो उदाहरण आपके सामने रखूंगा एक उदाहरण हमारे अन्नदाता हमारे किसान भाइयों की और दूसरी उदाहरण हमारे शिक्षा दाता हमारे स्कूल प्रबंधक और स्कूल का सारा स्टाफ जिसमें उनके प्रिंसिपल, टीचर्स, आया, माली, चपरासी, ड्राइवर, कंडक्टर, लेडी अटेंडेंट्स, सिक्योरिटी गार्ड आदि शामिल हैं।
हमारे किसान भाई अपने पैसों से फसल उगाते हैं और उसे बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं अगर उनकी फसल कोई नहीं खरीदता तो सरकार ख़रीदती है। अगर उनकी फसल किसी कुदरती प्रकोप की वजह से नष्ट हो जाती है तो सरकार उन्हें मुआवजा भी देती है। यदि किसानों के साथ कोई अत्याचार होता है तो हम सब उसके खिलाफ आवाज भी उठाते हैं और उनका साथ भी देते हैं। अगर कोई किसान आत्महत्या करता है तो वह हर समाचार पत्र और न्यूज़ चैनलों के लिए सुर्खियां बन जाता है।
एक तरफ देश के अन्नदाता जिनकी जिन की फसल का मोल ना मिलना और जिन की फसल खराब होना और उस का मुआवजा ना मिलना, देशव्यापी मुद्दा बन जाता है और दूसरी तरफ देश के शिक्षा दाता जो उतनी ही मेहनत से देश के भविष्य की फसल यानी अभिभावकों के बच्चों को तैयार करते हैं और जो इस समय इतने बुरे दौर से गुजर रहे हैं कि उन को पैरंट्स ऑनलाइन शिक्षा का मोल देने को भी तैयार नहीं है। जिनका स्टाफ भूखों मरने के लिए मजबूर हो रहा है जो खुद भी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। उनके साथ ऐसा पक्षपात, ऐसा भेदभाव क्यों? कुछ पैरंट्स ऐसे हो सकते हैं जिनकी वास्तविक मजबूरियां हों। ऐसे पेरेंट्स को हम दोष भी नहीं देते परंतु अधिकतर पैरेंट्स सामर्थ्य वान होते हुए भी फीस नहीं देना चाहते। ऐसे में जैसे किसान भाइयों के लिए मुआवजे का प्रावधान है वैसे ही इन सबके लिए कोई सरकार किसी मुआवजे का प्रावधान क्यों नहीं कर रही? शिक्षा दाताओं के हक में कोई सामाजिक संस्थाएं कोई राजनीतिक दल या आम जनता आवाज क्यों नहीं उठा रहे ??