HINDI Teaching

HINDI Teaching Hindi is the national language of India, a nation of over 1 billion people. It is a direct descendent of Sanskrit.

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18/09/2016

वाक्यांश या शब्द–समूह -- शब्द

• हाथी हाँकने का छोटा भाला— अंकुश
• जो कहा न जा सके— अकथनीय
• जिसे क्षमा न किया जा सके— अक्षम्य
• जिस स्थान पर कोई न जा सके— अगम्य
• जो कभी बूढ़ा न हो— अजर
• जिसका कोई शत्रु न हो— अजातशत्रु
• जो जीता न जा सके— अजेय
• जो दिखाई न पड़े— अदृश्य
• जिसके समान कोई न हो— अद्वितीय
• हृदय की बातेँ जानने वाला— अन्तर्यामी
• पृथ्वी, ग्रहोँ और तारोँ आदि का स्थान— अन्तरिक्ष
• दोपहर बाद का समय— अपराह्न
• जो सामान्य नियम के विरुद्ध हो— अपवाद
• जिस पर मुकदमा चल रहा हो/अपराध करने का आरोप हो/अभियोग लगाया गया हो— अभियुक्त
• जो पहले कभी नहीँ हुआ— अभूतपूर्व
• फेँक कर चलाया जाने वाला हथियार— अस्त्र
• जिसकी गिनती न हो सके— अगणित/अगणनीय
• जो पहले पढ़ा हुआ न हो— अपठित
• जिसके आने की तिथि निश्चित न हो— अतिथि
• कमर के नीचे पहने जाने वाला वस्त्र— अधोवस्त्र
• जिसके बारे मेँ कोई निश्चय न हो— अनिश्चित
• जिसका भाषा द्वारा वर्णन असंभव हो— अनिर्वचनीय
• अत्यधिक बढ़ा–चढ़ा कर कही गई बात— अतिशयोक्ति
• सबसे आगे रहने वाला— अग्रणी
• जो पहले जन्मा हो— अग्रज
• जो बाद मेँ जन्मा हो— अनुज
• जो इंद्रियोँ द्वारा न जाना जा सके— अगोचर
• जिसका पता न हो— अज्ञात
• आगे आने वाला— आगामी
• अण्डे से जन्म लेने वाला— अण्डज
• जो छूने योग्य न हो— अछूत
• जो छुआ न गया हो— अछूता
• जो अपने स्थान या स्थिति से अलग न किया जा सके— अच्युत
• जो अपनी बात से टले नहीँ— अटल
• जिस पुस्तक मेँ आठ अध्याय होँ— अष्टाध्यायी
• आवश्यकता से अधिक बरसात— अतिवृष्टि
• बरसात बिल्कुल न होना— अनावृष्टि
• बहुत कम बरसात होना— अल्पवृष्टि
• इंद्रियोँ की पहुँच से बाहर— अतीन्द्रिय/इंद्रयातीत
• सीमा का अनुचित उल्लंघन— अतिक्रमण
• जो बीत गया हो— अतीत
• जिसकी गहराई का पता न लग सके— अथाह
• आगे का विचार न कर सकने वाला— अदूरदर्शी
• जो आज तक से सम्बन्ध रखता है— अद्यतन
• आदेश जो निश्चित अवधि तक लागू हो— अध्यादेश
• जिस पर किसी ने अधिकार कर लिया हो— अधिकृत
• वह सूचना जो सरकार की ओर से जारी हो— अधिसूचना
• विधायिका द्वारा स्वीकृत नियम— अधिनियम
• अविवाहित महिला— अनूढ़ा
• वह स्त्री जिसके पति ने दूसरी शादी कर ली हो— अध्यूढ़ा
• दूसरे की विवाहित स्त्री— अन्योढ़ा
• गुरु के पास रहकर पढ़ने वाला— अन्तेवासी
• पहाड़ के ऊपर की समतल जमीन— अधित्यका
• जिसके हस्ताक्षर नीचे अंकित हैँ— अधोहस्ताक्षरकर्त्ता
• एक भाषा के विचारोँ को दूसरी भाषा मेँ व्यक्त करना— अनुवाद
• किसी सम्प्रदाय का समर्थन करने वाला— अनुयायी
• किसी प्रस्ताव का समर्थन करने की क्रिया— अनुमोदन
• जिसके माता–पिता न होँ— अनाथ
• जिसका जन्म निम्न वर्ण मेँ हुआ हो— अंत्यज
• परम्परा से चली आई कथा— अनुश्रुति
• जिसका कोई दूसरा उपाय न हो— अनन्योपाय
• वह भाई जो अन्य माता से उत्पन्न हुआ हो— अन्योदर
• पलक को बिना झपकाए— अनिमेष/निर्निमेष
• जो बुलाया न गया हो— अनाहूत
• जो ढका हुआ न हो— अनावृत
• जो दोहराया न गया हो— अनावर्त
• पहले लिखे गए पत्र का स्मरण— अनुस्मारक
• पीछे–पीछे चलने वाला/अनुसरण करने वाला— अनुगामी
• महल का वह भाग जहाँ रानियाँ निवास करती हैँ— अंतःपुर/रनिवास
• जिसे किसी बात का पता न हो— अनभिज्ञ/अज्ञ
• जिसका आदर न किया गया हो— अनादृत
• जिसका मन कहीँ अन्यत्र लगा हो— अन्यमनस्क
• जो धन को व्यर्थ ही खर्च करता हो— अपव्ययी
• आवश्यकता से अधिक धन का संचय न करना— अपरिग्रह
• जो किसी पर अभियोग लगाए— अभियोगी
• जो भोजन रोगी के लिए निषिद्ध है— अपथ्य
• जिस वस्त्र को पहना न गया हो— अप्रहत
• न जोता गया खेत— अप्रहत
• जो बिन माँगे मिल जाए— अयाचित
• जो कम बोलता हो— अल्पभाषी/मितभाषी
• आदेश की अवहेलना— अवज्ञा
• जो बिना वेतन के कार्य करता हो— अवैतनिक
• जो व्यक्ति विदेश मेँ रहता हो— अप्रवासी
• जो सहनशील न हो— असहिष्णु
• जिसका कभी अन्त न हो— अनन्त
• जिसका दमन न किया जा सके— अदम्य
• जिसका स्पर्श करना वर्जित हो— अस्पृश्य
• जिसका विश्वास न किया जा सके— अविश्वस्त
• जो कभी नष्ट न होने वाला हो— अनश्वर
• जो रचना अन्य भाषा की अनुवाद हो— अनूदित
• जिसके पास कुछ न हो अर्थात् दरिद्र— अकिँचन
• जो कभी मरता न हो— अमर
• जो सुना हुआ न हो— अश्रव्य
• जिसको भेदा न जा सके— अभेद्य
• जो साधा न जा सके— असाध्य
• जो चीज इस संसार मेँ न हो— अलौकिक
• जो बाह्य संसार के ज्ञान से अनभिज्ञ हो— अलोकज्ञ
• जिसे लाँघा न जा सके— अलंघनीय
• जिसकी तुलना न हो सके— अतुलनीय
• जिसके आदि (प्रारम्भ) का पता न हो— अनादि
• जिसकी सबसे पहले गणना की जाये— अग्रगण
• सभी जातियोँ से सम्बन्ध रखने वाला— अन्तर्जातीय
• जिसकी कोई उपमा न हो— अनुपम
• जिसका वर्णन न हो सके— अवर्णनीय
• जिसका खंडन न किया जा सके— अखंडनीय
• जिसे जाना न जा सके— अज्ञेय
• जो बहुत गहरा हो— अगाध
• जिसका चिँतन न किया जा सके— अचिँत्य
• जिसको काटा न जा सके— अकाट्य
• जिसको त्यागा न जा सके— अत्याज्य
• वास्तविक मूल्य से अधिक लिया जाने वाला मूल्य— अधिमूल्य
• अन्य से संबंध न रखने वाला/किसी एक मेँ ही आस्था रखने वाला— अनन्य
• जो बिना अन्तर के घटित हो— अनन्तर
• जिसका कोई घर (निकेत) न हो— अनिकेत
• कनिष्ठा (सबसे छोटी) और मध्यमा के बीच की उँगली— अनामिका
• मूलकथा मेँ आने वाला प्रसंग, लघु कथा— अंतःकथा
• जिसका निवारण न किया जा सके/जिसे करना आवश्यक हो— अनिवार्य
• जिसका विरोध न हुआ हो या न हो सके— अनिरुद्ध/अविरोधी
• जिसका किसी मेँ लगाव या प्रेम हो— अनुरक्त
• जो अनुग्रह (कृपा) से युक्त हो— अनुगृहीत
• जिस पर आक्रमण न किया गया हो— अनाक्रांत
• जिसका उत्तर न दिया गया हो— अनुत्तरित
• अनुकरण करने योग्य— अनुकरणीय
• जो कभी न आया हो (भविष्य)— अनागत
• जो श्रेष्ठ गुणोँ से युक्त न हो— अनार्य
• जिसकी अपेक्षा हो— अपेक्षित
• जो मापा न जा सके— अपरिमेय
• नीचे की ओर लाना या खीँचना— अपकर्ष
• जो सामने न हो— अप्रत्यक्ष/परोक्ष
• जिसकी आशा न की गई हो— अप्रत्याशित
• जो प्रमाण से सिद्ध न हो सके— अप्रमेय
• किसी काम के बार–बार करने के अनुभव वाला— अभ्यस्त
• किसी वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा— अभीप्सा
• जो साहित्य कला आदि मेँ रस न ले— अरसिक
• जिसको प्राप्त न किया जा सके
• जो कम जानता हो— अल्पज्ञ
• जो वध करने योग्य न हो— अवध्य
• जो विधि या कानून के विरुद्ध हो— अवैध
• जो भला–बुरा न समझता हो अथवा सोच–समझकर काम न करता हो— अविवेकी
• जिसका विभाजन न किया जा सके— अविभाज्य/अभाज्य
• जिसका विभाजन न किया गया हो— अविभक्त
• जिस पर विचार न किया गया हो— अविचारित
• जो कार्य अवश्य होने वाला हो— अवश्यंभावी
• जिसको व्यवहार मेँ न लाया गया हो— अव्यवहृत
• जो स्त्री सूर्य भी नहीँ देख पाती— असूर्यपश्या
• न हो सकने वाला कार्य आदि— अशक्य
• जो शोक करने योग्य नहीँ हो— अशोक्य
• जो कहने, सुनने, देखने मेँ लज्जापूर्ण, घिनौना हो— अश्लील
• जिस रोग का इलाज न किया जा सके— असाध्य रोग/लाइलाज
• जिससे पार न पाई जा सके— अपार
• बूढ़ा–सा दिखने वाला व्यक्ति— अधेड़
• जिसका कोई मूल्य न हो— अमूल्य
• जो मृत्यु के समीप हो— आसन्नमृत्यु
• किसी बात पर बार–बार जोर देना— आग्रह
• वह स्त्री जिसका पति परदेश से लौटा हो— आगतपतिका
• जिसकी भुजाएँ घुटनोँ तक लम्बी होँ— आजानुबाहु
• मृत्युपर्यन्त— आमरण
• जो अपने ऊपर निर्भर हो— आत्मनिर्भर/स्वावलंबी
• व्यर्थ का प्रदर्शन— आडम्बर
• पूरे जीवन तक— आजीवन
• अपनी हत्या स्वयं करना— आत्महत्या
• अपनी प्रशंसा स्वयं करने वाला— आत्मश्लाघी
• कोई ऐसी वस्तु बनाना जिसको पहले कोई न जानता हो— आविष्कार
• ईश्वर मेँ विश्वास रखने वाला— आस्तिक
• शीघ्र प्रसन्न होने वाला— आशुतोष
• विदेश से देश मेँ माल मँगाना— आयात
• सिर से पाँव तक— आपादमस्तक
• प्रारम्भ से लेकर अंत तक— आद्योपान्त
• अपनी हत्या स्वयं करने वाला— आत्मघाती
• जो अतिथि का सत्कार करता है— आतिथेय/मेजबान
• दूसरे के हित मेँ अपना जीवन त्याग देना— आत्मोत्सर्ग
• जो बहुत क्रूर व्यवहार करता हो— आततायी
• जिसका सम्बन्ध आत्मा से हो— आध्यात्मिक
• जिस पर हमला किया गया हो— आक्रांत
• जिसने हमला किया हो— आक्रांता
• जिसे सूँघा न जा सके— आघ्रेय
• जिसकी कोई आशा न की गई हो— आशातीत
• जो कभी निराश होना न जाने— आशावादी
• किसी नई चीज की खोज करने वाला— आविष्कारक
• जो गुण–दोष का विवेचन करता हो— आलोचक
• जो जन्म लेते ही गिर या मर गया हो— आजन्मपात
• वह कवि जो तत्काल कविता कर सके— आशुकवि
• पवित्र आचरण वाला— आचारपूत
• लेखक द्वारा स्वयं की लिखी गई जीवनी— आत्मकथा
• वह चीज जिसकी चाह हो— इच्छित
• किन्हीँ घटनाओँ का कालक्रम से किया गया वर्णन— इतिवृत्त
• इस लोक से संबंधित— इहलौकिक
• जो इन्द्र पर विजय प्राप्त कर चुका हो— इंद्रजीत
• माँ–बाप का अकेला लड़का— इकलौता
• जो इन्द्रियोँ से परे हो/जो इन्द्रियोँ के द्वारा ज्ञात न हो— इन्द्रियातीत
• दूसरे की उन्नति से जलना— ईर्ष्या
• उत्तर और पूर्व के बीच की दिशा— ईशान/ईशान्य
• पर्वत की निचली समतल भूमि— उपत्यका
• दूसरे के खाने से बची वस्तु— उच्छिष्ट
• किसी भी नियम का पालन नहीँ करने वाला— उच्छृंखल
• वह पर्वत जहाँ से सूर्य और चन्द्रमा उदित होते माने जाते हैँ— उदयाचल
• जिसके ऊपर किसी का उपकार हो— उपकृत
• ऐसी जमीन जो अच्छी उत्पादक हो— उर्वरा
• जो छाती के बल चलता हो (साँप आदि)— उरग
• जिसने अपना ऋण पूरा चुका दिया हो— उऋण
• जिसका मन जगत से उचट गया हो— उदासीन
• जिसकी दोनोँ मेँ निष्ठा हो— उभयनिष्ठ
• ऊपर की ओर जाने वाला— उर्ध्वगामी
• नदी के निकलने का स्थान— उद्गम
• किसी वस्तु के निर्माण मेँ सहायक साधन— उपकरण
• जो उपासना के योग्य हो— उपास्य
• मरने के बाद सम्पत्ति का मालिक— उत्तराधिकारी/वारिस
• सूर्योदय की लालिमा— उषा
• जिसका ऊपर कथन किया गया हो— उपर्युक्त
• कुँए के पास का वह जल कुंड जिसमेँ पशु पानी पीते हैँ— उबारा
• छोटी–बड़ी वस्तुओँ को उठा ले जाने वाला— उठाईगिरा
• जिस भूमि मेँ कुछ भी पैदा न होता हो— ऊसर
• सूर्यास्त के समय दिखने वाली लालिमा— ऊषा
• विचारोँ का ऐसा प्रवाह जिससे कोई निष्कर्ष न निकले— ऊहापोह
• कई जगह से मिलाकर इकट्ठा किया हुआ— एकीकृत
• सांसारिक वस्तुओँ को प्राप्त करने की इच्छा— एषणा
• वह स्थिति जो अंतिक निर्णायक हो, निश्चित— एकांतिक
• जो व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर हो— ऐच्छिक
• इंद्रियोँ को भ्रमित करने वाला— ऐँद्रजालिक
• लकड़ी या पत्थर का बना पात्र जिसमेँ अन्न कूटा जाता है— ओखली
• साँप–बिच्छू के जहर या भूत–प्रेत के भय को मंत्रोँ से झाड़ने वाला— ओझा
• जो उपनिषदोँ से संबंधित हो— औपनिषदिक
• जो मात्र शिष्टाचार, व्यावहारिकता के लिए हो— औपचारिक
• विवाहिता पत्नी से उत्पन्न संतान— औरस
• हड्डियोँ का ढाँचा— कंकाल
• दो व्यक्तियोँ के बीच परस्पर होने वाली बातचीत— कथोपकथन
• बर्तन बेचने वाला— कसेरा
• जिसे अपने मत या विश्वास का अधिक आग्रह हो— कट्टर
• जिसकी कल्पना न की जा सके— कल्पनातीत
• ऐसा अन्न जो खाने योग्य न हो— कदन्न
• हाथी का बच्चा— कलभ
• कर्म मेँ तत्पर रहने वाला— कर्मठ
• एक के बाद एक— क्रम
• कान मेँ कही जाने वाली बात— कानाबाती/कानाफूसी
• सरकार का वह अंग जो कानून का पालन करता है— कार्यपालिका
• शृंगारिक वासनाओँ के प्रति आकर्षित— कामुक
• जो दुःख या भय से पीड़ित हो— कातर
• अपनी गलती स्वीकार करने वाला— कायल
• दूसरे की हत्या करने वाला— कातिल
• बाल्यावस्था और युवावस्था के बीच की अवस्था— किशोरावस्था
• जो बात पूर्वकाल से लोगोँ मेँ सुनकर प्रचलित हो— किँवदन्ती/जनश्रुति
• अपने काम के बारे मेँ कुछ निश्चय न करने वाला— किँकर्तव्यविमूढ़
• वृक्ष लता आदि से ढका स्थान— कुञ्ज
• जिस लड़के का विवाह न हुआ हो— कुमार
• ऐसी लड़की जिसका विवाह न हुआ हो— कुमारी
• बुरे कार्य करने वाला— कुकर्मी
• बुरे मार्ग पर चलने वाला— कुमार्गी
• जिसकी बुद्धि बहुत तेज हो— कुशाग्रबुद्धि
• जो अच्छे कुल मेँ उत्पन्न हुआ हो— कुलीन
• वह व्यक्ति जिसका ज्ञान अपने ही स्थान तक सीमित हो— कूपमंडूक
• किए गए उपकार को मानने वाला— कृतज्ञ
• किए गए उपकार को न मानने वाला— कृतघ्न
• जो धन को अत्यधिक कंजूसी से खर्च करता हो— कृपण
• जिसने संकल्प कर रखा है— कृतसंकल्प
• जो केन्द्र से हटकर दूर जाता हो— केन्द्रापसारी
• जो केन्द्र की ओर उन्मुख हो— केन्द्राभिसारी/केन्द्राभिमुख
• सर्प के शरीर से निकली हुई खोली— केँचुली
• जो क्षमा किया जा सके— क्षम्य
• जिसका कुछ ही समय मेँ नाश हो जाए— क्षणभंगुर
• जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैँ— क्षितिज
• जो भूख मिटाने के लिए बेचैन हो— क्षुधातुर
• भूख से पीड़ित— क्षुधार्त
• वह स्त्री जिसका पति अन्य स्त्री के साथ रात को रहकर प्रातः लौटे— खंडिता
• आकाशीय पिँडोँ का विवेचन करने वाला— खगोलशास्त्री
• जो व्यक्ति अपने हाथ मेँ तलवार लिए रहता है— खड्गहस्त
• नायक का प्रतिद्वन्द्वी— खलनायक
• जहाँ से गंगा नदी का उद्गम होता है— गंगोत्री
• शरीर का व्यापार करने वाली स्त्री— गणिका
• जो आकाश को छू रहा हो— गगनस्पर्शी
• पहले से चली आ रही परम्परा का अनुपालन करने वाला— गतानुगतिक
• ग्रहण करने योग्य— ग्राह्य
• गीत गाने वाला/वाली— गायक/गायिका
• गीत रचने वाला— गीतकार
• हर पदार्थ को अपनी ओर आकृष्ट करने वाली शक्ति— गुरुत्वाकर्षण
• जो बात गूढ़ (रहस्यपूर्ण) हो— गूढ़ोक्ति
• जीवन का द्वितीय आश्रम— गृहस्थाश्रम
• गायोँ के खुरोँ से उड़ी धूल— गोधूलि
• जब गायेँ जंगल से लौटती हैँ और उनके चलने की धूल आसमान मेँ उड़ती है (दिन और रात्रि के बीच का समय)— गोधूलि बेला
• गायोँ के रहने का स्थान— गौशाला
• घास खोदकर जीवन–निर्वाह करने वाला— घसियारा
• शरीर की हानि करने वाला— घातक
• जो घृणा का पात्र हो— घृणित/घृणास्पद
• जिसके सिर पर चंद्रकला हो (शिव)— चंद्रचूड़/चंद्रशेखर
• वह कृति जिसमेँ गद्य और पद्य दोनोँ होँ— चंपू
• चक्र के रूप मेँ घूमती हुई चलने वाली हवा— चक्रवात
• ब्याज का वह प्रकार जिसमेँ मूल ब्याज पर भी ब्याज लगता है— चक्रवृद्धि ब्याज
• जिसके हाथ मेँ चक्र हो— चक्रपाणि
• चार भुजाओँ वाला— चतुर्भुज
• कार्य करने की इच्छा— चिक्कीर्षा
• लंबे समय तक जीने वाला— चिरंजीवी
• जो चिरकाल से चला आया है— चिरंतन
• जो बहुत समय तक ठहर सके— चिरस्थायी
• चिँता (चिँतन) करने योग्य बात— चिँतनीय/चिँत्य
• जिस पर चिह्न लगाया गया हो— चिह्नित
• चार पैरोँ वाला— चौपाया/चतुष्पद
• जो गुप्त रूप से निवास कर रहा हो— छद्मवासी
• दूसरोँ के केवल दोषोँ को खोजने वाला— छिद्रान्वेषी
• पत्थर को गढ़ने वाला औजार— छैनी
• एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलने वाला— जंगम
• पेट की अग्नि— जठराग्नि
• बारात ठहरने का स्थान— जनवासा
• जो जल बरसाता हो— जलद
• जो जल से उत्पन्न हो— जलज
• वह पहाड़ जिसके मुख से आग निकले— ज्वालामुखी
• जल मेँ रहने वाला जीव— जलचर
• जनता द्वारा चलाया जाने वाला तंत्र— जनतंत्र
• उम्र मेँ बड़ा— ज्येष्ठ
• जो चमत्कारी क्रियाओँ का प्रदर्शन करता हो— जादूगर
• जिसने आत्मा को जीत लिया हो— जितात्मा
• जानने की इच्छा रखने वाला— जिज्ञासु
• इन्द्रियोँ को वश मेँ करने वाला— जितेन्द्रिय
• किसी के जीवन–भर के कार्योँ का विवरण— जीवन–चरित्र
• जो जीतने के योग्य हो— जेय
• जेठ (पति का बड़ा भाई) का पुत्र— जेठोत
• स्त्रियोँ द्वारा अपनी इज्जत बचाने के लिए किया गया सामूहिक अग्नि-प्रवेश— जौहर
• ज्ञान देने वाली— ज्ञानदा
• जो ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखता हो— ज्ञानपिपासु
• बहुत गहरा तथा बहुत बड़ा प्राकृतिक जलाशय— झील
• जहाँ सिक्कोँ की ढलाई होती है— टकसाल
• बर्तन बनाने वाला— ठठेरा
• जनता को सूचना देने हेतु बजाया जाने वाला वाद्य— ढिँढोरा
• जो किसी भी गुट मेँ न हो— तटस्थ/निर्गुट
• हल्की नीँद— तन्द्रा
• जो किसी कार्य या चिन्तन मेँ डूबा हो— तल्लीन
• ऋषियोँ के तप करने की भूमि— तपोभूमि
• उसी समय का— तत्कालीन
• वह राजकीय धन जो किसानोँ की सहायता हेतु दिया जाता है— तक़ाबी
• जिसमेँ बाण रखे जाते हैँ— तरकश/तूणीर
• जो चोरी–छिपे माल लाता ले जाता हो— तस्कर
• किसी को पद छोड़ने के लिए लिखा गया पत्र— त्यागपत्र
• तर्क करने वाला व्यक्ति— तार्किक
• दैहिक, दैविक और भौतिक सुख— तापत्रय
• तैर कर पार जाने की इच्छा— तितीर्षा
• ज्ञान मेँ प्रवेश का मार्गदर्शक— तीर्थँकर
• वह व्यक्ति जो छुटकारा दिलाता है/रक्षा करता है— त्राता
• दुखान्त नाटक— त्रासदी
• भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने/देखने वाला— त्रिकालज्ञ/त्रिकालदर्शी
• गंगा, जमुना और सरस्वती नदी का संगम— त्रिवेणी
• जिसके तीन आँखे हैँ— त्रिनेत्र
• वह स्थान जो दोनोँ भृकुटिओँ के बीच होता है— त्रिकुटी
• तीन महीने मेँ एक बार— त्रैमासिक
• जो धरती पर निवास करता हो— थलचर
• पति और पत्नी का जोड़ा— दंपती
• दस वर्षोँ की समयावधि— दशक
• गोद लिया हुआ पुत्र— दत्तक
• संकुचित विचार रखने वाला— दक़ियानूस
• धन जो विवाह के समय पुत्री के पिता से प्राप्त हो— दहेज
• जंगल मेँ फैलने वाली आग— दावानल
• दिन भर का कार्यक्रम— दिनचर्या
• दिखने मात्र को अच्छा लगने वाल— दिखावटी
• जो सपना दिन (दिवा) मेँ देखा जाता है— दिवास्वप्न
• दो बार जन्म लेने वाला (ब्राह्मण, पक्षी, दाँत)— द्विज
• जिसने दीक्षा ली हो— दीक्षित
• अनुचित बात के लिए आग्रह— दुराग्रह
• बुरे भाव से की गई संधि— दुरभिसंधि
• वह कार्य जिसको करना कठिन हो— दुष्कर
• दो विभिन्न भाषाएँ जानने वाले व्यक्तियोँ को एक–दूसरे की बात समझाने वाला— दुभाषिया
• जो शीघ्रता से चलता हो— द्रुतगामी
• जिसे कठिनाई से जाना जा सके— दुर्ज्ञेय
• जिसको पकड़ने मेँ कठिनाई हो— दुरभिग्रह/दुग्राह्य
• पति के स्नेह से वंचित स्त्री— दुर्भगा
• जिसे कठिनता से साधा/सिद्ध किया जा सके— दुस्साध्य
• जो कठिनाई से समझ मेँ आता है— दुर्बोध
• वह मार्ग जो चलने मेँ कठिनाई पैदा करता है— दुर्गम
• जिसमेँ खराब आदतेँ होँ— दुर्व्यसनी
• जिसको मापना कठिन हो— दुष्परिमेय
• जिसको जीतना बहुत कठिन हो— दुर्जेय
• वह बच्चा जो अभी माँ के दूध पर निर्भर है— दुधमुँहा
• बुरे भाग्य वाला— दुर्भाग्यशाली
• जिसमेँ दया भावना हो— दयालु
• जिसका आचरण बुरा हो— दुराचारी
• दूध पर आधारित रहने वाला— दुग्धाहारी
• जिसकी प्राप्ति कठिन हो— दुर्लभ
• जिसका दमन करना कठिन हो— दुर्दमनीय
• आगे की बात सोचने वाला व्यक्ति— दूरदर्शी
• देश से द्रोह करने वाला— देशद्रोही
• देह से सम्बन्धित— दैहिक
• देव के द्वारा किया हुआ— दैविक
• प्रतिदिन होने वाला— दैनिक
• धन से सम्पन्न— धनी
• जो धनुष को धारण करता हो— धनुर्धर
• धन की इच्छा रखने वाला— धनेच्छु
• गरीबोँ के लिए दान के रूप मेँ दिया जाने वाला अन्न–धन आदि— धर्मादा
• जिसकी धर्म मेँ निष्ठा हो— धर्मनिष्ठा
• किसी के पास रखी हुई दूसरे की वस्तु— धरोहर/थाती
• मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाला— धीवर
• जो धीरज रखता हो— धीर
• धुरी को धारण करने वाला अर्थात् आधारभूत कार्योँ मेँ प्रवीण— धुरंधर
• अपने स्थान पर अटल रहने वाला— ध्रुव
• ध्यान करने योग्य अथवा लक्ष्य— ध्येय
• ध्यान करने वाला— ध्याता/ध्यानी
• जिसका जन्म अभी–अभी हुआ हो— नवजात
• गाय को दुहते समय बछड़े का गला बाँधने की रस्सी जो गाय के पैरोँ मेँ बाँधी जाती है— नवि
• जो नया–नया आया है— नवागंतुक
• जिसका उदय हाल ही मेँ हुआ है— नवोदित
• जो आकाश मेँ विचरण करता है— नभचर
• सम्मान मेँ दी जाने वाली भेँट— नजराना
• जिस स्त्री का विवाह अभी हुआ हो— नवोढ़ा
• ईश्वर मेँ विश्वास न रखने वाला— नास्तिक
• पुराना घाव जो रिसता रहता हो— नासूर
• जो नष्ट होने वाला हो— नाशवान/नश्वर
• नरक के योग्य— नारकीय
• वह स्थान या दुकान जहाँ हजामत बनाई जाती है— नापितशाला
• किसी से भी न डरने वाला— निडर/निर्भीक
• जो कपट से रहित है— निष्कपट
• जो पढ़ना–लिखना न जानता हो— निरक्षर
• जिसका कोई अर्थ न हो— निरर्थक
• जिसे कोई इच्छा न हो— निस्पृह
• रात मेँ विचरण करने वाला— निशाचर
• जिसका आकार न हो— निराकार
• केवल शाक, फल एवं फूल खाने वाला या जो मांस न खाता हो— निरामिष
• जिससे किसी प्रकार की हानि न हो— निरापद
• जिसके अवयव न हो— निरवयव
• बिना भोजन (आहार) के— निराहार
• जो यह मानता है कि संसार मेँ कुछ भी अच्छा होने की आशा नहीँ है— निराशावादी
• जो उत्तर न दे सके— निरुत्तर
• जिसके कोई दाग/कलंक न हो— निष्कलंक
• जिसमेँ कोई कंटक/अड़चन न हो— निष्कंटक
• जिसका अपना कोई शुल्क न हो— निःशुल्क
• जिसके संतान न हो— निःसंतान
• जिसका अपना कोई स्वार्थ न हो— निस्स्वार्थ
• व्यापारिक वस्तुओँ को किसी दूसरे देश मेँ भेजने का कार्य— निर्यात
• जिसको देश से निकाल दिया गया हो— निर्वासित
• बिना किसी बाधा के— निर्बाध
• जो ममत्व से रहित हो— निर्मम
• जिसकी किसी से उपमा/तुलना न दी जा सके— निरुपम
• जो निर्णय करने वाला हो— निर्णायक
• जिसे किसी चीज की लालसा न हो— निष्काम
• जिसमेँ किसी बात का विवाद न हो— निर्विवाद
• जो निन्दा करने योग्य हो— निन्दनीय
• जिसमेँ किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो— निर्विकार
• जो लज्जा से रहित हो— निर्लज्ज
• जिसको भय न हो— निर्भय
• जो नीति जानता हो— नीतिज्ञ
• रंगमंच पर पर्दे के पीछे का स्थान— नेपथ्य
• आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत करने वाला— नैष्ठिक
• जो नीति के अनुकूल हो— नैतिक
• जो न्यायशास्त्र की बात जानता हो— नैयायिक
• घृत, दुग्ध, दधि, शहद व शक्कर से बनने वाला पदार्थ— पंचामृत
• पक्षपात करने वाला— पक्षपाती
• पदार्थ का सबसे छोटा कण— परमाणु
• जितने की आवश्यकता हो उतना— पर्याप्त
• महीने के दो पक्षोँ मेँ से एक— पखवाड़ा
• नाटक का पर्दा गिरना— पटाक्षेप/यवनिकापतन
• अपनी गलती के लिए किया हुआ दुःख— पश्चाताप
• केवल अपने पति मेँ अनुराग रखने वाली स्त्री— पतिव्रता
• पति को चुनने की इच्छा वाली कन्या— पतिम्वरा
• उपाय/मार्ग बताने वाला— पथ-प्रदर्शक/मार्गदर्शक
• अपने मार्ग से च्युत/भटका हुआ— पथभ्रष्ट
• अपने पद से हटाया हुआ— पदच्युत
• जो भोजन रोगी के लिए उचित है— पथ्य
• घूमने–फिरने/देश–देशान्तर भ्रमण करने वाला यात्री— पर्यटक
• केवल दूध पर निर्भर रहने वाला— पयोहारी
• दूसरोँ पर निर्भर रहने वाला— पराश्रित/पराश्रयी
• परपुरुष से प्रेम करने वाली स्त्री— परकीया
• पति द्वारा छोड़ दी गई पत्नी— परित्यका
• दूसरे का मुँह ताकने वाला— परमुखापेक्षी
• जो पहनने लायक हो— परिधेय
• जो मापा जा सके— परिमेय
• जो सदा बदलता रहे— परिवर्तनशील
• जो आँखोँ के सामने न हो— परोक्ष/अप्रत्यक्ष
• दूसरे पर उपकार करने वाला— परोपकारी/परमार्थी
• जो पूरी तरह से पक चुका हो/पारंगत हो चुका हो— परिपक्व
• पर्दे के अंदर रहने वाली— पर्दानशीन
• प्रशंसा करने योग्य— प्रशंसनीय
• किसी प्रश्न का तत्काल उत्तर दे सकने वाली मति— प्रत्युत्पन्नमति
• किसी वाद का विरोध करने वाला— प्रतिवादी
• शरणागत की रक्षा करने वाला— प्रणतपाल
• वह ध्वनि जो कहीँ से टकराकर आए— प्रतिध्वनि
• जो किसी मत को सर्वप्रथम चलाता है— प्रवर्तक
• वह स्त्री जिसके हाल ही मेँ शिशु उत्पन्न हुआ हो— प्रसूता
• वह आकृति जो किसी शीशे, जल आदि मेँ दिखाई दे— प्रतिबिम्ब
• हास्य रस से परिपूर्ण नाटिका— प्रहसन
• प्रमाण द्वारा सिद्ध करने योग्य— प्रमेय
• संध्या के बाद व रात्रि होने के पूर्व का समय— प्रदोष/पूर्वरात्र
• ज्ञान नेत्र से देखने वाला अंधा व्यक्ति— प्रज्ञाचक्षु
• सभा मेँ विचारार्थ प्रस्तुत बात— प्रस्ताव
• हाथ से लिखी गई पुस्तक— पाण्डुलिपि
• किसी परिश्रम के बदले मिलने वाली राशि— पारिश्रमिक
• जिसका स्वभाव पशुओँ के समान हो— पाशविक
• महीने के प्रत्येक पक्ष से संबंधित— पाक्षिक
• किसी विषय का पूर्ण ज्ञाता— पारंगत
• जिसमेँ से आर–पार देखा जा सकता हो— पारदर्शी
• जो परलोक से संबंधित हो— पारलौकिक
• मार्ग मेँ खाने के लिए भोजन— पाथेय
• जिसका संबंध पृथ्वी से हो— पार्थिव
• ज्ञात इतिहास के पूर्व समय का— प्रागैतिहासिक
• स्थल का वह भाग जिसके तीन ओर पानी हो— प्रायद्वीप
• जिसको देखकर अच्छा लगे— प्रियदर्शी
• पीने की इच्छा रखने वाला— पिपासु
• बार–बार कही गई बात— पुनरुक्ति
• जिसका पुनः जन्म हुआ हो— पुनर्जन्म
• पहले किया गया कथन— पूर्वोक्त
• दोपहर से पहले का समय— पूर्वाह्न
• प्राचीन इतिहास का ज्ञाता— पुरातत्त्ववेत्ता
• पीने योग्य पदार्थ— पेय
• पिता एवं प्रपिताओँ से संबंधित— पैतृक
• जो सम्पत्ति पिता से प्राप्त हो— पैतृक सम्पत्ति
• फटे–पुराने कपड़े पहनने वाला— फटीचर
• केवल फलोँ पर निर्वाह करने वाला— फलाहारी
• फल की इच्छा रखने वाला— फलेच्छु
• बुरी किस्मत वाला— बदकिस्मत
• बुरे मिजाज (आचरण) वाला— बदमिजाज
• सूर्योदय से पहले दो घड़ी तक का समय— ब्रह्ममुहूर्त
• जीवन का प्रथम आश्रम— ब्रह्मचर्याश्रम
• बहुत विषयोँ का जानकार— बहुज्ञ
• जिसने सुनकर अनेक विषयोँ का ज्ञान प्राप्त किया हो— बहुश्रुत
• समुद्र मेँ लगने वाली आग— बड़वानल
• जो अनेक रूप धारण करता हो— बहुरूपिया
• बहुत से देवताओँ के अस्तित्व मेँ विश्वास करने वाला मत— बहुदेववाद
• काफी अधिक कीमत का— बहुमूल्य
• अनेक भाषाओँ को जानने वाला— बहुभाषाविद्
• रात का भोजन— ब्यालू/रात्रिभोज
• जिस स्त्री के कोई संतान नहीँ हुई हो— बाँझ
• खाने का इच्छुक— बुबुक्षु

• किसी भवनादि के खंडित होने के बाद बचे भाग— भग्नावशेष
• भय के कारण बेचैन— भयाकुल
• भाग्य पर भरोसा रखने वाला— भाग्यवादी
• जो भाग्य का धनी हो— भाग्यवान
• दीवारोँ पर बने हुए चित्र— भित्तिचित्र
• जो पृथ्वी के भीतर का ज्ञान रखता हो— भूगर्भवेता
• धरती पर चलने वाला जन्तु— भूचर
• जो पहले था या हुआ— भूतपूर्व
• धरती को धारण करने वाला पर्वत— भूधर
• औषधियोँ का जानकार— भेषज
• प्रातःकाल गाया जाने वाला राग— भैरवी
• सूर्योदय के पहले का समय— भोर
• भूगोल से संबंधित— भौगोलिक
• फूलोँ का रस— मकरंद
• दोपहर का समय— मध्याह्न
• सर्दी मेँ होने वाली वर्षा— महावट/मावठ
• हाथी को हाँकने वाला— महावत
• सुख एवं दुःख मेँ एक समान रहने वाला— मनस्वी
• जिसकी आँखेँ मगर जैसी हो— मकराक्ष
• किसी मत का अनुसरण करने वाला— मतानुयायी
• दो पक्षोँ के बीच मेँ पड़कर फैसला कराने वाला— मखत्राता/यज्ञरक्षक
• जो बहुत ऊँची अकांक्षा/इच्छा रखता हो— महत्वाकांक्षी
• जिसकी बुद्धि कमजोर है— मन्दबुद्धि/मतिमान्द्य
• जिसकी आत्मा महान हो— महात्मा
• किसी चीज के मर्म का ज्ञाता— मर्मज्ञ
• मध्यरात्रि का समय— मध्यरात्र
• मन का असीम दुःख— मनस्ताप
• जहाँ केवल रेत ही रेत हो— मरुस्थल
• माँस आदि खाने वाला— माँसाहारी
• माह मेँ होने वाला— मासिक
• माता की हत्या करने वाला— मातृहंता
• कम खाने वाला— मिताहारी
• कम खर्च करने वाला— मितव्ययी
• जो असत्य बोलता हो— मिथ्यावादी
• जिस स्त्री की आँखेँ मछली के समान होँ— मीनाक्षी
• थोड़ा खिला हुआ फूल— मुकुल
• शुभ कार्य हेतु निकाला गया समय— मुहूर्त
• दिल खोलकर कहना— मुक्तकंठ
• मुद्रा का अधिक चलन/प्रसार— मुद्रास्फीति
• मरणासन्न अवस्थावाला/शक्ति के अनुसार— मुमूषु
• मरने की इच्छा— मुमूर्षा
• मोक्ष की इच्छा रखने वाला— मुमुक्षु
• चुपचाप देखने वाला— मूकदर्शक
• हरिण के नेत्रोँ जैसी आँखोँ वाली— मृगनयनी
• जो मीठी वाणी बोलता हो— मृदुभाषी
• जिसने मृत्यु को जीत लिया हो— मृत्युंजय
• कमल की डंडी— मृणाल
• जो रचना किसी व्यक्ति की अपनी स्वयं की हो एवं नई हो— मौलिक
• जुड़वाँ भाई या बहन— यमल/यमला
• रंगमंच का परदा— यवनिका
• शक्ति के अनुसार करना— यथाशक्ति
• जैसा चाहिए, उचित हो वैसा— यथोचित
• जो यंत्र से संबंधित हो— यांत्रिक
• जब तक जीवन रहे— यावज्जीवन/जीवनपर्यँत
• घूम–घूमकर जीवन बिताने वाला— यायावर
• समाज को नई दिशा देकर नए युग की शुरुआत करने वाला— युगप्रवर्तक
• अपने युग का ज्ञान रखने वाला— युगद्रष्टा
• यज्ञ–स्थान पर स्थापित किया जाने वाला खंभा— यूप
• रात को कुछ भी दिखाई नहीँ देने वाला रोग— रतौँधी
• किसानोँ से भूमि कर लेने वाला सरकारी विभाग— राजस्व विभाग
• राज्य द्वारा आधिकारिक रूप से प्रकाशित होने वाला पत्र— राजपत्र(गजट)
• जिसके नीचे रेखाएँ लगाई गई होँ— रेखांकित
• प्रेम, आनन्द, भय आदि से रोँगटे खड़े होने की दशा— रोमांच
• प्रसन्नता से जिसके रोँगटे खड़े हो गए होँ— रोमांचित
• जो लकड़ी काटकर जीवन बिताता हो— लकड़हारा
• जिसका वंश लुप्त हो गया हो— लुप्तवंश
• लोभी स्वभाव वाला— लुब्ध/लोभी
• जिसे देखकर रोँगटे खड़े होँ जाएँ— लोमहर्षक
• वंश परम्परा के अनुसार— वंशानुगत
• जिसके हाथ मेँ वज्र हो— वज्रपाणि
• बहुत ही कठोर और बड़ा आघात— वज्राघात
• बचपन और यौवन के मध्य की उम्र— वयसंधि
• जिसका वर्णन न किया जा सके— वर्णनातीत
• अधिक बोलने वाला— वाचाल
• सन्तान के प्रति प्रेम— वात्सल्य
• मुकदमा दायर करने वाला— वादी
• भाषण देने मेँ चतुर— वाग्मी
• जिसका वाणी पर पूर्ण अधिकार हो— वाचस्पति
• सामाजिक मानमर्यादा के विपरीत कार्य करने वाला— वामाचारी
• गृह–निर्माण संबंधी विज्ञान— वास्तुविज्ञान
• बाहर के तापमान का असर रोकने हेतु की जाने वाली व्यवस्था— वातानुकूलन
• वह कन्या जिसके विवाह करने का वचन दे दिया गया हो— वाग्दता
• जिसमेँ विष मिला हुआ हो— विषाक्त
• जिस पर विश्वास किया जा सके— विश्वस्त
• जिस विषय मेँ निश्चित मत न हो— विवादास्पद
• जिसकी पत्नी मर चुकी हो— विधुर
• स्त्री जिसका पति मर गया हो— विधवा
• सौतेली माँ— विमाता
• जो दूसरी जाति का हो— विजातीय
• जिस पर अभी विचार चल रहा हो— विचाराधीन
• वह स्त्री जो पढ़ी–लिखी व ज्ञानी हो— विदुषी
• अपना हित–अहित सोचने मेँ समर्थ— विवेकी
• अपनी जगह से अलग किया हुआ— विस्थापित
• जिसके अंदर कोई विकार आ गया हो— विकृत
• जो अपने धर्म के विरुद्ध कार्य करने वाला हो— विधर्मी
• जो विधि/कानून के अनुसार सही हो— विधिवत्/वैध
• किसी विषय का विशेष ज्ञान रखने वाला— विशेषज्ञ
• विनाश करने वाला— विध्वंसक
• जिसके शरीर के भाग मेँ कमी हो— विकलांग
• जिसे व्याकरण का पूरा ज्ञान हो— वैयाकरण
• सौ वर्षोँ का समूह— शताब्दी
• जो शरण मेँ आ गया हो— शरणागत
• शरण की इच्छा रखने वाला— शरणार्थी
• हाथ मेँ पकड़कर चलाया जाने वाला हथियार जैसे तलवार— शस्त्र
• सौ वस्तुओँ का संग्रह— शतक
• जो सौ बातेँ एक साथ याद रख सकता है— शतावधानी
• जिसके स्मरण मात्र से ही शत्रु का नाश हो/शत्रु का नाश करने वाला— शत्रुघ्न
• जिसका कोई आदि और अंत न हो— शाश्वत
• शाक, फल और फूल खाने वाला— शाकाहारी/निरामिष
• जिस शब्द के दो अर्थ होँ— शिलष्ट
• शिव का आलय (स्थान)— शिवालय
• शुभ चाहने वाला— शुभेच्छु/शुभाकांक्षी
• अनुसंधान के लिए दिया जाने वाला अनुदान— शोधवृत्ति
• जो सुनने योग्य हो— श्रव्य/श्रवणीय
• जिसमेँ श्रद्धा भावना हो— श्रद्धालु
• पति/पत्नी का पिता— श्वसुर
• पति/पत्नी की माता— श्वश्रू (सास)
• पति/पत्नी का भाई— श्वशुर्य (साला)

14/09/2016
10/03/2015
३१ जुलाई प्रेम चंद जी का १३४ वीं जयंती
02/08/2014

३१ जुलाई प्रेम चंद जी का १३४ वीं जयंती

मुंशी प्रेमचंद्रमुंशी प्रेमचंद्र का नाम घनपत राय था | मुंशी जी का जन्म ३१ जुलाई सन १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही...
16/10/2013

मुंशी प्रेमचंद्र


मुंशी प्रेमचंद्र का नाम घनपत राय था | मुंशी जी का जन्म ३१ जुलाई सन १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही नामक गाँव मे हुआ था |
इनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था | जो डाक घर मे मुंशी के पद पर नौकरी करते थे | मुंशी जी मध्यम स्तर के थे, उनके घर मे खाने-पीने की कमी न थी तथा रहन-सहन स्तर मध्यम दर का था | मध्यम स्तर के घर मे जन्म लेने के कारण मुंशी जी अजीवन मध्यम जीवन व्यतीत करते रहे | इन सब से जूझने के कारण इन्होने इस जीवन की त्यागा |
मुंशी जी जब ६ वर्ष के थे तब उन्हे एक मोलवी के घर लालगंज नामक गाँव मे फारसी और उर्दू पढ़ाने के लिये भेजा गया | पढाई-लिखाई के कारण मुंशी जी का जीवन बहुत ही मस्ती से व्यतीत हो रहा था, लेकिन जब ये ७ साल के थे तथा इनकी माता जी बहुत बीमार पड़ी और बीमार होने के कारण इनकी मृत्यु हो गयी तब ये बहुत ही छोटे थे |
माँ की मृत्यु के बाद मुंशी जी बहुत हे टूट गयी क्योकि वो अपनी माँ के साथ ही सारे लाड तथा खेलना-कूदना करते थे | मुंशी जी को थोडा प्यार अपनी बड़ी बहन से मिला लेकिन कुछ समय पश्चात् उनका भी विवाह हो गया, इन सबके बाद मुंशी जी की दुनिया एक प्रकार से बहुत अकेली और सुनी हो गयी, इन सब चीजो से बाहर आने के लिये मुंशी जी ने अपने को उपन्यास और कहानियो मे व्यस्त कर लिया, उनकी कहानियो मे उन्होने ऐसी कहानियो का वर्णन किया है जिसमे बचपन मे किसी बच्चे के माँ-बाप की मृत्यु हो जाती है, वो अपना अकेला पन दरिदता और दीन-हीन दशा को व्यक्त किया है उनकी माँ से उनका बिछ्रना और पिता के देख-रेख मे रहने वाले मुंशी जी एक रास्ता चुना जिस रास्ते ने उन्हे आगे चल कर एक उपन्यास-कार, महान कथाकार और बहुत सी उपाधियो से सम्मानित किया गया |
घनपत राय का विवाह १५-१६ बरस मे हे कर दिया गया, लेकिन ये विवाह उनको फला नही और कुछ समय के बाद ही उनकी बीवी की मृत्यु हो गयी उसके कुछ समय के बाद उन्होने बनारस के बाद चुनार के स्कूल मे मास्टरी की | नौकरी के साथ ही उन्होने बी.ए की | मास्टरी करते रहते प्रेमचंद्र के बहुत से तबादले हुई उन्होने जन-जीवन को बहुत ही गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य की तरफ समर्पित कर दिया |
उनके तीन लड़के थे बड़ा मनसा-राम १६ वर्ष का था, मझला जियाराम १२ वर्ष और सियाराम ७ वर्ष का था, जब मुंशी जी ने दुबारा विवाह किया | मुंशी जी का का विवाह निर्मला से हुआ तब मुंशी जी तोता-राम के नाम से जाने जाते थे | तब मुंशी जी बवासीर और एसिडिटी बीमारियों से ग्रस्त थे घर मे सिर्फ एक विधवा बहन जिसका नाम रुख्मनी जो ५० साल से ऊपर थी जो उनके साथ ही रहती थी | प्रेमचंद्र ने लगभग ३०० कहानिया तथा चौदह बडे उपन्यास लिखे |
सन १९३५ मे मुंशी जी बहुत बीमार पर गये और ८ अक्टूबर सन १९३६ को ५६ वर्ष की आयु मे ही उनकी मृत्यु हो गयी | मुंशी जी के साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओ मे किया जा चुका है |
मुंशी प्रेमचंद्र की प्रसिद्ध कहानिया
पंच परमेश्वर,
ईदगाह प्रेम चन्द्र जी एक कहानी जो गरीब लड़के हामिद की कहानी है जिसकी पास बहुत ही कम धन था ईदगाह मे जाने के लिये वो अपने दोस्तों के साथ गया जहा उसके दोस्तों ने जहा अपना सारा धन खिलोनै और मिठाई पर लगाया वहा हामिद को याद आया की उसकी बुडी दादी के हाथ रोटी बनाते वक़्त जल जाते है उसने अपने थोडे से धन से एक चिमटा ख़रीदा जिससे उसके दादी के हाथ न जले ये कहानी दिल को दहला देती है |.
मंत्र,
नशा,
शतरंज के खिलाडी,
पूस की रात,
आत्माराम,
बूढी काकी,
बड़े भाईसाहब,
बड़े घर की बेटी,
कफ़न,
उधार की घडी,
नमक का दरोगा,
पंच फूल,
प्रेम पूर्णिमा,
राम कथा,
जुरमाना
उपन्यास
गबन,
बाज़ार-इ-हुस्न और सेवा सदन बाज़ार-इ-हुस्न प्रेमचंद्र जी के प्रसिद उपन्यास थे जो उर्दू मे थे
गोदान,
कर्मभूमि,
कायाकल्प,
मनोरमा,
निर्मला,
प्रतिज्ञा,
प्रेमाश्रम,
रंगभूमि,
वरदान,
प्रेमा |

सच्चिदानंदहीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" को प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देनेवाले कथाका...
08/09/2013

सच्चिदानंदहीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" को प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देनेवाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म ७ मार्च १९११ को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर फरार हुए और १९३० ई. के अन्त में पकड़ लिए गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

ये स्वयं भारत के भक्त थे। इन्हीं के साथ टैगोर अध्ययन-मण्डल की स्थापना की और रस्किन के सौन्दर्यशास्त्र तथा आचरणशास्त्र का अध्ययन किया। कला-क्षेत्रों के बीच घूमते-घूमते स्थाप्तय और शिल्प दोनों का राग-बोध परिपक्व होता गया। अज्ञेय का जन्म 7 मार्च, 1911 को कसया में हआ। बचपन 1911 से ’15 तक लखनऊ में। शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत-मौखिक परम्परा से हुआ 1915 से ’19 तक श्रीनगर और जम्मू में। यहीं पर संस्कृत पंडित से रघुवंश रामायण, हितोपदेश, फारसी मौलवी से शेख सादी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा घर पर शुरू हुई। शास्त्री जी को स्कूल शिक्षा में विश्वास नहीं था। बचपन में व्याकरण के पण्डित से मेल नहीं हुआ। घर पर धार्मिक अनुष्ठान स्मार्त ढंग से होते थे। बड़ी बहन जो लगभग आठ की थीं, जितना अधिक स्नेह करती थीं। उतना ही दोनों बड़े भाई (ब्रह्मानन्द और जीवानन्द जो’ 34 में दिवंगत हो गए) प्रतिस्पर्धा रखते थे। छोटे भाई वत्सराज के प्रति सच्चिदानन्द का स्नेह बचपन से ही था, 1919 में पिता के साथ नालन्दा आए, इसके बाद’ 25 तक पिता के ही साथ रहे, पिता जी ने हिन्दी सिखाना शुरू किया। वे सहज और संस्कारी भाषा के पक्ष में थे। हिन्दुस्तानी के सख़्त ख़िलाफ़ थे। नालन्दा से शास्त्री जी पटना आए और वहीं स्व- काशी प्रसाद जायसवाल और स्व. राखालदास वन्द्योपाध्याय से इस परिवार का सम्बन्ध हुआ, पटना में ही अंग्रेजी से विद्रोह का बीज सच्चिदानन्द के मन में अंकुरित हुआ।

शास्त्रीजी के पुराने मित्र रायबहादुर हीरालाल ही उनकी हिन्दी भाषा की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के सम्पर्क में आने से बंग्ला की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के संपर्क में आने से बंग्ला सीखी और इसी अवधि में इण्डियन प्रेस से छपी बाल रामायण बाल महाभारत, बालभोज इन्दिरा (बकिमचन्द्र) जैसी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं और हरिनारायण आप्टे और राखालदास वन्द्योपाध्याय के ऐतिहासिक उपन्यास इसी अवधि में पढ़े गए। 1921-’25 तक ऊटकमंड में रहे यहां नीलिगिरि की श्यामल उपत्यका ने बहुत अधिक प्रभाव डाला। 1921 में उडिपी के मध्याचार्य के द्वारा इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इसी मठ के पण्डित ने छः महीने तक संस्कृत और तमिल की शिक्षा दी। इस समय ‘भड़ोत’ से ‘वात्स्यायन’ में परिवर्तन भी हुआ, जो प्राचीनतम संस्कार के नये उत्साह से जीने का एक संकल्प था। पिता ने संकीर्ण प्रदेशिका से ऊपर उठकर गोत्रनाम का प्रचलन कराया। इसी समय पहली बार गीता पढ़ी।

पिताजी के आग्रह से अन्य धर्मों के ग्रन्थ भी पढ़े और घर पर ही पिताजी के पुस्तकालयों का सदुपयोग शुरू किया। वर्ड्सवर्थ, टेनिसन, लांगफेलो और व्हिटमैन की कविताएं इस अवधि में पढ़ीं। शेक्सियर, मारलो, वेब्स्टर के नाटक तथा लिटन, जार्ज एलियट, थैकरे, गोल्डस्मिथ, तोल्स्तोय, तुर्गनेव, गोगोल, विक्टर ह्यूगो तथा मेलविल के उपन्यास भी पढ़े गये। लयबद्ध भाषा के कारण टेनिसन का प्रभाव बड़ा गहरा पड़ा। टेनिसन के अनुकरण में, अंग्रेजी में ढेरों कविताएं भी लिखीं। उपन्यासकारों में ह्यूगो का प्रभाव, विशेषकर उनकी रचना टॉयलर ऑफ़ द सी का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। इसी अवधि में विश्वेश्वर नाथ रेऊ तथा गौरीचन्द हीराचन्द ओझा की हिन्दी में लिखी इतिहास की रचनाएं पढ़ने को मिलीं तथा मीरा, तुलसी के साहित्य का अध्ययन भी इन्होंने किया। साहित्यिक कृतित्व के नाम पर इस अवधि की देन है आनन्द बन्धु जो इस परिवार की निजी पत्रिका थी। इस पत्रिका के समीक्षक थे हीरालाल जी और डॉ.. मौद्गिल। इस अवधि में एक छोटा उपन्यास भी लिखा और इसी अवधि में जब मैट्रिक की तैयारी ये कर रहे थे, मां के साथ इन्होंने जलियावाला बाग-काण्ड की घटना के आसपास पंजाब की यात्रा की थी और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विद्रोह की भावना ने जन्म लिया था। इनके पिताजी स्वयं अंग्रेजी की अधीनता की चुभन कभी-कभी व्यक्त करते थे।

एक घटना भी ब्लैकस्टोन नामक अंग्रेजी अधिकारी के साथ घट चुकी थी। वह शास्त्रीजी और राखालदास के साथ यात्रा कर रहा था। डिब्बे में राखालदास की पत्नी भी थीं। वह स्नानकक्ष से अर्धनग्न डिब्बे के भीतर आया। शास्त्रीजी ने उस से पूछा, ‘‘क्या इस रूप में तुम किसी अंग्रेज महिला के सामने आ सकते थे ?’ उत्तर में वह कुछ बोला नहीं, हंसता रहा। शास्त्रीजी ने उसे उठाकर डिब्बे से बाहर फेंक दिया। उसने आजीवन शत्रुता निभाई, यहां तक कि पिता द्वारा किए गए इस अपमान का बदला पुत्र से चुकाया, जब वे लाहौर किले में नज़रबन्द हुए। दूसरी घटना ऊटी में स्वंय सच्चिदानन्द के साथ घटी थी, जब वे दो-तीन महीने अंग्रेज़ों के साथ स्कूल में पढ़ने गए। वहां अंग्रेज लड़कों की मरम्मत करके ही इन्हें स्कूल में कार्ड मिला, जिसे फेंक कर ये घर चले आए। 1925 में पंजाब से मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा दी और उसी वर्ष इण्टरमीडिएट साइंस पढ़ने मद्रास क्रिश्चियन कालेज में दाखिल हुए। यहाँ उन्होंने गणित, भौतिकशास्त्र और संस्कृत विषय लिए थे। यहां इनके अंग्रेजी प्रोफेसर हेण्डरसन ने (जिन्हें त्रिशंकु समर्पित की गई) साहित्य के अध्ययन की प्रेरणा दी।

ये स्वयं भारत के भक्त थे। इन्हीं के साथ टैगोर अध्ययन-मण्डल की स्थापना की और रस्किन के सौन्दर्यशास्त्र तथा आचरणशास्त्र का अध्ययन किया। कला-क्षेत्रों के बीच घूमते-घूमते स्थाप्तय और शिल्प दोनों का राग-बोध परिपक्व होता गया। दक्षिण के मन्दिर और नीलगिरि के दृश्य ने उनके व्यक्तित्व में प्रकृति-प्रेम और कलाप्रेम को निखार दिया। मद्रास में सामाजिक विषमता की चेतना जगने लगी थी और जाति के विरुद्ध विद्रोह मन में इसी अवधि में उमड़ना शुरू हुआ। शास्त्रीजी स्वयं जाति में विश्वास न कर के वर्ण में विश्वास करते थे और पुत्रों से आशा करते थे कि ब्राह्मणवर्ण का स्वभाव—त्याग, अभय और सत्य—उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

बचपन से किशोरावस्था तक की यह अवधि उलझन और आकुलता के बीच कठिन अध्यवसाय की अवधि है। एक ओर परिवार के और बाहर के अनेक प्रकार के प्रिय-अप्रिय प्रभावों ने उनके चित्त को उद्वेलित किया, तो दूसरी ओर पिता के कठिन अनुशासन ने परिश्रम में लगातार लगाए रख कर मन और शरीर को संयम में ढाला। बचपन में इन्हें ‘सच्चा’ के नाम से पुकारा जाता था और जब-जब इनकी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया गया, इन्होंने मौन विद्रोह किया। एक बार की घटना ऐसी है कि बड़े भाई और इनमें होड़ लगी कि चौदह रोटी कौन खा सकता है ? बड़े भाई ने कहा कि तुम खाओ तो तुम्हें मैं इनाम दूँगा। ये खाने बैठे, पिता जी को इसकी सूचना मिली, उन्होंने बड़े भाई को डांटा और इनसे कहा कि तुम न खाओ, उठ जा। ये चौदह के आस-पास तक पहुंच रहे थे, अपने मन से उठे नहीं, इसलिए उन्होंने भाई से इनाम मांगा। उन्होंने देने से इन्कार किया तो मौन विरोध में इन्होंने खाना ही कम कर दिया इस प्रकार का आत्मपीड़क क्रोध इनमें बहुत दिनों तक रहा है। और अब भी किसी न किसी रूप में कभी न कभी उभर आता है। इसी क्रोध में आकर इन्होंने अपनी आर्थिक बर्बादी भी कम नहीं की।

1927 में लाहौर फॉरमन कॉलेज में ये बी. एस-सी. में भर्ती हुए। इसी कालेज में नवजवान भारत-सभा के सम्पर्क में आए और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख सदस्य आज़ाद, सुखदेव और भगवतीचरण बोहरा से परिचय हुआ। इस कालेज में बी.एस-सी. तक तो ये सक्रिय रूप से कान्तिकारी आन्दोलन में प्रविष्ट नहीं हुए थे, यद्यपि 1929 में पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का जो अधिवेशन लाहौर में हुआ, उस में ये स्वयं सेवक अफसर के रूप में मौजूद थे। यहीं इन्हीं के स्वयं सेवक दल ने उन लोगों को जबरदस्ती स्वयंसेवक कैम्प में बन्द रखा था, जो गांधीजी के उस प्रस्ताव का अप्रिय रूप में विरोध करने वाले थे, जो उन्होंने इरविन को बधाई देने के लिए रखा था। इसी स्वयंसेवक शिविर में कदाचित पहली बार कांग्रेस के मंच से ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाया गया था।

1929 में बी.एस-सी. करके अंग्रेजी एम.ए. में दाखिल हुए। इसी साल से ये क्रान्तिकारी दल में भी प्रविष्ट हुए इनके साथ थे देवराज, कमलकृष्ण और वेदप्रकाश नन्दा। कालेज में जिन दो अध्यापकों ने सबसे अधिक इन्हें प्रभावित किया, वे थे, जे.एम. बनेड और डेनियल। जे.एम.बनेड ने तो इनके जेल जाने पर भी अपना स्नेह सम्बन्ध बनाए रखा। बनेड ने ही (यद्यपि वे भौतिकशास्त्र के अध्यापक थे) विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन की प्रेरणा दी। प्रो. डेनियल ने इन्हें ब्राउनिंग की ओर उन्मुख किया। इनके क्रान्तिकारी जीवन की अवधि 1929 से आरम्भ होकर 1936 तक है। इस अवधि का अधिकांशतः इतिहास देश के इतिहास से सम्बद्ध है। उसमें कहने की इतनी बातें हैं कि यहां उन पर विस्तार से विचार करना अनावश्यक है। घटनाक्रम कुल यह है कि पहला क्रर्यक्रम इन का और इनके साथियों का भगतसिंह को छुड़ाने का हुआ। इस बीच में भगवती चरण वोहरा एक दुर्घटना में शहीद हुए और यह कार्यक्रम स्थगित हो गया।

दूसरा कार्यक्रम दिल्ली-हिमालयन-टॉयलेट्स फैक्ट्री के बहाने बम बनाने का कारखाना कायम करने का था। उस फैक्ट्री में अज्ञेय वैज्ञानिक के रूप में सलाहकार थे। तीसरा कार्यक्रम अमृतसर में पिस्तौल की मरम्मत और कारतूस भरने का कारखाना कायम करने का शुरू हुआ और यहीं देवराज और कमलकृष्ण के साथ 15 नवम्बर, 1930 को गिरफ्तार हुए। गिरफ्तारी के बाद एक महीने लाहौर किले में, फिर अमृतसर की हवालात में। यहीं से यातना शुरू हुई। आर्म्स ऐक्ट वाले मुकदमें में ये छूटे, पर दिल्ली में 1931 में नया मुकदमा शुरू किया गया। यह मुकदमा 1933 तक चलता रहा। दिल्ली जेल में ही काल-कोठरी में बन्द रहे और यहीं रह कर छायावाद से मनोविज्ञान, राजनीति अर्थशास्त्र और कानून—ये सारे विषय पढ़े। यहीं रहकर चिन्ता, विपथगा की अनेक कहानियां और शेखर लिखा; पर यह पूरी अवधि कुल ले-देकर घोर आत्ममन्थन, शारीरिक यातना और स्वप्नभंग की पीड़ा की अवधि रही।

1934 की फरवरी में छूटे, फिर लाहौर में दूसरे कानून के अन्तर्गत नज़रबन्द किये गये। यहीं रह कर कोठरी की बात और चिन्ता की रचना की और इसी अवधि में कहानियों का छपना शुरू हुआ। 1934 के मध्य में घर के अन्दर नज़रबन्द हो गई और घर आने पर एक साथ छोटे भाई और माता की मृत्यु और पिता जी की नौकरी से निवृत्ति—इन सभी घटनाओं ने रोते चित्त में नये उद्वेलन पैदा किए नज़रबन्दी हटने तक ये डलहौजी़ और लाहौर रहे। सात साल के इस अर्से ने कई छाप छोड़ी हैं। रावी के पुल से छलांग मारने पर घुटने की टोपी उतरी और वह दर्द मौका पाते ही आज भी लौट आता है। क्रान्तिकारी जीवन के साथियों में जो लोग आदर्शच्युत हुए या जो टूटने लगे उनके कारण घोर आत्मपीड़न का भाव जाग गया और एकाकीपन का अभ्यास जो बढ़ा, वह अभी भी नहीं छूटा। अज्ञेय को अत्यधिक सामाजिकता इतनी असह्य है, इसका प्रमाण मैं स्वयं दे सकता हूं। कभी-कभी वे स्वागत-समारोहों के बाद लौटने पर ऐसा अनुभव करते हैं कि किसी यन्त्रणा से गुजर कर आए हैं। पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण छाप इस जीवन की उनकी राग अनुभूति को सघन बनाने में है। इस जीवन में प्रखर शक्ति और ताप जिस स्रोत से मिला था, उसके आकस्मिक निधन की चोट बड़ी गहरी पड़ी है।

यह वियोग उन्हीं के शब्दों में ‘स्थायी वियोग’ है। उस ‘अत्यन्तगता’ की स्मृति एक अमूल्य थाती है। इसी के सहारे हारिल का धर्म निभाना सबसे बड़ा पार्थिव धर्म उन्होंने जाना है। यह उन्होंने जाना और अपनी ‘मांग को स्वंय अपना खंडन’ माना। ‘आहुति बनकर’ ही उन्होंने प्रेम को ‘यज्ञ की ज्वाला’ के रूप में देखा। ‘वंचनाओं के दुर्ग के रुद्ध सिंहद्वार खोल कर मुक्त आकाश’ के लिए जो अदम्य आशा उनके चित्त में हमेशा भरती रहती है अपने को तटस्थ और एकाकी रख सकने का वह लम्बा अभ्यास। यह सही है कि शिल्प की दृष्टि से और भाषा की दृष्टि से इस अवधि की कविताओं पर छायावाद का गहरा प्रभाव है, पर साथ ही यह भी निर्विवाद है कि कथ्य छायावाद की भूमिका से बिलकुल अलग है। उसका आधार अरूप प्रेम नहीं, न मिटने वाली प्यास नहीं, रहस्य-अन्वेषण नहीं, है ऊर्जस्वी और मांसल प्रेम, प्रत्यंचा तोड़ धनुष का सन्धान (शक्ति के परे आत्मोत्सर्ग) और एक दुर्निवार ऊर्ध्वग ज्वाल। इस दृष्टि से इस अवधि को भट्ठी में गलाई की अवधि कहा जा सकता है।

गदहपचीसी पार करके 1936 में जब जीविका के लिए कर्मक्षेत्र में उतरे तो पहले एक आश्रम खोलने की बात सोची। पर पिता की एक डांट ने इस भिखमंगी से इन्हें विरत कर दिया। फिर सैनिक के सम्पादन-मण्डल में आए और वहां साल-भर रहे। इसी समय मेरठ के किसान आन्दोलन में भी काम किया और इस अवधि में रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द्र गुप्त, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे और नेमिचन्द्र जैन से परिचय हुआ। राजनैतिक विचारों में भी उथल-पुथल शुरू हुई। गांधीजी के प्रति जहां श्रद्धा बिलकुल नहीं थी, वहां आदर-भाव जगा, पर कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित न होने के पक्ष में न होते हुए भी, और सुभाष चन्द्र बसु के साथ त्रिपुरी में न्याय नहीं हुआ यह मानते हुए भी, सुभाष बाबू के लिए श्रद्धा न कर सके। जवाहरलाल नेहरू के खतरनाक विचार और खतरनाक जीवन के नारे ने पहले बहुत प्रभावित किया था, बाद में उनकी बौद्धिक सच्चाई की ही छाप मन में अधिक गहरी पड़ी।

1937 के अन्त में बनारसीदास चतुर्वेदी के आग्रह से विशाल भारत में गये। लगभग डेढ़ वर्ष कलकत्ता रहे। यहां सुधीन्द्र दत्त, बुद्धदेव बसु, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बलराज साहनी और पुलिन सेन परिचय की परिधि में आए। कलकत्ता के महानगर का पहला अनुभव बहुत तीखा रहा। इसके विमानवीकृत पहलू ने इनके संवेदनशील चित्त को बहुत व्यथित किया। विशाल भारत को व्यक्तिगत कारणों से इन्होंने छोड़ा और 1939 में पिताजी के पास बड़ौदा गये। पिताजी ने विदेश जाकर अध्ययन पूरा करने के लिए कहा। इतने में ही महायुद्ध छिड़ गया और दिल्ली आल इण्डिया रेडियो में नौकरी करने चले आये। इसी अन्तराल में हिन्दी साहित्य के अनेकानेक आयामों और चक्रों से तो परिचित हुए ही, पत्रकारिता के आदर्श और व्यवहार के वैषम्य का भी साक्षात् अनुभव प्राप्त किया। इन आकाशवृत्तियों के लाभ मुख्यतः दो हुए। एक तो हिन्दी की साहित्यिक परिधि के भीतर पैठ और दूसरा-अपना जीवन-पथ निर्माण करने का एक विश्वास। यह विश्वास कुछ आवश्यकता से अधिक ही हुआ और इसी के कारण 1940 में एक बहुत बड़ी गलती सिविल मैरेज करके इन्होंने की। यह शादी बहुत बड़ी चुभन बनी। इस चुभन के कारण, कुछ अपने फ़ासिस्ट-विरोधी विश्वास के उफान में इन्होंने 1942 के आन्दोलन को उपयोगी न समझा और उसी साल दिल्ली में अखिल भारतीय फ़ासिस्ट-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन के बाद में प्रगतिशील लेखक संघ का एक अलग गुट बन गया।

पर उससे इनका सम्बन्ध नहीं था। शाहिद और ये एक साथ थे और कृश्नचन्दर, रामविलास और शिवदानसिंह दूसरी ओर। दोनों विचारधाराओं के लोग अलग-अलग उद्देश्यों से फासिस्ट-विरोधी युद्ध में शरीक हो रहे थे। युद्ध को गलत मानते हुए सुरक्षात्मक युद्ध की अनिवार्यता ये मानते थे। इसीलिए अपने विश्वास को मात्र प्रमाणित करने के लिए युद्ध में 1943 में सम्मिलित हुए। युद्ध के पहले इनका समय अपनी पूर्वपत्नी से अलग मेरठ और दिल्ली में अधिक बीता था। युद्ध में जिस यूनिट में ये सम्मिलित हुए, उसका कार्य प्रतिरोध अभियान (रेजिस्टेंस मूवमेंट) की तैयारी करना था।



प्रमुख कृतियां:

कविता संग्रह: भग्नदूत, चिन्ता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, पूर्वा (इत्यलम् तथा हरी घास पर क्षण भर), सुनहले शैवाल, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे, नदी की बाँक पर छाया, प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोयम्स (अंग्रेजी में) और ऐसा कोई घर आपने देखा है।
कहानी-संग्रह: विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप |
उपन्यास: शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
यात्रा वृत्तांत: अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।
निबंध संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मनेपद, आधुनिक साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल,
संस्मरण: स्मृति लेखा
डायरियां: भवंती, अंतरा और शाश्वती।
विचार गद्य: संवत्‍सर
नाटक: उत्तरप्रियदर्शी

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