01/05/2023
मज़दूर और मज़दूरी दोनों के अर्थ समय के साथ बदले हैं, ऐसे में 132 साल से चली आ रही मई दिवस की परंपरा के आज क्या मायने हैं?
क्या आज के दौर में भी मज़दूर दिवस की ज़रूरत है?
दुनिया में सबसे ज़्यादा बंधुआ मज़दूर भारत में हैं. विश्व ग़ुलामी सूचकांक की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में भारत में 80 लाख लोग "आधुनिक गुलामी" में जी रहे थे. यानी औसतन एक हज़ार भारतीयों में से छह को अपने काम का मेहनताना नहीं मिल रहा था. हालांकि भारत सरकार ने इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं.
गुडवीव इंटरनेशनल नाम की एक संस्था के साल 2020 के सर्वे के मुताबिक महामारी की वजह से मजदूरों के कर्ज़ में फंसने का जोख़िम तीन गुना बढ़ गया है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार साल 2016 में दुनिया भर में 4 करोड़ से ज़्यादा लोग बंधुआ मज़दूरी का शिकार थे.
अनुमानों के मुताबिक इनमें से 71 फ़ीसदी महिलाएं थीं. इस साल जारी हुई विश्व असमानता रिपोर्ट की मानें तो भारत में श्रम से होने वाली कुल कमाई का सिर्फ 18 प्रतिशत हिस्सा ही महिलाओं के हाथ आता है.
आईएलओ की साल 2021 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में बाल मज़दूरों की तादाद बढ़कर 16 करोड़ हो गई है. रिपोर्ट ये भी आगाह करती है कि कोविड-19 महामारी के असर से इस संख्या में साल 2022 के अंत तक 90 लाख तक का इज़ाफ़ा हो सकता है.
साल 2011 जनगणना के हवाले से संगठन का अंदाज़ा है कि देश में 5-14 साल की उम्र के बच्चों में से 3.9 प्रतिशत मज़दूरी करते हैं.
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