Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya

Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya

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*जीवन में समस्याएँ आने पर घबराए नहीं। समस्याओं को सुलझाना सीखें, तभी आप उत्साहपूर्वक जी सकेंगे।*
छोटी या बड़ी समस्याएं सभी के जीवन में आती हैं। प्रतिदिन आती रहती हैं। *इन समस्याओं से संघर्ष करना, इन को हरा देना, इनसे जीत जाना, बस यही जीवन जीने की कला है। जो व्यक्ति किस कला को जानता है, वही वास्तविक विजेता है।*
सबसे पहले समस्याओं को समझें, कि जीवन में कौन कौन सी समस्याएं हैं? फिर इन समस्याओं का कारण ढूंढें, ये समस्याएँ कहाँ से और क्यों उत्पन्न हुई? जब कारण का पता चल जाए, तब उन कारणों को दूर करें। *यदि इतनी शक्ति सामर्थ्य विद्या साधन संपत्ति आपके पास हो, और आप उन समस्याओं के कारणों को दूर कर पाएँ, तो 100 प्रतिशत गारंटी से आप उन समस्याओं को सुलझा लेंगे। तब आपके जीवन में चिंता और तनाव नहीं होगा, बल्कि आनंद और उत्साह होगा।*
समस्याओं को सुलझाने का सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए, आपको अपने माता पिता तथा वेदादि शास्त्रों के विद्वानों का सहयोग लेना पड़ेगा। अपने बड़े बुजुर्ग अनुभवी माता पिता एवं गुरुजनों आदि का सहयोग लेवें। अपनी समस्याओं को सुलझाने का तरीका उनसे सीखें। उनके पास जीवन का बहुत लंबा अनुभव है। उस अनुभव से आप लाभ उठाएं।
*आज अगर कहीं किसी वकील साहब से कोई सलाह लेनी हो, कोई मुकदमा जीतने में सहयोग लेना हो, तो लाखों रुपए उनको देने पड़ते हैं, फिर भी मुकदमा जीतने की कोई गारंटी नहीं होती।* और आपके अनुभवी माता-पिता तथा वेदों के विद्वान गुरुजन मुफ्त में आपको बहुत उत्तम सलाह देते हैं। *यदि आप उन की सलाह मान कर, उस पर आचरण करें, तो आप की समस्याएं जल्दी-जल्दी दूर हो जाएँ। चिंता तनाव आदि से मुक्त होकर आप उत्तम जीवन जिएँ। जीवन में शांति आनंद उत्साह प्रसन्नता भी बनी रहे, और आपकी लाखों रुपये की बचत भी हो जाए। इसके लिए अपने माता-पिता तथा वेदों के विद्वान गुरुजनों की सहायता अवश्य लेवें।*
प्रतिदिन रात्रि में सोने से एक घंटा पहले सब समस्याओं पर विचार कर के, उनको सुलझा कर, अगले दिन की योजना बनाकर सोएं। जिस समस्या का समाधान उस समय न हो पाए, उसे डायरी में लिख लें, उसके बाद उस पर चिंतन करना बंद कर दें। उसका समाधान अगले दिन सोचने के लिए छोड़ दें। *सोने से पहले, बिस्तर पर बैठकर, निश्चिंत होकर पांच मिनट ओ३म् या गायत्री मंत्र से ईश्वर का ध्यान करें। इसी मंत्र का पाठ करते करते सो जाएं। आपको नींद भी जल्दी आएगी, और चिंताएँ भी नहीं सताएंगी।*
ऐसा करने पर भी आपको सुबह उठते ही अनेक चिंताएं और समस्याएँ घेर लेंगी। तब भी उन समस्याओं से घबराना नहीं है। दिन हो, या रात हो, उनका समाधान ढूंढें। पूर्वोक्त पद्धति से ही समस्याओं को दूर कर के, चिंता तनाव से मुक्त होकर उत्तम जीवन जीएँ।
- *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक।*
प्रश्न -- क्या अन्याय सहना चाहिए, चाहे वह अन्याय करने वाले स्वयं के माता-पिता ही क्यों ना हों?
क्या अन्याय सहने वाला दोषी नहीं?🤔
उत्तर -- ....!???
मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरा जीवन भारत की दो ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी होगा..
राम मंदिर और कश्मीर की वास्तविक आजादी .. !🚩🚩🚩
संसार को सदा जिसकी आवश्यकता रही है और रहेगी तथा इस समय भी जिसकी अत्यंत आवश्यकता है उस तत्त्व का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है | वेद में यदि और उपदेश न होता केवल यही मंत्र होता तब भी वेदं का आसन संसार के सभी मतों और सम्प्रदायों से उच्च रहता |
ये दुनियां हर इन्सान के लिए केवल उसी हद तक खुलती है जीस हद तक उनका ध्यान जाता है। आपका ध्यान कितना तीव्र है आपका जीवन उतना ही चमकीला होगा।💐
सभी लोगों को इस तरह का एक्शन लेना चाहिए!!!
जिससे बच्चों का भविष्य खराब ना हो।
मुझे आशा ही नही, पुर्ण विश्वास है... कि मेरा देश फिर से अपने प्राचीन गौरव को हासिल कर सकेगा...और वो दिन दूर नहीं....!!! जब भारत पुनः विश्वगुरू बनेगा।
जय जय भारत जागृत भारत देश......!!!
⭕ পবিত্র গঙ্গা তীরের হাওড়ার সাঁকরাইলের মিনি ভারত নামে খ্যাত রাজগঞ্জ ও বানীপুরের রুটি-রোজগারের জন্য সেই বিহার রাজ্য থেকে আগত-বসবাসকারী নাগরিকদের নদী সহ সূর্যের সুন্দর প্রকৃতির এবারের ছট পুজোর একঝলক - 👤 ক্যামেরায়-স্বরূপ পালের সাথে, খবরে-একসময়কার সংবাদ প্রতিদিন খ্যাত রিপোর্টার অশোক প্রধান ।
হাওড়া জেলা ও সাঁকরাইল প্রশাসনের সেরা উপহার । প্রায় পৃথিবী সৃষ্টির পর কলকাতার অতি কাছেই জনবহুল আন্দুল স্টেশনের যাতায়াতের একটি রাস্তা এই সর্বপ্রথম পাকা হল । 👤 সরাসরি তুলে আনা খবরে ও ক্যামেরায়-সাংবাদিক অশোক প্রধান ।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।
शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ॥
यही सब मेरे रिश्तेदार हैं।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ।।
( मनुस्मृति २/१०६ )
जैसे लकड़ी का हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हिरण होता है ठीक वैसे ही बिना विद्या पढ़ा हुआ ब्राह्मण या विप्र होता है । अर्थात् नाममात्र.......

"जो मनुष्य विद्वान्, सत्संगी होकर पूरा विचार नहीं करता वह सदा भ्रमजाल में पड़ा रहता है।"
- महर्षि दयानंद .....

सत्य और प्रिय बोलना चाहिए; पर अप्रिय सत्य नहीं बोलना और प्रिय असत्य भी नहीं बोलना यह सनातन धर्म है ।‼️‼️
विश्व की एकमात्र भाषा हिन्दी जो अ- *अज्ञानी* से शुरू होती है। और ज्ञ-से *ज्ञानी* बनाकर ही दम लेती है।

A pvt. School Estd:-1990. Aimed to make education available for labour class society of National Jute Mill. Completely Raged by blaze on the night of 17/18 Aug 2011.

Operating as usual

27/10/2021

"दिन का ढलना और जीवन का ढलना यदि दोनों को एक समान मान लेवें, तो प्रतिदिन यह भी समझना चाहिए, कि शाम को दिन ढलने के साथ साथ आपका जीवन भी ढल रहा है। इसलिए रात्रि (मृत्यु) होने से पहले जल्दी-जल्दी पुण्य कमा लेना चाहिए।"
आज संसार के लोगों का चिंतन वाणी आचार विचार देखकर ऐसा लगता है, कि अधिकांश लोग पूरी तरह से नास्तिक हो चुके हैं। नास्तिकता कई प्रकार की होती है।
"एक प्रकार के नास्तिक" ऐसे हैं, जो स्पष्ट मना करते हैं, कि "ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है।"
"दूसरे नास्तिक" यद्यपि सीधा निषेध तो नहीं करते, "ईश्वर को मानते तो हैं, परंतु वे ईश्वर के स्वरूप को ठीक से नहीं जानते।" उसकी कर्म फल व्यवस्था को नहीं जानते। उसके संविधान को नहीं जानते। उसको स्वीकार नहीं करते। और उसके अनुसार अपना आचरण भी नहीं करते। ये लोग मूर्ति आदि जड़ पदार्थों को ही ईश्वर मानकर चल रहे हैं। और वे सोचते हैं, कि "मूर्तियां तो हमें देख नहीं सकती। ये हमें पाप करने से रोकती भी नहीं। ये हमारा क्या बिगाड़ लेंगी?" "समय आने पर, ईश्वर उनके पाप कर्मों का दंड देगा," इस बात पर उन्हें कोई विश्वास नहीं है। इसलिए वे लोग मूर्ति के रूप में माने हुए ईश्वर से डरते नहीं, और बुरे काम करते रहते हैं।" ऐसे लोग भटके हुए आस्तिक हैं। अतः ये भी एक भिन्न प्रकार के नास्तिक ही हैं, क्योंकि इनका आचरण ठीक नहीं है।
अब "तीसरे प्रकार के नास्तिक" ऐसे हैं, जो ईश्वर को, शब्दों से तो ठीक से स्वीकार करते हैं, कि "ईश्वर है। वह चेतन है, सर्वव्यापक है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, हमें सदा देखता है। वह न्यायकारी भी है। हमारे कर्मों का ठीक ठीक फल देगा।" ऐसा कहते भी हैं। अर्थात शाब्दिक रूप से वे लोग ईश्वर को ठीक जानते मानते हैं। परंतु व्यवहार उनका भी ऐसा नहीं दिखाई देता, कि वे ईश्वर को ठीक प्रकार से समझ पाए हों। "क्योंकि उनके व्यवहार में भी बहुत से झूठ छल कपट अन्याय शोषण आदि बुरे कर्म दिखाई देते हैं। इसलिए शब्दों से आस्तिक होते हुए भी, ईश्वर को ठीक स्वीकार करते हुए भी, आचरण ठीक न होने से, ये भी एक भिन्न प्रकार के नास्तिक ही हैं।"
अब "चौथे प्रकार के वे लोग हैं, जो सच्चे आस्तिक" हैं। वे वास्तविक ज्ञानी हैं। जो ठीक प्रकार से ईश्वर को न्यायकारी समझते हैं। "उनके आचरण से दिखता है, कि वे कभी किसी पर अन्याय नहीं करते। झूठ छल कपट आदि पाप कर्म नहीं करते। चाहे कितना भी विरोध हो, कितनी भी आपत्तियां आएं, तो भी वे सत्य मार्ग को नहीं छोड़ते। ईश्वर को साक्षी मानकर सब कार्य करते हैं। असली आस्तिक तो यही लोग हैं। जो चौथे प्रकार के हैं।" ऐसे लोग संसार में बहुत कम हैं। "गिने चुने लोग मिलेंगे, जो इस चौथे वर्ग में आते हैं। अधिकांश लोग तो बाकी तीन वर्गों में ही हैं।" ये तीनों वर्गों में आने वाले संसार के लोग अलग-अलग प्रकार के नास्तिक हैं, इसलिए संसार में बुरे कर्म चलते रहते हैं, और कभी समाप्त नहीं होते।
"अब जीवन तो लगातार चल ही रहा है/ढल ही रहा है। कुछ ही दिनों में जीवन की शाम हो जाएगी। वृद्धावस्था आ जाएगी। फिर मृत्यु भी सामने आ जाएगी।" तब शायद कुछ लोग इस अविद्या की निद्रा से जागें, और सोचें कि "यह जीवन तो निकल गया, कुछ खास पुण्य नहीं कमाया।" परन्तु तब पछताने से क्या लाभ?
"इसलिए सब लोगों को यह सोचना चाहिए, कि जीवन समाप्ति की ओर है। हम हर रोज मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं। मरने से पहले बहुत से पुण्य कमा लें, ताकि यह जीवन भी शांति से बीते और अगला जन्म भी अच्छा मिले, अर्थात मनुष्य जन्म मिल जाए।" इसलिए सावधानी से विचार करें। "मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है, वह कब आ जाए। वह OTP (One time password) अर्थात सूचना देकर नहीं आएगी। बिना सूचना दिए कभी भी आ सकती है। अतः समय (जीवन) नष्ट न करें, जल्दी से जल्दी ढेर सारे पुण्य कर्म कमा लें, और अपने जीवन को सफल बनाएं।"
----- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

"दिन का ढलना और जीवन का ढलना यदि दोनों को एक समान मान लेवें, तो प्रतिदिन यह भी समझना चाहिए, कि शाम को दिन ढलने के साथ साथ आपका जीवन भी ढल रहा है। इसलिए रात्रि (मृत्यु) होने से पहले जल्दी-जल्दी पुण्य कमा लेना चाहिए।"
आज संसार के लोगों का चिंतन वाणी आचार विचार देखकर ऐसा लगता है, कि अधिकांश लोग पूरी तरह से नास्तिक हो चुके हैं। नास्तिकता कई प्रकार की होती है।
"एक प्रकार के नास्तिक" ऐसे हैं, जो स्पष्ट मना करते हैं, कि "ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है।"
"दूसरे नास्तिक" यद्यपि सीधा निषेध तो नहीं करते, "ईश्वर को मानते तो हैं, परंतु वे ईश्वर के स्वरूप को ठीक से नहीं जानते।" उसकी कर्म फल व्यवस्था को नहीं जानते। उसके संविधान को नहीं जानते। उसको स्वीकार नहीं करते। और उसके अनुसार अपना आचरण भी नहीं करते। ये लोग मूर्ति आदि जड़ पदार्थों को ही ईश्वर मानकर चल रहे हैं। और वे सोचते हैं, कि "मूर्तियां तो हमें देख नहीं सकती। ये हमें पाप करने से रोकती भी नहीं। ये हमारा क्या बिगाड़ लेंगी?" "समय आने पर, ईश्वर उनके पाप कर्मों का दंड देगा," इस बात पर उन्हें कोई विश्वास नहीं है। इसलिए वे लोग मूर्ति के रूप में माने हुए ईश्वर से डरते नहीं, और बुरे काम करते रहते हैं।" ऐसे लोग भटके हुए आस्तिक हैं। अतः ये भी एक भिन्न प्रकार के नास्तिक ही हैं, क्योंकि इनका आचरण ठीक नहीं है।
अब "तीसरे प्रकार के नास्तिक" ऐसे हैं, जो ईश्वर को, शब्दों से तो ठीक से स्वीकार करते हैं, कि "ईश्वर है। वह चेतन है, सर्वव्यापक है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, हमें सदा देखता है। वह न्यायकारी भी है। हमारे कर्मों का ठीक ठीक फल देगा।" ऐसा कहते भी हैं। अर्थात शाब्दिक रूप से वे लोग ईश्वर को ठीक जानते मानते हैं। परंतु व्यवहार उनका भी ऐसा नहीं दिखाई देता, कि वे ईश्वर को ठीक प्रकार से समझ पाए हों। "क्योंकि उनके व्यवहार में भी बहुत से झूठ छल कपट अन्याय शोषण आदि बुरे कर्म दिखाई देते हैं। इसलिए शब्दों से आस्तिक होते हुए भी, ईश्वर को ठीक स्वीकार करते हुए भी, आचरण ठीक न होने से, ये भी एक भिन्न प्रकार के नास्तिक ही हैं।"
अब "चौथे प्रकार के वे लोग हैं, जो सच्चे आस्तिक" हैं। वे वास्तविक ज्ञानी हैं। जो ठीक प्रकार से ईश्वर को न्यायकारी समझते हैं। "उनके आचरण से दिखता है, कि वे कभी किसी पर अन्याय नहीं करते। झूठ छल कपट आदि पाप कर्म नहीं करते। चाहे कितना भी विरोध हो, कितनी भी आपत्तियां आएं, तो भी वे सत्य मार्ग को नहीं छोड़ते। ईश्वर को साक्षी मानकर सब कार्य करते हैं। असली आस्तिक तो यही लोग हैं। जो चौथे प्रकार के हैं।" ऐसे लोग संसार में बहुत कम हैं। "गिने चुने लोग मिलेंगे, जो इस चौथे वर्ग में आते हैं। अधिकांश लोग तो बाकी तीन वर्गों में ही हैं।" ये तीनों वर्गों में आने वाले संसार के लोग अलग-अलग प्रकार के नास्तिक हैं, इसलिए संसार में बुरे कर्म चलते रहते हैं, और कभी समाप्त नहीं होते।
"अब जीवन तो लगातार चल ही रहा है/ढल ही रहा है। कुछ ही दिनों में जीवन की शाम हो जाएगी। वृद्धावस्था आ जाएगी। फिर मृत्यु भी सामने आ जाएगी।" तब शायद कुछ लोग इस अविद्या की निद्रा से जागें, और सोचें कि "यह जीवन तो निकल गया, कुछ खास पुण्य नहीं कमाया।" परन्तु तब पछताने से क्या लाभ?
"इसलिए सब लोगों को यह सोचना चाहिए, कि जीवन समाप्ति की ओर है। हम हर रोज मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं। मरने से पहले बहुत से पुण्य कमा लें, ताकि यह जीवन भी शांति से बीते और अगला जन्म भी अच्छा मिले, अर्थात मनुष्य जन्म मिल जाए।" इसलिए सावधानी से विचार करें। "मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है, वह कब आ जाए। वह OTP (One time password) अर्थात सूचना देकर नहीं आएगी। बिना सूचना दिए कभी भी आ सकती है। अतः समय (जीवन) नष्ट न करें, जल्दी से जल्दी ढेर सारे पुण्य कर्म कमा लें, और अपने जीवन को सफल बनाएं।"
----- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

[10/24/21]   अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः ॥८३९॥
भावार्थभाषाः -
जो मन, आँख, कान आदि में मनन करने, देखने, सुनने आदि के सामर्थ्य को तथा आत्मा में बल को निहित करता है, उस कामना पूर्ण करनेवाले, विश्वद्रष्टा परमात्मा का महत्त्व सबको जानना चाहिए ॥

"ईश्वर के नाम और काम" - वैदिक प्रमाणों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर...प्रश्न डिस्क्रिप्शन में देखे 22/10/2021

"ईश्वर के नाम और काम" - वैदिक प्रमाणों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर...प्रश्न डिस्क्रिप्शन में देखे

"ईश्वर के नाम और काम" - वैदिक प्रमाणों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर...प्रश्न डिस्क्रिप्शन में देखे 📣 *ईश्वर के नाम और काम (कार्य) सम्बन्धित वैदिक प्रमाणों पर आधारित... आगामी सत्संग की सूचना-* 🌹🌼 *ओ३म्* 🌼🌹🏡अपने घर में .....

[10/19/21]   ये जो गलियों में आवारा जानवर घूम रहे हैं, इन्हें भी कभी मनुष्य जन्म मिला था।
इनमें से कोई डॉक्टर था, कोई इंजीनियर तो कोई उद्योगपति.....
इन्हें भी कभी ना कभी धर्म को समझने का मौका मिला था।
किसी ने इन्हें भी वेद मार्ग पर चलकर धर्मरक्षा को समझाया था।

19/10/2021

"सफलता और असफलता की पहचान क्या है? 'हृदय से सम्मान मिलना,' सफलता की पहचान है। और 'दिखावे का सम्मान मिलना,' असफलता की।"
प्रतिदिन लोग एक दूसरे से मिलते हैं। परस्पर व्यवहार करते हैं। नमस्ते स्वागत सम्मान आदि करते हैं। "एक दूसरे को उपहार/ गिफ्ट आदि देकर भी अनेक प्रकार से सम्मानित करते हैं, और एक दूसरे को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं।"
यह जो एक दूसरे को सम्मान दिया जाता है। यह सम्मान दो प्रकार का होता है। एक तो - "वास्तविक (असली) सम्मान अर्थात निर्भय होकर श्रद्धा पूर्वक हृदय से किया गया सम्मान।" और दूसरा - "सिर्फ दिखावे का सम्मान, या नकली सम्मान।"
"वास्तविक सम्मान में, सम्मान कर्ता के हृदय में, सम्माननीय व्यक्ति के प्रति श्रद्धा होती है, प्रेम होता है, समर्पण होता है, सद्भावना होती है, विश्वास होता है। उसके चेहरे पर वास्तविक प्रसन्नता होती है।" "नकली सम्मान में अर्थात जो सम्मान करने का दिखावा किया जाता है उसमें, हृदय में कोई प्रेम, श्रद्धा, सद्भावना, समर्पण, विश्वास आदि कुछ नहीं होता। ऊपर ऊपर से, केवल चेहरे से नकली प्रसन्नता दिखाई जाती है।" कभी कभी कमरे आदि स्थान की कुछ सजावट भी कर ली जाती है। इस प्रकार से कुछ बाह्य आडंबर किया जाता है, जिससे कि सामने वाले व्यक्ति को ऐसा लगे, कि "हम आप का सम्मान करते हैं।" सम्मान के पहले प्रकार में 'असली सम्मान' है, और दूसरे प्रकार में 'नकली सम्मान' है।
"बुद्धिमान लोग दोनों प्रकार के व्यवहार को समझ लेते हैं, कि सामने वाला व्यक्ति जो मुझे सम्मान दे रहा है, यह वास्तविक सम्मान है, हृदय से किया जा रहा है। अथवा नकली सम्मान है। सम्मान करने का केवल दिखावा किया जा रहा है।" परंतु "मूर्ख लोग इन दोनों का अंतर नहीं समझते। वे नकली सम्मान को भी असली सम्मान मानकर अपनी मूर्खता से खुश हो जाते हैं।" "कुछ आधे अधूरे बुद्धिमान लोग पहचान भी लेते हैं, कि सामने वाला नकली सम्मान कर रहा है। वह मेरी विद्या से, कला से, चतुराई से, धूर्तता आदि गुण दोषों के कारण से मुझसे डरता है। वह गुणों में या चतुराई आदि में मुझसे कुछ कमजोर है, इसलिए मुझसे डरता है। फिर भी ऊपर ऊपर से नकली सम्मान करता है।" परन्तु इतना समझने पर भी वे आधे अधूरे बुद्धिमान लोग अपने उन दोषों को दूर नहीं करते, जिन दोषों के कारण सामने वाला व्यक्ति उनसे डरता है। उनका असली सम्मान नहीं कर पाता, और सम्मान करने का बस दिखावा ही करता है। नकली सम्मान करता है। "इस प्रकार के लोग, अपने दोषों को दूर करने के लिए कोई पुरुषार्थ विशेष नहीं करते। ऐसे लोग, 'आधे अधूरे बुद्धिमान तथा असफल व्यक्ति' कहलाते हैं। जो मूर्ख लोग हैं, नकली सम्मान को असली सम्मान मानकर खुश हो जाते हैं, वे भी असफल हैं।
और जिनका वास्तव में हृदय से सम्मान किया जाता है, ऐसे लोग ही वास्तव में 'पूरे बुद्धिमान तथा अपने जीवन में सफल' व्यक्ति कहलाते हैं।"
आप भी विचार करें। आप दोनों में से किस कोटि में हैं, सफल या असफल? "यदि आप असफल व्यक्ति की कोटि में हों, तो अपने दोषों को दूर कर के सफल व्यक्ति बनें, और असली सम्मान को प्राप्त करें। तभी जीवन में वास्तविक आनन्द मिलेगा।"
---- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

"सफलता और असफलता की पहचान क्या है? 'हृदय से सम्मान मिलना,' सफलता की पहचान है। और 'दिखावे का सम्मान मिलना,' असफलता की।"
प्रतिदिन लोग एक दूसरे से मिलते हैं। परस्पर व्यवहार करते हैं। नमस्ते स्वागत सम्मान आदि करते हैं। "एक दूसरे को उपहार/ गिफ्ट आदि देकर भी अनेक प्रकार से सम्मानित करते हैं, और एक दूसरे को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं।"
यह जो एक दूसरे को सम्मान दिया जाता है। यह सम्मान दो प्रकार का होता है। एक तो - "वास्तविक (असली) सम्मान अर्थात निर्भय होकर श्रद्धा पूर्वक हृदय से किया गया सम्मान।" और दूसरा - "सिर्फ दिखावे का सम्मान, या नकली सम्मान।"
"वास्तविक सम्मान में, सम्मान कर्ता के हृदय में, सम्माननीय व्यक्ति के प्रति श्रद्धा होती है, प्रेम होता है, समर्पण होता है, सद्भावना होती है, विश्वास होता है। उसके चेहरे पर वास्तविक प्रसन्नता होती है।" "नकली सम्मान में अर्थात जो सम्मान करने का दिखावा किया जाता है उसमें, हृदय में कोई प्रेम, श्रद्धा, सद्भावना, समर्पण, विश्वास आदि कुछ नहीं होता। ऊपर ऊपर से, केवल चेहरे से नकली प्रसन्नता दिखाई जाती है।" कभी कभी कमरे आदि स्थान की कुछ सजावट भी कर ली जाती है। इस प्रकार से कुछ बाह्य आडंबर किया जाता है, जिससे कि सामने वाले व्यक्ति को ऐसा लगे, कि "हम आप का सम्मान करते हैं।" सम्मान के पहले प्रकार में 'असली सम्मान' है, और दूसरे प्रकार में 'नकली सम्मान' है।
"बुद्धिमान लोग दोनों प्रकार के व्यवहार को समझ लेते हैं, कि सामने वाला व्यक्ति जो मुझे सम्मान दे रहा है, यह वास्तविक सम्मान है, हृदय से किया जा रहा है। अथवा नकली सम्मान है। सम्मान करने का केवल दिखावा किया जा रहा है।" परंतु "मूर्ख लोग इन दोनों का अंतर नहीं समझते। वे नकली सम्मान को भी असली सम्मान मानकर अपनी मूर्खता से खुश हो जाते हैं।" "कुछ आधे अधूरे बुद्धिमान लोग पहचान भी लेते हैं, कि सामने वाला नकली सम्मान कर रहा है। वह मेरी विद्या से, कला से, चतुराई से, धूर्तता आदि गुण दोषों के कारण से मुझसे डरता है। वह गुणों में या चतुराई आदि में मुझसे कुछ कमजोर है, इसलिए मुझसे डरता है। फिर भी ऊपर ऊपर से नकली सम्मान करता है।" परन्तु इतना समझने पर भी वे आधे अधूरे बुद्धिमान लोग अपने उन दोषों को दूर नहीं करते, जिन दोषों के कारण सामने वाला व्यक्ति उनसे डरता है। उनका असली सम्मान नहीं कर पाता, और सम्मान करने का बस दिखावा ही करता है। नकली सम्मान करता है। "इस प्रकार के लोग, अपने दोषों को दूर करने के लिए कोई पुरुषार्थ विशेष नहीं करते। ऐसे लोग, 'आधे अधूरे बुद्धिमान तथा असफल व्यक्ति' कहलाते हैं। जो मूर्ख लोग हैं, नकली सम्मान को असली सम्मान मानकर खुश हो जाते हैं, वे भी असफल हैं।
और जिनका वास्तव में हृदय से सम्मान किया जाता है, ऐसे लोग ही वास्तव में 'पूरे बुद्धिमान तथा अपने जीवन में सफल' व्यक्ति कहलाते हैं।"
आप भी विचार करें। आप दोनों में से किस कोटि में हैं, सफल या असफल? "यदि आप असफल व्यक्ति की कोटि में हों, तो अपने दोषों को दूर कर के सफल व्यक्ति बनें, और असली सम्मान को प्राप्त करें। तभी जीवन में वास्तविक आनन्द मिलेगा।"
---- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

18/10/2021

"सभी आत्माएं अल्पज्ञ हैं। अल्पज्ञ होने से गलतियां होना संभव है। गलती होने पर उसका सुधार करें और आगे उत्साह से काम करें। निराश होकर बैठ न जाएं।"
जीवन में गलतियां किस से नहीं होती? सभी से होती हैं। किसी से छोटी, किसी से बड़ी। किसी से कम, और किसी से अधिक। गलतियां तो होती ही हैं। "बुद्धिमान लोग अपनी गलतियों को समझते हैं, स्वीकार करते हैं, उन्हें दूर करने का संकल्प करते हैं, प्रायश्चित करते हैं, उन गलतियों का दंड लेते हैं, और आगे नए लक्ष्य बनाकर उत्साह पूर्वक परिश्रम करते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन में सफल हो जाते हैं। उनकी गलतियां छूट जाती हैं, और अच्छे अच्छे गुण ईश्वर की कृपा से उनके अंदर स्थापित हो जाते हैं।"
आपसे भी यदि कोई गलतियां हो जाएं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह तो स्वाभाविक ही है। इसलिए जब भी कभी जाने अनजाने में गलती हो जाए, तो अपना आत्म निरीक्षण कर के पहले तो स्वयं ही अपनी गलतियां ढूंढें। "यदि स्वयं अपनी गलतियां न ढूंढ पाएं, तो अपने विश्वसनीय प्रिय मित्रों की सहायता लेवें। फिर उन गलतियों को समझें, स्वीकार करें। उनका प्रायश्चित करें। हो सके तो दंड भी लेवें। और भविष्य में न करने का मजबूत संकल्प लेवें। पूर्व अनुभव से शिक्षा प्राप्त करके नया संकल्प करें। पूरे उत्साह से काम करें। निराश होकर बैठ न जाएं। निराश होने से तो और अधिक हानियां होंगी।"
जो व्यक्ति पूर्व अनुभव से लाभ लेकर उत्साह पूर्वक पुरुषार्थ करता है, वह अपने जीवन में सफल हो जाता है। "और इसके विपरीत आलसी प्रमादी मूर्ख व्यक्ति कोई उन्नति नहीं कर पाता। तथा अपने जीवन को नष्ट कर लेता है।"
चींटी को देखिए। कितनी छोटी है. 10 बार दीवार पर चढ़ने की कोशिश करती है, गिर जाती है। फिर भी हिम्मत नहीं हारती। 11वीं बार वह फिर पुरुषार्थ करती है, और अंततः वह दीवार पर चढ़ जाती है। "क्या आपकी बुद्धि योग्यता शक्ति सामर्थ्य, चींटी से भी कम है? बिल्कुल नहीं। चींटी से बहुत अधिक है।"
जैसे चींटी बिलकुल निराश नहीं होती, और पुरुषार्थ करना नहीं छोड़ती। फिर आपका सामर्थ्य तो चींटी से बहुत अधिक है। तो आप क्यों निराश होते हैं। पुरुषार्थ क्यों नहीं करते। "पूर्व अनुभव अर्थात गलतियों से शिक्षा लेकर अब सही निर्णय लेवें। नया लक्ष्य बनाएं। पूरे उत्साह एवं पुरुषार्थ के साथ काम करें। आपको सफलता अवश्य मिलेगी। और जीवन में आनंद भी अवश्य ही आएगा।"
----- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

"सभी आत्माएं अल्पज्ञ हैं। अल्पज्ञ होने से गलतियां होना संभव है। गलती होने पर उसका सुधार करें और आगे उत्साह से काम करें। निराश होकर बैठ न जाएं।"
जीवन में गलतियां किस से नहीं होती? सभी से होती हैं। किसी से छोटी, किसी से बड़ी। किसी से कम, और किसी से अधिक। गलतियां तो होती ही हैं। "बुद्धिमान लोग अपनी गलतियों को समझते हैं, स्वीकार करते हैं, उन्हें दूर करने का संकल्प करते हैं, प्रायश्चित करते हैं, उन गलतियों का दंड लेते हैं, और आगे नए लक्ष्य बनाकर उत्साह पूर्वक परिश्रम करते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन में सफल हो जाते हैं। उनकी गलतियां छूट जाती हैं, और अच्छे अच्छे गुण ईश्वर की कृपा से उनके अंदर स्थापित हो जाते हैं।"
आपसे भी यदि कोई गलतियां हो जाएं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह तो स्वाभाविक ही है। इसलिए जब भी कभी जाने अनजाने में गलती हो जाए, तो अपना आत्म निरीक्षण कर के पहले तो स्वयं ही अपनी गलतियां ढूंढें। "यदि स्वयं अपनी गलतियां न ढूंढ पाएं, तो अपने विश्वसनीय प्रिय मित्रों की सहायता लेवें। फिर उन गलतियों को समझें, स्वीकार करें। उनका प्रायश्चित करें। हो सके तो दंड भी लेवें। और भविष्य में न करने का मजबूत संकल्प लेवें। पूर्व अनुभव से शिक्षा प्राप्त करके नया संकल्प करें। पूरे उत्साह से काम करें। निराश होकर बैठ न जाएं। निराश होने से तो और अधिक हानियां होंगी।"
जो व्यक्ति पूर्व अनुभव से लाभ लेकर उत्साह पूर्वक पुरुषार्थ करता है, वह अपने जीवन में सफल हो जाता है। "और इसके विपरीत आलसी प्रमादी मूर्ख व्यक्ति कोई उन्नति नहीं कर पाता। तथा अपने जीवन को नष्ट कर लेता है।"
चींटी को देखिए। कितनी छोटी है. 10 बार दीवार पर चढ़ने की कोशिश करती है, गिर जाती है। फिर भी हिम्मत नहीं हारती। 11वीं बार वह फिर पुरुषार्थ करती है, और अंततः वह दीवार पर चढ़ जाती है। "क्या आपकी बुद्धि योग्यता शक्ति सामर्थ्य, चींटी से भी कम है? बिल्कुल नहीं। चींटी से बहुत अधिक है।"
जैसे चींटी बिलकुल निराश नहीं होती, और पुरुषार्थ करना नहीं छोड़ती। फिर आपका सामर्थ्य तो चींटी से बहुत अधिक है। तो आप क्यों निराश होते हैं। पुरुषार्थ क्यों नहीं करते। "पूर्व अनुभव अर्थात गलतियों से शिक्षा लेकर अब सही निर्णय लेवें। नया लक्ष्य बनाएं। पूरे उत्साह एवं पुरुषार्थ के साथ काम करें। आपको सफलता अवश्य मिलेगी। और जीवन में आनंद भी अवश्य ही आएगा।"
----- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

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