Himachal Pradesh GK

Himachal Pradesh GK knowledge about HAS, SSC,CJL, IBPS( BANK)

Aadh Bhagwati Shri Naina Maa
01/07/2022

Aadh Bhagwati Shri Naina Maa

11/01/2022

रामपुर बुशैहर के 15/20 के सरपारा गाँव के नो नागों का इतिहास अपने आप मैं बहुत ही स्वर्णिम है ।

महाकाव्यों तथा पुराणों में नागो का उल्लेख मिलता है।नाग देवताओं का इतिहास रहस्यों से भरा होता है।प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसा एक गांव सरपारा स्तिथ है।यह क्षेत्र जलनाग देवता का निवास स्थान है। यहां पर जलनाग देवता का मंदिर भी स्थित है।इसके अलावा जल नाग देवता का पवित्र और सुंदर सरोवर (सौर) भी है।यह क्षेत्र नौ नागों की पवित्र जन्मभूमि भी है।
दंत कथा के अनुसार एक समय की बात है सरपारा गांव के रायपाल्टू परिवार की अविवाहित युवती जल नाग के सरोवर (सौर) के पास पशु चरा रही थी।सरोवर में अनेक प्रकार के पुष्प खिले हुए थे।वहां पर खिले एक लाल रंग के सुंदर फूल को देखकर युवती उस फूल की और मोहित हुई।और उसने वो फूल तोड़ डाला और अपने घर ले गई।कुछ महीनो बाद वो महिला गर्भवती हो गई।युवती का स्थानीय नाम लामदूधी था। गर्भ धारण करने के कुछ समय के बाद उस युवती ने नौ नाग पुत्रों को जन्म दिया।लोक लाज के कारण उस युवती ने उन छोटे छोटे नागों को एक टोकरे (छाबडू) में बंद करके पशुशाला (खूड़) में छिपा कर रख दिया।जब वो युवती गाय का दूध निकालने जाती तब चोरी छिपे वो उन छोटे नागों के बचो को दूध पिलाती।ऐसा वो युवती रोज करने लगी।दूध की मात्रा में कमी होने के कारण उसके परिवार वालो को शक हो गया।परिवार वालों ने सोचा वो कच्चा दूध किसको पिलाती है।
एक दिन उस युवती की मां पशुशाला (खूड़) में गई उसी समय परिवार की एक सदस्य गेंहू के कच्चे दाने (मौड़ी) भून रही थी।पशुशाला में टोकरे के भीतर नागों को देखकर युवती की मां आगबबूला हो गई।और उसने वो टोकरी गेहूं भूनने वाले बर्तन के उपर उड़ेल दिया।बर्तन गर्म होने के कारण नागों के छोटे-छोटे बच्चे अलग अलग दिशाओं में भागे।कुछ नागों ने साथ लगती जिला कुल्लू की सीमाओं में प्रवेश किया। उनमें से एक नाग धारा सरगा, दूसरा खरगा, तीसरा मूल मंदिर अमतुआ (देथवा)।
एक नाग धुंए के रूप में सुंगरी बहाली होते हुए खाबल रोहड़ू गए।बाकी बचे नाग दूसरी दिशा में गए एक नाग जाघोरी गए उन्होंने जघोरी को ही अपना निवास स्थान चुना। सबसे छोटे नाग अधिक आग में जलने के कारण अपने पिता जलनाग के पास ही शरण ले ली।नाग में से सबसे बड़े भाई वर्तमान में बोंडा (सराहन) क्षेत्र के आराध्य देवता है।उनके अनुज भाई अपनी माता लाम्बदुधी को लेकर काओबिल की और चल पड़े।छोटे भाई ने काओबिल को अपना निवास चुना और वहीं रुक गए।वर्तमान में उन्हें काओबिल के स्थानीय नाग देवता के रूप में जाना जाता है।
जलनाग देवता के सबसे बड़े पुत्र बोंडा नाग ने अपनी माता को अपने साथ ले जाने की जिद्द की नाग माता का वो सबसे प्रिय पुत्र था।अपने प्रिय पुत्र के आग्रह पर नाग माता उसके साथ सराहन की ओर चल पड़ी। काओबिल से नीचे उतरने के बाद वे सतलुज नदी के निकट आ पहुंचे।उस समय नदी पर कोई पुल नही था।नागमाता ने जल के स्तर को देख कर नदी पार जाने से इंकार कर दिया।अपनी माता को अपने बोंडा ले जाने की इच्छा पूरी करने के लिए नदी के आर पार एक विशालकाय नाग का रूप धारण नदी के आर पार अपना शरीर फैलाकर पुल का निर्माण किया।लेकिन नाग माता ने अपने प्रिय पुत्र की पीठ पर जाकर नदी पार करने से मना कर दिया।इस बात का साक्ष्य आज भी वह मौजूद है जहां नाग साहब ने पुल का निर्माण किया था आज वहां सीधा मैदान है। माता ने अपने बड़े बेटे से विनम्र निवेदन किया और काओबिल में रहने की इच्छा जताई।
बड़े बेटे ने अपनी माता की आज्ञा का पालन किया और माता से विदा लेकर स्वयं सराहन क्षेत्र की ओर चल पड़े। नाग माता लाम्बदुधी जो उस वक्त मानव के रूप में थी ने काओबिल की ओर चढ़ाई चढ़ना शुरू की चलते चलते नाग माता थक गए और कुकीधार नामक जगह पर नीचे बैठ कर पसीना पोछने लगी।पसीने की कुछ बूंद जमीन पर गिरी।जिस स्थान पर पसीने की बूंद गिरी आज भी वहां पर जल का स्त्रोत मौजूद है।उसके पश्चात वो अपने प्रिय पुत्र को वहां से देखने लगी।लेकिन उसकी नजरे पुत्र को ढूंढ़ नही पाई।कुछ कदम दूर चलने के बाद नाग माता के स्तनों से दुग्ध की धारा बहने लगी।अब नाग माता को अपने पुत्र की याद सताने लगी।अपने पुत्र की याद में नाग माता ने कुकीधार के समीप अपना दूध निकल कर रखा।आज उस स्थान पर एक छोटा सा कुआं है जो इस बात का जीवंत प्रमाण है पूरे इलाके में सुखा होने के बावजूद भी वो नही सूखता।
90 वर्ष के बुजुर्ग श्री भगत राम वर्मा के अनुसार जब वो युवावस्था में भेड़ बकरियां चुगाया करते थे।जब उनकी भेड़ बकरियां उस कुएं से पानी पीती थी तो उनके मुंह से पानी की जगह दूध की झाग निकलती थी।उसके पश्चात नाग माता ने चलते चलते कुकीधार में विश्राम किया।विश्राम करते करते उनकी नजर एक खुबसुरत झरने पर पड़ी।झरने की खूबसूरती को देखकर नाग माता की सारी थकान दूर हो गई।और नागमाता ने ये निश्चय किया की वे इस झरने के नीचे निवास करेगी।
नाग माता ने अपना मानव का रूप छोड़ कर नागिन का रूप धारण किया।वर्तमान में इस झरने को काओछौ (झरना) के नाम से जाना जाता है।ऐसी मान्यता है जब सूर्य की किरणे इस झरने पर पड़ती है तो ये सात रंगों में बदल जाता है। ऐसा भी माना जाता है नाग माता उस समय झरने के नीचे स्नान करती थी।झरना विशाल चट्टान को चीरता हुआ बहता है।यह स्थान अत्यंत पवित्र एवम् दर्शनीय है।आज भी जब कभी किसी नाग देवता का आगमन काओबिल में होता है तो नाग अपनी माता की विधिवत पूजा अर्चना करके अपनी शीश नवाते है।और देवता के बजंत्री पारंपरिक तरीके से नाग माता का स्वागत करते है।

दुनिया की सबसे कीमती जमीन 💰💰💰कहानी एक महान पंजाबी हिन्दू की जिसने अपना सर्वस्व दान कर दिया " दीवान टोडर मल जी " 🚩*******...
29/12/2021

दुनिया की सबसे कीमती जमीन 💰💰💰

कहानी एक महान पंजाबी हिन्दू की जिसने अपना सर्वस्व दान कर दिया " दीवान टोडर मल जी " 🚩

********************************
क्या आपको पता है कि- दुनिया में सबसे महगी जमीन कहाँ पर है? क्या वो अमेरिका, इंग्लैण्ड, जापान या डुबई में है ? जी नहीं... वो सबसे कीमती जमीन भारत में है और भारत के पंजाब प्रांत के सरहिंद में है. यहाँ एक ऐसी जगह है जो 78000 सोने की मोहर में 4 वर्ग गज खरीदी गई थी. सोने की वर्तमान कीमत के हिसाब से उस 4 वर्ग गज जगह के लिए लगभग 2,50,00,00,000 (दो अरब पचास करोड़ रूपय) कीमत चुकाई गई थी .

गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहबजादो को शहीद कर उनके पार्थिव शरीर को जंगल में (वर्तमान फतेहगढ़ साहब गुरुद्वारे के पीछे) रखा गया था और उनके अंतिम संस्कार की भी इजाजत नहीं थी. राष्ट्र, धर्म, गुरुजी और इंसानियत के प्रति निष्ठा रखने वाले सरहिंद के दीवान टोडरमल साहबजादों का अंतिम संस्कार करना चाहते थे. उन्होंने सरहंद के नबाब से आग्रह किया कि - साहबजादों के संस्कार की इजाजत दी जाए .

इस पर नबाब ने एक असंभव सी शर्त रख दी. उसने कहा हिन्दुस्थान की सारी जमीन के मालिक आलमगीर औरंगजेब हैं यदि आपको इन बच्चों का संस्कार करना है तो संस्कार करने के लिए जमीन खरीदो. टोडरमल ने कहा मैं जमीन खरीदने के लिए तैयार हूँ, आप कीमत बताइये . तब नबाब ने कहा जितनी जमीन चाहिए उतनी जगह पर सोने की मोहरें बिछाकर वो मोहरे सरकारी खजाने में देनी होंगी.

इस कीमत को सुनकर सब हक्के बक्के रह गए मगर दीवान टोडरमल ने इसे स्वीकार कर लिया. उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति और सोने को समर्पित कर दिया. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि - उनके पास इतना सोना नहीं था लेकिन उनके बचन देने के बाद, इलाके के सभी लोगों ने , अपनी पहेचान गुप्त रखते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने की मोहरे दीवान टोडरमल को समर्पित कर दीं थी.

दीवान टोडरमल मल ने सोने की 78,000 मोहरें बिछाकर नबाब से जमीन खरीदी और उस जगह पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शहीद होने वाले गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहबजादों का अंतिम संस्कार किया. धर्म की रक्षा के लिए शाहीद होने वाले साहबजादों का नाम तो अमर है ही लेकिन उनके पार्थिव शरीर के सम्मान के साथ अंतिम संस्कार के लिए दीवान टोडरमल को भी सदैव याद किया जाता रहेगा.

🚩 बाद में सरहन्द के नवाब ने दीवान टोडरमलजी जी पर इस्लाम विरोधी होने का इल्जाम लगा कर जिंदा ही उनके हाथ , पैर काट दिए थे , आंखें निकाल कर पेट मे भाला घुसेड़ कर कत्ल कर दिया था ।

जिस स्थान पर छोटे साहबजादों का अंतिम संस्कार किया गया था उस स्थान पर गुरुद्वारा "ज्योति सरूप साहिब " स्थित है.

दीवान टोडरमल जी आज भी हिन्दू सिख एकता की जिन्दा मिसाल हैं , आज के हालात में भी दीवान टोडरमल जी का नाम लिए बिना छोटे साहिबजादों के बलिदान की महान गाथा नही गायी जा सकती , लेकिन उनकी हवेली की कोई सम्भाल नही हो रही , वो देश की धरोहर जर्जर अवस्था मे है , क्या ये कोई षडयंत्र है ???

🙏 नमन है ऐसे महान राष्ट्रभक्तों और धर्म रक्षकों को 🙏

28/12/2021

ऋषि महत्व और उनके योगदान
----------------------महत्वपूर्ण जानकारी-----------------
#अंगिरा_ऋषि 👉 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

#विश्वामित्र_ऋषि 👉 गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

#वशिष्ठ_ऋषि 👉 ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

#कश्यप_ऋषि 👉 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

#जमदग्नि_ऋषि 👉 भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

#अत्रि_ऋषि 👉 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

#अपाला_ऋषि 👉 अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

ारायण_ऋषि 👉 ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

#पराशर_ऋषि 👉 ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

#भारद्वाज_ऋषि 👉 बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

#वेदों_के_रचयिता_ऋषि 👉 ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- १.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

१. #वशिष्ठ 👉 राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

२. #विश्वामित्र 👉 ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

३. #कण्व 👉 माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

४. #भारद्वाज 👉 वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

५. #अत्रि 👉 ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

६. #वामदेव 👉 वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

७. #शौनक 👉 शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि #अगस्त्य, #कष्यप, #अष्टावक्र, #याज्ञवल्क्य, #कात्यायन, #ऐतरेय, #कपिल, #जेमिनी, #गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

25/12/2021
सेंटा का गिफ्ट...सन 1510           गोआ के तात्कालिक मुश्लिम शासक यूसुफ आदिल शाह को पराजित कर पुर्तगालियों ने गोआ में अपन...
25/12/2021

सेंटा का गिफ्ट...

सन 1510

गोआ के तात्कालिक मुश्लिम शासक यूसुफ आदिल शाह को पराजित कर पुर्तगालियों ने गोआ में अपनी सत्ता स्थापित की। अगले पच्चीस तीस वर्षों में गोआ पर पुर्तगाली पूरी तरह स्थापित हो गए। फिर शुरू हुआ गोआ का ईसाईकरण। कुछ लोग उनकी कथा के प्रभाव में आ कर धर्म बदल लिए और ईसाई हुए। जो धन ले कर बदले उन्हें धन दिया गया, जो भय से बदल सकते थे उन्हें भयभीत कर बदला गया और जो नहीं बदले..?

गांव के बीच मे एक हिन्दू को खड़ा करा कर उसे आरा से चीरा जाता, हिन्दू युवतियों को नग्न कर सँड़सी से उनके स्तन नोचे जाते.. स्त्रियों को नग्न कर उनकी दोनों टांगो में दो रस्सी बाँध दी जाती और दोनों रस्सियां दो घोड़ों से जोड़ दी जातीं। दोनों घोड़े दो ओर दौड़ाये जाते और पल भर में एक शरीर दो भाग में बंट जाता। अरे रुकिए! यह कार्य केवल पुर्तगाली सैनिक नहीं करते थे, उनके साथ एक पादरी रहता था जो बाइबल पढ़ कर अपनी देख-रेख में कार्य प्रारम्भ कराता था। पुर्तगाली ईसाइयों को किसी गाँव मे यह खेल दो बार खेलने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि जिस गाँव मे एक बार यह आयोजन हो जाता, उस गाँव की सारी प्रजा उसी दिन ईसाई हो जाती थी।

पर भारत तो भारत है न! यहाँ के हिन्दू इतनी जल्दी कैसे हार मान लेते? ऊपर से सारा गोआ ईसाई हो गया था पर अंदर ही अंदर फिर अधिकांश जन हिन्दू हो गए थे। घर में मिट्टी के नीचे दबा कर सनातन धर्मग्रंथ रखे जाने लगे। बच्चों को धर्म का ज्ञान दिया जाने लगा। रामायण-महाभारत, वेद-पुराण पढ़े-पढ़ाने जाने लगे।

पर ईसाई भी तो ईसाई थे न! वे भी इतनी शीघ्रता से कैसे पराजय स्वीकार कर लेते?

तो सन 1560...

गोआ के बीचोबीच एक चिता तैयार की गई थी। लकड़ी की नहीं, हिन्दू धर्मग्रंथों की। पिछले छह महीने में हर हिन्दू के घर का कोना कोना छान कर,मिट्टी कोड़ कोड़ कर इन धर्मग्रंथों को निकाला गया था। मराठी और संस्कृत भाषा में लिखे गए इन महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थों की चिता, और उसके ऊपर हाथ पैर बाँध कर डाले गए हिन्दू... कुछ किताबें कहती हैं पाँच सौ लोग थे, कुछ कहती हैं हजार... कुछ किवदन्तियां कई हजार बताती हैं। ईश्वर जाने कितने थे।

निकट खड़े पादरी ने अपनी पुस्तक पढ़ी और फिर सैनिक की ओर संकेत किया। सैनिक ने चिता में अग्नि प्रवाहित की और भारत धू-धू कर जल उठा। अग्नि की लपटें बढ़ीं, और उनके साथ ही बढ़ती गयीं दो प्रकार की ध्वनियां... एक जीवित जल रहे हिंदुओं के चीत्कार की ध्वनि, और दूसरी निकट खड़े ईसाइयों के अट्ठहास की ध्वनि...

सनातन जल रहा था और अग्नि की लपटों के साथ ऊपर उठता जा रहा था चर्च! और वहाँ से हजारों कोस दूर रोम में बैठा सेंटा-क्लॉज मुस्कुरा उठा था।

यह भारत मे ईसाई धर्म के प्रारम्भ का सत्य था।

अपने बच्चों को सेंटा क्लॉज की पोशाक पहना कर खुश होने वाले हिन्दुओं! तुम्हारा सेंटा जब मुस्कुराता है तो लगता है कि वह गोआ की बेटियों की नोची गयी छातियों पर मुस्कुरा रहा है, एक वहशी दैत्य की तरह! तुम नहीं जानते कि क्रिसमस का जो केक तुम खा रहे हो वह गोआ की उन माओं के रक्त से सना हुआ है जिनके नग्न शरीर को घोड़े से चीरवा दिया गया था। क्रिसमस की तुम्हारी शुभकामनाओं में मुझे अपने उन पूर्वजों की चीखें सुनाई देती हैं जिन्हें उनके धर्मग्रन्थों के साथ जीवित ही जला दिया गया था।
क्यों?
सिर्फ इसी लिए कि वे हिन्दू थे।

गोआ एक उदाहरण मात्र है। भारत मे अंग्रेजी सत्ता के काल मे हिंदुओं-मुसलमानों पर ऐसे असंख्य अत्याचार ईसाइयों ने किए हैं। गिनने लगेंगे तो घृणा अपने चरम पर पहुँच जाएगी।

सेंटा क्लॉज गिफ्ट नहीं देता। सेंटा ने जब भी दिया, भारत को नरसंहार, अत्याचार, शोषण का ही गिफ्ट दिया है। सेंटा क्लॉज भारत पर हुए अत्याचार का प्रतीक है। इसका सम्मान करना, इसका त्योहार मनाना अपने पूर्वजों के अपमान जैसा है।

तुम इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हो? शत्रु-परम्पराओं का सम्मान धर्मनिरपेक्षता नहीं, मूर्खता है मित्र! वे झारखण्ड के जंगलों में तुम्हारे देवी-देवताओं को गाली देते हैं और तुम उनके पर्वों को उत्साह से मनाते हो? वे तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, गोआ, केरल में तुम्हारे पूर्वजों को गाली देते हैं और तुम उनका सम्मान करते हो?

वे आसाम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश में सनातन धर्म का लगभग-लगभग नाश कर चुके और तुम इससे अनभिज्ञ प्रेम के गीत गा रहे हो? तनिक सोचो तो, क्या हो तुम? मित्र! तुम अनजाने में अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने राष्ट्र, अपनी परम्पराओं, अपने पूर्वजों की प्रतिष्ठा की हत्या में सहयोग कर रहे हो। मित्र! तुम हत्या कर रहे हो...

और सेक्युलरिज्म? इसे भारत को क्या ईसाइयों से सीखना होगा? एक उदाहरण देता हूँ,

सातवीं शताब्दी में भारत के एक हिन्दू शासक अनंगपाल ने राय पिथौरा किले के पास एक ही प्रांगण में 'हिन्दू,बौद्ध और जैन' तीनो धर्मों के सत्ताईस मन्दिरों का निर्माण कराया था। यहाँ जाने वाला हर श्रद्धालु तीन धर्मों के आराध्यों की एक ही साथ पूजा करता था।

भारत का वह मन्दिर कुतुबुद्दीन ऐबक ने तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही तोड़ दिया पर क्या कोई आज भी मुझे पूरी दुनिया मे ऐसा कोई दूसरा स्थान दिखा सकता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ किसी ईसाई ने किसी दूसरे धर्म का धर्मस्थल बनवाया हो? नहीं न?

मित्र! इस धरा पर धर्मनिरपेक्षता हमसे ही प्रारम्भ हो कर हम पर ही समाप्त हो जाती है। पर यह याद रहे, धर्मनिरपेक्षता के भ्रम में आत्महंता बनना केवल और केवल मूर्खता है।

स्वतन्त्रता के बाद वामपंथियों द्वारा थोपी गयी षड्यंत्रपूर्ण परिभाषा के अनुसार मेरी बातें साम्प्रदायिक दिख रही होंगी, पर मुझे गर्व है अपने साम्प्रदायिक होने पर..

मैं अपने पूर्वजों के हत्यारों को क्षमा नहीं कर सकता। मेरे अंदर यदि किसी को घृणा भरी हुई दिखती है तो गर्व है मुझे अपनी घृणा पर। अपने शत्रुओं के प्रति इसी घृणा ने भारत की रक्षा की है, नहीं तो यूनान, मिस्र, रोम कबके मिट गए।

22 दिसंबर 1851भारत में पहली मालगाड़ी रुड़की से पिरन के बीच चलाई गई।
23/12/2021

22 दिसंबर 1851
भारत में पहली मालगाड़ी रुड़की से पिरन के बीच चलाई गई।

Ramanujan Prize Winner 2021: Professor Neena Gupta has been awarded the 2021 DST-ICTP-IMU Ramanujan Prize for young math...
20/12/2021

Ramanujan Prize Winner 2021: Professor Neena Gupta has been awarded the 2021 DST-ICTP-IMU Ramanujan Prize for young mathematicians from developing countries. She received the award for outstanding work in affine algebraic geometry and commutative algebra. She is the third woman to receive the Ramanujan Prize, which was first awarded in 2005. Also, the fourth Indian to win this prestigious award.

दुनिया का सबसे ऊँचा श्री कृष्ण मंदिरफोटो हिमाचल प्रदेश के किन्नौर की रोराघाटी में स्थित युला कुंडा झील की है। बर्फ के का...
16/12/2021

दुनिया का सबसे ऊँचा श्री कृष्ण मंदिर

फोटो हिमाचल प्रदेश के किन्नौर की रोराघाटी में स्थित युला कुंडा झील की है। बर्फ के कारण इन दिनों यह पूरी तरह जम चुकी है। तापमान -14 पहुंच चुका है। यहां झील के बीचोंबीच स्थित है दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना हुआ श्रीकृष्ण मंदिर। ये समुद्रतल से 12 हजार फीट ऊपर है। ये मंदिर प्रदेश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। बर्फबारी के कारण इन दिनों यह बंद रहता है।

शिमला से 194 किमी. की दूरी तय कर किन्नौर के टापरी तक पहुंचें। वहां से 3 किमी पैदल चलकर बेस कैंप तक पहुंचना होता है। फिर करीब 9 किमी की ट्रैकिंग के बाद युला कुंडा पहुंचा जा सकता है। बर्फबारी के कारण तीर्थस्थल अब कई महीने बंद रहेगा। इसके बावजूद माउंटेन क्लाइंबर्स इन दिनों भी वहां पहुंच जाते हैं।

मान्यता है कि पांडवों ने निर्वासन के दौरान झील का निर्माण किया था। फिर बीच में कृष्ण मंदिर बनाया। अधिक प्रचार-प्रसार न होने के कारण यह जगह पर्यटकों के बीच यह ज्यादा प्रसिद्ध नहीं है। जन्माष्टमी पर यहां स्थानीय श्रद्धालु काफी संख्या में पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारियों की मानें तो इस झील का पानी औषधीय गुणों से भरपूर है। दावा किया जाता है कि मंदिर की परिक्रमा से कष्ट दूर होते हैं।

जन्माष्टमी के दिन यहां पहुंचे श्रद्धालु किन्नौरी टोपी उल्टी करके झील में डालते हैं। मान्यता है कि अगर टोपी डूबे बिना दूसरे छोर तक पहुंच जाती है तो मनोकामना पूरी हो जाती है। आगामी साल भी खुशहाली लेकर आता है।

Denmark PM Mette Frederiksen to visit India from October 9•Prime Minister of Denmark Mette Frederiksen will be visiting ...
09/10/2021

Denmark PM Mette Frederiksen to visit India from October 9
•Prime Minister of Denmark Mette Frederiksen will be visiting India for three days from October 9, 2021. Frederiksen will be meeting President Ram Nath Kovind and holding bilateral talks with PM Narendra Modi.

•During Frederiksen’s 3-day visit, India and Demark will discuss the bilateral relations and review the Green Strategic Partnership along with regional and multilateral issues of mutual interest.

PM Modi to launch ‘Indian Space Association’October 8, 2021Prime Minister Narendra Modi, is set to digitally launch the ...
09/10/2021

PM Modi to launch ‘Indian Space Association’
October 8, 2021

Prime Minister Narendra Modi, is set to digitally launch the ‘Indian Space Association’ (ISpA) on October 11, 2021. Highlights Indian Space Association (ISpA) is the premier industry association of space and satellite companies. ISpA is represented by leading home grown and global corporations having advanced capabilities in space & satellite technologies. Founding members of ISpA

Address

Shimla
171005

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Himachal Pradesh GK posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share