पी0एम0 श्री प्राथमिक विद्यालय मुल्हैटा, बहजोई

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प्रधानमंत्री स्कूल फ़ॉर राइज़िंग इंडिया (पीएम श्री) एक केंद्र प्रायोजित योजना है. इस योजना के तहत, योजना छात्रों को 21वीं सदी के कौशल सिखाने के साथ उन्हें 'भविष्य के लिए तैयार' बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना है.

24/10/2025
20/10/2025

दीये सी तासीर रखिए,
यह मत सोचिए की घर किसका रोशन हुआ…”

*अवध पूरी रघुनंदन आये।*
*घर - घर नारी मंगल गाये।*

*रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥*
*सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥*

शत्रु को रण में जीतकर सीता जी और लक्ष्मण जी सहित प्रभु आ रहे हैं, देवता उनका सुंदर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही (भरत जी को) सारे दुःख भूल गए। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास के दुःख को भूल जाए॥

*जय राम जी की*
🕉🚩 दीपोत्सवस्य कोटिशः शुभाशया: 🚩🕉

17/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- १*क्रमांक - ३*वर्ग - १
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
*काले रेशमी चमकते बाल*
लेखक,: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
(क्रमांक २८३-१९ अक्टूबर)
*अच्छे सुंदर बाल बनाओं*
बालों को अच्छे व सुन्दर बनाओ ।
कंघे या कंघी से बाल बनाओ ।
बालों को सुलझाकर बनाओ ।
बालों को बनाते समय खींचना नहीं ।
बालों को सुलझाते समय भी खींचना नहीं ।
खींच -खींचकर बाल तोड़ना नहीं ।
कंघे से बाल बनाते समय उसे चमड़ी से छूने दो ।
सिर को कंघे की रगड़ लगने दो ।
रगड़ लगने से बालों की कसरत
होगी ।
रगड़ लगने से सिर की भी कसरत होगी ।
कंघा और कंघी को हमेशा साफ
रखो ।
इनके दाँतों को सम्भाल कर रखो ।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

17/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- १*क्रमांक - ३*वर्ग - १
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
*काले रेशमी चमकते बाल*
लेखक,: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
(क्रमांक 282-17 अक्टूबर))
*बालों का पोषण*
बालों को पोषण की जरूरत है।
बालों में तेल लगाओ ।
मलमल कर तेल लगाओ ।
सब बालों को तेल लगाओ ।
बालों की जड़ों में तेल लगाओ ।
तेल मलने से जड़ों में पहुँचता है।
आँवला व नारियल का तेल लगाओ ।
ब्राह्मी और दूधी का तेल लगाओं ।
सरसों व तिल का तेल लगाओ ।
तेल से बाल कोमल होते हैं।
तेल से बाल मजबूत होते हैं।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

15/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- १*क्रमांक - ३*वर्ग - १
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
*काले रेशमी चमकते बाल*
लेखक,: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २८०--१५ अक्टूबर )
*बालों का रक्षण*
बाल सिर को बचाते हैं।
तुम अपने बालों को बचाओ ।
बालों को अच्छी तरह धोओ ।
बालों में मल कर तेल लगाओ ।
बालों को कंघी से सुलझाओ ।
लम्बे बालों को अच्छी तरह बाँधो ।
गर्मी में और सर्दी में भी,
बालों को अच्छी तरह ढको ।
बालों को गीले रहने न दो ।
बालों को सदा सूखे रखो ।
बालों को सदा साफ रखो ।
बालों का सदा जतन करो ।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

13/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- १*क्रमांक - ३*वर्ग - १
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
*काले रेशमी चमकते बाल*
लेखक,: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २७८--१३ अक्टूबर )
*बाल*
बाल सिर की शोभा है।
किसीके बाल हैं काले - काले । किसीके बाल हैं भूरे - भूरे ।
दादाजी के बाल है सफेद ।
किसीके बाल हैं लहरदार,
किसी के बाल हैं सीधे सपाट ।
किसीके बाल हैं चिकने - चिकलने, किसी के बाल हैं खुरदरे ।
किसी के बाल हैं घने- घने
किसी के बाल हैं छेतराये ।
किसीके बाल हैं लम्बे - लम्बे, किसीके बाल हैं बिल्कुल छोटे ।
बाल सभी हैं भाँत- भाँत के,
बाल बिना हैं सभी टकले ।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

11/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- ८*क्रमांक - ५*वर्ग - ३
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
* *चित्त है संस्कारों की खान**
लेखक,: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २७६--११ अक्टूबर )
*चित्त शुद्धि कैसे होती है*
हमने पिछले अध्यायों में जाना कि संस्कारों के मिटने से चित्त शुद्ध होता है। चित्त के शुद्ध होने से ही ज्ञान होता है और तभी मोक्ष भी मिलता है।
हमारे मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि संस्कार मिटने से चित्त शुद्ध कैसे होता है ?
इसका उत्तर इस प्रकार जानना चाहो तो सरल है और दूसरी प्रकार से जानना चाहो तो कठिन है।
सरल उत्तर अर्थात्
हमारा आहार शुद्ध होने पर चित्त भी शुद्ध होता है।
हमारा मन अच्छा हो तो हमारा चित्त शुद्ध होता है।
हम निस्वार्थ भाव से काम करते हैं तो हमारा चित्त शुद्ध होता है।
हम बदले की भावना के बिना किसी का भला करते हैं तो हमारा चित्त शुद्ध होता है।
हम सेवा करते हैं तब भी हमारा चित्त शुद्ध होता है।
हम ध्यान करते हैं तब भी हमारा चित्त शुद्ध होता है।
यह सब बोलना, पढ़ना और समझना तो सरल है, परन्तु इसीके अनुसार करना कठिन है। इसीलिए यह उत्तर भी अधूरा ही गिना जाता है।
परन्तु इसके अतिरिक्त चित्त शुद्ध करने का कोई दूसरा उपाय नहीं है।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

10/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- ८*क्रमांक - ५*वर्ग - ३
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
* *चित्त है संस्कारों की खान**
लेखक.: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २७५-१०अक्टूबर २०२५)
*स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर*
स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर एक दूसरे के साथ जुड़े हुए ही रहते हैं।
परन्तु समय आने पर दोनों अलग हो जाते हैं और फिर से एक भी बन जाते हैं।
प्रथम स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर की बात समझिए ।
जब हमारा जन्म होता है तब स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर मिल जाते हैं। और जब हमारां मृत्यु होती है तब स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर अलग-अलग हो जाते हैं।
स्थूल शरीर निर्जीव बन जाता है। उसे मृतदेह कहते हैं। इसका अग्नि संस्कार किया जाता है। अग्नि संस्कार करने से शरीर के सभी महाभूत अलग-अलग होकर सृष्टि में रहने वाले पंचमहाभूतों में मिल जाते हैं।
सूक्ष्म शरीर मरता नहीं है। जब तक संस्कार रहते हैं तब तक सूक्ष्म शरीर भी रहता है।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

09/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- ८*क्रमांक - ५*वर्ग - ३
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
* *चित्त है संस्कारों की खान**
लेखक.: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २७४-९अक्टूबर २०२५)
*तीन शरीर*

चित्त पर पड़े हुए संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म में किस प्रकार जाते हैं?
इसके बारे में समझने के लिए हमें तीन प्रकार के शरीरों की बात समझनी पड़ेगी ।
हमारे तीन शरीर होते हैं।
१. स्थूल शरीर,
२. सूक्ष्म शरीर,
३. कारण शरीर
हाथ, पैर, सिर, मुँह, आँख और कान जैसे बाह्य अंग और हृदय फेफड़े, दिमाग जैसे आन्तरिक अंगों को धारण करने वाला जो शरीर है, वह हमारा स्थूल शरीर है।
*स्थूल शरीर* पंचमहाभूतों से बना हुआ है। यह हमारा जाना-पहचाना है। हम सदैव इसका पोषण व रक्षण करते हैं।
*सूक्ष्म शरीर* अर्थात् हमारा
अन्तःकरण । यह स्थूल शरीर के आश्रय में रहता है।
*कारण शरीर* अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर जिसमें से बने हैं, वह प्रकृति हैं।
*हमारे संस्कार सूक्ष्म शरीर में रहते हैं।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

08/10/2025

🕉️ *ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
पुण्यभूमि भारत संस्कृति वाचनमाला*संपुट- ८*क्रमांक - ५*वर्ग - ३
*श्रेणी - *(५से १२ वर्ष* /आबाल वृद्ध हेतु)
* *चित्त है संस्कारों की खान**
लेखक.: इंदुमति काटदरे
अनुवाद: वासुदेव प्रजापति
( क्रमांक २७३-८अक्टूबर २०२५)
*अन्तःकरण चतुष्टय*
हमने पढ़ा है कि अन्तःकरण चार हैं। इन चारों के समूह को अन्तःकरण चतुष्टय कहते हैं ।
मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चारों ही एक दूसरे के साथ घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं।इसलिए उन्हें एक साथ बोलने के लिए अन्तःकरण चतुष्टय कहते हैं।
कुछ विद्वान इन चारों को ही चित्त कहते हैं। कुछ विद्वान इन चारों को मन ही कहते हैं। कभी-कभी चित्त और बुद्धि का एक ही नाम महत् होता है। कभी अहंकार चित्त में समा जाता है।परन्तु तुम इन्हें चाहे एक कहो या तीन कहो या चार, काम तो इनके अपने अनुसार ही हैं।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*

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