16/05/2026
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> *हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी हमें क्या सिखाती है?*
*1. तौहीद पर चलना सिखाती है*
(पूरी ज़िंदगी तौहीद से भरी हुई है। पिता, क़ौम और बादशाह के सामने तौहीद का ऐलान और झूठे माबूदों से अलग होने का इज़हार)
*2. अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना सिखाती है*
(इब्राहीम अलैहिस्सलाम पूरी ज़िंदगी रब की रज़ा में राज़ी रहे और कभी कोई काम रब की रज़ा के खिलाफ नहीं किया)
*3. मुश्किल हालात में भी रब पर भरोसा करने का तरीक़ा सिखाती है*
(आग में डाले जाने का मामला हो या पिता की धमकी के बाद हिजरत का, बादशाह के सामने तौहीद के ऐलान की बात हो या फिर बीवी और बेटे को मक्का की गैर-आबाद ज़मीन में छोड़ कर आने की)
*4. आज़माइशों पर इस्तिक़ामत इख़्तियार करना सिखाती है*
(इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पूरी ज़िंदगी आज़माइशों से भरी हुई है: अकेले तौहीद वाले, तौहीद के ऐलान के जुर्म में क़ौम का सामना, आग में डाले जाने की आज़माइश, औलाद से महरूमी की आज़माइश, बेटे और बीवी को मक्का में छोड़ कर आने की आज़माइश, बेटे को ज़बह करने की आज़माइश, कई हिजरतों की आज़माइश वग़ैरह)
*5. औलाद की बेहतरीन तरबियत करना सिखाती है*
(औलाद अल्लाह से माँगना, औलाद के लिए नेक बीवी का इंतख़ाब करना, नेक औलाद की दुआ करना, बेटे से उसके मामले में बातचीत करना वग़ैरह)
*6. बीवी, बच्चों और नस्ल की फ़िक्र करना सिखाती है*
(मक्का में छोड़ा तो फ़ैमिली की ख़ैर-ख़ैरियत के लिए दुआ की, खुद की और नस्लों की बुतों की इबादत से हिफ़ाज़त की दुआ माँगी, नमाज़ों के क़ायम करने की दुआ, मग़फ़िरत की दुआ)
*7. इलाक़े, शहर और मुल्क से मुहब्बत और वफ़ादारी सिखाती है*
(इलाक़े की अमन व सलामती के लिए अल्लाह से दुआ, फलों की रोज़ी की दुआ, इलाक़े के लोगों की इस्लाह की दुआ, नमाज़ों के क़ायम करने की दुआ)
*8. किसी भी सूरत में मायूस न होना सिखाती है*
(इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी में बद से बदतरीन हालात आए लेकिन वह कभी मायूस नहीं हुए, ख़ास तौर पर औलाद से महरूमी के वक़्त)
*9. माँ-बाप के साथ हर हाल में वफ़ादारी सिखाती है*
(पिता को निहायत मुहब्बत और एहतराम से अब्बू जान कह कर तौहीद की दावत दी, पिता के सख़्त जुमलों के बावजूद पलट कर नहीं बोले, दुआ का वादा किया और करते भी रहे जब तक अल्लाह ने मना नहीं कर दिया)
*10. नेकियों पर घमंड न करना बल्कि उसकी क़बूलियत की दुआ करना सिखाती है*
(उलुल-अज़्म अंबिया में से एक, ख़लीलुल्लाह, अबुल-अंबिया, इमामुन्नास और ख़ाना-ए-काबा के मेमार होने के बावजूद कभी किसी नेकी या मक़ाम पर घमंड नहीं किया बल्कि अल्लाह से अपनी नेकियों की क़बूलियत की दुआ माँगते रहे)
*हाफ़िज़ ख़लीलुर्रहमान सनाबली, मुंबई*
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