21/09/2026
मदरसे के वो हसीन दिन
जब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मदरसे में बिताए वो दिन आँखों के सामने आ जाते हैं। वो सुबह जल्दी उठना, वज़ू करके दर्स में बैठना, और उस्ताद-ए-मोहतरम की बातों को ध्यान से सुनना — वो सिर्फ़ पढ़ाई नहीं थी, बल्कि ज़िंदगी जीने का एक बेहद हसीन तरीक़ा था
मदरसे का वो सुकून, सबक़ याद करने का जुनून, दोस्तों के साथ एक ही सफ़ पर बैठकर किताबें पढ़ना और बीच-बीच में हल्की सी शरारत करना, सब कुछ कितना पाक और ख़ूबसूरत था। वहाँ हमने सिर्फ़ दीन और किताबों का इल्म ही नहीं सीखा, बल्कि आदाब, अख़लाक़ और अपनों का एहतराम करना भी सीखा।
आज ज़िंदगी में हम कितने भी आगे बढ़ गए हों, लेकिन मदरसे के वो दिन, वहाँ की मिट्टी की खुशबू, और दोस्तों के साथ की गई वो बेफ़िक्र बातें आज भी दिल के सबसे क़रीब हैं। ज़िंदगी की सच्ची बुनियाद वहीं रखी गई थी।
वो यादें हमेशा मेरे दिल में ज़िंदा रहेंगी
दिल से शुक्रिया उन सभी उस्तादों का जिन्होंने सही रास्ता दिखाया।