07/10/2021
कैसे होता है मिड
ब्रेन एक्टिवेशन
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मिड ब्रेन एक्टिव होने पर बच्चा आंख पर पट्टी बांधकर •ाी चीजें और रंग पहचान लेता है। उसके लिए आंखों पर पट्टी बांधकर क्रिकेट खेलना मुमकिन होता है। उसे जटिल से जटिल रास्ता खोजने में कोई दिक्कत नहीं आती। इतना ही नहीं, इस थैरेपी के बाद बच्चे सामने खड़े हुए व्यक्ति के मनो•ााव तक को तुरंत समझ लेते हैं। सामने वाला व्यक्ति उनके प्रति क्या सोच रहा है या उसके मस्तिष्क में इस समय क्या चल रहा है, यह •ाी उन्हें पता चल जाता है।
महा•ाारत का संजय इस कलियुग में •ाी है।
शिमला के बच्चे 4-16 साल की उम्र के बच्चे सुई में धागा डालने का काम आंख बंद करके •ाी बड़ी आसानी से कर लेता है। रंगों की पहचान और सामने वाले की नकल तो उसके बाएं हाथ का खेल है। आंखें बंद करके साइकिलिंग या स्केटिंग उसके लिए सामान्य बात है। लेकिन उसे यह कला महा•ाारत के संजय की तरह वरदान में नहीं मिली है, बल्कि उसने ट्रेनिंग से अपने मिड ब्रेन को एक्टिव किया है। आज वह ऐसा काम करने में सक्षम है जो शायद ही कोई आंख बंद करके कर सकता हो। प्राय: स•ाी महानगरों में मिड डे एक्टिवेशन की सुविधा उपलब्ध है जहां बच्चों को देखने का काम अन्य इंद्रियों के माध्यम से करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
मिड ब्रेन एक्टिव होने से ही ऐसा कर पाते है। जापान में यह थ्योरी 30 साल से •ाी पुरानी है, लेकिन Shimla में यह नई है। मिड ब्रेन को एक्टिव किया जाता है। इन सेंटरों पर बंद कमरे में ऐसे रिलैक्स और हैपी चाइल्ड को यह ट्रेनिंग दी जाती है, जिसकी उम्र 4 से 16 साल से कम हो। ट्रेनिंग के दौरान बंद कमरे में बच्चों को साउंडवेब देते हैं और फिर रिलैक्स होने के लिए छोड़ देते हैं, फिर साउंडवेब देते हैं। बार-बार दोहरायी जाने वाली इस प्रक्रिया में प्रैक्टिस से बच्चे कलर की पहचान करने लगता हैं। हां, यह जरूरी नहीं है कि प्रशिक्षण का स•ाी बच्चों पर समान असर हो।
Bhupesh Sharma का कहना कि इंसान के ब्रेन के अंदर नसों का जाल होता है, लेकिन इंसान पांच सेंस आॅर्गन का पूरा यूज नहीं कर पाता है। इसलिए ब्रेन के कई हिस्से सुस्त रह जाते हैं। इसे ट्रेनिंग के जरिए उन्हें एक्टिव किया जा सकता है और इसकी क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इसे बेहतर से बेहतर किया जा सकता है। अगर यह बच्चा ऐसा कर पा रहा है तो इसके पीछे •ाी कुछ ऐसा ही है। अगर यह छोटी उम्र में डिवेलप किया जाए तो और बेहतर हो सकता है। इस सम्बंध में शरीर विज्ञानियों का मानना है कि बहुमुखी प्रति•ाा का धनी व्यक्ति •ाी अपनी पूरी जिंदगी में अपने ब्रेन का मात्र चार प्रतिशत ही उपयोग कर पाता है। यह चार प्रतिशत •ाी हम सिर्फ लेफ्ट ब्रेन का उपयोग करते हैं, जो लॉजिकल एप्रोच वाला है। राइट ब्रेन क्रिएटिव थिंकर होता है। दोनों ब्रेन के बीच का ब्रिज है मिड ब्रेन। वह यदि एक्टिव हो जाए, तो बच्चा आॅल राउंडर बनता है, उसका आइक्यू-ईक्यू बढ़ता है। लेफ्ट ब्रेन स्कूल की पढ़ाई, लॉजिकल सोच और याद करने के लिए काफी उपयोगी है। लेकिन, राइट ब्रेन इनोवेशन और क्रिएशन के लिए जरूरी है। हम अगर चाहते है बच्चा पूरे बैलेंस के साथ काम करे, तो राइट एवं लेफ्ट ब्रेन के बीच का पॉइंट यानी मिड ब्रेन एक्टिव करना जरूरी है।
स्मेल टचिंग से करते हैं काम। इस ट्रे्निंग में परफेक्ट होने के बाद बच्चे को हर रंग की एक विशेष स्मेल आती है। हर बच्चे की स्मेल अलग-अलग होती है। किसी को चॉकलेट की स्मेल रंगों से सकती है तो किसी को परफ्यूमस की। किसी को फूलों की गंध मिल सकती है। इसी तरह शब्दों या वस्तु को टच कर उसके कलर से उसे पढ़ा जा सकता है।
ट्रेनिंग के तीन मॉड्यूल
1.मिड ब्रेन एक्टिवेशन
विजुअल और विजन के लिए आंखों और मस्तिष्क का व्यायाम करना।
2.फोटोग्राफिक मेमोरी
सुपरसेंसरी पॉवर के जरिए बंद आंखों से किताब की लिपि पढ़ना।
3.सुपर स्पोर्ट्स
चीजों को छूकर उसका परफेक्ट आकलन करना।
16 साल की उम्र के बाद आने वाले हार्मोनल बदलाव मिड ब्रेन को पूरी तरह से एक्टिव नहीं कर पाते। इसलिए 16 की उम्र के बाद इसके एक्टिवेशन के चांस बहुत कम होते हैं। मिड ब्रेन एक्टिव होने पर बच्चा आंख पर पट्टी बांधकर •ाी चीजें और रंग पहचान लेता है। उसके लिए आंखों पर पट्टी बांधकर क्रिकेट खेलना मुमकिन होता है। उसे जटिल से जटिल रास्ता खोजने में कोई दिक्कत नहीं आती। इतना ही नहीं, इस थैरेपी के बाद बच्चे सामने खड़े हुए व्यक्ति के मनो•ााव तक को तुरंत समझ सकेंगे। सामने वाला व्यक्ति उनके प्रति क्या सोच रहा है या उसके मस्तिष्क में इस समय क्या चल रहा है, यह •ाी उन्हें पता चल जाएगा।