Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya

Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya A pvt. School Estd:-1990. Aimed to make education available for labour class society of National Jute Mill.

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जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि किसी व्यक्ति के कार्य की गुणवत्ता अच्छी होती है, परंतु उसे परखने वाले लोग समय पर नही...
22/08/2026

जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि किसी व्यक्ति के कार्य की गुणवत्ता अच्छी होती है, परंतु उसे परखने वाले लोग समय पर नहीं मिलते।इस कारण से वह व्यक्ति कुछ निराश सा हो जाता है। "उस समय निराश नहीं होना चाहिए। अपना उत्साह और सफलता की आशा बनाए रखनी चाहिए।"
यदि आपके कार्य की गुणवत्ता भी अच्छी है और आपको पहचानने वाले लोग नहीं मिल रहे, तो चिंता न करें, थोड़ा धैर्य रखें। "प्रयास लगातार करते रहें। कुछ समय के बाद कोई न कोई पारखी व्यक्ति मिलेगा, जो आपके कार्य की गुणवत्ता को पहचानेगा, और तब आपका कार्य बन जाएगा।"
"इसके लिए ईश्वर पर विश्वास रखें। ईमानदारी तथा बुद्धिमत्ता से पूरा पुरुषार्थ करें। और स्वयं पर भी विश्वास रखें, कि आप अपने कार्य में अवश्य ही सफल होंगे।"
"यदि आप इतना कर लेंगे, तो निश्चित रूप से कुछ ही समय बाद आपकी कला को कोई न कोई अवश्य ही पहचानेगा और आप अपने उद्देश्य में सफल हो जाएंगे।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

"ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, न्यायकारी है, आनंदस्वरूप है।" वास्तव में वेदों के अनुसार ईश्वर...
21/08/2026

"ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, न्यायकारी है, आनंदस्वरूप है।" वास्तव में वेदों के अनुसार ईश्वर ऐसा है।
"परंतु लोग क्या मानते हैं? ईश्वर अनेक हैं। ईश्वर हमारे घर में रहता है, हमारे मंदिर में रहता है। समय-समय पर वह अवतार लेता है। और अब अवतारों की फोटो मूर्तियां बनाकर लोग उनकी पूजा कर रहे हैं। जो ईश्वर सारी सृष्टि को बनाता है, उसी को लोग मूर्ति के रूप में बना रहे हैं। जो ईश्वर न्याय करता है, उसी से लोग जाकर माफी मांग रहे हैं। नदियों में स्नान करने से पाप धुल जाता है, ऐसा मानकर ईश्वर को अन्यायकारी कह रहे हैं। स्वीकार कर रहे हैं, और उसका इस रूप में प्रचार कर रहे हैं।"
"जबकि ईश्वर आनंदस्वरूप है। फिर भी लोग ईश्वर का आनंद बिल्कुल नहीं लेना चाहते। संसार के जड़ पदार्थों खीर पूरी हलवा मिठाई सोना चांदी मोटर गाड़ी आदि का ही आनंद ले रहे हैं।"
यह सब क्या है? यह सब असत्य है। क्योंकि "वेदों के अनुसार ऊपर लिखी बातें सत्य हैं। जैसे ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, न्यायकारी है, आनंदस्वरूप है।"
"जब वास्तव में ईश्वर ऐसा है, तो उसी के अनुसार अपना जानना मानना बोलना लिखना और व्यवहार क्यों नहीं करते?"
"ऐसे असत्य से बचें, और वेदों के अनुसार जैसा वास्तव में ईश्वर है, वैसा स्वीकार करें। वैसा ही लिखें बोलें, मानें, और व्यवहार भी करें। तभी आपका कल्याण होगा, अन्यथा नहीं।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"

"माता-पिता घर में प्रशासन चलाते हैं।अध्यापक प्रिंसिपल आदि स्कूल कॉलेज में। कंपनियों में भी अधिकारी लोग होते हैं जो वहां ...
19/08/2026

"माता-पिता घर में प्रशासन चलाते हैं।अध्यापक प्रिंसिपल आदि स्कूल कॉलेज में। कंपनियों में भी अधिकारी लोग होते हैं जो वहां का प्रशासन चलाते हैं। गांव में पंचायत और नगर में न्यायालय। ये सब अपने-अपने क्षेत्रमें प्रशासन चलाते हैं।"
यदि उनके अपने-अपने क्षेत्र में कोई लोग दोष करते हैं त्रुटियां करते हैं, तो इन अधिकारियों का कर्तव्य है, कि "वे उनको पहले प्रेम से समझाएं, कि आप इस प्रकार की गलतियां ना करें।" यदि वे लोग मान लेते हैं, तो ठीक है। और समझाने पर भी यदि वे नहीं मानते, तो उन्हें दंड की चेतावनी देनी चाहिए। "और यदि वे लोग चेतावनी से भी न सुधरें, तो उन्हें दंड अवश्य ही देना चाहिए।" क्योंकि यह नियम है कि "दंड के बिना कोई सुधरता नहीं है." "इस प्रकार से दंड देकर उनका सुधार करना अहिंसा है। क्योंकि न्याय करना ही अहिंसा है। और अपराधी को दंड देना न्याय है। इसलिए इसको अहिंसा के रूप में स्वीकार करना चाहिए। तभी आप आपका परिवार समाज देश और दुनियां सुख शांति से जी पाएगी, अन्यथा नहीं।"
"अहिंसा ही सुख शांति का उपाय है, जिसमें अपराधी को दंड देना भी सम्मिलित है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

"वेदों के अनुसार समाज में चार वर्गों के लोग होते हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। शूद्र का अर्थ अछूत नहीं है। इसका...
18/08/2026

"वेदों के अनुसार समाज में चार वर्गों के लोग होते हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। शूद्र का अर्थ अछूत नहीं है। इसका अर्थ है जो श्रमिक वर्ग है = labour class उसको शूद्र कहते हैं। इन सबकी योग्यता अलग-अलग प्रकार की होती है, इसलिए समाज को चार वर्गों में वेद ने बांटा है। वेदों के अनुसार यह चारों वर्ग जन्म से नहीं, बल्कि गुण कर्म योग्यता से माने जाते हैं।"
"इनमें से ब्राह्मण वैश्य और शूद्र इन तीन के लिए अहिंसा की परिभाषा इस प्रकार से है। मन में किसी भी प्राणी से द्वेष न करना, वाणी से बिना कारण किसी को दुख नहीं देना, बल्कि सभ्यता से अच्छी मीठी भाषा बोलना। शरीर से दूसरों पर अत्याचार नहीं करना धक्का मुक्की मारा मारी नहीं करना, न्याय पूर्वक सबके साथ अच्छा व्यवहार करना, हो सके तो दूसरों को सुख देना, यह अहिंसा की परिभाषा है। यह तीन वर्गों पर लागू होती है।"
"क्षत्रियों पर लागू होने वाली अहिंसा की परिभाषा इससे कुछ अलग है। उसको जानने के लिए कल तक प्रतीक्षा करें।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

18/08/2026
छोटा बड़ा जवान बूढ़ा स्त्री पुरुष सभी पर अहिंसा की एक ही परिभाषा लागू होती है, कि "सबके साथ न्याय पूर्वक व्यवहार किया जा...
17/08/2026

छोटा बड़ा जवान बूढ़ा स्त्री पुरुष सभी पर अहिंसा की एक ही परिभाषा लागू होती है, कि "सबके साथ न्याय पूर्वक व्यवहार किया जाए। किसी के साथ भी अन्याय न किया जाए, इसका नाम अहिंसा है।"
मन से, वाणी से और शरीर से, इन तीन साधनों से कर्म किए जाते हैं। "यदि कोई व्यक्ति इन तीनों साधनों से न्याय पूर्वक व्यवहार करे, तो वह अहिंसक है।"
"और यदि तीनों में से किसी भी प्रकार से वह दूसरों पर अन्याय करता है, तो वह हिंसक कहलाएगा।"
जैसे मन में दूसरों के प्रति बुरा सोचना, कि "हे भगवान! मेरे पड़ोसी की टांग टूट जाए, तो अच्छा हो।" ऐसा सोचना अन्याय है। "यह गलत चिंतन मन से किया गया, इसलिए यह मानसिक हिंसा है।" इसका ईश्वर से दंड मिलेगा।
"वाणी से दूसरों के साथ कठोर भाषा बोलना, छल कपट करना, उन्हें अपमानित करना, यह वाचनिक हिंसा है। क्योंकि यह अन्याय है।"
"तथा शरीर से दूसरों के साथ बिना कारण धक्का मुक्की करना, छेड़छाड़ करना, मारपीट करना आदि यह शारीरिक हिंसा है। क्योंकि यह अन्याय है।"
"किसी को भी इस प्रकार के हिंसात्मक कार्य नहीं करने चाहिएं। क्योंकि ऐसा करना अन्याय है। और अन्याय करने का नाम ही हिंसा है।"
अहिंसा तो यह है कि सबके साथ न्याय पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। सबके लिए अच्छा ही सोचना चाहिए, जैसे कि "हे ईश्वर! सब लोग अच्छे काम करें और सदा सुखी रहें।" ऐसा सोचना चाहिए। "सबके साथ सभ्यता और सम्मान से बातचीत करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपराध करे, तो उसे न्याय पूर्वक दंड भी देना चाहिए। यह सब अहिंसा कहलाती है। क्योंकि यह न्याय है।"
"हिंसा को कोई भी नहीं चाहता। और अन्याय को भी कोई नहीं चाहता। इससे पता चलता है कि अन्याय करना हिंसा है।"
"और न्याय को सब चाहते हैं, अहिंसा को भी सब चाहते हैं। इससे पता चलता है कि न्याय का व्यवहार करना ही अहिंसा है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

वैदिक शास्त्रों में लिखा है, कि "संसार में पूरा सुखी कोई भी व्यक्ति नहीं है।" "अब यदि कोई व्यक्ति सांसारिक पदार्थों = भो...
15/08/2026

वैदिक शास्त्रों में लिखा है, कि "संसार में पूरा सुखी कोई भी व्यक्ति नहीं है।" "अब यदि कोई व्यक्ति सांसारिक पदार्थों = भोजन वस्त्र मकान कार आदि आदि साधनों से सुख लेता है, तो उसको उन वस्तुओं में राग आसक्ति या अटैचमेंट हो जाती है। और जब किन्हीं वस्तुओं या व्यक्तियों से वह दुखी होता है, तो उनके प्रति उस व्यक्ति के मन में द्वेष उत्पन्न होता है। यह राग और द्वेष दोनों ही दुखदायक हैं।"
"सुख देने वाली वस्तु जब नहीं मिलती, तब दुख होता है। तो यह समझना चाहिए कि यहां राग दुख दे रहा है।" "दुख देने वाली वस्तु जब सामने आ जाती है, तब दुख होता है। तो यह समझना चाहिए कि यहां द्वेष दुख दे रहा है।" इसलिए राग और द्वेष दोनों से बचना चाहिए। अर्थात "जब सुख देने वाली वस्तु सामने आए, तो उसका सुख नहीं लेना है। और जब दुख देने वाली वस्तु सामने आए, तो उससे दुखी नहीं होना है । उससे अपना बचाव अवश्य करना है।"
"यदि आप इस तरह से जीवन जिएंगे, तो आप राग द्वेष से बचकर जीवन जी सकते हैं। और तब आपके जीवन में शांति प्रसन्नता आनन्द आदि आदि होंगे, अन्यथा नहीं।"
"भोजन वस्त्र मकान आदि भौतिक वस्तुओं का उपयोग सुख भोगने के लिए न करें। केवल जीवन रक्षा के लिए करें। तो आपके जीवन में राग द्वेष वाली समस्याएं नहीं आएंगी और आप आनन्द से जिएंगे।" "तब आपका चिंतन यह रहेगा कि यदि वस्तु मिल गई, तो ठीक है। और यदि नहीं मिली, तो कोई बात नहीं। फिर कभी प्राप्त कर लेंगे।"
आज स्वतंत्रता दिवस है। स्वतंत्रता का यह अर्थ भी है, कि "आप अपने मन इंद्रियों के गुलाम न हों, बल्कि उनके राजा हों। आप अपनी इच्छा से अपने मन इंद्रियों का प्रयोग कर सकें। तो इस प्रकार के चिंतन और व्यवहार से आप स्वतंत्रता पूर्वक जी सकेंगे। आज स्वतंत्रता दिवस इस रूप में भी मनाएं कि "हम अपने मन इंद्रियों के गुलाम नहीं बनेंगे, बल्कि इनसे स्वतंत्र होकर इनके राजा बनेंगे।" "स्वतंत्रता दिवस की आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

"कुछ विचार व्यक्ति के मन में निराशा उत्पन्न करते हैं। वे अच्छे नहीं होते।" "और कुछ विचार अच्छे होते हैं, जो मन में आशा उ...
14/08/2026

"कुछ विचार व्यक्ति के मन में निराशा उत्पन्न करते हैं। वे अच्छे नहीं होते।" "और कुछ विचार अच्छे होते हैं, जो मन में आशा उत्पन्न करते हैं।"
"यदि आपके मन में कभी निराशाजनक विचार आवें, तो उन्हें तुरंत मन से निकाल दीजिए, अन्यथा वे बहुत हानिकारक होते हैं।"
"और जो आशा बढ़ाने वाले विचार होते हैं, यदि उनको आप सदा अपने मन में रखें, तो आप जीवन में सदा उत्साहित प्रसन्न और आनन्दित रहेंगे, जिससे आपका जीवन सुखमय और सफल होगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

व्यक्ति सुबह चार पांच छ बजे जब भी सो कर उठता है, तभी से उसके मन में विचार उत्पन्न होने लगते हैं, और पूरा दिन चलते रहते ह...
13/08/2026

व्यक्ति सुबह चार पांच छ बजे जब भी सो कर उठता है, तभी से उसके मन में विचार उत्पन्न होने लगते हैं, और पूरा दिन चलते रहते हैं। रात्रि को जब वह सो जाता है, तब वे विचार रुकते हैं।
इन विचारों में अधिकतर सांसारिक विचार ही होते हैं। "जैसे खाना-पीना घूमना फिरना धन कमाना और किसी से राग द्वेष करना इत्यादि।" "तो इन सांसारिक विचारों को कुछ समय के लिए रोकना चाहिए।" "सुबह शाम बैठकर ईश्वर का ध्यान करना चाहिए। आधा-आधा घंटा भी सुबह-शाम बैठकर यदि आप ईश्वर का ध्यान करें, और उस समय इन सांसारिक विचारों को रोक दें, केवल ईश्वर का ही चिंतन स्तुति प्रार्थना उपासना आदि करें, तो इसे "महर्षि पतंजलि जी का योग" कहते हैं।"
इस योग से बहुत शांति मिलती है। "क्योंकि ईश्वर सदा स्वयं शांत रहता है, और जो जो लोग एकांत में बैठकर ईश्वर का ध्यान करते हैं, उन सबको ईश्वर शांति देता है।" ऐसी शांति संसार में किसी भी दुकान या बाजार में नहीं मिलती।
"इस शांति के बिना बहुत से लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं, और उनका जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है। और कितने ही लोग तो अपने मन पर नियंत्रण न रख पाने के कारण आत्महत्या तक भी कर लेते हैं। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।"
"जब तक संसार के विचार आपके मन में चलते रहेंगे, तब तक सूक्ष्म रूप से मन में कोई न कोई राग द्वेष भी चलता रहेगा।" "इसलिए आत्महत्या जैसी दुर्घटनाओं से बचने के लिए तथा मन की शांति प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन ईश्वर का ध्यान उपासना आदि करना अत्यंत आवश्यक है। सुबह शाम कम से कम आधा-आधा घंटा ईश्वर का ध्यान अवश्य करें। यह आपकी रक्षा करेगा।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

सुखी रहने के लिए सबसे पहले यह आवश्यक है, कि आपका शरीर स्वस्थ होना चाहिए। "शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अपनी दिनचर्या को ठी...
12/08/2026

सुखी रहने के लिए सबसे पहले यह आवश्यक है, कि आपका शरीर स्वस्थ होना चाहिए। "शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अपनी दिनचर्या को ठीक रखें। इस के लिए रात को जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठना, थोड़ा व्यायाम करना आवश्यक है।"
फिर मन को भी प्रसन्न रखना चाहिए। "यदि आप सत्य को स्वीकार करते हैं, और झूठ को स्वीकार नहीं करते, तो आपका मन भी प्रसन्न रहेगा।"
यदि आपका दिन भर का कार्य वेदानुकूल है। "जैसे यज्ञ करना, ईश्वर का ध्यान करना, वैदिक ऋषियों के ग्रंथ पढ़ना, गौ आदि प्राणियों की रक्षा करना, वृक्ष लगाना, माता-पिता एवं गुरु जनों की सेवा करना, वैदिक विद्वानों का सत्संग करना इत्यादि, आपका शारीरिक आचरण भी इस प्रकार का है।"
"और कुछ अच्छे लोग भी यदि आपके जीवन में हैं, जो आपको सुख-दुख में साथ देते हैं। तो आप समझ लीजिए, कि आप संसार के बहुत बड़े संपत्तिशाली व्यक्ति हैं।"
"यदि उक्त बातें आपके जीवन में नहीं हैं, और धन बहुत अधिक है, तो भी आप सच्चे संपत्तिशाली नहीं हैं। सच्चे संपत्तिशाली बनें और सदा आनन्द में रहें।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

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