Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya

Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya

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मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरा जीवन भारत की दो ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी होगा..
राम मंदिर और कश्मीर की वास्तविक आजादी .. !🚩🚩🚩
संसार को सदा जिसकी आवश्यकता रही है और रहेगी तथा इस समय भी जिसकी अत्यंत आवश्यकता है उस तत्त्व का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है | वेद में यदि और उपदेश न होता केवल यही मंत्र होता तब भी वेदं का आसन संसार के सभी मतों और सम्प्रदायों से उच्च रहता |
ये दुनियां हर इन्सान के लिए केवल उसी हद तक खुलती है जीस हद तक उनका ध्यान जाता है। आपका ध्यान कितना तीव्र है आपका जीवन उतना ही चमकीला होगा।💐
सभी लोगों को इस तरह का एक्शन लेना चाहिए!!!
जिससे बच्चों का भविष्य खराब ना हो।
मुझे आशा ही नही, पुर्ण विश्वास है... कि मेरा देश फिर से अपने प्राचीन गौरव को हासिल कर सकेगा...और वो दिन दूर नहीं....!!! जब भारत पुनः विश्वगुरू बनेगा।
जय जय भारत जागृत भारत देश......!!!
⭕ পবিত্র গঙ্গা তীরের হাওড়ার সাঁকরাইলের মিনি ভারত নামে খ্যাত রাজগঞ্জ ও বানীপুরের রুটি-রোজগারের জন্য সেই বিহার রাজ্য থেকে আগত-বসবাসকারী নাগরিকদের নদী সহ সূর্যের সুন্দর প্রকৃতির এবারের ছট পুজোর একঝলক - 👤 ক্যামেরায়-স্বরূপ পালের সাথে, খবরে-একসময়কার সংবাদ প্রতিদিন খ্যাত রিপোর্টার অশোক প্রধান ।
হাওড়া জেলা ও সাঁকরাইল প্রশাসনের সেরা উপহার । প্রায় পৃথিবী সৃষ্টির পর কলকাতার অতি কাছেই জনবহুল আন্দুল স্টেশনের যাতায়াতের একটি রাস্তা এই সর্বপ্রথম পাকা হল । 👤 সরাসরি তুলে আনা খবরে ও ক্যামেরায়-সাংবাদিক অশোক প্রধান ।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।
शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ॥
यही सब मेरे रिश्तेदार हैं।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ।।
( मनुस्मृति २/१०६ )
जैसे लकड़ी का हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हिरण होता है ठीक वैसे ही बिना विद्या पढ़ा हुआ ब्राह्मण या विप्र होता है । अर्थात् नाममात्र.......

"जो मनुष्य विद्वान्, सत्संगी होकर पूरा विचार नहीं करता वह सदा भ्रमजाल में पड़ा रहता है।"
- महर्षि दयानंद .....

सत्य और प्रिय बोलना चाहिए; पर अप्रिय सत्य नहीं बोलना और प्रिय असत्य भी नहीं बोलना यह सनातन धर्म है ।‼️‼️
विश्व की एकमात्र भाषा हिन्दी जो अ- *अज्ञानी* से शुरू होती है। और ज्ञ-से *ज्ञानी* बनाकर ही दम लेती है।

A pvt. School Estd:-1990. Aimed to make education available for labour class society of National Jute Mill. Completely Raged by blaze on the night of 17/18 Aug 2011.

Operating as usual

[06/01/21]   जीवन में हमेशा तैयारी के साथ रहना चाहिए....!
मौसम और इंसान कब बदल जाये इसका कोई भरोसा नहीं...!!

[06/01/21]   मनुष्य उसे ही कहेंगे जो विना बिचारॆ कुछ भी नहीं करता, कोई भी काम विना बिचारॆ न करे।
कुछ सोचो मत जो सब कर रहे हैं करते रहो इसे मानसिक गुलामी कहते हैं।

[05/31/21]   जो तूफानों में पलते हैं ...! दुनिया वही बदलते है...!!
अच्छा इंसान कभी भी मतलबी नहीं होता, बस वह दूर हो जाता है उन लोगों से जिनको उसकी कदर नहीं होती।

[05/30/21]   जो समाज व्यक्तिगत उन्नति को सामाजिक उन्नति से ऊपर रखता है, वह समाज पहले भ्रष्ट होता है फिर नष्ट हो जाता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि वह मिथिला है या मेरठ।
जहां सामूहिकता समाप्त होती है और व्यक्तिगत हित सर्वोपरि हो जाते हैं उस समाज को नष्ट होने से कोई बचा नहीं सकता।

Photos from Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya's post 30/05/2021

क्या आप ने अन्धकार से प्रकाश की ओर जाना चाहा ?
क्या आप इस अमर ग्रन्थ को पढ़ रहे हैं?
महर्षि दयानन्द ने इसका नाम सत्यार्थ प्रकाश (सत्य+अर्थ+प्रकाश) अर्थात् सही अर्थ पर प्रकाश डालने वाला (ग्रन्थ) रखा।
सत्यार्थ प्रकाश की रचना आर्य समाज के संस्थापक महार्षि दयानंद सरस्वती ने की। समाजसुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती की इस रचना (सन् 1875) का मुख्य प्रयोजन सत्य को सत्य और मिथ्या को मिथ्या ही प्रतिपादन करना था और सत्यार्थ प्रकाश की रचना का उद्देश्य आर्य समाज के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार था।

[05/29/21]   प्रायः लोग इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करते, कि "मुझे क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, कौन सा काम अच्छा है, कौन सा काम बुरा है?"
लोग तो यह सोचते हैं कि "बस, जो मुझे अच्छा लगता है, मुझे वही करना है।"
इस नीति पर संसार के अधिकांश लोग चलते हैं। परंतु इसका परिणाम वे लोग नहीं जानते।

[05/29/21]   "वर्तमान काल में लगभग हर इंसान स्वयं को बदल चुका है और इंसान से पशु या नरपिशाच बन चुका है।"

नरपिशाचों की गुलामी करके पशु स्वयं को धन्य भी समझ रहे हैं।

28/05/2021

जब से सुबह नींद खुलती है, तब से व्यक्ति विचार आरंभ कर देता है। और पूरा दिन विचार करता रहता है। रात्रि को नींद आने तक भी विचार चलते रहते हैं। इन विचारों में बहुत से ऐसे व्यर्थ के विचार होते हैं, जिन्हें आप दूसरे को बता नहीं सकते, सुना नहीं सकते । अथवा बताने सुनाने की कोशिश करें , तो लोग उन्हें सुनना नहीं चाहते । क्योंकि वे फालतू बातें हैं, जिनसे किसी को भी लाभ नहीं होता। बस स्वयं ही सोच सोच कर सारा दिन दुखी होते रहते हैं ।
उदाहरण के लिए अमुक पार्टी में बहुत भ्रष्ट लोग हैं। अमुक नेता बहुत भ्रष्ट है। अमुक व्यक्ति इस तरह के काम करता है, इत्यादि।
जिस विषय में आप कुछ कर नहीं सकते, उस विषय में सोचने और बोलने से लाभ क्या? सिर्फ अपना और दूसरों का समय एवं शक्ति नष्ट करने वाली बात है।
*इसलिए उतना ही सोचें, जितना उपयोगी हो। अर्थात उसे आप दूसरों के सामने बोल भी सकें। और बोलें वही, जो आपके लिए और दूसरों के लिए सार्थक हो.*
*व्यर्थ की और हानिकारक बातें सोच-सोच कर अपना और दूसरों का तनाव न बढ़ाएं ; तथा अपनी शक्ति एवं समय का नाश न करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो
आप की ओर से संसार पर बहुत बड़ा उपकार होगा* -
*स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

जब से सुबह नींद खुलती है, तब से व्यक्ति विचार आरंभ कर देता है। और पूरा दिन विचार करता रहता है। रात्रि को नींद आने तक भी विचार चलते रहते हैं। इन विचारों में बहुत से ऐसे व्यर्थ के विचार होते हैं, जिन्हें आप दूसरे को बता नहीं सकते, सुना नहीं सकते । अथवा बताने सुनाने की कोशिश करें , तो लोग उन्हें सुनना नहीं चाहते । क्योंकि वे फालतू बातें हैं, जिनसे किसी को भी लाभ नहीं होता। बस स्वयं ही सोच सोच कर सारा दिन दुखी होते रहते हैं ।
उदाहरण के लिए अमुक पार्टी में बहुत भ्रष्ट लोग हैं। अमुक नेता बहुत भ्रष्ट है। अमुक व्यक्ति इस तरह के काम करता है, इत्यादि।
जिस विषय में आप कुछ कर नहीं सकते, उस विषय में सोचने और बोलने से लाभ क्या? सिर्फ अपना और दूसरों का समय एवं शक्ति नष्ट करने वाली बात है।
*इसलिए उतना ही सोचें, जितना उपयोगी हो। अर्थात उसे आप दूसरों के सामने बोल भी सकें। और बोलें वही, जो आपके लिए और दूसरों के लिए सार्थक हो.*
*व्यर्थ की और हानिकारक बातें सोच-सोच कर अपना और दूसरों का तनाव न बढ़ाएं ; तथा अपनी शक्ति एवं समय का नाश न करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो
आप की ओर से संसार पर बहुत बड़ा उपकार होगा* -
*स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

[05/28/21]   यदि आप के कारण कोई प्रसन्न होता है, तो इससे आपको पुण्य मिलता है। यदि आप के कारण कोई दुखी होता है, तो इससे आपको पाप लगता है।
अतः पुण्य कमाएँ, पाप नहीं।

[05/27/21]   Enjoy your life today because yesterday had gone and tomorrow may never come.

27/05/2021

प्रायः लोग सुबह से रात तक बोलते रहते हैं । खूब बोलते हैं । बोलना सरल काम है , चुप रहना कठिन है , अर्थात मौन रहना कठिन है। साधक लोगों को छोड़कर शायद ही कोई प्रतिदिन 2 घंटा मौन रहता होगा ।
फिर भी लोग जो कुछ भी बोलते हैं , उनमें अधिकतर यह प्रवृत्ति देखी जाती है, कि वे बोल बोल कर अपने विचार दूसरों पर थोपते रहते हैं , अपनी भड़ास दूसरों पर निकालते रहते हैं । और यदि दूसरा व्यक्ति उनके कथन का उत्तर देना चाहे , तो उसे प्रायः सुनना पसंद नहीं करते। स्वयं बोल बोल कर उसकी बात काटते रहते हैं, दूसरे व्यक्ति को बोलने ही नहीं देते। कई तो इतने डरपोक होते हैं, जो सामने वाले व्यक्ति का उत्तर सुनना ही नहीं चाहते। सुनने की हिम्मत ही नहीं होती और उठ कर भाग जाते हैं। ऐसे कायर लोग क्या बोलेंगे? ऐसा बोलना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। *यदि आप कुछ बोलना ही चाहते हैं, तो उसका उत्तर सुनने की हिम्मत भी आप में होनी चाहिए, अथवा मौन रहना ही उत्तम है। प्रतिदिन एक घंटा या दो घंटा मौन रहने का अभ्यास करें । उस मौन के समय में थोड़ा ईश्वर का ध्यान भी कर लेवें, तो और भी अच्छा है। इससे आपको बहुत शांति मिलेगी, आनंद मिलेगा । मन वाणी आदि इंद्रियों पर संयम होगा । क्रोध आदि दोषों को भी आप धीरे-धीरे जीत लेंगे* - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

प्रायः लोग सुबह से रात तक बोलते रहते हैं । खूब बोलते हैं । बोलना सरल काम है , चुप रहना कठिन है , अर्थात मौन रहना कठिन है। साधक लोगों को छोड़कर शायद ही कोई प्रतिदिन 2 घंटा मौन रहता होगा ।
फिर भी लोग जो कुछ भी बोलते हैं , उनमें अधिकतर यह प्रवृत्ति देखी जाती है, कि वे बोल बोल कर अपने विचार दूसरों पर थोपते रहते हैं , अपनी भड़ास दूसरों पर निकालते रहते हैं । और यदि दूसरा व्यक्ति उनके कथन का उत्तर देना चाहे , तो उसे प्रायः सुनना पसंद नहीं करते। स्वयं बोल बोल कर उसकी बात काटते रहते हैं, दूसरे व्यक्ति को बोलने ही नहीं देते। कई तो इतने डरपोक होते हैं, जो सामने वाले व्यक्ति का उत्तर सुनना ही नहीं चाहते। सुनने की हिम्मत ही नहीं होती और उठ कर भाग जाते हैं। ऐसे कायर लोग क्या बोलेंगे? ऐसा बोलना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। *यदि आप कुछ बोलना ही चाहते हैं, तो उसका उत्तर सुनने की हिम्मत भी आप में होनी चाहिए, अथवा मौन रहना ही उत्तम है। प्रतिदिन एक घंटा या दो घंटा मौन रहने का अभ्यास करें । उस मौन के समय में थोड़ा ईश्वर का ध्यान भी कर लेवें, तो और भी अच्छा है। इससे आपको बहुत शांति मिलेगी, आनंद मिलेगा । मन वाणी आदि इंद्रियों पर संयम होगा । क्रोध आदि दोषों को भी आप धीरे-धीरे जीत लेंगे* - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

23/05/2021

संसार में अनेक प्रकार के व्यक्ति हैं। सब की योग्यता अलग अलग है। सब के पूर्व जन्मों के संस्कार भी अलग-अलग हैं, इस कारण से उनकी क्षमताएं भी अलग-अलग हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण वर्तमान जीवन में पुरुषार्थ करता है। और अपनी अपनी क्षमता से वह आगे बढ़ता है। कुछ लोग दूसरों की उन्नति को देखकर सहन नहीं कर पाते , क्योंकि उनके पूर्व जन्मों के संस्कार इतने उत्तम नहीं हैं। तथा वर्तमान में भी वे अपने उन खराब संस्कारों का विरोध नहीं करते और नया पुरुषार्थ करके उन्नति करना नहीं चाहते।
ऐसे लोग जब दूसरों की उन्नति देखते हैं, तो सहन न हो पाने के कारण उनकी टांग खींचने लगते हैं, उनका विरोध करने लगते हैं। उनके पास उन्हें और कोई उपाय नहीं दिखता। क्योंकि वे स्वयं इतने योग्य नहीं होते, कि दूसरे व्यक्ति से आगे निकल पाएँ। तो उन्हें यही उचित लगता है कि दूसरे की टांग खींचो, उसे बदनाम करो, और इस प्रकार से उसे पछाड़ो। यह नीति अच्छी नहीं है। ईश्वर के संविधान के विरुद्ध है। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह दंड का पात्र है ।
आप भी अपना आत्म निरीक्षण करें । यदि यह दोष आपके अंदर भी हो, तो ईश्वर के दंड को याद करके इस दोष को दूर करने का प्रयत्न करें। अपने पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों से युद्ध करें , उन्हें दूर करें , और उन्नति करने के लिए ईमानदारी से नया पुरुषार्थ करें । फिर उससे जितनी भी प्रगति उन्नति हो, उतने में संतोष करें - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

संसार में अनेक प्रकार के व्यक्ति हैं। सब की योग्यता अलग अलग है। सब के पूर्व जन्मों के संस्कार भी अलग-अलग हैं, इस कारण से उनकी क्षमताएं भी अलग-अलग हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण वर्तमान जीवन में पुरुषार्थ करता है। और अपनी अपनी क्षमता से वह आगे बढ़ता है। कुछ लोग दूसरों की उन्नति को देखकर सहन नहीं कर पाते , क्योंकि उनके पूर्व जन्मों के संस्कार इतने उत्तम नहीं हैं। तथा वर्तमान में भी वे अपने उन खराब संस्कारों का विरोध नहीं करते और नया पुरुषार्थ करके उन्नति करना नहीं चाहते।
ऐसे लोग जब दूसरों की उन्नति देखते हैं, तो सहन न हो पाने के कारण उनकी टांग खींचने लगते हैं, उनका विरोध करने लगते हैं। उनके पास उन्हें और कोई उपाय नहीं दिखता। क्योंकि वे स्वयं इतने योग्य नहीं होते, कि दूसरे व्यक्ति से आगे निकल पाएँ। तो उन्हें यही उचित लगता है कि दूसरे की टांग खींचो, उसे बदनाम करो, और इस प्रकार से उसे पछाड़ो। यह नीति अच्छी नहीं है। ईश्वर के संविधान के विरुद्ध है। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह दंड का पात्र है ।
आप भी अपना आत्म निरीक्षण करें । यदि यह दोष आपके अंदर भी हो, तो ईश्वर के दंड को याद करके इस दोष को दूर करने का प्रयत्न करें। अपने पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों से युद्ध करें , उन्हें दूर करें , और उन्नति करने के लिए ईमानदारी से नया पुरुषार्थ करें । फिर उससे जितनी भी प्रगति उन्नति हो, उतने में संतोष करें - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

[05/23/21]   यह हमारे कर्मों का ही फल है कि हमें ऐसी पृथ्वी पर जन्म मिला जहां आर्यों का चक्रवर्ती राज्य इस समय नहीं है। संचित कर्मो व प्रारब्ध से वर्तमान जीवन मिलता है। मनुष्य अपने कर्मो से अपने भविष्य व भाग्य का स्वयं निर्माता है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने भाग्य का निर्माता स्वयं को ही मानकर सत्कर्म करें और कर्म पथ पर आने वाली बाधाओं को अपने स्वाबलंबी प्रभाव से दूर करता हुआ निरंतर प्रगति करें ।

22/05/2021

संसार में 24 घंटे चारों तरफ लड़ाई-झगड़ा चलता ही रहता है । इस संसार में पुण्य कर्म कम होते हैं , और पाप अन्याय अधिक । जिस का परिणाम यह होता है कि मनुष्यों की संख्या कम है और दूसरे जीव जंतु मनुष्य से लाखों गुना अधिक हैं। परंतु ईश्वर की इस कर्म फल व्यवस्था को लोग प्रायः ठीक से नहीं समझते । और यह नहीं सोचते कि *यदि हम दूसरों पर अन्याय करेंगे, तो ईश्वर हमें दंड देगा। समाज राजा भी दंड दे सकता है । यदि वह दंड नहीं दे पाया , तो ईश्वर तो अवश्य ही दंड देगा।* इस बात को लोग नहीं समझते। इसलिए दूसरों पर अन्याय करते रहते हैं ।
अब दूसरी बात - जिस व्यक्ति पर अन्याय होता है , वह यदि बलवान हो , तो अन्यायकारी को पीट देता है , और अपना बदला ले लेता है । यदि अन्याय से ग्रसित व्यक्ति कमजोर हो , तो वह पीट नहीं पाता, बदला नहीं ले पाता , और अंदर ही अंदर जीवन भर दुखी होता रहता है । धीरे-धीरे वह डिप्रेशन में चला जाता है , और बहुत सी हानियाँ उठाता है ।
परंतु कोई कोई बलवान व्यक्ति ऐसा भी होता है , जो अन्यायकारी से बदला ले सकता है, उसकी पिटाई भी कर सकता है अथवा अन्य अन्य प्रकार से उसे हानि पहुंचा सकता है। फिर भी वह ऐसा नहीं करता , और उसे माफ कर देता है । उसे ईश्वर के न्याय पर छोड़ देता है , तथा अपने जीवन को शांत प्रसन्न आनंदित बनाकर जीता है। ऐसा ही व्यक्ति असली बलवान है. - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

संसार में 24 घंटे चारों तरफ लड़ाई-झगड़ा चलता ही रहता है । इस संसार में पुण्य कर्म कम होते हैं , और पाप अन्याय अधिक । जिस का परिणाम यह होता है कि मनुष्यों की संख्या कम है और दूसरे जीव जंतु मनुष्य से लाखों गुना अधिक हैं। परंतु ईश्वर की इस कर्म फल व्यवस्था को लोग प्रायः ठीक से नहीं समझते । और यह नहीं सोचते कि *यदि हम दूसरों पर अन्याय करेंगे, तो ईश्वर हमें दंड देगा। समाज राजा भी दंड दे सकता है । यदि वह दंड नहीं दे पाया , तो ईश्वर तो अवश्य ही दंड देगा।* इस बात को लोग नहीं समझते। इसलिए दूसरों पर अन्याय करते रहते हैं ।
अब दूसरी बात - जिस व्यक्ति पर अन्याय होता है , वह यदि बलवान हो , तो अन्यायकारी को पीट देता है , और अपना बदला ले लेता है । यदि अन्याय से ग्रसित व्यक्ति कमजोर हो , तो वह पीट नहीं पाता, बदला नहीं ले पाता , और अंदर ही अंदर जीवन भर दुखी होता रहता है । धीरे-धीरे वह डिप्रेशन में चला जाता है , और बहुत सी हानियाँ उठाता है ।
परंतु कोई कोई बलवान व्यक्ति ऐसा भी होता है , जो अन्यायकारी से बदला ले सकता है, उसकी पिटाई भी कर सकता है अथवा अन्य अन्य प्रकार से उसे हानि पहुंचा सकता है। फिर भी वह ऐसा नहीं करता , और उसे माफ कर देता है । उसे ईश्वर के न्याय पर छोड़ देता है , तथा अपने जीवन को शांत प्रसन्न आनंदित बनाकर जीता है। ऐसा ही व्यक्ति असली बलवान है. - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

22/05/2021

यदि किसी व्यक्ति को आप कोई बात समझाते हैं, बार-बार समझाते हैं कि "आप ऐसी गलती न किया करें, क्योंकि आपकी ऐसी गलती से दूसरों को परेशानी होती है।" बार-बार समझाने पर भी यदि वह व्यक्ति समझता नहीं है, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता, उसे छोड़ता नहीं है, तो इसके दो कारण हो सकते हैं।
पहला कारण - "उसकी बुद्धि का स्तर कम हो सकता है, इस कारण से वह समझ नहीं पा रहा।" दूसरा कारण - "बुद्धि का स्तर तो कम नहीं है, परंतु वह सत्य को समझना नहीं चाहता अर्थात उसमें ईमानदारी की कमी है। वह अभिमानी है। अभिमान के कारण वह सत्य को समझते हुए भी स्वीकार नहीं करना चाहता।"
*यदि कोई व्यक्ति अच्छा बुद्धिमान हो और ईमानदार भी हो, अभिमानी न हो, तो उसे सत्य समझाया जा सकता है। और वह सत्य को समझ भी सकता है।*
अब संसार में अनेक बार ऐसा देखा जाता है कि , *एक व्यक्ति बुद्धिमान तो है, उसके जीवन में अन्य कार्यों को देखने से यह सिद्ध होता है कि इसमें बुद्धि की कोई कमी नहीं है, और इसे इसकी गलती बार-बार बताई जाती है, तब भी यह अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता, उस गलती का प्रायश्चित नहीं करता, उसे दूर नहीं करता। तो ऐसी स्थिति में आपको यह समझ लेना चाहिए, कि यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। यह अभिमानी है। और अभिमान के दोष के कारण सत्य को समझते हुए भी स्वीकार नहीं कर रहा।*
ऐसी स्थिति में जो उचित लगे, वैसा अगला कदम उठाना चाहिए।
अर्थात *यदि आप ब्राह्मण स्तर के व्यक्ति हैं, तो उससे झगड़ा नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे राजा या ईश्वर के न्याय पर छोड़ देना चाहिए। उस से संबंध तोड़ देना चाहिए। अपने जीवन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। और यदि आप क्षत्रिय स्वभाव के व्यक्ति हैं, तो उसे राजा से विधिवत दंड दिलवाकर उसका सुधार करना चाहिए* - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

यदि किसी व्यक्ति को आप कोई बात समझाते हैं, बार-बार समझाते हैं कि "आप ऐसी गलती न किया करें, क्योंकि आपकी ऐसी गलती से दूसरों को परेशानी होती है।" बार-बार समझाने पर भी यदि वह व्यक्ति समझता नहीं है, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता, उसे छोड़ता नहीं है, तो इसके दो कारण हो सकते हैं।
पहला कारण - "उसकी बुद्धि का स्तर कम हो सकता है, इस कारण से वह समझ नहीं पा रहा।" दूसरा कारण - "बुद्धि का स्तर तो कम नहीं है, परंतु वह सत्य को समझना नहीं चाहता अर्थात उसमें ईमानदारी की कमी है। वह अभिमानी है। अभिमान के कारण वह सत्य को समझते हुए भी स्वीकार नहीं करना चाहता।"
*यदि कोई व्यक्ति अच्छा बुद्धिमान हो और ईमानदार भी हो, अभिमानी न हो, तो उसे सत्य समझाया जा सकता है। और वह सत्य को समझ भी सकता है।*
अब संसार में अनेक बार ऐसा देखा जाता है कि , *एक व्यक्ति बुद्धिमान तो है, उसके जीवन में अन्य कार्यों को देखने से यह सिद्ध होता है कि इसमें बुद्धि की कोई कमी नहीं है, और इसे इसकी गलती बार-बार बताई जाती है, तब भी यह अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता, उस गलती का प्रायश्चित नहीं करता, उसे दूर नहीं करता। तो ऐसी स्थिति में आपको यह समझ लेना चाहिए, कि यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। यह अभिमानी है। और अभिमान के दोष के कारण सत्य को समझते हुए भी स्वीकार नहीं कर रहा।*
ऐसी स्थिति में जो उचित लगे, वैसा अगला कदम उठाना चाहिए।
अर्थात *यदि आप ब्राह्मण स्तर के व्यक्ति हैं, तो उससे झगड़ा नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे राजा या ईश्वर के न्याय पर छोड़ देना चाहिए। उस से संबंध तोड़ देना चाहिए। अपने जीवन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। और यदि आप क्षत्रिय स्वभाव के व्यक्ति हैं, तो उसे राजा से विधिवत दंड दिलवाकर उसका सुधार करना चाहिए* - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

[05/22/21]   किसी के अच्छे या बुरे कर्म का फल तत्काल प्राप्त नही होता देखकर यह मत विचारो कि इन कर्मों का फल आगे नही मिलेगा।
कर्म फल से कोई नही बच सकता , क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक , सर्वज्ञ तथा न्यायकारी है।

20/05/2021

संसार में बहुत से लोग प्रायः झगड़ा करते ही रहते हैं । उनकी आदत ही झगड़ने की होती है। न वे शांति से जीना जानते हैं , न दूसरों को जीने देते हैं । दूसरों के कामों में हमेशा दोषी ही निकालते रहते हैं , उन्हें अपमानित करने का प्रयास करते हैं , उन्हें बुद्धिहीन सिद्ध करने की कोशिश करते हैं । ऐसे लोग छोटी छोटी बात में प्रमाण मांगते हैं । *आप यह काम करते हैं , इसका क्या प्रमाण है?* चाहे वह काम प्रसिद्ध भी हो, सभी जानते हों, कि यह काम अच्छा है । फिर भी अपने अड़ियल स्वभाव के कारण , अपने दुरभिमान के कारण , वे दूसरों को सदा परेशान करते ही रहते हैं ।
ऐसे लोग अपने अंदर झांक कर नहीं देख पाते कि वे स्वयं क्या करते हैं ? *वे जो कुछ करते हैं, उसमें भी कोई प्रमाण है या नहीं , उसमें भी कोई शास्त्रों की सहमति है या नहीं , कोई ईश्वर का समर्थन है या नहीं ?* इस बात पर भी विचार नहीं करते । जिसका परिणाम यह होता है कि वे सही मार्ग से भटक जाते हैं। लड़ाई झगड़ा और दूसरों को अपमानित करना ही उनका उद्देश्य बन जाता है । ऐसे लोग स्वयं सदा दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख देते रहते हैं । *यह जीवन शैली अच्छी नहीं है । इससे बचकर रहें । दूसरों के दोषों की ओर ज्यादा ध्यान न दें । अपने बारे में अधिक सोचें, कि *मुझ में क्या क्या दोष हैं? मैं उनको कैसे दूर करूं , जिससे कि मेरा दुख कम हो जाए । कौन से अच्छे गुणों को धारण करूं, जिससे कि मेरा सुख बढ़े।* इस बात पर अधिक जोर लगाना चाहिए।
हां , यदि किसी का कोई बड़ा दोष अचानक सामने दिख जाए , तो उससे अपनी रक्षा अवश्य करें । परंतु दूसरों के दोष देखने का विशेष प्रयास न करें । यही जीवन शैली उत्तम है । इसी से आपका सुख बढ़ेगा - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

संसार में बहुत से लोग प्रायः झगड़ा करते ही रहते हैं । उनकी आदत ही झगड़ने की होती है। न वे शांति से जीना जानते हैं , न दूसरों को जीने देते हैं । दूसरों के कामों में हमेशा दोषी ही निकालते रहते हैं , उन्हें अपमानित करने का प्रयास करते हैं , उन्हें बुद्धिहीन सिद्ध करने की कोशिश करते हैं । ऐसे लोग छोटी छोटी बात में प्रमाण मांगते हैं । *आप यह काम करते हैं , इसका क्या प्रमाण है?* चाहे वह काम प्रसिद्ध भी हो, सभी जानते हों, कि यह काम अच्छा है । फिर भी अपने अड़ियल स्वभाव के कारण , अपने दुरभिमान के कारण , वे दूसरों को सदा परेशान करते ही रहते हैं ।
ऐसे लोग अपने अंदर झांक कर नहीं देख पाते कि वे स्वयं क्या करते हैं ? *वे जो कुछ करते हैं, उसमें भी कोई प्रमाण है या नहीं , उसमें भी कोई शास्त्रों की सहमति है या नहीं , कोई ईश्वर का समर्थन है या नहीं ?* इस बात पर भी विचार नहीं करते । जिसका परिणाम यह होता है कि वे सही मार्ग से भटक जाते हैं। लड़ाई झगड़ा और दूसरों को अपमानित करना ही उनका उद्देश्य बन जाता है । ऐसे लोग स्वयं सदा दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख देते रहते हैं । *यह जीवन शैली अच्छी नहीं है । इससे बचकर रहें । दूसरों के दोषों की ओर ज्यादा ध्यान न दें । अपने बारे में अधिक सोचें, कि *मुझ में क्या क्या दोष हैं? मैं उनको कैसे दूर करूं , जिससे कि मेरा दुख कम हो जाए । कौन से अच्छे गुणों को धारण करूं, जिससे कि मेरा सुख बढ़े।* इस बात पर अधिक जोर लगाना चाहिए।
हां , यदि किसी का कोई बड़ा दोष अचानक सामने दिख जाए , तो उससे अपनी रक्षा अवश्य करें । परंतु दूसरों के दोष देखने का विशेष प्रयास न करें । यही जीवन शैली उत्तम है । इसी से आपका सुख बढ़ेगा - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

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यजुर्वेद ४०वाँ अध्याय (स्वामी दयानन्द सरस्वती)

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