Shiksha Jyoti Institute

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Shiksha Jyoti is unique for the quality of education that it imparts to student and its dedication towards their success.

26/01/2021

आप सभी लोगों को 72 वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय संविधान

14/06/2020

🩸14 जून 2020:- विश्व रक्तदाता दिवस (Word Blood Donor Day🩸
💞🤝 मानवता का पाठ सिखाता रक्तदान 🤝 💞

https://sanjeevanisamachar.com/india-news/blood-donation-teaches-humanity-lessons/

रक्तदान महादान है, इसे जीवनदान के बराबर माना जाता है। रक्तदान ना केवल अन्य व्यक्ति के जीवन को बचाता है, बल्कि यह रक्त देने वाले को स्‍वस्‍थ बनने में भी हेल्‍प करता है, इसलिए यह दोनों के लिए फायदेमंद है। रक्तदान एक जीवन देने वाली एक्टिविटी है जो किसी व्यक्ति के जीवन को बचा सकती है।
इस बात का अहसास हमें तब होता हैं, जब हमारा कोई अपना खून के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझता है।
यही वजह है कि इसे ‘महादान’ कहा जाता है। आपके रक्त की बूँद का हर कतरा किसी के जीवन का स्रोत बन सकता है। इसकी कमी की वजह से किसी की जान न जाए इसलिए और जब भी मौका मिले, सभी हेल्‍दी पुरुष और महिलाओं को रक्तदान आवश्य करनी चाहिए।
रक्तदान से बॉडी में नए ब्‍लड को पुनर्जीवित करने कि क्षमता का विकास होता हैं।
रक्तदाताओं के लिए पौष्टिक और स्वस्थ आहार और अच्छी तरह से आराम करना बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे नए ब्‍लड सेल्‍स फिर से बनें, अन्यथा इससे बॉडी में ब्‍लड की कमी हो सकती है।
रक्तदान करना, न केवल कई जीवन बचाता है, बल्कि आपके जीवन में मूल्य जोड़ने का अवसर भी देता है। यह लोगों को मानवता के बारे में पढ़ाने में मदद करता है और हमारे असाधारण तरीके से हमारे प्राकृतिक सह-अस्तित्व की भावना को भी परिभाषित करता हैं।
रक्त दान करना सबसे मानवीय कर्मों में से एक है क्योंकि रक्त दान का मतलब दाता को कुछ मिनट हो सकता है, लेकिन किसी और के लिए जीवन भर हो सकता है।

जात पात है इंसानों में, रक्त की कोई जात नहीं ।
रक्त की कमी से मरते को, इससे बड़ी कोई सौगात नहीं ।।
बिना किसी स्वार्थ के तुम, अपनी यह सोच बलवान करो ।
फिर खून का रिश्ता जुड़ जाएगा, पहले तुम रक्तदान करो ।।
पहचाने दर्द जो दूसरों का, वहीं तो सच्चा इंसान हैं ।
कोई छोटा-मोटा काम नहीं, ये दान तो बहुत महान हैं ।।
करके यह दान इंसानियत का, ऊँचा अपना नाम करों ।
फिर खुन का रिश्ता जुड़ जायेंगा पहलें तुम रक्तदान करों ।।

रक्तदान करना मानवता के लिए सबसे बड़ा कार्य हैं। मैं रोजमर्रा के उन तमाम नायकों को हृदयवत सलाम करता हूँ जो रक्त देकर किसी के जीवन को बचाते हैं।
यदि आप एक रक्त दाता हैं, तो आप कहीं किसी के लिए नायक हैं।
इसलिए रक्त दान करें और जीवन का उपहार दें। यहाँ तक ​​कि आपके द्वारा किया गया रक्तदान कई लोगों की मदद कर सकता है। रक्त दान करने की तुलना में मानव जाति के लिए इससे बड़ा सेवा का कोई कार्य नहीं है।
इस प्रकार, रक्त दान किसी के बहुमूल्य जीवन को बचा सकता है। रक्तदान के बारे में छात्रों को शिक्षित करने से उन्हें उपयुक्त उम्र तक पहुंचने के बाद रक्तदाता बनने के लिए प्रेरित किया जा सकता हैं। वे जागरूकता पैदा करने में मदद कर सकते हैं और दूसरों को रक्त दान करने के लिए कह सकते हैं।

पंकज भारती
शिक्षक | लेखक | शोधकर्ता | विचारक | समीक्षक | विश्लेषक | प्रखर वक्ता

🌱🌴🎋🌺🌎🥦🌷💦💧पर्यावरण दिवस पर विशेष:-✍️✍️✍️✍️ पर्यावरण दिवस [Eco Day or Environment Day or WED (World Environment Day)] 5 जू...
05/06/2020

🌱🌴🎋🌺🌎🥦🌷💦💧
पर्यावरण दिवस पर विशेष:-
✍️✍️✍️✍️ पर्यावरण दिवस [Eco Day or Environment Day or WED (World Environment Day)] 5 जून को प्रत्येक वर्ष विश्व स्तर पर मनाया जाता है। पर्यावरण को संरक्षित करना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिए सभी को प्रेरित करना हम सभी मानव का कर्तव्य है। क्याकिं बिना पर्यावरण के पृथ्वी पर मानव का जीवन संभव नहीं है। दुनियाभर में पर्यावरण को समर्पित यह खास दिन इंसानों को प्राकृतिक वातावरण के प्रति सचेत करने के लिए मनाया जाता है, जब उन्हें पर्यावरण संरक्षण की याद दिलाई जाती है। इंसानों व प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को देखते हुए यह खास तौर पर अहम हो जाता है। इस बार पर्यावरण दिवस ऐसे समय में आया है, जब पूरी मानवजाति एक बड़ी कोरोना वायरस महामारी के कहर से जूझ रही है, और दुनिया ग्लोबल वार्मिंग जैसी चिंताओं से रू-ब-रू है। पर्यावरण को समर्पित यह खास दिन हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने के लिए प्रेरित करता है।

इस बार विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम ‘जैव-विविधता’ ( ‘Celebrate Biodiversity’ ) रखा गया है। इस थीम के जरिए इस बार संदेश दिया जा रहा है कि जैव विविधता संरक्षण एवं प्राकृतिक संतुलन होना मानव जीवन के अस्तित्व के लिए बेहद आवश्यक है। जैव विविधता को बनाये रखने के लिए हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी धरती के पर्यावरण को बनाये रखें। ‘जैव विविधता’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- जैविक और विविधता। सामान्य रूप से जैव विविधता का अर्थ जीव जन्तुओं एवं वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियों से है। प्रकृति में मानव, अन्य जीव जन्तु और वनस्पतियों का संसार एक दूसरे से इस प्रकार जुड़ा है कि किसी के भी बाधित हाने से सभी का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे मानव जीवन पर बुरा असर पड़ता है।

विश्व पर्यावरण दिवस 1974 से ही मनाया जाता है, जब संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार इसकी घोषणा की थी। इस दौरान लोगों को पर्यावरण की अहमियत, इंसानों व पर्यावरण के बीच के गहरे ताल्लुकात को समझाते हुए प्रकृति, पृथ्वी एवं पर्यावरण के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है।
समग्र्र मनुष्य जाति पर्यावरण के बढ़ते असंतुलन एवं उससे उपजी कोरोना महाव्याधि से संत्रस्त है। इधर तेज रफ्तार से बढ़ती दुनिया की आबादी, तो दूसरी तरफ तीव्र गति से घट रहे प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत। समूचे प्राणि जगत के सामने अस्तित्व की सुरक्षा का महान संकट है। पिछले लम्बे समय से ऐसा महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण से जुडी हुई है। इसके संतुलन एवं संरक्षण के सन्दर्भ में पूरा विश्व चिन्तित है। आज पृथ्वी विनाशकारी हासिए पर खड़ी है। सचमुच आदमी को जागना होगा। जागकर फिर एक बार अपने भीतर उस खोए हुए आदमी को ढूंढना है जो सच में खोया नहीं है, अपने लक्ष्य से सिर्फ भटक गया है। यह भटकाव पर्यावरण के लिये गंभीर खतरे का कारण बना है। पानी के परंपरागत स्रोत सूख रहे हैं। वायुमण्डल दूषित, विषाक्त हो रहा है। माटी की उर्वरता घट रही है। इससे उत्पादन में कमी आ रही है। भू-क्षरण, भूमि का कटाव, नदियों द्वारा धारा परिवर्तन ये घटनाएं आये दिन घटित हो रही हैं। बाढ़, भूस्खलन और भूकंप प्रतिवर्ष तबाही मचा रहे हैं। इससे मनुष्य की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समृद्धि के भविष्य पर अनेक प्रश्नचिह्न उभर रहे हैं। पर्यावरण चिन्ता की घनघोर निराशाओं के बीच एक बड़ा प्रश्न है कि कहां खो गया वह आदमी जो स्वयं को कटवाकर भी वृक्षों को काटने से रोकता था? गोचरभूमि का एक टुकड़ा भी किसी को हथियाने नहीं देता था। जिसके लिये जल की एक बूंद भी जीवन जितनी कीमती थी। कत्लखानों में कटती गायों की निरीह आहें जिसे बेचैन कर देती थी। जो वन्य पशु-पक्षियों को खदेड़कर अपनी बस्तियां बनाने का बौना स्वार्थ नहीं पालता था। अपने प्रति आदमी की असावधानी, उपेक्षा, संवेदनहीनता और स्वार्थी चेतना को देखकर प्रकृति ने उसके द्वारा किये गये शोषण के विरुद्ध विद्रोह किया है, तभी बार-बार भूकम्प, चक्रावत, बाढ़, सुखा, अकाल और अब कोरोना महाबीमारी जैसे हालात देखने को मिल रहे हैं।
इस संकट का मूल कारण है प्रकृति का असंतुलन। औद्योगिक क्रांति एवं वैज्ञानिक प्रगति से उत्पन्न उपभोक्ता संस्कृति ने इसे भरपूर बढ़ावा दिया है। स्वार्थी और सुविधा भोगी मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। उसकी लोभ की वृत्ति ने प्रकृति एवं पृथ्वी को बेरहमी से लूटा है। इसीलिए पर्यावरण की समस्या दिनों-दिन विकराल होती जा रही है। न हवा स्वच्छ है, न पानी। तेज शोर आदमी को मानसिक दृष्टि से विकलांग बना रहा है। ओजोन परत का छेद दिनोंदिन बढ़ रहा है। सूरज की पराबैंगनी किरणें, मनुष्य शरीर में अनेक घातक व्याधियाँ उत्पन्न कर रही हैं। समूची पृथ्वी पर उनका विपरीत असर पड़ रहा है। जंगलों-पेड़ों की कटाई एवं परमाणु ऊर्जा के प्रयोग ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया है।
कोरोना की विकरालता हो या पर्यावरण संकट-जहाँ समस्या है, वहाँ समाधान भी हैै। अपेक्षा है, प्रत्येक व्यक्ति अपना दायित्व समझे और इस समस्या का सही समाधान ढूँढे। महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वही है, जो मनुष्य को कम से कम वस्तुओं के सहारे जीना सिखाए। अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी ने कहा-सबसे संपन्न व्यक्ति वह है जो आवश्यकताओं को कम करता है, बाहरी वस्तुओं पर कम निर्भर रहता है।’’ महापुरुषों के ये शिक्षा सूत्र समस्याओं के सागर को पार करने के लिए दीप-स्तंभ का कार्य कर सकते हैं।
हम जानते हैं-कम्प्यूटर और इंटरनेट के युग में जीने वाला आज का युवा बैलगाड़ी, चरखा या दीये की रोशनी के युग में नहीं लौट सकता फिर भी अनावश्यक यातायात को नियंत्रित करना, यान-वाहनों का यथासंभव कम उपयोग करना, विशालकाय कल-कारखानों और बड़े उद्योगों की जगह, लघु उद्योगों के विकास में शांति/संतोष का अनुभव करना, बिजली, पानी, पंखे, फ्रिज, ए॰सी॰ आदि का अनावश्यक उपयोग नहीं करना या बिजली-पानी का अपव्यय नहीं करना, अपने आवास, पास-पड़ोस, गाँव, नगर आदि की स्वच्छता हेतु लोकचेतना को जगाना-ये ऐसे उपक्रम हैं, जिनसे आत्मसंयम पुष्ट होता है, प्राकृतिक साधन-स्रोतों का अपव्यय रुकता है। प्रकृति के साथ सहयोग स्थापित होता है और पर्यावरण की सुरक्षा में एक सकारात्मक भागीदारी हो सकती हैं।
शाकाहार, खान-पान की शुद्धि और व्यसन मुक्ति भी पर्यावरण- सुरक्षा के सशक्त उपाय हैं। खान-पान की विकृति ने मानवीय सोच को प्रदूषित किया है। संपूर्ण जीव जगत के साथ मनुष्य के जो भावनात्मक रिश्ते थे, उन्हें चीर-चीर कर दिया है। इससे पारिस्थितिकी और वानिकी दोनों के अस्तित्व को खुली चुनौती मिल रही है। नशे की संस्कृति ने मानवीय मूल्यों के विनाश को खुला निमंत्रण दे रखा है। पान मसाला तथा पान के साथ खाया जाने वाला तम्बाकू बहुत ही हानिकारक होता है, विश्व में प्रतिवर्ष तीन करोड़ लोग कैंसर तथा तम्बाकू जनित अन्य रोगों के शिकार हो रहे हैं। यदि तम्बाकू का सेवन छोड़ दिया जाए तो कैंसर की 65 प्रतिशत संभावना कम हो सकती है। वाहनों का प्रदूषण, फैक्ट्रियों का धुँआ, परमाणु परीक्षण-इनको रोक पाना किसी एक व्यक्ति या वर्ग के वश की बात नहीं है। पर कुछ छोटे-छोटे कदम उठाने की तैयारी भी महान क्रांति को जन्म दे सकती है।
विकास का जो आधुनिक स्वरूप विकसित करने की वकालत की जा रही है, उससे तो लगता है कि प्रकृति, प्राकृतिक संसाधनों एवं विविधतापूर्ण जीवन का अक्षयकोष कहलाने वाला देश भविष्य में राख का कटोरा बन जाएगा। हरियाली उजड़ती जा रही है और पहाड़ नग्न हो चुके हैं। नदियों का जल सूख रहा है, कृषि भूमि लोहे एवं सीमेन्ट, कंकरीट का जंगल बनता जा रहा है। महानगरों के इर्द-गिर्द बहुमंजिले इमारतों एवं शॉपिंग मॉल के अम्बार लग रहे हैं। उद्योगों को जमीन देने से कृषि भूमि लगातार घटती जा रही है। नये-नये उद्योगों की स्थापना से नदियों का जल दूषित हो रहा है, निर्धारित सीमा-रेखाओं का अतिक्रमण धरती पर जीवन के लिये घातक साबित हो रहा है। महानगरों का हश्र तो आप देख चुके हैं। अगर अनियोजित विकास ऐसे ही होता रहा तो दिल्ली, मुम्बई, कोलकता में सांस लेना जटिल हो जायेगा।
इस देश में विकास के नाम पर वनवासियों, आदिवासियों के हितों की बलि देकर व्यावसायिक हितों को बढ़ावा दिया गया। खनन के नाम पर जगह-जगह प्रकृति से जंगल और जमीन को छीना गया।
आज कोरोना एवं पर्यावरण की घोर उपेक्षा के कारण जीवन का अस्तित्व ही संकट में है। प्रकृति एवं पर्यावरण की तबाही को रोकने के लिये बुनियादी बदलाव जरूरी है और वह बदलाव सरकार की नीतियों के साथ जीवनशैली में भी आना जरूरी है।
पर्यावरण प्रदूषण को आज रोका नहीं गया तो यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को समूल नष्ट कर देगी। मानव के आने वाली पीढ़ियों को बचाना है तो हमें आज मिलकर सभी को पर्यावरण प्रदूषण को रोकने का संकल्प लेना ही होगा।
तो आइये इस पर्यावरण दिवस के अवसर पर जीवनदायिनी वायु, जीवनस्वरूप जल, जीवन की उत्पत्ति की कारक धरती माँ की स्वच्छता, सुरक्षा व परिवर्द्धन हेतु दृढ़संकल्पित हों। 🌱🌾🌿🌳🌲🌎

✍️ पंकज भारती 🙏
शिक्षक | लेखक | शोधकर्ता | विचारक | विश्लेषक

आप सभी को विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day) कि हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🍚🍦🍨🧁🍼🥛🐄 यह विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day)...
01/06/2020

आप सभी को विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day) कि हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🍚🍦🍨🧁🍼🥛

🐄 यह विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day) 01 जून 2020 उन तमाम किसान एवं मेहनती मजदूर भाइयों को समर्पित जिन्होंने पिछले 15 वर्षों से दुग्ध उत्पादन में भारत को पूरे विश्व मे सर्वश्रेष्ट स्थान पर बनाये हुए रखा है।🐂

आप सभी स्वजनों को इस दिवस की हार्दिक मंगलकारी शुभकामनाएं।🌸💐💐

🐂 विश्व_दुग्ध_दिवस (World Milk Day) 01 जून 🐄

🍼 संक्षिप्त विवरण:- 👇
विश्व दुग्ध दिवस यानि 01 जून पूरे विश्व में मनाया जाता है। इस दिवस के पूरे उत्सव के दौरान दूध को एक वैश्विक भोजन के रूप में केन्द्रित किया जाता है।
विश्व दुग्ध दिवस, संयुक्त राष्ट्र (United Nation) द्वारा हर साल इसे इसी दिन मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की मकसद डेयरी या दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में स्थिरता, आजीविक और आर्थिक विकास का योगदान है। दुनियाभर में दूध से पोषित हो रहे लोगों व इससे चलने वाली आजीविका के कारण इस दिन को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद दुनियाभर में दूध को वैश्विक भोजन के रूप में मान्यता देना है।
हर साल दुग्ध दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक थीम निर्धारित किया जाता है। इस थीम का मकसद यह होता है कि लोगों तक दूध की पहुंच को आसान बनाया जा सके साथ ही लोगों को दूध के प्रति जागरूक भी किया जा सके। बता दें कि पहले इस दिन को मैराथन, स्कूली गतिविधियों, व कई तरह के प्रोग्राम्स के जरिए इस दिन को मनाया जाता था। साथ ही इसके लिए कई तरह के कैंपेन भी चलाए जाते थे।
सर्वप्रथम साल 2001 में इस दिन यानि 01 जून को दुग्ध दिवस को मनाने की शुरुआत हुई थी।
इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के खाद्य विभाग और कृषि संगठन द्वारा की गई थी। पिछले साल विश्व दुग्ध दिवस में 72 देशों ने भाग लिया था। इन देशों में लगभग 586 प्रोग्राम्स का आयोजन किया गया था। आपको बता दें कि भारत में 01 जून को विश्व दुग्ध दिवस व 26 नवंबर को राष्ट्रीय दुग्ध दिवस मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन 26 नवंबर 1921 को केरल के कोझिकोड में श्वेत क्रांति या दुग्ध क्रान्ति या ऑपरेशन फ्लड या भारत में दुग्ध उत्पादन(मिल्क प्रोडक्शन) के जनक कहें जानें वाले वर्गीज कुरियन का जन्म हुआ था। जिन्होंने मिल्क प्रोडक्शन में भारत को नंबर वन बनाया।

🥛 उद्देश्य:-👇
दूध के संबंध में सभी लोगों का ध्यान आकर्षित करना जैसे दुध हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण हैं, इससे कितने असीमित लाभ और फायदे हैं। इसको लेकर जागृत करना एवं दूध उद्योग से जुड़ी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार के लिए अवसर प्रदान करना।

🍨 विश्व दुग्ध दिवस से संबंधित अन्य जानकारियां:-👇
बहुत सारे देशों के सहभागिता से पूरे विश्व में 2001 में पहली बार विश्व दुग्ध दिवस मनाया गया था।
इस उत्सव में वर्ष दर वर्ष भाग लेने वाले देशों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। तब से, पूरे विश्व भर में दूध और दुग्ध उद्योग से संबंधित क्रिया-कलापों को प्रचार-प्रसार में हर वर्ष ध्यान केन्द्रित करने के लिये इसे मनाया जाता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सव संबंधित क्रिया-कलापों को आयोजित करने के द्वारा इस उत्सव का राष्ट्रीयकरण किया जाता है। पूरे जीवन भर सभी के लिये दूध और इसके उत्पादों के महत्व के बारे में लोगों में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के द्वारा 1 जून को विश्व स्तर पर हर वर्ष मनाने के लिये विश्व दुग्ध दिवस की पहली बार स्थापना की गयी थी। इसे 1 जून को मनाने के लिये चुना गया था क्योंकि इस समय के दौरान बहुत सारे देशों के द्वारा विश्व दुग्ध दिवस पहले से ही मनाया जा रहा था।

🧁 विश्व दुग्ध दिवस क्यों मनाया जाता है ?👇
दुध के सभी पहलूओं के बारे में आम जनता की जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है जैसे इसकी स्वाभाविक उत्पत्ति, दूध का पोषण संबंधी महत्व और विभिन्न दूध उत्पाद सहित पूरे विश्वभर में इसका आर्थिक महत्व। विभिन्न उपभोक्ताओं और दूध उद्योग के कर्मचारियों के भाग लेने के द्वारा कई देशों (मलेशिया, कोलंबिया, रोमानिया, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका आदि) में इसे मनाने की शुरुआत की गयी।
विश्व दुग्ध दिवस के पूरे उत्सव के दौरान दूध को एक वैश्विक भोजन के रुप में केन्द्रित किया जाता है। ऑनलाइन अपने वेबसाइट पर अंतरराष्ट्रीय डेयरी संघ के द्वारा ढ़ेर सारे विज्ञापन संबंधी क्रिया-कलापों (एक स्वस्थ और नियंत्रित भोजन के रुप में दूध के महत्व को बताना) की शुरुआत की गयी है। पूरे दिन प्रचार संबंधी गतिविधियों के द्वारा आम लोगों के लिये दूध के महत्व के संदेश को फैलाने के लिये एक-साथ काम करने के लिये उत्सव में स्वास्थ्य संस्थाओं से विभिन्न सदस्य भाग लेते हैं।
दूध की सच्चाई को उनको समझाने के लिये विश्व दुग्ध दिवस उत्सव बड़ी जनसंख्या पर असर डालता है। दूध शरीर के द्वारा जरुरी सभी पोषक तत्वों का एक बहुत अच्छा स्रोत है जिसमें कैल्सियम, मैगनिशियम, जिंक, फॉसफोरस, ऑयोडीन, आइरन, पोटेशियम, फोलेट्स, विटामिन ए, विटामिन डी, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी12, प्रोटीन,फैट, खनिज लवण इत्यादि जैसें और भी महत्वपूर्ण पोषक तत्व मौजूद होता है। ये बहुत ही ऊर्जायुक्त और पोषक आहार होता है जो शरीर को ऊर्जा उपलब्ध कराता है, क्योंकि इसमें उच्च गुणवत्ता के प्रोटीन सहित आवश्यक और गैर-आवश्यक अमीनो एसिड और फैटी एसिड मौजूद होता है।

पंकज भारती
शिक्षक | लेखक | शोधकर्ता | विचारक | समीक्षक | विश्लेषक | प्रखर वक्ता

30/05/2020

एक ऐसा चुटकला जो चुटकला नहीं ज्ञान हैं।

एक पर्यटक, ऐसे शहर मे आया जो शहर उधारी में डूबा हुआ था।

पर्यटक ने रु॰ 500 का नोट होटल और रेस्टोरेंट के काउंटर पर रखा और कहा :- मैं जा रहा हूँ, आपके होटेल के अंदर कमरा पसंद करने।

👉 होटल का मालिक फ़ौरन भागा घी वाले के पास और उसको रु॰ 500 देकर घी का हिसाब चुकता कर लिया।

👉 घी वाला भागा दूध वाले के पास और जाकर रु॰ 500 देकर दूध का हिसाब पूरा करा लिया।

👉 दूध वाला भागा गाय वाले के पास और गाय वाले को रु॰ 500 देकर दूध का हिसाब पूरा करा दिया।

👉गाय वाला भागा चारे वाले के पास और चारे के खाते में रु॰ 500 कटवा आया।

👉 चारे वाला गया उसी होटल पर, वो वहां कभी-कभी उधार में रेस्टोरेंट में खाना खाता था। रु॰ 500 देकर हिसाब चुकता किया।

👉 पर्यटक वापस आया और यह कहकर अपना रु॰ 500 का नोट ले गया कि उसे कोई भी रूम पसंद नहीं आया।

न किसी ने कुछ लिया
न किसी ने कुछ दिया
सबका हिसाब चुकता

बताओ गड़बड़ कहाँ हैं ?

कहीं गड़बड़ नहीं है बल्कि यह सभी की गलतफहमी है क्योंकि लोग हमेशा यह समझ लेते हैं कि रुपये हमारे हैं।

खाली हाथ आये थें,
खाली हाथ ही जाना है।

विचार करें और जीवन का आनंद लें।

हमेशा खुश रहे मस्त रहें।

✍️ पंकज भारती ✍️
शिक्षक | लेखक | शोधकर्ता | विचारक | समीक्षक | विश्लेषक | प्रखर वक्ता

29/05/2020

29 मई विश्व के इतिहास में एक अहम तारीख है। क्योंकि यही वह दिन है जब दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट को इंसान ने फतह किया।🚩🚩
आज से 67 साल पहले दो पर्वतारोहियों ने एक इतिहास रचा था। एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ना तब तक दुनियाभर के किसी भी पर्वतारोही के लिए एक सपने की तरह था। ऐसा कर पाना वाकई बहुत मुश्किल था। लेकिन एडमंड हिलेरी और नोर्गे ने अपनी इच्छाशक्ति और संकल्प के बलबूते ये कर दिखाया।
न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के तेनजिंग नोर्गे शेरपा द्वारा माउंट एवरेस्ट की पहली चढ़ाई की याद में यह दिवस मनाया जाता है। इसी दिन 1953 में हिलेरी और नोर्गे ने एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई करने का कीर्तिमान बनाया था।
इसलिए प्रत्येक वर्ष 29 मई को अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस के रूप में मनाया जाता है।

28/05/2020

भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन "प्रसाद" बन जाता हैं।
🌺🌺🌺
भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख "व्रत" बन जाती हैं।
🌱🌱🌱
भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी "चरणामृत" बन जाता हैं।
🌸🌸🌸
भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर "तीर्थयात्रा" बन जाता हैं।
🌹🌹🌹
भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत "कीर्तन" बन जाता हैं।
🌷🌷🌷
भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर "मन्दिर" बन जाता हैं।
🌻🌻🌻
भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य "कर्म" बन जाता हैं।
💐💐💐
भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया "सेवा" बन जाती हैं।
🥇🥇🥇
और…
भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति "मानव" बन जाता हैं।

24/05/2020

फैसला आपकों करना हैं-
समय पर दर्द सहकर कुछ बनना हैं अथवा ...दर्द और कष्ट से भागकर कुछ नहीं बनना हैं 🤔

23/05/2020

These tourists display true kindness...Saving the desperate baby elephant during safari 😍😍😍💗💓💖

21/05/2020

🙏 प्रणाम का महत्व 🙏

महाभारत का युद्ध चल रहा था, एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर भीष्म पितामह घोषणा कर देते हैं कि -
कल मैं पांडवों का वध कर दूँगा।
उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई
भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए।
तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो,
श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए।
शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि- अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम🙏 करों-
द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने "अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया, फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि-
वत्स! तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो ? क्या तुमको श्रीकृष्ण यहाँ लेकर आये है ?
तब द्रोपदी ने कहा कि - हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं, तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम🙏🙏 किया।
भीष्म पितामह ने कहा-
मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम केवल श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं दूसरा कोई भी नही कर सकता।
शिविर से वापस लौटते समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -
तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है।
अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन, दुःशासन आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती।

🎯......तात्पर्य्......🎯

वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि- जाने अनजाने में अक्सर घर के बड़ों, बुजुर्गों, अनुभवियों की उपेक्षा हो जाती है।
यदि घर के बच्चे और बहुएँ अथवा उस घर के तमाम छोटे सदस्य प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो किसी भी घर में कभी कोई क्लेश नाम का कोई चीज नहीं रह जायेगा।

याद रखे, बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता।
यदि सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।

क्योंकि.....👇

🙏 प्रणाम प्रेम है।
🙏 प्रणाम अनुशासन है।
🙏प्रणाम शीतलता है।
🙏प्रणाम आदर सिखाता है।
🙏प्रणाम से सुविचार आते है।
🙏 प्रणाम झुकना सिखाता है।
🙏प्रणाम क्रोध मिटाता है।
🙏प्रणाम आँसू धो देता है।
🙏प्रणाम अहंकार मिटाता है।
🙏प्रणाम हमारी संस्कृति है।

🙏 सबको प्रणाम 🙏

पंकज भारती
शिक्षक | लेखक | शोधकर्ता | विचारक | समीक्षक | विश्लेषक | प्रखर वक्ता

22/12/2018

|| शिक्षा ज्योति संस्थान ||
Mathematics is the only subject which develops our
logical thinking/abilities.
It is a great motivator for all humans because its career starts with zero but it never ends(infinity).
In 2012, The Indian government declared 22 December to be National Mathematics Day. This was announced by Prime Minister Manmohan Singh on 26 February 2012 at Madras University, during the inaugural ceremony of the celebrations to mark the 125th anniversary of the birth of the Indian mathematical genius Srinivasa Ramanujan (22 Dec 1887 - 26 Apr 1920). On this occasion Manmohan Singh also announced that 2012 would be celebrated as the National Mathematics Year.
Mathematics day to all.

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Saran
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