Ram Mohan

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Ram Mohan विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है। -रवींद्रनाथ ठाकुर

06/09/2026

रौनकें हैं मगर सुकून नहीं,
दिल तवायफ के कोठे जैसा है।
हिमांशी बाबरा

तुम्हारे बाद परिंदों ने गाँव छोड़ दिया,तुम्हारे बाद दरख़्तों पर घोंसले न रहे।तू आख़िरी था बस्ती में जिस ने इश्क़ किया,तु...
06/09/2026

तुम्हारे बाद परिंदों ने गाँव छोड़ दिया,
तुम्हारे बाद दरख़्तों पर घोंसले न रहे।
तू आख़िरी था बस्ती में जिस ने इश्क़ किया,
तुम्हारे बाद तो लोगों में हौसले न रहेl

नसीरुद्दीन नसीर ये दर्स-ए-अव्वलीं मुझ को मिला मेरे बुज़ुर्गों से,बहुत छोटे हैं वो औरों को जो छोटा समझते हैं।
04/09/2026

नसीरुद्दीन नसीर
ये दर्स-ए-अव्वलीं मुझ को मिला मेरे बुज़ुर्गों से,
बहुत छोटे हैं वो औरों को जो छोटा समझते हैं।

04/09/2026

बड़े ही तेज़ चुभते हैं ये लहजे मार देते हैं
समीना गुल

बड़े ही तेज़ चुभते हैं ये लहजे मार देते हैं
मुझे अक्सर ये अपनों के रवय्ये मार देते हैं

जिसे अपना समझते हैं वही तकलीफ़ देता है
ये दर दर जा पे हैं खुलते दरीचे मार देते हैं

जिसे हम तूल देते हैं तकल्लुफ़ बरतरफ़ हो कर
तअ'ल्लुक़ से बंधे अक्सर वो रिश्ते मार देते हैं

बहुत तकलीफ़ देते हैं वो क़िस्से ना-शनासी के
हमेशा बे-सबब गुज़रें वो लम्हे मार देते हैं

नहीं मा'लूम होते हैं मगर मा'लूम होते हैं
बहुत मा'दूम होते हैं वो जज़्बे मार देते हैं

जिन्हें जाना नहीं होता वो अक्सर लौट जाते हैं
अचानक से ख़फ़ा हो कर ये अपने मार देते हैं

तुम्हारे सामने आ कर ये लुक्नत सी जो पड़ती है
अधूरे बे-ज़बाँ हो के ये जुमले मार देते हैं

मिरी कोशिश ये होती है मिरी बातें करो मुझ से
ज़माने भर के होते हैं वो क़िस्से मार देते हैं

24/08/2026

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

19/08/2026
18/07/2026

"नेताओं ने गांधी की कसम तक बेची,
कवियों ने निराला की कलम तक बेची,
मत पूछ कि इस दौर में क्या-क्या न बिका,
इंसानों ने आंखों की शरम तक बेची।"
कवि-गोपालदास 'नीरज'जी

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