12/03/2026
*हरीश राणा न्यूज*
हरीश राणा Ghaziabad के रहने वाले थे।
वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए Chandigarh गए थे।
वहाँ वे B.Tech कर रहे थे और अपने पीजी/हॉस्टल में रहते थे।
परिवार के अनुसार वे पढ़ाई में अच्छे और शांत स्वभाव के थे।
2013 में एक दिन अचानक बड़ा हादसा हुआ।
हरीश अपने पीजी की चौथी मंज़िल से गिर गए।
गिरने से उनके दिमाग में बहुत गंभीर चोट लगी।
उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वे कोमा जैसी अवस्था में चले गए।
डॉक्टरों ने बताया कि उनका दिमाग इतना क्षतिग्रस्त हो गया था कि वे vegetative state में पहुँच गए — यानी
वे जागते हुए भी सचेत नहीं थे
खुद से बोल या हिल नहीं सकते थे
उन्हें पाइप से खाना और इलाज देना पड़ता था ।
हादसे के बाद हरीश लगभग 13 साल तक बिस्तर पर ही रहे।
उनकी हालत में:
कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ
वे मशीनों और ट्यूब के सहारे जीवित थे
परिवार लगातार उनकी देखभाल करता रहा
इस दौरान परिवार पर भावनात्मक और आर्थिक दोनों दबाव बहुत बढ़ गया।
आखिरकार हरीश के माता-पिता ने अदालत में एक कठिन फैसला लेते हुए याचिका दायर की।
उन्होंने कहा कि:
बेटे के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है
वह वर्षों से दर्द और निर्भरता में जीवन जी रहा है
इसलिए उसे सम्मानपूर्वक मृत्यु की अनुमति दी जाए
इस याचिका में उन्होंने Passive Euthanasia की अनुमति मांगी।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
मामला भारत की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India पहुँचा।
कोर्ट ने:
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट देखी
डॉक्टरों की राय ली
मरीज की हालत का पूरा रिकॉर्ड जांचा
मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया कि रिकवरी की संभावना लगभग नहीं है।
कोर्ट का फैसला (2026)
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि:
हरीश राणा के मामले में Passive Euthanasia की अनुमति दी जा सकती है
इसका मतलब है कि
धीरे-धीरे लाइफ-सपोर्ट हटाया जाएगा
मरीज को प्राकृतिक तरीके से मृत्यु होने दी जाएगी
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में
मेडिकल बोर्ड
कानूनी प्रक्रिया
परिवार की सहमति
सभी चीज़ें जरूरी हैं।
माता-पिता की भावनाएँ
हरीश के पिता ने मीडिया से कहा:
“कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए ऐसा फैसला नहीं चाहते, लेकिन उसकी हालत देखकर हमें यह कदम उठाना पड़ा।”
यह मामला इसलिए भी भावुक बना क्योंकि परिवार 13 साल तक उम्मीद के साथ बेटे की देखभाल करता रहा।
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