Bharat Gour

Bharat Gour प्रदेशसचिव,Consumer Confederation of India,चूरू
संभाग प्रभारी, SSP, निजी शिक्षण संस्थान संघ, सरदारशहर

30/04/2025

क्षय हो जाए सब अधर्म अक्षय रहे सदा धर्म -कर्म सद्भावना बनी रहे हर दम जीवन राह पर हो सत्कर्म|
आप सभी को अक्षय तृतीया की बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं|

11/04/2025

हमारे #महापुरुष और #छुट्टियां
साथियों आज के समय में यह एक होड़ सी लग गई है कि हमारे पुरोधा महापुरुषों की #जयंती/ #पुण्यतिथि पर सरकारें राजकीय/सार्वजनिक #अवकाश घोषित करती है लेकिन मेरा मानना है कि हमारे आदर्श ये सभी महापुरुष #कर्मवीर थे, सदैव कार्यरत रहने में विश्वास रखते थे, कर्म को ही अपनी पूजा मानते थे ऐसे में इनकी स्मृति में अवकाश घोषित करने के बजाय इनकी जयंति/पुण्यतिथि को शिक्षण संस्थाओं में #अनिवार्य रूप से मनाया जाना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इन महापुरुषों के #कृतित्व और #व्यक्तित्व को जान सके, समझ सके और उनका अनुकरण कर सके!
यही हमारी उनको सच्चे #श्रद्धांजलि होगी!

  यह छोटी सी चिड़िया जिसकी  चहचहाहट  के साथ हम सबका बचपन बीता है। सुबह-सुबह इनकी चहचहाहट सुनकर दिल खुश हो जाता है। बालकन...
20/03/2025


यह छोटी सी चिड़िया जिसकी चहचहाहट के साथ हम सबका बचपन बीता है। सुबह-सुबह इनकी चहचहाहट सुनकर दिल खुश हो जाता है।
बालकनी में मम्मी के द्वारा इनके लिए की गई दाने पानी की व्यवस्था वाली जगह पर तो दृश्य देखते ही बनता है।
आज विश्व गौरैया दिवस है तो आइए हम सब संकल्प लें गर्मियों में इन बेजुबान पक्षियों के लिए दाने पानी की व्यवस्था अपनी आदत में शामिल करने का।

Celebrating my 11th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉
08/04/2024

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 #अदम्य_अपराजयी_अतुल्य_पुरोधा                 #गुरु_गोविन्दसिंहपौष शुक्ला सप्तमी 1666 को सिख पंथ के नौवें गुरु तेग बहादु...
17/01/2024

#अदम्य_अपराजयी_अतुल्य_पुरोधा
#गुरु_गोविन्दसिंह

पौष शुक्ला सप्तमी 1666 को सिख पंथ के नौवें गुरु तेग बहादुर की उत्तर-पूर्वी भारत की धर्म प्रसार यात्रा के दौरान पटनानगर में माता गुजरी की पावन-कोख से एक दिव्य रत्न अवतरित हुआ जिसका नाम गोविन्दराय रखा गया। गुरु तेगबहादुर ने 1670 में पंजाब लौटकर सुरम्य पहाड़ियों के मध्य चकनानकी क्षेत्र में जमीन खरीदकर आनन्दपुर का निर्माण करवाया। गोविन्दराय की शिक्षा दीक्षा का प्रबन्धन आनन्दपुर में ही हुआ जो गुरुपद पर आसीन होने के पश्चात भी जारी रहा। दिव्यबालक गोविन्दराय ने संस्कृत, गुरुमुखी व फारसी के शास्त्रीय-ज्ञान के साथ युद्ध-कौशल में भी दक्षता अर्जित की। वे अत्यंत दृढ निश्चयी व प्रखर प्रज्ञावान थे कि अति अल्प समय में ही शस्त्र और शास्त्र की समस्त विधाओं के साथ गुरुज्ञान प्रदाता के रुप में भी सिद्धहस्त हो गये।

जब मुगल सल्तनत द्वारा सताये गये कश्मीरी पण्डित, तेगबहादुर से सहयोग का निवेदन कर रहे थे तब नौ वर्षीय बालक गोविंदराय पास में ही बैठे हुये थे। गुरुने कहा, इसके लिये तो किसी महापुरुष के बलिदान की आवश्यकता है। गोविन्दराय ने तत्काल कहा, गुरुजी आपसे बढकर, बड़ा बलिदानी महापुरुष और कौन होगा? लोगों ने कहा, तूँ अनाथ होजायेगा और तेरी माँ विधवा! गोविन्दराय ने बिना किसी हिचक के तत्काल कहा, मेरे एक के अनाथ व मेरी माँ के विधवा होने मात्र से यदि लाखों सनाथ व सधवा रहते हैं और धर्म की रक्षा होतीं है तो इससे अधिक सुखद और क्या होगा ? ऐसे दृढनिश्चयी, धर्मनिष्ठ युगपुरुष को शत-शत वन्दन और नमन।

11नवम्बर 1675 को पिता व गुरु तेगबहादुर की शहीदी से लगभग पाँच माह बाद 29 मार्च 1676 के बैसाखी पर्व पर मात्र दस वर्ष की आयु में बहुत ही धूमधाम व मान सम्मान के साथ दसवें नानक के रुप में गुरुपद पर पद प्रतिष्ठापित हुए। गोविन्द राय गुरु गोविन्द सिंह नाम से जगविख्यात हुए। गुरु गोविन्द सिंह का सम्पूर्ण जीवन मुगलों से संघर्ष में ही व्यतीत हुआ। इनके तीन रानियाँ जीतोकौर, सुन्दरी व देवनकौर थी। चार पुत्र जुझारसिंह, अजीतसिंह, जोरावर सिंह व फतेहसिंह थे। 9 वर्षीय जोरावरसिंह व 7 वर्षीय फतहसिंह तो औरंगजेब द्वारा जिन्दा दीवार में चुनवा दिये गये जबकि 17 वर्षीय जुझारसिंह व 13 वर्षीय अजीतसिंह अपने अन्य सिख योद्धाओं के संग 1704 के चमकौर के युद्ध में लङते हुये शहीद हो गये। मात्र 40 सिखों ने 10 लाख की सेना अर्थात एक एक सिख सैनिक ने सवा लाख से संघर्ष किया। रात्रि में शत्रु सेना को ललकारते हुये गुरु अपने दो शिष्यों के साथ युद्ध के मैदान के मध्य से ही गुजरने पर बाध्य हुये। संयोग से बिजली की चमक में शिष्य भाई दयासिंह ने साहबजादे की नग्न लाश दिखाई दी। उसने अपनी चादर ओढाने का प्रयास किया तो गुरु ने कहा, यदि औढा सको तो मेरे सभी साहबजादों (शहीदों) को चादर औढाओ अन्यथा एक साहबजादे को कतई नहीं। गुरु निर्लेप भाव से आगे बढते गये। भाई दयासिंह अपने गुरु के निर्लेप समभाव से हतप्रभ और नतमस्तक थे। अगले ही वर्ष 1705 के मुक्तसर के युद्ध में विशाल मुगलीया सेना को फिर बहुत ही बुरी तरह से हराया। गुरु गोविन्दसिंह ने मुगलों से 14 तथा अन्य 7 कुल 21युद्ध लड़े और सबमें विजयी रहे। वे अपने समय के अदम्य व अजेय योद्धा थे।

गुरु ने 1699 के बैसाखी पर्व पर विशाल जनसभा मेंसे भाई साहिबसिंह, घरमसिंंह, हिम्मतसिंह, मोहकमसिंह व दयासिंह का अकल्पनीय तरीके से पँज प्यारों के रुपमें चयन किया। उन्हें अपने हाथ से अमृत छकाया और उनके हाथ से स्वयं अमृत छका। इस प्रकार एक अदम्य, सबल व सशक्त खालसा पंथ व खालसा दल का विधिवत संगठन तैयार किया। पँच-कक्कार केश, कंघा, कङा, करपान व कच्छा की अनिवार्यता के साथ सिख समुदाय को एक अलग अतिविशिष्ठ, समतामूलक, सेवाभावी व बहादुर कौम की पहिचान प्रदान की।

इतने उत्थल पुत्थल व आपाधापी के दौरान भी अनेक नये किलों व भवनों का निर्माण कराया। आमजन के दुख दुविधाओं के निवारण व सुखसुविधाओं के संवर्धन का सतत प्रयास किया। अनेक मौलिक पुस्तकों का सृजन किया तो अनेकों का संकलन व संपादन किया। चण्डी दी वार, अकाल उसत्त, विचित्र नाटक, खालसा महिमा, जकरनामा, शास्त्रनाममाला व दशम ग्रंथ का सृजन व गुरुग्रंथ साहिब का सम्पादन प्रमुख है। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अपने गुरुभक्त बहादुरशाह को बादशाह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बहादुरशाह की गुरुभक्ति से सरहिन्द का सुबेदार वजीर खाँ भयभीत होगया। उसने गुरु की दक्षिण यात्रा के दौरान जमेशद खाँ व वासिल बेग को पीछे लगा दिया वे दोनों शीघ्र ही गुरु के सैन्य दल में सम्मिलित होकर गुरु के विश्वसनीय बन गये। एक दिन जमशेद खाँ ने घात लगाकर गुरु के हृदय के सन्निकट छूरा घोंप दिया। गुरु ने तत्काल अपनी कटार से उसका काम तमाम कर दिया और भय से भागता हुआ वासिल बेग गुरु भक्तों के हाथों मार दिया गया। चिकित्सकों के सफल प्रयास से गुरु का घाव लगभग ठीक हो गया था। इसी दौरान हैदराबाद से कुछ गुरु भक्त गुरु से मिलने और भेंट उपहार देने आये। गुरु ने भी उनको उपहार के रुपमें कुछ विशिष्ट धनुष भेंट किये। धनुष संचालन के गुर सिखाने के दौरान प्रत्यंचा खिंचने के प्रयास गुरु के घाव से रक्तस्राव होने लग गया। घाव निरन्तर रिसता, बढता व गम्भीर होता ही गया।
गुरु ने अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुये, कहा कि पिताश्री गुरु तेगबहादुर जी मुझे बुला रहे हैं। गुरु ने अपने मार्गदर्शन में एक बड़ी झोंपङीनुमा चिता तैयार करवाई। अपने हाथों से शिष्यो को लंगर छकाया (गुरुभोज करवाया)। शिष्यों को मार्गदर्शन प्रदान किया और अपने नीले घोङे पर सवार होकर घघकती चिता में प्रविष्ट हो गये। जलती चिता के शान्त होने पर शिष्यो को गुरु अथवा का घोङे का एक भी अवशेष नहीं मिला। सभी शिष्य हतप्रभ और नतमस्तक थे।
7 अक्टुबर 1708 को मात्र् 42 वर्ष की आयु में ही अदम्य, अपराजयी व अतुल्य योद्धा तथा सृष्टि का महामानव थरती से विदा हो गये। यह हमारी सनातनीय संस्कृति का दुर्भाग्य ही है कि हम ऐसे कालजयी पुरोधाओं को पंथ विशेष का प्रतिनिधि मानकर वह मान सम्मान व प्रतिष्ठा नहीं देते जिसके वे शत-प्रतिशत हकदार हैं।

 #संक्रान्तिसंक्रान्ति शब्द का प्रचलित अर्थ और अभिप्राय, सूर्य के राशि परिवर्तन से है। संक्रान्ति के अन्य शाब्दिक अर्थ स...
14/01/2024

#संक्रान्ति

संक्रान्ति शब्द का प्रचलित अर्थ और अभिप्राय, सूर्य के राशि परिवर्तन से है। संक्रान्ति के अन्य शाब्दिक अर्थ संक्रमण, संगमन, अंतरण, परिवर्तन, हस्तांतरण, बदलाव, रद्दोबदल इत्यादि है। पृथ्वी के सम्पूर्ण परिक्रमण पथ पर ऐसे बारह तारामंडल हैं जिन्हें राशि या राशिमंडल कहते हैं। सूर्य एक राशि में लगभग 30 दिन रहता है। इसे सौर मास कहते हैं। इस प्रकार एक सौरवर्ष 360 दिन का होता है परन्तु यथार्थ में एक सौरवर्ष 365 दिन, 5 घण्टे, 48 मीनिट व 46 सैकण्ड का होता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण को संक्रान्ति कहते हैं। इस प्रकार 12 माह में 12 संक्रान्तियाँ होती है। भारत के अनेक राज्यों में संक्रान्ति दिवस ही नये मास की प्रथम तिथि मानी गयी है। मेषसंक्रान्ति = चेत्र। वृषसंक्रान्ति = वैसाख। मिथुन = ज्येष्ठ। कर्क = आषाढ। सिंह = श्रावण। कन्या = भाद्रपद। तुला = आसोज। वृश्चिक = कार्तिक। धनु = मगसर। मकर = पौष। कुम्भ = माध। मीन = फाल्गुन। प्रत्येक संक्रान्ति का अपना खगोलिय व ज्योतिषीय महत्व है परन्तु मकर, मेष, कर्क व तुला का विशिष्ट महत्व है क्योंकि ये संक्रान्तियां ऋतु परिवर्तन के लिये भी उत्तरदायी है। इसमें भी कर्क व मकर संक्रान्तियां अति विशिष्ट है क्योंकि ये दोनों संक्रान्तियां अयन परिवर्तन के लिये उत्तरदायी है। सनातन संस्कृति में मकर-संक्रान्ति सर्वाधिक पावन मानी जाती है क्योंकि इस संक्रान्ति से सूर्य उत्तरायणपंथी होता है। दिन निरन्तर बङा होने लगता है जिससे सकारात्मक ऊर्जा व कार्य सामर्थ्य में सतत संवर्धन होता जाता है।

भारत भूमि पर मकर संक्रान्ति का खगोलीय और ज्योतिषीय ही नहीं बल्कि धार्मिक महत्व भी सर्वाधिक है। मकर संक्रान्ति के दिन पवित्र नदियों व सरोवरों में स्नान के साथ पूजा-पाठ, दान-पूर्ण्य, भजन-कीर्तन एवं ध्यान-धारणा को पुण्य फलदायी व पाप-विमुक्तक माना जाता है कर्क संक्रान्ति के बाद सूर्य दक्षिणायनपंथी होता है और अगले छः माह तक दिन निरन्तर छोटा होता जाता है परिणामतः ऊर्जा उपलब्धि व कार्य सामर्थ्य सतत घटती जाती है। यह भी मान्यता है कि सूर्य के दक्षिणायनी अवधि के दौरान मरनेवाले जन्म-मरण एवं भव-बन्धन के मकङ जाल में फंसे रहते हैं जबकि सूर्य की उत्तरायणी अवधि में मरने वाले समस्त पाप बन्धनों से विमुक्त होकर सीधे मोक्ष धाम पहुँचते हैं। इसी अवधारणा से सम्पोषित पितामह भीष्म ने लम्बे समय तक सर-सैया पर असीम कष्ट सह हर्ष झेले थे। लोकजीवन में लोक मान्यताओं और परम्पराओं का विशिष्ट महत्व होता है। जीवन-पथ में अनेक संक्रान्तियों से साक्षात्कार होता ही रहता है। संक्रान्तियाँ अर्थात परिवर्तन तो सृष्टिचक्रों का अपरिहार्य अंग है जो अनन्तकाल तक रहेगा। भारतीय तत्व-चिन्तनीय दर्शन धाराओं का सम्पूर्ण विश्वधरा पर कोई जोङ नही। ये अनुपम, अतुल्य, बेजोङ और पूर्ण विज्ञान सम्मत हैं।

13/01/2024

#राम और #रामत्व

संस्कृत सूक्ति, "रमन्ते योगिनः यस्मिन् सा रामम् उच्चयते" अर्थात जहाँ कहीं भी योगी विचरण करते हैं वह सबकुछ ही राम कहलाता हैं। "राम सोही पहचानिये जो रमता सकल जहान" अर्थात जो सम्पूर्ण सृष्टि पर सर्वत्र अर्थात सृष्टि के प्रत्येक कण व क्षण में समाहित है वही राम है। महर्षि वशिष्ठ के अनुसार, "जो आनन्द सिन्धु सुखवासी। सीकर ते त्रैलोक सुवासी।।" अर्थात राम आनन्द के ऐसे अथाह सागर है जिसकी एक बून्द मात्र ही तीन लोक का सुख प्रदान करती है। कबीरदास जी के अनुसार, "आतम राम अवर नहीं दूजा।" अर्थात आत्मा और राम एक ही स्वरुप है। राम शब्द संस्कृत की रम् + धम् धातुओं का संयोजन है। रम् = रचा-बसा या समाया हुआ तथा धम् = ब्रम्हाण्ड = परमशून्य। इसप्रकार राम सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में समाविष्ट साश्वत परमतत्व है। दूसरे अर्थ में रा = आभा या प्रकाश की किरण तथा म = मैं स्वंय। इस प्रकार राम = मेरे अन्तर्मन का आत्मीय प्रकाश = दिव्यज्ञान। राम-राम 108 मणकों की माला के समतुल्य है। तेरा राम धर्म तेरे पास = तेरी सत्यनिष्ठा तेरे पास। राम के और भी अनेक लौकिक और आध्यात्मिक शब्दार्थ व भावार्थ हैं। लोकजीवन में राम शब्द, सत्य निष्ठा, निश्छलता, दायित्व धर्मिता, सहिष्णुता, कर्तव्य परायणता, नैतिक मर्यादा और धर्म-ईमान का प्रतीक है। राम केवल व्यक्ति नहीं लोक मर्यादा है। राम-रसायन तो पाप विनाशी गंगधार के समतुल्य है।

एक कहावत है, राम से भी बड़ा राम का नाम अर्थात रामत्व बड़ा व व्यपक है। रामत्व = प्रभु श्रीराम का आदर्श जीवनदर्शन = लोक मर्यादा की उत्कृष्ट परम्परायें = सामुदायिक सहिष्णुता की सर्वोच्चता = सहजीवी सहभागिता का सबल-सशक्त संयोजन = निश्छल-निर्लेप-निष्कपट आचरण = सकारात्मक जीवनमूल्यों का सर्वश्रेष्ठ ताना-बाना। यह कटुसत्य है कि, विश्व-पटल पर महत्वाकांक्षी बाहुबलियों व अतिवादियों के आक्रमण तो होते रहे हैं, आगे भी होते ही रहेंगे। इतिहास साक्षी है कि, देखते ही देखते, सुसमृद्ध संस्कृतियां और विशाल साम्राज्य क्रूर व आतताई आक्रान्ताओं द्वारा सहज ही धूलधूसरित कर दिये गये। सम्पूर्ण विश्वधरा पर केवलमात्र भारत भूमि ही एक ऐसी भूमि है जहाँ टिड्डीदल की तरह जब तब विदेशी आक्रमण होते ही रहे। जहाँ विश्व की अन्य सभी समकालीन सभ्यतायें तो एक या दो आक्रमणों में ही मटियामेट कर दी गयी परन्तु एक मात्र हमारी सनातन संस्कृति ही है जो आक्रान्ताओं को ही आत्मसात करने में सफल रही। यथार्थ में रामत्व ही वह आत्मीय अपणायत का अमोघ अमृत रसायन है, जिससे संपोषित भारतीय सनातनीय संस्कृति हजारों-हजार वर्षों से देशी-विदेशी आतताई आक्रान्ताओं के असीम आक्रमण एवं अकल्पनीय अत्याचार झेलकर भी सबल-सशक्त और साश्वत है और रहेगी। हमें भगवान श्रीराम और रामत्व पर अभिमान है और रहेगा।

10/01/2024

#विश्व_हिन्दी_दिवस

स्वतंत्रता के पश्चात लम्बी बहस के बाद 14 सितम्बर 1949 के दिन, देवनागरी लिपि में हिन्दी को भारत की अधिकृत शासकीय भाषा घोषित किया गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु ने 14 सितम्बर 1953 को राष्ट्रीय हिन्दी भाषा दिवस घोषित किया। संयोग से 14 सितम्बर हिन्दी के मूर्धन्य लेखक, मुखर प्रचारक व पैरवीकार, राजेन्द्रसिंह का जन्मदिन भी है। उस दिन से आज तक निरन्तर, 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाने की औपचारिक रस्म अदायगी निभाई जा रही है। इसीप्रकार 10 जनवरी, 1974 को महाराष्ट्र के नागपुर में प्रथम वैश्विक हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 122 देशों ने प्रतिनिधित्व किया। 10 जनवरी 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री सरदार मनमोहनसिंह ने 10 जनवरी को वैश्विक हिन्दी दिवस घोषित किया। इस प्रकार 14 सितम्बर को राष्ट्रीय और 10 जनवरी को अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस, देश में दो-दो हिन्दीभाषा दिवस मनाने की शासकीय औपचारिकतायें निभाई जा रही है। इतना दिखावा होने के पश्चात भी हिन्दी को यथोचित शासकीय सम्मान, स्वीकृति व अधिकार कभी नहीं मिले। दुर्भाग्य यह कि, शत-प्रतिशत वैज्ञानिक, सरल-समृद्ध, 55% से अधिक भारतीयों की भाषा एवं सम्पूर्ण विश्वधरा पर चौथे नम्बर की प्रमुख भाषा को जो समुचित मान-सम्मान व प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए थी, वह आजतक सुलभ न हो सकी।
अपनी भाषा और संस्कृति की ऐसी, दुर्दशा, दुर्गति और आत्मघातक मनोवृत्ति भारत के अलावा अन्य किसी देश में दिखाई नहीं देती।

 #समाधानयह शत-प्रतिशत सत्य है कि विश्व की ऐसी कोई भी समस्या या संकट नहीं जिसका कोई सार्थक हल या समाधान असम्भव हो। जिस प्...
10/01/2024

#समाधान

यह शत-प्रतिशत सत्य है कि विश्व की ऐसी कोई भी समस्या या संकट नहीं जिसका कोई सार्थक हल या समाधान असम्भव हो। जिस प्रकार बहते, गंदले या उबलते हुये पानी में किसी की परछाई नहीं बन सकती, ठीक इसी प्रकार विचलित, विकारयुक्त और आवेशित मनोस्थिति में कभी भी किसी भी समस्या का सार्थक समाधान सम्भव नहीं हो सकता। इसके विपरीत, समस्त आवेशी आवेगों एवं पूर्वाग्रही विकारों से पूर्णतः विमुक्त होकर, शान्त एवं स्थिर मनोस्थिति के साथ सकारात्मक सोच से सराबोर होकर, समाधान का प्रयास किया जाये तो शत-प्रतिशत सफलता सुनिश्चित होती है। इसमें रत्तिमात्र भी संशय नहीं है। हम होंगे कामयाब एक दिन की सकारात्मक सोच से सम्पूरित, सार्थक प्रयासों की निरन्तरता मे समस्त समस्याओं का शत-प्रतिशत समाधान समाहित है।

02/01/2024

#माली संस्कृत भाषा के माला शब्द से ही माली की व्युत्पत्ति मानी गयी है। सामान्यरुप से फूलों अर्थात पुष्पी-पादपों के पालक-पोषक और परिरक्षक को माली, फूलमाली, उद्यानपालक, बागवान इत्यादि नामों से जाना जाता है।
भारत व नेपाल में माली एक सनातनीय जाति-वर्ग है।
पश्चिमी अफ्रिका का एक देश माली गणराज्य है। माली देश की अपनी सुविकसित संस्कृति और सुसमृद्ध परम्परायें रही है। अरबी भाषा में माली एक सर्वनाम के रुपमें जाना जाता है। उदाहरणार्थ अरबी के अल किताब माली का हिन्दी अर्थ होगा :- यह किताब मेरी है। माली शब्द आर्थिक स्थिति अर्थात सम्पन्नता या विपन्नता का भी दिग्दर्शन कराता है। माली हालत = आर्थिक स्थिति।
छन्दशास्त्र में राजी-वगण छन्द का दूसरा नाम माली है। वाल्मिकी रामायण के अनुसार राक्षसराज सुकेश के तीन पुत्र माल्यवान, सुमाली व माली थे। माली शब्द के अन्य और भी अनेक पर्याय या समान अर्थक शब्द हैं जैसे :- मालाकार, माला धारक, धनी, मालदार, दौलतमंद, सृजक, संपोषक, संरक्षक, स्वामी इत्यादि। परिवार के मुखिया, पालक-पोषक और परिरक्षक को भी माली कहा जाता है। एक गुरु या शिक्षक भी एक माली ही है। राष्ट्र भी एक उद्यान या परिवार है अतः राजा या राष्ट्रीय-शासक भी राष्ट्रमाली माना जाता है। सम्पूर्ण सृष्टि के समस्त चर और अचर का सृजक, सम्पोषक और संरक्षक, सर्वेश्वर या परमेश्वर ही है। अतः परमेश्वर ही सम्पूर्ण सृष्टि का सबसे बङा साश्वत माली है। बिन माली के कोई भी उद्यान सुरक्षित व संरक्षित नहीं रहता है ।

 #वीर_बाल_दिवस                                                               वर्तमान मोदी सरकार ने 26 दिसम्बर को वीर बाल...
26/12/2023

#वीर_बाल_दिवस वर्तमान मोदी सरकार ने 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस घोषित किया है। इस दिन (26दिसम्बर,1704) गुरु गोविन्द सिंह जी के दो साहबजादे, जोरावरसिंह (9वर्ष) और फतह सिंह (7वर्ष) मुगल सेनापति वजीर खान के आदेश से जिन्दा दीवार में चिनवा दिये गये क्योंकि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था। यथार्थ में सनातनीय धर्म दर्शन के सबल संरक्षक और दिशाबोधक सिख पंथ के 10 गुरुओं में से प्रथम चार (नानक, अंगद देव, अमरदास व रामदास) के साथ तो मुगलों के सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध रहे परन्तु अन्तिम छः (अर्जनदेव, हरगोविंद, हरिहरराय, हरकिशन, तेगबहादुर और गोविन्दसिंह) के साथ खट्टे मिट्ठे सम्बन्ध रहे। गोविन्द सिंह को तो खालसा सेना गठित करके सतत सैनिक संघर्ष के लिये बाध्य होना पङा। गुरु गोविन्द सिंह ने मुगलों के संग 14 युद्ध किये और सदा अपराजित ही रहे। सन् 1700 ईस्वी में आनन्दपुर युद्ध फतह करने के बाद गुरु गोविन्द सिंह आनन्दपुर साहिब में ही स्थाई रूप से रहने लगे। मुगल पूरा दम लगाकर भी उनका बाल भी बाँका न कर सके। मुगलों का प्रस्ताव था कि, गुरु गोविन्द सिंह आनन्दपुर साहिब छोडकर अन्यत्र चले जायें तो वे कोई बाधा नहीं डालेंगे। गुरु गोविन्द सिंह भी स्थाई सुकून व शान्ति की अपेक्षा में 21दिसम्बर 1704 को आनन्दपुर साहिब किले का सुरक्षित परिसर छोडकर रात्री में ही निकल पङे। 22 दिसम्बर 1704 को वे सरसा नदी तट पर पहुँचे परन्तु नदी पूरे उफान पर थी पार करना सहज सम्भव नहीं था। पीछे से वजीर खान की विशाल सेना गुरु गोविन्द सिंह को जिन्दा या मुर्दा पकङने के दृढ ईरादे के साथ पहुँच गयी। नदी पार करने के दौरान गुरु के अनेक सहयात्री, नदी के बहाव में बह गये या दिशा भटक गये। गुरु गोविन्द सिंह को सुरक्षित आगे निकालने के लिये केवल 43 सैनिक बचे उनमें से दो गुरु के सहजादे अजीत सिंह व जुझार सिंह भी थे। केवल 43 सैनिक मुगलों की विशाल सेना का आधे से अधिक संहार करते हुये शहीद हो गये परन्तु गुरु गोविन्द सिंह सकुशल आगे बढ गये। भटके हुये दल में गुरु गोविन्द सिंह के दो छोटे शहजादे जोरावर सिंह व फतह सिंह मुगलों के हत्थे चढ गये, जिन्हें इस्लाम स्वीकार न करने के अपराध में जिन्दा दीवार में चिनवा दिया गया। भारत भूमि पर सनातन के सबल संरक्षकों और शहीद बालकों को सादर नमन।

20/12/2023

#जंजीर आज अरबी भाषा का शब्द #जंजीर हिन्दी भाषा परिवार का अभिन्न अंग बन चुका है। जंजीर का हिन्दी में समानार्थक शब्द श्रृँखला है तो राजस्थानी में साँकळ तथा अंग्रेजी में Chain है। जंजीर के अन्य पर्याय बेड़ी, कुँडी, कड़ी, लड़ी, बन्धन इत्यादि है। जंजीर छोटी- छोटी अनेक कड़ियों को जोड़कर बनायी जाती है। लौह-जंजीर, दुर्दान्त अपराधियों को जकड़कर और पशुओं को बान्धकर बन्धक बनाने के काम आती है तो स्वर्ण या रजत जंजीर गले का आभूषण बनती है। भौतिक जंजीरों के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भावात्मक जंजीरें भी होती है। मानव मन की समस्त पूर्वाग्रही विचारधारायें ऐसी ही अदृश्य जंजीरें हैं जो सामुदायिक समरसता की अवरोधक हैं। भावात्मक जंजीरों के घातक प्रभावों की अत्यधिक लम्बी सूची है। इन्हें मोटे रुप में वैचारिक, आर्थिक, शैक्षिक, भाषायी, क्षेत्रीय, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। जंजीरों के और भी अनेक दुखदाई स्वरुप और वर्ग गिनाये जा सकते हैं। भौतिक जंजीरों की अपेक्षा भावात्मक जंजीरें अधिक व्यापक, विस्तारित व प्रभावशाली होती है। सभी जंजीरें कष्टदायक व परितज्य नहीं होती बल्कि सामुदायिक सहसम्बन्धों का सुदृढ तानाबाना भी होती है। समस्त पारिवारिक रिश्ते-नाते, स्नेह-सम्बन्ध, पारस्परिक सहकार, प्रचलित परम्परायें, रीति-रिवाज, आर्थिक गठबन्धन, राजनैतिक व्यवस्थायें और संवैधानिक नियम, धार्मिक मान्यतायें व मर्यादाएं, आत्मीय अपणायत के और भी अनेक स्वरुप एक प्रकार की अदृश्य जंजीर का ही स्वरूप है जो सामुदायिक समरसता, सहिष्णुता, सबलता और सहजीवितता का मौलिक आधार है। जंजीरों की जकड़न ही स्वच्छन्दता का शमन है।

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Shakambhari Vidyapeeth, Near Silam Puria Well, Ward No./6
Sardarshahr
331403

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